About Me

Hailing from one of the most politically engaged areas of India, Eastern UP and after the completion of UG & PG from Gorakhpur University, I have shifted my academic orientation to Area Studies (International Relations). Written dissertation on India's Border Management and accomplished doctorate from SIS, JNU making comparative analysis between two different borders of India with Pakistan and Nepal.

Currently, I am heading the Department of Political Science, Galgotias University and majorly dealing with subjects of theoretical and diplomatic concerns global politics.

I, frequently share my humble opinions and perspectives through popular newspaper, digital mediums, journals and blogs in English as well as in Hindi.




Sunday, December 11, 2016

त्योहारों के रेलें, मेले और भारत

डॉ. श्रीश पाठक

भारत में भानमती के कुनबे बहुत है । ये इसकी खूबसूरती है, पहचान भी और है इसकी मजबूती भी । अपने देश में जाने कितने देश बसते हैं । तरह-तरह के लोग, तरह-तरह की आदतें, रस्में तरह-तरह की और तहजीबें तरह-तरह की । तरह-तरह के पकवान, तरह-तरह के परिधान, तरह-तरह की बोलियाँ और तरह-तरह के त्यौहार । हाँ, त्यौहार...! अपना देश तो त्योहारों का देश है और भारत देश है मेलों का भी । हमारे यहाँ मंडी तो नहीं पर मेलों की रिवायत रही है । कोस-कोस पे पानी का स्वाद बदलता है और तीन-चार कोस पे बोली बदल जाती है और तकरीबन हर पंद्रह-बीस कोस बाद भारत में कोई न कोई मेले का रिवाज मिल जायेगा । प्रसिद्द मेलों की बड़ी लम्बी फेहरिश्त है और कमोबेश पूरे भारत में है यह । मेले जो कभी हर महीने लगते हैं, कुछ बड़े मौसम-परिवर्तन पर लगते हैं और कुछ साल के अंतराल पर लगते हैं । इन सतरंगी मेलों में भांति-भांति के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, एक-दूसरे की खासियतें समझते हैं, जरूरतें साझा करते हैं, रिश्ते बनते हैं, नाटक, खेल देखते हैं, इसप्रकार मेले दरअसल स्थानीयता का उत्सव होते हैं । त्योहारों का भी मूलभूत दर्शन उत्सव ही है । कभी प्रकृति-परिवर्तन का उत्सव है, कभी संबंधों का उत्सव है, कभी फसल पकने का उत्सव है तो कभी आस्था का उत्सव है । आस-पास की प्रत्येक वस्तु की महत्ता समझना, हो रहे हर परिवर्तन का स्वागत करना सिखलाते हैं ये उत्सव, ये त्यौहार ।
भारत का राष्ट्रवाद, पश्चिमी राष्ट्रवाद से मूलतः भिन्न है । पश्चिमी राष्ट्रवाद के हिसाब से चलते तो इस देश के जाने कितने विभाजन सहसा ही हो जाते और यकीन मानिए लोकतंत्र की राह को अपनाने वाला भारत लोकतंत्र के अंतर्गत आने वाले ‘आत्मनिर्णयन के अधिकार (Right to Self-Determination)’ की वज़ह से उन्हें शायद ना रोक पाता ना नाज़ायज ही ठहरा पाता..! पर स्वतंत्रता-संघर्ष के जमाने से ही लड़ते-भिड़ते हमारे युगनायकों ने भविष्य के भारत की यह तस्वीर भांप ली थी और उन्होंने राष्ट्रवाद के भारतीय संस्करण के मूलभूत मायने ही बदल दिए । भारतीय राष्ट्रवाद ‘अनेकता में एकता’ के सिद्धांत पर चलता है । यह Heterogeneity (विभिन्नता-विविधता) का आदर करता है जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद  Homogeneity (समुत्पन्नता-समरूपता) पर आधारित है। हमारे देश के राष्ट्रवाद की करारी नींव में जो इटें जमी हैं वे सतरंगी हैं, वे एक रंग की नहीं हैं । इसलिए जैसे ही और जिस मात्रा में हम साम्प्रदायिक होते हैं, उतनी ही मात्रा में हम राष्ट्रवादी नहीं रह जाते । आँख मूंदकर हम पश्चिमी राष्ट्रों से तुलना करते हैं और उनके राष्ट्रवाद के मानकों से हम अपने सतरंगी समाज के बाशिंदों को चाहते हैं एक ही रंग में रंगना, यहीं चूक होती है ।
भानमती के भिन्न-भिन्न कुनबों से भारत एक राष्ट्र बन सका है तो राष्ट्रवाद की स्वदेशी संकल्पना से ही । राष्ट्रवाद की यह स्वदेशी संकल्पना ‘अनेकता में एकता’ की चाशनी में भीगी-पगी है और आधुनिक राष्ट्रवाद के मानकों को भी संतुष्ट करती है । समझने की जरुरत है कि –भारत की एकता, ‘एक-जैसे’ होने से नहीं हैं बल्कि भारत की एकता, अनेकताओं की मोतियों को एक सूत्र में जोड़ने वाली भारतीय राष्ट्रप्रेम से उर्जा पाती है और निखरती जाती है । जिस क्षण से हमने भारत की विविधता को मान देना समाप्त किया, हमारा राष्ट्रीय कलेवर, सारा ताना-बाना बिखर जायेगा । चर्चिल जैसे लोग हमारे राष्ट्रवाद में अन्तर्निहित कमजोरी देखते थे, मजाक उड़ाते थे, कहते थे-आजादी के पंद्रह साल भीतर ही यह कुनबा बिखर जाएगा, हमने उन्हें गलत साबित किया; हमने जता दिया कि पश्चिमी राष्ट्रवाद जिसकी विश्व कवि रवीन्द्र खुलकर आलोचना करते थे, उस राष्ट्रवाद से विश्वयुद्ध उपजते हैं, यूरोप में छोटे-बड़े कई विभाजन होते हैं, कई छोटे राष्ट्र उभरते हैं, पर भारतीय राष्ट्रवाद से अलग-अलग, तरह-तरह के लोग भी साथ मिलजुलकर उसकी अस्मिता अक्षुण्ण रखते हैं ।
भारतीय राष्ट्रवाद सफल हो सका, अपनी परम्पराओं को निभाने की जीवटता से । अलग-अलग धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, नृजाति, प्रजाति, समुदाय, खान-पान होने के बावजूद सभी लोग उत्साह से सभी के त्योहारों में शामिल होते हैं । सभी उत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं । सरकारें भी इन त्योहारों को मनाती हैं और अपना समसामयिक सहयोग देती हैं । फिर समय-समय पर जगह-जगह आयोजित मेले, पारस्परिक मेलजोल का खूब मौका देते है । सभी, सभी त्योहारों में शामिल हो सकें, मेलों में आमद दुरुस्त बनी रहे, इसमें भारतीय रेलों का महती योगदान है । आज का भी भारत इन रेलों से ही सफ़र करता है । रेलों की शुरुआत भले ही अंग्रेजों ने की हो पर हम भारतीयों ने इसे अंग्रेजीदां नहीं बनने दिया । आम आदमी इसपर चल सके यह प्राथमिकता पर रहा भले ही इसमें घाटे की मार सहनी पड़ी । अंग्रेजों का ध्यान माल ढो मुनाफा बटोर कही और पहुँचाना था हमारा ध्यान देश के हर नागरिक तक रेल पहुँचाने पर अधिक केन्द्रित रहा । इसप्रकार उन्नीस सौ इक्यावन में राष्ट्र को समर्पित इन रेलों ने भारतीय राष्ट्रवाद के मूलमंत्र ‘अनेकता में एकता’ को जीवंत बनाये रखा है । भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है । भारतीय रेल ने भारतीय राष्ट्रवाद के सफ़र में निर्णायक अप्रतिम  योगदान दिया है और यह जारी है ।
भारतीय रेलवे का महत्त्व इन अर्थों में रेखांकित किया जाना आवश्यक है । इसे निजी हाथों में सौपना, इसे बस एक वस्तु समझना है, जिसे गाहे-बगाहे बाजार में धकिया दिया जाना है । भारतीय रेलवे एक बड़ा कार्यस्थल है, इसका एक राष्ट्रीय महत्त्व है, यह देश के बड़े गतिमान प्रतीकों में है । उन्नीस सौ चौबीस में अकवर्थ कमिटी ने इसकी तत्कालीन महत्ता समझते हुए  आम बजट से इतर इसका बजट बनाने की अनुशंसा की थी ताकि यह सही मायनों में स्वायत्त रह सके, और संसाधनों की कमी इसके महत्त्व की पूर्ती के मार्ग में ना आये । भारत सरकार इसका बजट अगर आम बजट में ही जोड़ने की तैयारी में है तो यकीनन यह इसके सांगोपांग आयामों की अवहेलना है ।
C:\Users\Shree Tab\AppData\Local\Microsoft\Windows\INetCache\IE\2QF3WLOX\writing-pen-clean-black-icon-25429206[1].jpgडॉ. श्रीश  

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