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Friday, June 15, 2018

झटके में इतिहास बनाने वाली मुलाकात




दुनिया भर से आये तकरीबन ढाई हजार से अधिक पत्रकार सिंगापुर के खूबसूरत द्वीप सेंटोसा में इस दशक की बहुप्रतीक्षित भेंट ‘डोनॉल्ड ट्रम्प- किम जोंग-उन’ के साक्षी बने और इस भेंट के एक प्रमुख सूत्रधार दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए-इन ने अमेरिका और उत्तर कोरिया के इस ‘सेंटोसा एग्रीमेंट’ को आख़िरी बचे शीतकालीन अवशेष को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका वाला बताया। यकीनन, विश्व कूटनीति का यह एक शानदार पड़ाव था। कोरियाई द्वीप 1910 से 1945 ई. तक जापानी नियंत्रण में रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में जब अमेरिका-ब्रिटेन-सोवियत संघ के संयुक्त नेतृत्व में हिरोशिमा-नागासाकी की भीषण विभीषिका के बाद जापान ने पराजय स्वीकार कर ली तब कोरिया की सीमाओं से लगे सोवियत संघ और प्रमुख विश्व शक्ति अमेरिका ने कोरिया को विभाजित करने का निर्णय किया। 1950 में सोवियत संचालित उत्तर कोरिया के शासक किम इल-संग और अमेरिका द्वारा संचालित दक्षिण कोरिया के शासक सिंगमन री में समूचे कोरिया को हथियाने के लिए भयानक संघर्ष छिड़ पड़ा. अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री डीन एचेसन ने एक बार कहा था कि दुनिया के सबसे बेहतरीन विशेषज्ञों से यदि सबसे भयानक युद्ध स्थल के बारे में पूछा जाए तो एक स्वर में जवाब कोरियाई प्रायद्वीप होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमन और चीन के माओ जेदांग किसी कीमत पर यह संघर्ष जीतना चाहते थे। 1953 में आख़िरकार युद्धविराम घोषित किया गया जिसमें 38वें समानांतर अक्षांश के उत्तर में नयी सीमा खींची गयी और उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया के मध्य दो मील चौड़ा एक क्षेत्र छोड़ा गया जिसे ‘असैन्य क्षेत्र (DMZ)’ कहा गया। 

जबतक सोवियत संघ अस्तित्व में रहा उत्तर कोरिया बड़ी तेजी से दक्षिण कोरिया की ही तरह प्रगति करता रहा लेकिन सोवियत संघ के विघटित होते ही उत्तर कोरिया विकास की होड़ में दक्षिण कोरिया से बहुत पिछड़ता रहा। किम इल-संग के बाद किम जोंग-इल के समय में उत्तर कोरिया एक बैरकों में बंद देश बनता गया और देश की पिछड़ती अर्थव्यवस्था ने गरीबी और बेरोजगारी को सम्हालने से हाथ खड़े कर दिए। जोंग-इल ने दमन और मिलिटरी मजबूती का दामन पकड़ा जिसमें घोषित-अघोषित रूप से रूस और चीन का साथ मिलता रहा। जोंग-इल के उत्तराधिकारी किम जोंग-उन ने जब 27 वर्ष की उम्र में बागडोर सम्हाली तो उत्तर कोरिया में एक बदलाव देखा गया, लेकिन जोंग-उन अपने देश के भीतर ही मिसाइलों और परमाण्विक आयुध विकास पर काम करते रहे। इस वक्त तक पुतिन और शी जिनपिंग के निर्बाध नेतृत्व वाले रूस और चीन अपनी बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्टतया उजागर करने लगे। चीन, रूस और परमाणु आग्रही उत्तर कोरिया मिलकर एशिया में दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के द्वारा निर्मित शक्ति संतुलन को चुनौती देने लगे। अमेरिका के नेतृत्व में भारत, जापान, आस्ट्रेलिया को मिलाकर एक अनौपचारिक सामरिक समूह चतुष्क (क्वाड) गढ़ा गया जिससे समूचे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रूस-चीन-उ. कोरिया संगति को संतुलित किया जा सके। भड़काऊ बयानों, मिसाइल परीक्षणों और रूस-चीन-अमेरिका के परस्पर मतभेदों से कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव कुछ कदर बढ़ा कि आये दिन विश्लेषक इस संघर्ष में नवशीत युद्ध की झलक निरखने लगे। मार्च, 2017 में उत्तर कोरिया के जापान की ओर चार बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण के बाद, अमेरिकी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने कहा कि विश्व शांति के विरुद्ध उत्तर कोरिया का भय एक नवीन चरण में प्रवेश कर चुका है। मई 2017 में ट्रम्प ने जोंग-उन को परमाणु हथियारों वाला ‘मैडमैन’ कहा। जून 2017 में अमेरिका ने उ. कोरिया पर प्रतिबन्ध लगाए और जुलाई 2017 में उ. कोरिया ने मिसाइल परीक्षण किया जिसकी जद में संभवतः अमेरिका का अलास्का प्रान्त आता है। सितम्बर, 2017 में संयुक्त राष्ट्र संघ में ट्रम्प ने उ. कोरिया को पूरी तरह तहस-नहस करने की चेतावनी दी और संयुक्त राष्ट्र संघ ने उ. कोरिया पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाया। जवाब में किम जोंग-उन ने भी ट्रम्प को मासिक विक्षिप्त करार देते हुए कहा कि भयभीत स्वान भूँकता अधिक है। 

ट्रम्प अपनी विदेश नीति में जबसे खुलकर कारोबारी रुख अपना रहे हैं तब से उनके सहयोगी अपनी वैदेशिक नीतियों में खासा अनिश्चित हो रहे हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को अमेरिकी प्रभाव से लाभ है तो वैश्विक जिम्मेदारी मिलकर उठानी होगी। इससे पहले सहयोगी यह मानते रहे कि सुपरपॉवर शक्ति होने के नाते यह महज अमेरिका की जिम्मेदारी है। नवम्बर, 2017 में जब ट्रंप अपने बारह दिवसीय इंडो-पैसिफिक यात्रा में दक्षिण कोरिया पहुंचे तो उन्होने अपना यह रुख स्पष्ट कर दिया था। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जाए-इन, जो कोरियाई मैत्री के नारे से चुनकर सत्ता तक पहुंचे हैं, अपने देश की किसी वैश्विक कूटनीतिक भूमिका के लिए तैयार नहीं थे और उन्होने उ. कोरिया के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर काम करना शुरू कर दिया। नतीजा बेहद सकारात्मक रहा क्योंकि उ. कोरिया के नए तानाशाह शासक जोंग-उन अपने देश की चरमराती अर्थव्यवस्था से वाक़िफ़ हैं और दक्षिण कोरिया के मैत्री भाव से उत्तर कोरिया के अस्तित्व को लेकर जो उनकी असुरक्षा है, वह भी जाती रहेगी। मार्च, 2018 में अमेरिका और उ. कोरिया दोनों ने ट्रंप-किम भेंटवार्ता की संभावनाओं की घोषणा कर विश्व को चौंका दिया। 8 मई, 2018 को उ. कोरिया ने तीन अमेरिकी बंदियों को मुक्त किया तो ट्रंप ने मुलाकात की तारीख 12 जून तय कर दी। सहसा, उ. कोरिया ने 15 मई को दक्षिण कोरिया से चल रही अपनी वार्ता, प्रस्तावित अमेरिका-द. कोरिया मिलिट्री अभ्यास की चर्चा करके स्थगित कर दी। ट्रंप ने भी बेहद गुस्से और शत्रु भाव में एक चिट्ठी लिखकर 12 जून की प्रस्तावित भेंटवार्ता स्थगित कर दी। अंततः जब किम जोंग-उन ने पंगये-री के अपने न्यूक्लियर परीक्षण स्थल को खत्म करने की घोषणा की तो 1 जून को ट्रंप ने 12 जून की भेंटवार्ता को बहाल करने की घोषणा की। 

12 जून को ट्रंप और जोंग-उन ने जब सिंगापुर के सेंटोसा में 13 सेकेंड का अपना पहला हैंडशेक किया तो कोरियाई प्रायद्वीप, जापान सहित समूचे विश्व के लिए यह अभूतपूर्व क्षण था। इकहत्तर वर्षीय ट्रंप बेहद उत्साहित दिखे वहीं चौतीस वर्षीय जोंग-उन संयमित बने रहे। ट्रंप ने मुलाकात को बेहद सकारात्मक और उम्मीद से बढ़कर करार दिया वहीं जोंग-उन ने कहा कि यहाँ तक आने के लिए अतीत के फंदों से निकलकर आना पड़ा है। सेंटोसा समझौते में तीन महत्वपूर्ण विकास हुए। पहला, उ. कोरिया ने सतत व स्थायी शांति के लिए पूर्ण कोरियाई परमाण्विक निःशस्त्रीकरण पर अपनी प्रतिबद्धता जतायी। दूसरा, अमेरिका ने इसके बदले उ. कोरिया को सुरक्षा की गारंटी प्रदान की। तीसरा, दोनों पक्षों ने एक नये संबंध की नींव रखने की मंसा प्रकट की। उत्साहित ट्रंप ने जोंग-उन को दक्षिण कोरिया के साथ चलने वाले अमेरिकी मिलिट्री ड्रिल बंद करने का आश्वासन भी दिया, जिसपर द. कोरिया ने चिंता भी व्यक्त कर दी कि सहूलियत बड़ी शीघ्रता से दी जा रही। इस भेंटवार्ता को दोनों नेता अपनी-अपनी उपलब्धि मानकर चल रहे हैं। ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में उतरना है और अपने किसी पूर्ववर्ती से अलग उ. कोरिया को सुरक्षा बंदोबस्त देने की बात कहकर वे अपने लिए एक माइलेज तो बना ही रहे हैं, वहीं किम जोंग-उन कुछ वैसा कर गए हैं जैसा कि उनके किसी पूर्ववर्ती तो क्या कोई कोरियाई सपने में भी सोच सकता था। 

यह समझौता विश्व शांति की दृष्टि से यकीनन एक मील का पत्थर है परंतु कुछ आशंकाएं अवश्य ही हैं। समझौते में समयसीमा और शर्तों पर कोई स्पष्टता नहीं है। समझौते के तुरंत बाद जहाँ ईरान ने यह कहकर चुटकी ली कि जोंग-उन को होशियार रहना चाहिए, ट्रंप अमेरिका पहुंचते-पहुंचते समझौता खारिज कर सकते हैं वहीं भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में समझौते की मुबारकबाद देते हुए उ. कोरिया के परमाण्विक सूत्र पर दृष्टि रखने की नसीहत दी जो कि भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) में है। इस समझौता बैठक के बाद भी चीन और रूस की भूमिका एक मूक दर्शक की तो नहीं ही होगी। गौरतलब है कि किम जोंग-उन अपना पहला विदेशी दौरा मार्च, 2018 में चीन का ही किया था। मई, 2018 में एक बार फिर जोंग-उन, शी जिनपिंग से मिलने चीन गए। चीन और रूस इस समझौते से अमेरिकी खतरा क्षेत्र में कम होने से राहत की साँस ले रहे होंगे लेकिन क्षेत्र में अपनी भूमिका के स्थायित्व को लेकर अवश्य ही सजग होंगे। आने वाले समय में जबकि किम जोंग-उन ने अमेरिका आने का ट्रंप का न्यौता स्वीकार कर लिया है सेंटोसा से शांति का सबक तभी धुंधला नहीं पड़ेगा जब अमेरिका, दक्षिण कोरिया और उ. कोरिया सहयोग और शांति के अधिकाधिक आयाम विकसित करें और जापान, रूस के साथ-साथ चीन भी शांति में ही दूरगामी विकास की संभावना देखे। 

Sunday, February 11, 2018

मालदीव संकट और भारत



महज सवा चार लाख की आबादी वाले छोटे से देश मालदीव ने अपने राजनीतिक संकट से पूरी दुनिया की नज़र भारत पर केंद्रित कर दी है। मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने मालदीव के पहले लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद सहित हाई प्रोफ़ाइल नौ राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और 12 सांसदों की सदस्यता बहाल करने का निर्देश दिया। संसद सदस्यता के बहाल होने का अर्थ यह है कि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की सरकार अल्पमत में आ जाएगी और उनके विरुद्ध संसद महाभियोग पारित कर सकेगी। यामीन ने खतरा भांपते हुए और संभवतः अपना आखिरी दांव चलते हुए देश में 15 दिवसीय आपातकाल की घोषणा कर संसदीय कामकाज सहित सारे कामकाज ठप कर दिए हैं, आशंका है वे इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं । उनके निर्देश पर सेना ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व यामीन के भाई पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया है तथा संसद को घेर लिया है। निर्वासित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भारत से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाई है और अमेरिका से भी मदद की दरख्वास्त की है। भारत ने कड़े शब्दों में मालदीव से लोकतंत्र बहाली की अपील तो जरूर की है पर किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर एक चुप्पी बनाई हुई है। तीस साल पहले 1988 में भी जब कुछ स्थानीय व्यापारियों की शह पर तमिल आतंकवादियों की सहायता से गयूम की सरकार को अपदस्थ करने की साजिश रची गयी थी तो गयूम की गुहार पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने नौ घंटे के भीतर ही भारतीय सैन्य टुकड़ी भेजकर गयूम की सत्ता बहाल की थी। एकबार फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से लोकतंत्र बचाने की गुहार लगाई गयी है। भारत के पास चुनने के जो विकल्प हैं, यकीनन कोई उनमें से आसान नहीं हैं।

1965 में ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता से मुक्त होने के बाद मालदीव में  सल्तनत राजशाही 1968 के जनमत संग्रह तक चलती रही जब इब्राहिम नासिर के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना हुई। 1978 से मालदीव में मौमून अब्दुल गयूम का काल शुरू हुआ जो लोकतान्त्रिक तो नहीं रहा किन्तु मालदीव को एक राजनीतिक स्थिरता मिली, जिसकी लम्बे समय से दरकार थी। गयूम हिंदमहासागर में विश्व-शक्तियों का हस्तक्षेप नहीं चाहते रहे। मालदीव की इस विदेश नीति के साथ उसकी राजनीतिक स्थिरता भारत के हित में थी, इसलिए 1988 के गयूम शासन के तख्तापलट को भारत ने सैन्य हस्तक्षेप से सफलतापूर्वक रोक लिया था। 2003 में पेशे से पत्रकार मोहम्मद नशीद ने मालदीवियन डेमोक्रैटिक पार्टी का गठन किया और गयूम प्रशासन पर राजनीतिक सुधारों के लिए दबाव बनाया। नागरिक समाज के लोकतान्त्रिक आंदोलनों से आखिरकार 2008 में मालदीव को नया लोकतान्त्रिक संविधान मिला जो बहुदलीय व्यवस्था प्रणाली पर आधारित था। अक्टूबर 2008 में चुनाव हुए और गयूम को हराकर विपक्षी नेता मोहम्मद नशीद नवम्बर, 2008 में देश के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति चुने गए। तीन साल बाद ही नशीद सरकार को राजनीतिक संकट से जूझना पड़ा और आखिरकार 2012 में नशीद को त्यागपत्र देना पड़ा। 2013 के नवम्बर में गयूम के प्रयासों से उनके भाई अब्दुल्ला यामीन ने राष्ट्रपति की कुर्सी अपने नाम की और तबसे यामीन और नशीद में राजनीतिक संघर्ष जारी है। 

1988 से 2013 और 2018 तक मालदीव के राजनीतिक परिदृश्य में कई तब्दीलियां हुई हैं। मोहम्मद नशीद ने राष्ट्रपति रहते देश की पर्यटन नीति में जो बदलाव किये थे उनसे अब्दुल गयूम और अब्दुल्ला यामीन के आर्थिक हितों को ठेस लगी थी। फिर नशीद ने देश के कुछ द्वीपों को सामरिक हितों के लिए ब्रिटेन और अमेरिका को प्रयोग करने की इजाजत दे दी थी जो गयूम की विश्व-शक्तियों को हिन्द महासागर क्षेत्र से बाहर रखने की नीति से भी अलग थी। इस बीच सबसे रुचिकर राजनीतिक विकास यह हुआ कि गयूम और यामीन में आपस में ही ठन गयी है । यामीन ने गयूम के बेटे पर गंभीर आरोप लगाए हैं और अब गयूम विपक्षी पाले में दिखाई दे रहे हैं। गयूम की राजनीति में इस्लामिक राष्ट्रवाद के लिए जगह रही है, उन्होंने इस्लाम को मालदीव का राज्यधर्म भी घोषित किया। मालदीव की नजदीकियाँ पाकिस्तान और अरब राज्यों से भी रही हैं। यह स्थिति मालदीव को देर-सबेर चीन के करीब ले ही जाती, जबकि शी जिनपिंग का चीन अपने आक्रामक ओबोर नीति से तेजी से हिन्द महासागर क्षेत्र में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। 

हिन्द महासागर सामरिक दृष्टि से इस समय सबसे महत्वपूर्ण हो चला है। अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य के बीच की समस्त व्यापारिक गतिविधियाँ हिन्द महासागर से होती हैं। चीन की क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता और रूस व पाकिस्तान की चीन के साथ जुगलबंदी ने ब्रिटेन-अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत को विवश किया है कि वे हिन्द महासागर को अधिक तवज्जो दें। जुलाई 2017 में संपन्न मालाबार नौसेना अभ्यास और बहुप्रसिद्ध चतुष्क (क्वाड) इसी शृंखला का एक सामरिक विकास है। डियागो गार्सिआ, एक सामरिक लघुद्वीप जो ब्रिटेन-अमेरिका-भारत के संयुक्त निगरानी में संचालित है, क्षेत्र पर निर्णायक पकड़ बनाने में मदद करता है और चीन की स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स नीति को संतुलित करता है। यहाँ, मारीशस का चागोस प्रायद्वीप के लिए चीन की तरफ सौदेबाजी के लिए उद्यत होना भी ध्यान में रखा जाना चाहिए जो ब्रिटेन-अमेरिका के सामरिक हितों के विरूद्ध विकास है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद चीन ने मालदीव के साथ मुक्त व्यापार समझौता संपन्न कर लिया है और श्रीलंका, मारीशस के साथ बेहद तेजी के साथ इस दिशा में वार्त्ता जारी है। इससे क्षेत्र में चीन की बढ़ती पकड़ का अंदाजा लगता है।  

भारत के कूटनीतिक कुटुंब के पास मालदीव संकट पर चुप रह जाने का विकल्प ही नहीं है। चुप्पी का अर्थ यामीन सरकार के अलोकतांत्रिक कदम का समर्थन कर देना होगा। मालदीव की तरफ से हस्तक्षेप का जो आग्रह है वह 1988 की तरह आधिकारिक नहीं है, अपितु यह निर्वासित राष्ट्रपति नशीद की तरफ से है। 1988 में हिन्द महासागर में चीन का दखल नहीं था जो आज के मालदीव सरकार का निर्णायक मित्र है। यामीन ने इस संकट पर अपने विशेष दूत अपने मित्र देशों यथा- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को भेज दिए हैं। बाद में भारत से भी संवाद की कोशिश की गयी, जिसे भारत ने यामीन सरकार की प्राथमिकताओं को समझने के बाद ठुकरा दिया। यामीन सरकार ने भी यूरोपीय यूनियन और श्रीलंका के विशेष दूतों से माले में मिलने से इंकार कर दिया है। ज़ाहिर है यामीन सरकार चाहती है कि चीन ही अपनी प्रभावी भूमिका से उनकी सरकार बचा ले । किन्तु चीन ने मालदीव सरकार को इस संकट से निपटने में सक्षम बताते हुए यह संकेत दिए हैं कि उसकी मंसा है कि कोई भी वाह्यशक्ति इस आंतरिक संकट में हस्तक्षेप न करे। चीनी अधिकारियों ने अपने भारतीय समकक्षों को भी आपसी द्विपक्षीय संबंधों में कोई दूसरा विवादित बिंदु न जोड़ने का आग्रह किया है। चीन ने अपने मालदीव पर्यटकों को कुछ सुरक्षा निर्देश भी जारी किये हैं। चीन ने अभी तक किसी मित्र देश के लिए खुलकर सामरिक हस्तक्षेप नहीं किया है इसलिए मालदीव में भी इसकी सम्भावना कम ही है। 

इस संकट पर पश्चिमी जगत एकमत हैं कि लोकतंत्र बहाली के तर्क से भारत को किसी भी प्रकार के आवश्यक हस्तक्षेप के लिए तैयार रहना चाहिए। ट्रम्प के अमेरिका की यह रट रही है कि भारत को अपनी वैश्विक भूमिका निभानी चाहिए। अमेरिका, भारत, पाकिस्तान, चीन, सऊदी अरब और यूरोपीय यूनियन आपस में मालदीव संकट पर अलग-अलग स्तरों पर वार्त्तारत हैं और बारीकी से मामले को देख रहे हैं। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत अपनी भूमिका से बच नहीं सकता, विश्व-शक्ति भूमिका के अपने खतरे तो हैं ही किन्तु अक्रियता अन्ततः मालदीव को भारत से दूर ले जाएगी और भारतीय कूटनीतिक साख को भी मद्धम करेगी। भारत के पास प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का विकल्प तो है, किन्तु निश्चिततः यह अंतिम विकल्प है क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप अविश्वासों और विवादों का नया सिलसिला शुरू करेगा और फिर हिन्द क्षेत्र आँगन में वाह्य विश्व-शक्तियों का हस्तक्षेप और बढ़ जायेगा। भारत के पास कूटनीतिक विकल्प उपलब्ध हैं। संयुक्त राष्ट्र विशेष दल की निगरानी में मालदीव में लोकतंत्र बहाली के प्रयास किये जा सकते हैं। भारत की यह कोशिश रहनी चाहिए कि अपने कूटनीतिक प्रभाव का प्रयोग करके अमेरिका, सऊदी अरब, यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय समाज के संयुक्त दबाव से चीन के प्रभाव को कम किया जाए और मालदीव में लोकतंत्र बहाली की जाय।  

Friday, January 5, 2018

पाकिस्तान पर दबाव बनाने के पीछे कहीं अमेरिका की ये रणनीति तो नहीं


"अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण रीति से पिछले पंद्रह सालों में सहायता के नाम पर तैतीस बिलियन से भी अधिक राशि पाकिस्तान को दी है, और उन्होंने हमें बस झूठ, धोखा दिया है कि जैसे हमारे नेता मूर्ख हों। उन्होंने उन आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह दी, जिन आतंकवादियों को हम अफ़ग़ानिस्तान में उनकी थोड़ी सहायता से खोज रहे थे। … अब नहीं !"

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने नए साल के अपने छठे ट्वीट से दक्षिण एशियाई, खासकर पाकिस्तानी राजनीति में खलबली मचा दी। ट्रम्प के बयानों को लेकर विश्लेषक कुछ पसोपेस में रहते हैं, जो अक्सर अस्पष्ट, विरोधाभासी और सनसनीखेज होते हैं, किन्तु यह ट्वीट बेहद करारा, स्पष्ट और निर्णायक था। भारत-अमेरिकी रिश्तों की तुलना में अमेरिकी-पाकिस्तानी रिश्ते ज्यादा गहरे और शीतकालीन समय के जांचे-परखे रिश्ते रहे हैं, ऐसे में जबकि भारत-अमेरिका रिश्तों की ऊष्मा बढ़ रही तो भारत के लिए भी यह ट्वीट खास मानी गयी। 

ट्रम्प के इस ट्वीट के बाद पाकिस्तान की तिलमिलाहट साफ़ दिखी और पाकिस्तान के विदेश मंत्री जनाब ख्वाजा मोहम्मद आसिफ साहब ने उसी ट्विटर पर कई करारे जवाब दिये और लिखा कि जल्द ही पाकिस्तान ट्रम्प को जवाब देगा और सच और झूठ अलग-अलग हो जायेंगे। पाकिस्तान ने अमेरिकी राजदूत डेविड हेल को इस सन्दर्भ में तलब किया और प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी की अध्यक्षता में राष्टीय सुरक्षा समिति (एन.एस.सी.) की बैठक हुई जिसमें हाल-फिलहाल कई स्तरों से की जा रही देश की अमेरिकी आलोचनाओं पर बात हुई। पाकिस्तान-अमेरिका के रिश्तों में ठंडक की सुगबुगाहट कम-अधिक एक अरसे से दिख रही है पर दिसंबर से यह सर्द सतह पर नजर आने लगी है। दिसंबर में अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने पाकिस्तान की अपनी यात्रा में अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रयासों में उसकी सिकुड़ी भूमिका की कई बार आलोचना की। फिर तो इसी मुद्दे के बहाने अमेरिकी अधिकारियों के बयानों की झड़ी लगती रही, कभी विदेश सचिव रेक्स टिलरसन, कभी निकी हैले तो कभी जेम्स मैटिस और कई मंचों पर कई बार राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पाकिस्तान की खिंचाई की। अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के मसविदे में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की आलोचना की। पाकिस्तान को दी जा रही नॉन नाटो रक्षा सहूलियतों में कटौती की बात की गयी और निकी हैले के हवाले से पाकिस्तान को दी जाने वाली 255 मिलियन डॉलर की सहायता राशि को फ़िलहाल स्थगित करने की सुचना दी गयी। 

अमेरिका और पाकिस्तान के ऐतिहासिक रिश्तों की प्रकृति हमेशा से सामरिक रही है जिसमें ‘आदान-प्रदान’ की मुख्य भूमिका रही है और यह रिश्ता एक विश्व-शक्ति का एक क्षेत्रीय राष्ट्र से था। विश्व-राजनीति में विश्व-शक्ति होने का एक व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि वह ग्लोब के प्रत्येक सामरिक क्षेत्रों में उसका एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि होना चाहिए जो उस क्षेत्र-विशेष में उसके हितों को सुनिश्चित करने में मदद करे। पाकिस्तान ने वह भूमिका अपने लिए स्वीकार कर ली। ब्रिटिश दासता से मुक्ति के पश्चात् जहाँ भारत ने स्वतंत्र विदेश नीति की चाह में निर्गुट आंदोलन की राह पकड़ी, वहीं पाकिस्तान ने अमेरिकी गुट में शामिल होना मुफीद समझा। अमेरिका ने पाकिस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाया और पाकिस्तान को रक्षा और आर्थिक सहायता मिलती रही। जब भी इस लेन-देन में किसी भी पक्ष से कसर रही, आपसी रिश्तों में खींचातानी देखने को मिली। 1971 तक अमेरिका, भारत और पाकिस्तान दोनों से ही सामरिक रिश्तों की जुगत में लगा रहा ताकि अमेरिका के पास सौदेबाजी की शक्ति (बार्गेनिंग) बनी रहे और एशिया क्षेत्र में वह निर्णायक बना रहे। हालाँकि अमेरिका के रिश्ते पाकिस्तान से ही प्रगाढ़ रहे, भारत से रिश्तों में एक हिचक ही बनी रही। फिर 1998 के परमाण्विक परीक्षण के बाद अमेरिकी उप विदेश सचिव स्ट्रोब टालबोट और तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह की अट्ठारह राउंड की भारतीय लिहाज से बेहद सफल वार्ता हुई जिसके के बाद से ही अमेरिका-भारत के रिश्तों की नयी मजबूत बुनियाद पड़ी। 

ट्रम्प के ट्वीट में पिछले पंद्रह सालों का हवाला दिया है। स्पष्ट है कि ओसामा बिन लादेन को पकड़ने की एबोटाबाद ऑपरेशन तक के पाकिस्तानी सहयोग को चिन्हित किया गया है और उसके बाद के पाकिस्तानी सहयोग को ‘बहुत थोड़ा और विरोधाभासी’ कहा गया है। निश्चित ही साल 2012 पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में एक महत्वपूर्ण साल है। अमेरिका के एबोटाबाद ऑपरेशन की पाकिस्तान की भीतरी राजनीति में बेहद आलोचना हुई। एक तो ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तानी मिलिटरी बेस के भीतर सुरक्षित पाया जाना और फिर अमेरिका का एकतरफा ऑपरेशन जिसमें पाकिस्तानी सरकार कुछ यों पेश आयी कि उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था; इसे पाकिस्तानी संप्रभुता का भीषण हनन माना गया और जो था भी। इससे पहले परवेज़ मुशर्रफ ने 2009 में खुलकर स्वीकार कर लिया था कि अमेरिकी सहायता का एक बड़ा हिस्सा भारत के खिलाफ पाकिस्तानी रक्षा बजट में खर्च किया जाता है। फिर इधर अमेरिका के रिश्ते जितने ही भारत से बढ़ते गए, पाकिस्तान के रिश्ते उभरते विश्व शक्ति चीन से बढ़ते गए। भारत से अमेरिकी मेलजोल जहाँ पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा था वहीं चीन से पाकिस्तानी मेलजोल अमेरिका को पसंद नहीं था। बदलते विश्व-राजनीति में पाकिस्तान के हितों के लिए एक मजबूत पड़ोसी के रूप में चीन से संबंध निश्चित ही मुफीद है जो कि भारत-चीन के खट्टे रिश्तों को देखते हुए पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर के भारत-विरोध को भी तुष्ट करता है। फिर चीन न केवल भौतिक रूप से पाकिस्तान से अधिक सम्बद्ध है अपितु आर्थिक और सामरिक परिप्रेक्ष्य में भी यह तब और अनुकूल हो जाता है जब इस समीकरण में महत्वाकांक्षी पुतिन का रूस भी शामिल हो जाता है। अमेरिकी नाराजगी के मूल में महज पाकिस्तान से ‘अफग़ानिस्तान में अपेक्षित सहयोग’ का मिलना ही नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान का धीरे-धीरे चीन, रूस और उत्तर कोरिया के साथ सम्बद्ध हो जाना है। अफगानिस्तान कार्ड तो महज एक दबाव की कार्यनीति है। चीन की ओबोर नीति और बढ़ती सामरिक सक्रियता ने ही अमेरिका को मजबूर किया है कि वह दक्षिण एशिया क्षेत्र को एशिया-प्रशांत क्षेत्र की वृहद् दृष्टि से देखे, जिसमें चीनी सामरिक प्रभाव को भारतीय केंद्रीय भूमिका से संतुलित किया जा सके। 

दरअसल चीन-रूस-पाकिस्तान-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) के जवाब में ही अमेरिका-भारत-जापान-आस्ट्रेलिया का चतुष्क (क्वाड) निर्मित किया गया है और ट्रम्प का यह ट्वीट और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा की जा रही लगातार आलोचना एंटीक्वाड की एक प्रमुख धुरी पाकिस्तान पर दबाव बनाकर इसी एंटीक्वाड को  कमजोर करने की रणनीति है। व्यवसायी ट्रम्प की राजनीतिक शैली वैश्वीकरण के दौर की प्रचलित मल्टीलैटरलिज्म (बहुपक्षीयवाद) के स्थान पर बाईलैटरलिज्म (द्विपक्षीयवाद) की है जो ट्रम्प की संरक्षणवादी ‘अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी’ से भी मेल खाती है और अमेरिकी प्रभुत्व को मिलने वाली बहुपक्षीयवाद की चुनौती से भी सुरक्षा मिलती है। द्विपक्षीयवाद नीति में ट्रम्प अपने प्रत्येक सहयोगी राष्ट्र से  उनकी भूमिका की जवाबदेही स्पष्ट चाहते हैं, जिसके एवज में उन्हें अमेरिकी तवज्जो दी जाती है। इस साल नवम्बर में अमेरिका में कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों की सम्भावना ट्रम्प को अमेरिकी अवाम के नजर में सक्रिय और अमेरिकी डॉलर व अमेरिकी हितों के लिए प्रतिबद्ध दिखते रहने को मजबूर करती है। ट्रम्प के चुनावी वादे ही हैं जो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति के जान-माल के नुकसानों को न्यूनतम करने के उद्देश्य से पाकिस्तान और भारत से अफ़ग़ानिस्तान में और अधिक सक्रियता की बार-बार मांग करते हैं। यकीनन, अमेरिका के रिश्ते भारत से मजबूत हो रहे हैं और पाकिस्तान से उनके रिश्तों में तनाव है पर भू-राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए अमेरिका का पाकिस्तान से रिश्तों में तनाव की दीर्घकालिक सम्भावना तलाशना कठिन ही है।  

Tuesday, January 2, 2018

2017: भारतीय कूटनीति का लेखा-जोखा



पिछला साल महज उपलब्धियों वाला नहीं रहा है, अपितु भारतीय कूटनीति के लिए कई सबक देकर यह वर्ष विदा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के अभिकरण इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में भारतीय जज दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति भारत की जबरदस्त कूटनीतिक विजय मानी गयी पर उसी संयुक्त राष्ट्र का लोकतंत्रीकरण करने के लिए सरंचनात्मक सुधार करते हुए सुरक्षा परिषद् में भारत की वीटोसहित सदस्यता के भारतीय प्रयासों में ठंडक बनी रही। यदा-कदा आते-जाते कई देशों के भारतीय अतिथि इस मुद्दे पर भारतीय पक्ष लेते रहे पर कुछ भी ठोस प्रगति नहीं हुई। भारत से अपने संबंधों में एक उन्नत स्तर की समझ की दुहाई देने वाला अमेरिका भी अपने रवैये में ढुलमुल ही रहा। पड़ोसी चीन ने तो कभी भी इस मुद्दे पर भारत का समर्थन नहीं ही किया अपितु वह कहता रहा कि सुधारों का यह उपयुक्त समय ही नहीं है। भारत समझ सकता है कि भारत के हित उसके विश्व सहयोगियों को भी वहीं तक स्वीकार्य होंगे जहाँ तक उनके हित को कोई असुरक्षा न हो। 

चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भी भारत की सदस्यता का पुरजोर विरोध किया। एनएसजी, परमाणु आपूर्ति राष्ट्रों का एक समूह है जो परमाणु तकनीक के प्रयोग/दुष्प्रयोग पर नियंत्रण रखती है। ध्यातव्य है कि विश्व में शस्त्र व तकनीक -नियंत्रण के लिए चार अनौपचारिक समितियाँ यथा- एनएसजी, एमटीसीआर, आस्ट्रेलिया समूह और डब्ल्यू ए , कार्य करती हैं, जिनकी सहमति से ही कोई राष्ट्र अपने विभिन्न प्रकार के शस्त्रों का निर्माण व प्रयोग कर सकता है, इसमें शस्त्र-नियंत्रण की मंशा मूल है। साधारणतया, इन समितियों में सदस्यता के लिए परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) एवं व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर करना आवश्यक है, किन्तु  अपवाद रूप से दूसरे कई देश भी हैं, जिन्होंने बिना इन संधियों पर हस्ताक्षर किये भी इनमें से कुछ समितियों के सदस्य हैं। फिर, 2008 के अमेरिका के साथ हुए भारत के परमाणु समझौते में स्पष्ट था कि आने वाले दिनों में अमेरिका इन समितियों की सदस्यता के लिए भारत की मदद करेगा। अमेरिका ने जब तब मदद की भी है और भारतीय कूटनीतिक श्रम के साथ देश को एमटीसीआर और डब्ल्यू ए की सदस्यता मिल भी चुकी है। जहाँ आस्ट्रेलिया ग्रुप में सदस्यता के लिए भारत लगभग आश्वस्त है वहीं एनएसजी की सदस्यता में सर्वाधिक अड़ंगा चीन की तरफ से है। एक रुचिकर बात यह भी है कि चीन स्वयं भी अभी डब्ल्यू ए की सदस्यता के लिए प्रयासरत है और भारत का कूटनीतिक कुटुंब डब्ल्यू ए में अपने निर्णायक भूमिका के चलते सौदेबाजी की सुन्दर स्थिति में है। 

आज के वैश्वीकरण की विश्व-राजनीति में उत्तर-दक्षिण विभाजन जैसी शब्दावली अब उतनी प्रासंगिक नहीं मानी जाती किन्तु मुद्दा यदि पर्यावरण का और खाद्य-सुरक्षा का हो तो यह विभाजन पूरी तरह हर वर्ष सतह से ऊपर आ जाता है। भारत जैसे विकासोन्मुख और औपनिवेशिक अतीत वाले देश अभी भी अपनी अर्थव्यवस्था में कृषि पर एक निर्णायक स्तर तक निर्भर हैं। किन्तु विश्व बैंक का प्रभावी गुट, विभिन्न देशों के द्वारा दी जा रही कृषि सहायता पर खासा नियंत्रण लगाना चाहता है। इन देशों की खाद्य सुरक्षा-अधिकारों के प्रति अमेरिका न केवल असंवेदनशील है बल्कि उसने विकसित पश्चिमी शक्तियों के साथ सुर मिलाते हुए इन देशों की मांग को नज़रअंदाज भी कर दिया। फ़िलहाल, 2013 के ‘शांति-अनुच्छेद’ से यथास्थिति बरकरार रही और ब्यूनस आयर्स में हुई इस वर्ष की ग्यारहवीं मंत्रीस्तरीय अभिकरण की बैठक में भारत के पक्ष को चीन सहित सभी विकासशील देशों का पुरजोर समर्थन मिला। इसीप्रकार, जहाँ यूरोपीयन यूनियन सहित लगभग विश्व के सभी देशों ने पर्यावरण मुद्दे पर स्मार्ट कृषि तकनीकों के विकास और पर्यावरण के संरक्षण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की, वहीं ट्रम्प के अमेरिका ने इस प्रतिबद्धता से यह कहकर अपने हाथ खींच लिए कि यह अमेरिकी हितों के अनुरूप नहीं है। 

तीन तरफ से जल से घिरे और उत्तर से स्थलबद्ध भारत के विभिन्न हित तब तक सुरक्षित नहीं हो सकते जबतक हिन्द महासागर को सामरिक दृष्टिकोण से सुरक्षित न कर लिया जाय। हिन्द महासागर की सुरक्षा के लिए भारत का  अफ्रीका महाद्वीप के देशों के साथ अच्छे संबंधों की अनिवार्यता सर्वविदित है। कम से कम जहाँ भारत दशकों से दिखाई ही नहीं देता था, वहॉं भारत की सक्रियता दिखने लगी है और दक्षिण अफ्रीका के साथ रक्षा सहयोग समझौते के बाद यकीनन इसमें तेजी भी आयी है। भारत ने इस महाद्वीप में अपनी गतिविधियाँ बहुपक्षता और आर्थिक प्राथमिकताओं में गढ़ी है। अपने से पूरब में भारत ने ऐक्ट ईस्ट नीति पर अमल किया है और सकारात्मक परिणाम भी आये हैं। म्यांमार और थाईलैंड ने भारत की इस मंशा में रूचि दिखाई है। अमेरिका के साथ सामरिक भागेदारी में भारत को जापान, आस्टेलिया के साथ बहुचर्चित चतुष्क (क्वाड) में शामिल किया गया और अमेरिका द्वारा बारम्बार सम्पूर्ण एशिया-प्रशांत क्षेत्र को इंडो-पैसिफिक कहकर भारत की उभरती वैश्विक संभावनाओं को रेखांकित भी किया गया। भारत ने भारत-एसियान कनेक्टिविटी पर बल दिया और जापान के साथ सफलतापूर्वक अपने सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ करने की कोशिश की। 

इस वर्ष मोदी की विदेश यात्राओं में यूरोप प्रमुखता से छाया रहा, इससे भारत की ईयू से सम्बद्धता में सुधार भी देखने को मिला है। मध्य-पूर्व एशिया में जहाँ भारत के संबंध ईरान से बेहतर हुए हैं वहीं सऊदी अरब से भी संबंधों में ऊष्मा बनी रही। भारत ने मध्य-पूर्व एशिया में एक सुन्दर कूटनीतिक संतुलन साधा है।  इधर मध्य एशिया के साथ भारत ने  कनेक्ट सेन्ट्रल एशिया नीति के तहत अपने कदम बढ़ाये हैं और इससे लाभ यह हुआ है कि  ईरान के चाबहार बंदरगाह के खुल जाने के बाद तुर्कमेनिस्तान-कजाखिस्तान सीमा रेलवे परियोजना का लाभ उठाते हुए भारत मध्य एशिया से तो जुड़ेगा ही अपितु इसकी पहुँच यूरोप तक हो जाएगी। अमेरिका महाद्वीप में भी कनाडा और मेक्सिको से भारत के संबंधों में तरलता आयी है और ब्राजील, क्यूबा से कूटनीतिक संबंध पहले से बेहतर बने हैं। 

भारत ने इस वर्ष दो अवसरों पर अपनी प्रौढ़ होती कूटनीति के भी दर्शन कराये। अपना एक चुनावी वादा पूरा करते दिखने की चाह में ट्रम्प ने असमय ही जेरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने की घोषणा करते हुए अपने दुताबास वहीं स्थानांतरित करने की बात की। ट्रम्प के इस सहसा स्टंट के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में मध्य-पूर्व एशियाई देशों के नेतृत्व में महासभा ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें द्विपक्षीय विवाद में तृतीय पक्ष के अहस्तक्षेप की सामान्य परम्परा दुहराई गयी थी। भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया और अमेरिका, इजरायल सहित कई विश्लेषकों को चौंका दिया। दरअसल, भारत ने न केवल संयुक्त राष्ट्र में हवा का ताप मह्सूस कर लिया बल्कि यह भी परख लिया कि इस प्रस्ताव से कोई भी जमीनी बदलाव नहीं होने जा रहा। इस मत से एकतरफ जहाँ भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता की पुष्टि हुई वहीं भारत फलस्तीन मुद्दे पर अपनी पारम्परिक नीति पर भी कायम रह सका। 

इसीप्रकार जून में भी भारत ने ब्रिटेन के विरुद्ध और अपने हिन्द महासागर में पड़ोसी मॉरीशस के उस प्रस्ताव के पक्ष में मत कर दिया जिसमें विवादित चागोस द्वीपसमूह के स्वामित्व-निर्णयन के लिए इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस जाने की बात कही गयी थी। हालाँकि, हिन्द-एशिया क्षेत्र में चीन की आक्रामक घेरेबंदी की नीति को ब्रिटिश-अमेरिकी और भारत की मिलीजुली सामरिक व्यवस्था से ही संतुलन मिलता है जो कि इसी विवादित चागोस के डियागो गार्सिआ पर स्थति है। गौरतलब है कि मॉरीशस ने ताईवान मुद्दे पर चीन को हमेशा समर्थन दिया है ताकि संयुक्त राष्ट्र में चीन अपने वीटो अधिकार से मॉरीशस के हितों की रक्षा कर सके। यहाँ, भारत ने अपनी भू-राजनैतिक यथार्थ को महत्त्व दिया और कूटनीतिक रूप से प्रौढ़ कदम उठाया।  निश्चित ही, इसी प्रकार भारत को सभी देशों से संतुलन साधते हुए अपने राष्ट्रहितों को लेकर प्रतिबद्ध रहना होगा क्योंकि आगे भी चुनौतियाँ आसान तो नहीं रहने वाली हैं।  


Sunday, December 31, 2017

सुनो बे दो हजार अट्ठारह



सुनो भई दो हजार अट्ठारह,


देखो, आराम से आना! लगे कि कुछ नया आ रहा है. फिर वही अखबार मत लाना जिसे ले जाएगा कबाड़ी वाला. लोग तो हैं ही सट्टेबाज, सत्ता की मलाई के लिए खांचा खीचने के लिए तैयार बैठे हैं. फेस्टिवल वाले देश में फेस्टिवल का धरम बताएंगे, किसी किसी दिन की जाति बतावेंगे और बंसी बजैइया के देश में बेशर्म इज्ज़त के नाम पे उसी पेड़ पे लटकावेंगे जहाँ उ चोर कपड़े लेके बैठे रहा!


सुनो, इस बार मुहल्ले में भी आना चमकदार टीवी से उतरकर. देखों यों आना कि नालियाँ साफ हो जाएं, अस्पताल में दवाई मिले और पाठशाला में मिलें गुरुजी. मौका लगे तो छह लाख गावों में शैम्पू की छोटी छोटी सैशे में समाकर आना, पर आना. पता करना कि किसी गांव में सचमुच बिजली रहती कितनी देर तक है. देखना, कि नहर में पूआल रखी है या पानी भी आता है. किसी से चुपके से पूछना कि पिछले चुनाव में जो मर्डर हुआ, उसमें कुछ हुआ या फिर सब विकास ही है.


अच्छा रुको रे दो हजार अट्ठारह! जरा विकास को पुचकार देना, बेचारा रूखा सूखा हुआ है. सब उसे हर सीजन में नए कपड़े पहनाकर घुमाते हैं सर पे, पर बेचारा दशकों से भूखा है. सड़क की पटरियों पे इधर उधर पोस्टर बैनर के नीचे कहीं कहीं कुछ बोतलों में चमकती अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाटने से भला पेट भरता तो क्या बात थी. उसे बताना कि तुझे रोपेंगे किसी दिन रे विकास, अभी तो नारों से ही सेंसेक्स और रेटिंग में ज्वार आ जाता है.


लड़कियों के कान में चुपके से कह दो कि ये 21 वीं शती अब बालिग हुई. पढ़ें, लड़ें, कमाएँ, प्यार करें और जिएं! कितने ही जगह लड़कियों तुम्हारा अभी इन्तजार है, कितना ही अभी चमकना है! तुम्हारे पास सब कुछ पाने को ही तो है और लड़कों मेहनत करों, लड़कियाँ भी पुरजोर साथ देने को तैयार हैं.


नया भारत, सरकार के बनाने से नहीं बनेगा कभी, कह दो इस देश के गरम खून वाले बहुसंख्यक युवाओं से. नए साल जो तुम सचमुच नए हो तो नई सोच का तड़का लगा देना युवाओं में, ताकि वो सोच सहम जाएं जो विभाजन की फसल पैदा करती है.


यार, देश अपना अभी भी बहुतों से बहुत मायनों में पीछे है, कह दो हे नए साल हम सबसे कि हम सब मिलजुलकर इसे तरक्की के एक नए पैमाने पर ले जाएंगे!


नवल वर्ष की शुभकामनाएँ!




Saturday, December 30, 2017

2017 की विश्व राजनीति और भारत




अब जबकि पृथ्वी 2017 का अपना चक्कर पूरा ही करने वाली है, यह एक मुफीद समय है कि इस साल की विश्व-राजनीति को पीछे मुड़कर टटोला जाय, देखा जाय कि वे कौन सी घटनाएँ थीं, जिन्होंने खासा असर पैदा किया, ऐसी वे कौन सी गतिविधियाँ रहीं, जिनके जिक्र के बिना 2017 का कोई जिक्र अधूरा रहेगा और इन सबके बीच अपना भारत कैसे आगे बढ़ा ! यह एक मुश्किल काम इसलिए तो है ही कि विश्व राजनीति की बिसात बेहद लम्बी-चौड़ी है, पर असल चुनौती इसमें वैश्वीकरण की प्रक्रिया पैदा करती है। विश्व में वैश्वीकरण है, इसके अपने अच्छे-बुरे असर हैं; पर दरअसल विश्व-राजनीति का भी वैश्वीकरण हो चला है। इसका अर्थ यह है कि अब किसी भी महत्वपूर्ण वैश्विक घटना के स्थानीय निहितार्थ व प्रभाव हैं और किसी महत्वपूर्ण स्थानीय घटना के भी वैश्विक निहितार्थ व प्रभाव हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।संचार साधनों ने यह सुलभता तो दी है कि सभी घटनाएँ सभी स्तर पर लगभग तुरत ही उपलब्ध हैं, किन्तु इन्होने विश्व-राजनीति की जटिलताओं का और विस्तार ही किया है। इनकी अनदेखी करना सहसा विश्व-राजनीति के किसी घटना की व्याख्या में चूक जाना है।  विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण का सबसे सीधा असर यों महसूस किया जा सकता है कि अब भले ही देशों के मध्य कूटनीतिक तनातनी हो, देश आपस के व्यापारिक संबंधों पर उसका असर न्यूनतम रखना चाहते हैं। अमेरिका और चीन के व्यापारिक  आंकड़ें इस सन्दर्भ में देखे जा सकते हैं। यहीं से इस आशा को भी बल मिलता है कि दुनिया में तनाव तो कई जगह बेहद गहरे हैं पर विश्वयुद्ध जैसी विभीषिका अथवा शीतयुद्ध जैसे तनाव की सम्भावना मद्धिम ही है। 

दुनिया के सबसे चमकदार महाद्वीप यूरोप का यूरोपीय यूनियन लगभग साल भर चर्चा में रहा। आर्थिक वजहों को अगर परे रखें तो ब्रिटेन का ईयू से छिटकना, जिसे विश्व मीडिया में ब्रेक्जिट कहा गया; लगातार चर्चा में रहा। 2016 में ही ब्रिटेन ने अपनी मंशा जतला दी थी पर इसे औपचारिक जामा मिला 2017 में । अभी भी ब्रेक्जिट की जटिल औपचारिक प्रक्रियाएँ चल रही हैं और इसी के सामानांतर यह विमर्श भी चलता रहा कि आज की वैश्वीकरण वाली विश्व-राजनीति में ईयू का एकीकृत मॉडल कितना सटीक है ! प्रसिद्द बार्सीलोना शहर वाले स्पेन का सबसे समृद्ध राज्य कैटेलोनिया, जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान स्पेनी राष्टीय पहचान से भी पुरानी है, इस साल एक नए राष्ट्र बनने के संघर्ष में जुटा रहा। कैटेलोनियन राष्ट्रीयता के साथ एक अलग संप्रभु राष्ट्र-राज्य बन जाने की राह बेहद कठिन है क्योंकि ईयू, अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस समेत सभी विकसित देशों ने इसका विरोध किया है। कैटेलोनिया विवाद दरअसल यूरोप में चल रहे दर्जन भर से अधिक नए राष्ट्र-राज्य आन्दोलनों की सबसे सशक्त बानगी है, जिसके मूल में पश्चिमी देशों की दोतरफा नीति की झलक तो है ही अपितु और गहरे में यह पश्चिमी राष्ट्रवाद की सीमा को भी उजागर कर देती है। पश्चिमी जगत लोकतान्त्रिक आत्म-निर्णयन के सिद्धांत का हवाला देता हुआ विकासशील देशों खासकर जिनका एक औपनिवेशिक अतीत भी है, के ऐसे ही आन्दोलनों के पक्ष में खड़ा हो जाता है। किंतु जब बात स्वयं पर आती है तो एक स्वर से सभी विकसित पश्चिमी राष्ट्र ऐसे आन्दोलनों को ‘खतरनाक चलन’ कह ख़ारिज करना चाहते हैं। सिद्धांततः पश्चिमी राष्ट्रवाद एकरूपता/समरूपता (homogeneity) की नींव पर निर्मित है जिसमें विविध पहचानों को किसी एक पहचान में विलीन होना होता है अथवा अलग राष्ट्र बन जाना होता है। इसके विपरीत भारतीय राष्ट्रवाद की संकल्पना जो पश्चिमी राष्ट्रवाद के जवाब में आयी उसने विविधता को अंगीकार किया और अनेकता में एकता के दर्शन करते हुए विभिन्नता (heterogeneity) को अपना आधार बनाया। कैटेलोनिया विवाद जैसे वैश्विक घटना से भारत स्थानीय स्तर पर यह पाठ ले सकता है कि हमें अपनी राष्ट्रीयता को संजोना चाहिए जो हमारे देश की विशाल विविधता को आत्मसात करते हुए सततता में विश्वास रखती है। 

जुलाई में इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल को आखिरकार आई एस के चंगुल से छुड़ा लिया गया जिसे ठीक दो साल पहले अबू बक्र अल बगदादी के नेतृत्व में कब्ज़ा कर लिया गया था। इसके साथ ही पिछले तीन साल का क्रूरतम आतंकवादी खौफ व क्रूरता अंततः थमी, जिसने लोगों के मन में अल क़ायदा का नाम भुला ही दिया था।  अमेरिका और रूस दोनों ने ही आईएस के खिलाफ हुंकार भरी, पर यकीनन दोनों का उद्देश्य अपना अपना राष्ट्रहित रहा। रूस के लिए सीरियाई सरकार प्राथमिकता में है तो अमेरिका इराकी प्रतिबद्धता के अनुरूप कार्यरत रहा। मध्य-एशिया का सबसे गरीब देश यमन जो अदन की खाड़ी के किनारे-किनारे बसा है हूती (शिया) और सुन्नी की क्षेत्रीय लड़ाई में मोहरा बन गया। यमन में हालात तो पहले ही कुछ ठीक नहीं थे पर शियापरस्त ईरान और सुन्नीपरस्त सऊदी अरब ने यमन की घरेलू राजनीति की खींचातानी को अंततः एक बेहद अमानवीय गृहयुद्ध में तब्दील कर दिया। दिसंबर के इस हफ्ते में यमन को यों सुलगते लगभग हजार दिन हो जायेंगे और लगभग नौ हजार की नरबलि ले चूका यह संघर्ष विश्वशक्तियों के निर्णायक हस्तक्षेप की अभी भी बाँट जोह रहा है। मध्य-एशिया का सबसे पुराना और जटिल मुद्दा फ़िलहाल ठंडे बस्ते में था कि इसी दिसंबर माह के पहले हफ्ते में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपना एक चुनावी वादा पूरा करते हुए ऐलान किया कि अब वक्त आ गया है कि जेरुसलम को इजरायल की राजधानी घोषित किया जाय  और अमेरिकी दूतावास को जेरुसलम में प्रतिस्थापित किया जाय। ट्रम्प के इस बेवक्त के स्टंट ने मध्य एशियाई राजनीति के इस पुराने जिन्न को फिर से जगा दिया और मध्य एशियाई शक्तियाँ इस मुद्दे पर एकजुट हो इजरायल और अमेरिका का विरोध करने लगी हैं। इसमें सऊदी अरब की भूमिका सबसे अधिक उल्लेखनीय है। पहले से ही यह मुल्क अमेरिका सहयोग की नीति अपनाता रहा है और नए अतिमहत्वाकांक्षी राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व वाला सऊदी अरब एक सोची समझी अस्पष्टता बरत रहा है। ज़ाहिर है नए साल में भी मध्य एशिया सुर्ख़ियों में बना रहेगा भले ही सुलगता हुआ ही रहे। भारत ने बेहद सुन्दर संतुलन के साथ मध्य एशिया की अपनी विदेश नीति कुछ यों साधी है कि तेल की जरूरतें पूरी होती रहें और लपटें भी न लगें। 

वैश्विक स्तर पर जिन मामलों ने 2017 को परिभाषित किया उनमें इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस के जजों का चुनाव, पनामा पेपर्स और जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रोबर्ट मुगाबे की विदाई खासा सनसनीखेज रही। यूएनओ ने सभी पारम्परिक शक्तियों ने ब्रिटेन को समर्थन दिया पर अंततः भारत के दलवीर भंडारी ने जीत दर्ज की। यह हेग विजय भारतीय कूटनीति के अथक प्रयासों का परिणाम थी। दलवीर भंडारी का जजों के पैनल में होना एक निर्णायक बिंदु था जहाँ भारत को कुलदीप जाधव मामले में सहायता मिली थी। जिम्बाब्वे में एक समय नायक की तरह राज करने वाले रोबर्ट मुगाबे ने सत्ता मोह में अपनी छवि के साथ ही समझौता कर लिया और अंततः जनविरोध के समक्ष घुटने टेककर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक होना पड़ा। दुनिया के चौथे सबसे बड़े लॉ फर्म मोजैक फोंसेका के डेटाबेस से तकरीबन साढ़े ग्यारह मिलियन दस्तावेजों के लीक हो जाने से दुनिया भर के कच्चे-चिट्ठों की पोल खुली। लगभग हर देश में इसपर बवाल मचा पर सर्वाधिक असर पाकिस्तान की सिविल सोसायटी पर देखा गया जब अदालत ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मामले में उन्हें दोषी करार दिया। नवाज़ को गद्दी छोड़नी भी पड़ी. अपने देश भारत में भी पनामा पर चर्चा बहुत हुई और कई लोगों के नाम भी उछले पर अंततः यह सुर्खियां सूख गयीं। 

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चीन इस वर्ष भी पश्चिमी मीडिया के लिए ड्रैगन बना रहा और चीन लगभग वर्ष भर इसके कई वाजिब कारण भी मुहैया करवाता रहा। दुनिया अभी चीन के ओबोर नीति को समझ ही रही थी तब तक चीन के सर्वेसर्वा शी जिनपिंग ने अपनी पार्टी के अक्टूबर अधिवेशन में अपने तीन घंटे तेईस मिनट के लम्बे भाषण में चीन की वैश्विक और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को नए सिरे से रेखांकित कर दिया। यकीनन चीन आने वाले वर्षों में भी एक प्रमुख निर्णायक विश्व शक्ति बना रहेगा। अपनी आर्थिक व्यवस्था एक हद तक सुदृढ़ और स्थिर कर लेने के पश्चात् अब चीन विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनने की होड़ में है। विवाद की दृष्टि से दक्षिण चीन सागर में  इस वर्ष हिलोर कम रही पर यह शांत कभी नहीं रहा। चीन ने विश्व के लगभग सभी सामरिक क्षेत्रों में भारी निवेश किया है और एशिया-हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपनी भौतिक सम्बद्धता काफी मजबूत कर ली है। इधर रूस में पुतिन पिछले सत्रह सालों से एक निर्णायक पद पर बने हुए हैं और पुतिन का रूस अब अपनी ऐतिहासिक महत्वाकांक्षा के आगोश में है, जिसमें उसने चीन, सीरिया पाकिस्तान और उत्तर कोरिया का सामरिक समर्थन भी जुटा लिया है। उत्तर कोरिया लगातार प्रतिबंधों के बीच में भी धमकियाँ देता रहा और अपने हथियारों का परीक्षण करते हुए तनाव का माहौल बनाता रहा। यही कारण है कि ट्रम्प का अमेरिका सम्पूर्ण एशिया-हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को इंडो-पैसिफिक कह भारत की वैश्विक भागेदारी बढ़ाने की वकालत कर रहा है। नवम्बर के ईस्ट एशिया समिट में बाकायदा क्वाड (चतुष्क) देशों की चर्चा हुई जिसमें अमेरिका के साथ जापान, आस्ट्रेलिया और भारत शामिल है। हाल की अमेरिका द्वारा जारी की गयी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा कार्ययोजना में भी भारत को एक प्रमुख विश्व शक्ति मानते हुए चतुष्क (क्वाड) की चर्चा की गयी। शिंजो अबे की पकड़ जापान में मजबूत हुई है और वे जापान को एक बार फिर सामरिक और सैन्य दृष्टिकोण से सक्रीय एवं मजबूत बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं। चीन में शी जिनपिंग घरेलू राजनीति में और मजबूत हुए हैं और वे भी चीन को विश्व शक्ति बनाने को आतुर हैं। ठीक यही रूस के पुतिन की स्थिति है। 2017 का एशिया एक शांत किन्तु गहरे तनाव में है। 

भारत के लिहाज से यह वर्ष उत्साहजनक रहा। वैश्विक हलकों में इसकी चर्चा लगातार होती रही। खाद्य सुरक्षा, कृषि, पर्यावरण के मुद्दों पर जहाँ इसे सभी विकासशील देशों का समर्थन मिला वहीं एनएसजी सदस्यता, सुरक्षा परिषद् सदस्यता के मोर्चे पर गतिरोध बना रहा। बाकी अन्य सभी विषयों पर अमेरिका लगातार और काफी खुलकर भारत के समर्थन में बयान जारी करता रहा।यों तो हर वर्ष ही भारत-चीन के सैनिकों में छिटपुट गतिरोध होते हैं, किन्तु इस वर्ष तिब्बत-भूटान के एक कोने से लगा डोकलम विवादों में रहा। तनातनी एक समय इतनी बढ़ी कि कुछ युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए किन्तु भारत इस बार रक्षात्मक नहीं रहा और अंततः चीन ने पैतरा बदल लिया। चीन के द्वारा जबरन उत्पन्न की गयी इस गतिरोध में आखिरकार उसे भी पता लगा कि भूटान के साथ-साथ दुनिया की बड़ी शक्तियाँ और खासकर अमेरिका भारत के साथ खड़े हैं। जैसे ट्रम्प भारत की वैश्विक भूमिका को निभाते हुए देखना चाहते हैं ठीक वैसे ही भारत ने अपने उत्तर-पूर्व के पड़ोसियों के साथ मेलजोल बढ़ाया है और भारत की एक्ट ईस्ट नीति में म्यांमार एक प्रमुख सहयोगी राष्ट्र के तौर पर उभरा है। किन्तु पड़ोस में वह म्यांमार ही है जहाँ से इस वर्ष विश्व की सर्वाधिक चर्चित त्रासदी रोहिंग्या शरणार्थी समस्या के तौर पर सामने आया । भारत ने इस पर एक सोची समझी कूटनीतिक अकर्मण्यता दिखाई, पड़ोसी देश बांग्लादेश थोड़ा नाराज भी रहा और अंततः यह विवाद थमा। भारत के सम्बन्ध अपने पड़ोसियों से इस वर्ष खिंचे ही रहे बस इसमें अफ़ग़ानिस्तान और भूटान अपवाद रहे। यों तो पाकिस्तान को छोड़कर कमोबेश सभी पड़ोसी देशों के छोटे-बड़े प्रतिनिधियों की भारत यात्रा समय-समय पर हुई किन्तु पारस्परिक संबंधों में वह अपेक्षित ऊष्मा नदारद रही। 

भारत को निश्चित ही श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और पाकिस्तान से अपने सम्बन्ध सुधारने की कोशिश करनी होगी क्यूंकि बड़ी तेजी से चीन इन पड़ोसियों में अपने भारी निवेश से एक गुडविल बनाता जा रहा है। नेपाल ने ऐतिहासिक रूप से नए संविधान के अनुरूप शांतिपूर्ण ढंग से एक साथ केंद्र और राज्य के चुनाव संपन्न करवा लिया और अंततः तीन दशकों के बाद उसे एक स्थिर सरकार मिली है। मालदीव ने हाल ही में चीन से मुक्त व्यापार समझौता संपन्न किया और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर आख़िरकार चीन का निर्णायक स्वामित्व हो गया। चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ग्वादर बंदरगाह भी विकसित किया और पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन-अधिकृत अक्साई चिन पर पाकिस्तान-चीन के द्वारा पारस्परिक व्यापारिक गलियारा विकसित किया जिससे भारत का पारम्परिक ऊर्जा के भंडार मध्य एशिया के देशों के साथ भौतिक संपर्क ही अवरुद्ध हो गया। हालाँकि भारत ने अपनी तैयारियों में तेजी लाते हुए आखिरकार ईरान के साथ सहयोग करते हुए ग्वादर के निकट ही सिस्तान-बलूचिस्तान प्रान्त में उन्नत चाबहार बंदरगाह विकसित कर लिया और अब यह संचलन में भी आ गया है। चाबहार एक कूटनीतिक उपलब्धि भी है क्योंकि इससे भारत का न केवल मध्य एशिया के देशों के साथ पुनः भौतिक संपर्क स्थापित हो सकेगा अपितु भारत की सामरिक पहुँच ईरान-अफ़ग़ानिस्तान-रूस होते हुए यूरोप तक हो जाएगी। हिन्द महासागर में भारत अमेरिका के साथ डियागो गार्सिआ पर अपनी सामरिक पकड़ बनाये हुए है, हालाँकि इस वर्ष ब्रिटेन के अस्थाई स्वामित्व वाले इस मारीशस के द्वीप पर ब्रिटेन और मारीशस के बीच तनातनी भी रही। मामला यूएनओ में पहुंचा और भारत ने भू-राजनीतिक स्थिति को देखते हुए मारीशस के पक्ष में मतदान किया। यहाँ कूटनीतिक चुनौतियाँ सचमुच आसान नहीं हैं। पीएम मोदी की विदेश यात्राओं में यूरोप के देश प्रमुखता से रहे, यथा-जर्मनी, स्पेन, रूस, फ़्रांस, पुर्तगाल और नीदरलैंड ! इसके अलावा 2017 में मोदी फिलीपींस, चीन, श्रीलंका, कजाखस्तान, अमेरिका और म्यांमार की यात्रा पर रहे। सर्वाधिक चर्चित यात्रा मोदी की इजरायल यात्रा रही क्यूंकि यह यात्रा एक कूटनीतिक बदलाव का द्योतक यात्रा रही। संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया, नेपाल, श्रीलंका, फलस्तीन, मारीशस, यमन, अफ़ग़ानिस्तान, भूटान के राष्टध्यक्षों ने भारत की इस वर्ष यात्रा की और जापान की शिंजो अबे की यात्रा इस वर्ष विशेष सुर्ख़ियों में रही। भारत ने इस वर्ष कई सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया किन्तु सार्क और नैम के बैठक ठिठके ही रहे और यकीनन इसके कूटनीतिक निहितार्थ निकाले गए। 

नए वर्ष का विश्व जहाँ जेरुसलम और उत्तर कोरिया में उलझा रहेगा वहीं एक आशा ही है कि संभवतः अगले वर्ष दुनिया के शक्तिशाली देश ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों से लड़ने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठा सकें। 2017 की एक खास बात यह भी रही कि अंततः वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में मांग और पूर्ति के प्रक्रियाओं में तेजी आयी और विश्व-व्यापार को पटरी पर आने में मदद मिली। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का सुधार विश्व में एक आर्थिक आशावादिता जगाता है। नया वर्ष मोदी सरकार के इस कार्यकाल आख़िरी वर्ष होगा और सरकार अपने सभी वैश्विक और क्षेत्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का प्रयास करेगी। पिछले सालों की सक्रियता से दुनिया को यह सन्देश तो अवश्य ही पहुंचा है कि भारत अपनी वैश्विक भूमिकाओं के लिए तैयार है।  भारत ने यकीनन वे क्षेत्र भी स्पर्श किये हैं जो एक अरसे अछूते रहे और खासकर अमेरिका के साथ संबंध यकीनन और बेहतर हुए हैं। विदेश नीति के सर्वाधिक विश्वसनीय सिद्धांत सततता व परिवर्तन के हिसाब से और राष्ट्र के दूरगामी हितों को देखते हुए भारत को ईरान, इजरायल, रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को भी सम्हालते रहना होगा। कहना होगा कि भारत को अपनी वैश्विक भूमिका के साथ अपनी क्षेत्रीय भूमिका नज़रअंदाज नहीं करनी चाहिए। खासकर अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को सुधारने की दिशा में एकतरफा ही सही पहल शुरू कर देनी चाहिए। नैम और सार्क को पुनर्जीवित करने का प्रयास भारत की बार्गेनिंग शक्ति को उभारेगा और इसे अपनी वैश्विक पहचान बनाने में मदद देगा। 


Friday, December 29, 2017

आपके सपने हैं, विश्वास सबसे पहले आपको करना है



ये उधेड़बुन बनी रहती है कि सपने संजोये जाएँ भी कि नहीं। कुछ कहते हैं कि अपनी सीमा समझते हुए जमीन पर पाँव जमाये रखना चाहिए। लक्ष्य रीयलिस्टिक होने चाहियें। जिंदगी के खूबसूरत एहसास से परे डरे सहमे लोगों की सख्त नसीहतें अधिक मिल जाएंगी। ये जिंदगी को बस एक रेस बना छोड़ देते हैं जिसके अंत में चाहे जीत हो या हार हो, इंसान हांफने ही लगता है।

इस दुनिया का सबसे उम्रदराज शख्स भी नहीं जानता कि अगले पल क्या होना है। इसलिए सपने संजोने का प्यारा जोखिम लिया जाना चाहिए। अगर आप चाहते हैं कि आपकी ज़िंदगी महज जेरोक्स बनकर न रह जाए, तो सपने संजोने चाहिए अपने। इसके फायदे अधिक हैं, नुकसान गिनती के हैं। सपनों वाला आदमी एक तरह के उत्साह में रहता है। पॉजिटिव मन के आदमी को ये दुनिया और भी प्यारी लगती है।

अपने सपनों का पीछा करते हुए धीरे धीरे हमारा व्यक्तित्व निखर जाता है और यह निखार कई बार उन सपनों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए सपनों की यात्रा में गिरना-उठना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि चलते रहना।

घबराने की जरुरत नहीं है, हिम्मत से सपने संजोते हुए धीरे-धीरे लगातार सीखते हुए मुस्कुराते हुए यारियां निभाते हुए चलने की जरुरत है। आप लोगों में उत्साह भर सकते हैं। लोग घबराये हुए हैं, डरे हुए हैं; ऐसे में आपकी मुस्कान राहत तो देगी ही उन्हें, आपको एक बेहतर सामजिक सम्बल भी मिलेगा। सभी दौड़ में हैं तो इंतज़ार मत करिये कि कोई आपको पुचकरेगा, हौसला बढ़ाएगा या आपके सपनों की ईज्जत करेगा। सपने आपने देखे हैं, सबसे अधिक भरोसा आपको ही उनपर करना होगा।

Wednesday, December 27, 2017

कुलभूषण जाधव, अजमल कसाब नहीं हैं...


कभी भारतीय नेवी में काम कर चुका एक शख्स जो अपनी अधेड़ उम्र में ईरान जाकर कारोबार कर रहा था कि सहसा उसका अपहरण हो जाता है। पाकिस्तानी मीडिया हल्ला मचाती है कि उसने भारत के जासूस को पकड़ा है वह भी अपने प्रान्त बलूचिस्तान से। कहा जाता है कि वह रॉ का एक जासूस है, जो बलूचिस्तान में हुए कई बम विस्फोटों का जिम्मेदार है। पाकिस्तानी मार्शल कोर्ट उसे गुनहगार मानती है और फांसी की सजा सुनाती है। भारत सरकार हरकत में आती है और सजा के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, हेग में अपील करती है। पंद्रह सदस्यीय जजों का पैनल (जिसमें भारत के जस्टिस दलवीर भंडारी भी हैं ) उस शख्स की सजा पर रोक लगा देता है। भारत सरकर राहत की साँस लेती है और उनके परिवारजनों को उस शख्स से मिलवाने की कूटनीतिक जुगत लगाती है। यह मेहनत रंग लाती है और भारी इंटरनेशनल दबाव में पाकिस्तान, उस शख्स को उसकी माँ और पत्नी से मिलवाने के लिए राजी हो जाता है। पत्नी और माँ की सघन जांच होती है, महज सादे कपड़ों में उस शख्स से मीटिंग करवाई जाती है, बात आमने-सामने पर फोन से होती है, जिसे अधिकारी सुन रहे होते हैं और उनके बीच में एक मोटी पर पारदर्शी दीवार होती है। अगले दिन पाकिस्तान के सारे अख़बार देश की दरियादिली पर लहालोट होते हैं और उस शख्स की पत्नी के जूतों में सदिग्ध वस्तु होने की बात कहते हैं।
जी हाँ, उस शख्स का नाम है, कुलभूषण जाधव !
राजनीति में खासकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सच वह माना जाता है जो आपको और आपके देश को सूट करता है। तो सच क्या है, यह इस लेख का विषय नहीं है। कुछ बातें और कहीं जा सकती हैं, जिससे सीन और समझ में आ सकता है। देशों में सरकारें होती हैं, उन्हें फिर फिर चुनाव जीतकर सत्ता में आना होता है। चुनाव एक खर्चीली और कठिन प्रक्रिया है। राजनीतिक जनभागेदारी और राजनीतिबोध से शून्य समाज में सरकारें अमूमन भ्रष्ट होती हैं और वे ऐसे मुद्दे खोजती और बनाती हैं, जिसमें जनता का ध्यान जाए, जनता खुश हो और मूल समस्याएँ किनारे पडी रहें। भारत-पाकिस्तान की सरकारों में यह आम है, इसलिए जबतब ही किसी घटना पर भारत में ‘विदेशी हाथ’ और पाकिस्तान में ‘खुफ़िआ हाथ’ होने की बात की जाती है।
हमने अजमल कसाब को जब रंगे हाथों पकड़ा तो पाकिस्तान के लिए वह अंतरराष्ट्रीय शर्म से गुजरने जैसा था। हमने अजमल कसाब का गुनाह कुबूलता विडिओ चलाया और कसाब कहता सुना गया कि उसके साथ भारतीय अधिकारी बहुत अच्छे से पेश आये और भारतीय अख़बारों में उसके लिए बिरयानी के खर्चों की चर्चा हुई। कसाब ने उसी वीडियो में कुबूला कि गरीबी में उसने आतंक का रास्ता चुना और आईएसआई ने उसे ट्रेनिंग दी है। बाद में भारतीय कोर्ट ने उसी दोषी पाया और फांसी की सजा दे दी। चूँकि कसाब के लिए भारत के पास ढेरों सुबूत थे और कसाब भारतीय जमीन पर पकड़ा गया, इसलिए पाकिस्तान चाहकर भी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस नहीं जा सकता था बल्कि पाकिस्तान ने तो आधिकारिक रूप से माना ही नहीं कि कसाब पाकिस्तानी नागरिक है. हालाँकि कसाब का पंजाबी पाकिस्तानी उच्चारण चीख चीखकर बयान कर रहा था कि यकीनन वह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के फरीदकोट का है। कुलभूषण जाधव का भी एक विडिओ जारी किया गया है, जिसमें उसने कमोबेश इसी पैटर्न पर कुबूलनामा पेश किया है। पाकिस्तान में सियासत गरम है कि कुलभूषण को फांसी देके रहेंगे और भारत में राजनीति गरम है कि कुलभूषण के परिवार वालों के साथ बदसुलुकी हुई है और भारत चुप नहीं बैठेगा।
मुझे सच नहीं पता, निष्कर्ष आप निकालें !!!

Tuesday, December 26, 2017

दौलत, शोहरत या मेहनत, क्या है लाइफ की कुंजी ?

इस life में सबसे खूबसूरत और सबसे डरावना एक ही न बदलने वाला सच है और वह है: uncertainity ! हमें नहीं पता होता कि अगले ही moment पर क्या होने वाला है। कुछ भी हो सकता है सो उसकी तैयारी हम करते हैं। education लेते हैं, job ढूंढते हैं और अपने से बड़ों से अक्सर words of wisdom लेते हैं। पर जिंदगी कभी पूरी खुलती नहीं और past अगर repeat भी करता है तो इतने creative ढंग से repeat करता है कि उसे present में face करते वक्त words of wisdom अक्सर काम ही नहीं आते या बस थोड़ी सी मदद कर पाते हैं।
हमें क्या चाहिए life से हम तो यहीं confuse रहते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि जिन्हें हम अपनी life में admire करते हैं वे अलग-अलग लोग हैं और अलग-अलग चीजों ने उनके life में click किया है।1938 में Harvard ने एक बड़ा research project लिया, जिसे Adult Development Program  नाम दिया गया। दो groups के कुल 744 लोगों पर यह study की गयी। पहला group, Harvard से pass outs लोगों से बना और दूसरा Boston के poor suburbs के लोगों से बना। ऐसे research सचमुच survive नहीं करते पर luckily यह research आज भी चल रहा है और उन 744 में से अधिकांश जिन्दा हैं और अपने 90s में हैं। कई doctor बने, कई lawyers, कुछ ने MNCs में job ली, एक अमेरिका के president बने, कुछ alchohlic हो गए और कुछ Schizophrenic हो गए। बहुत ही धीरे-धीरे काफी minute detailing  के साथ इस research के लगभग 80 साल हुए। इस project के वर्तमान director, Robert Waldinger ने इस स्टडी के conclusions अपने एक TED Talk में share किया।
आश्चर्यजनक रूप से एक happy and healthy life के लिए wealth, Fame और hardwork से कहीं अधिक relationships की आवश्यकता है, ऐसा इस research का conclusion है। इस relationships में यह matter नहीं करता कि आप कितने लोगों से जुड़े हैं बल्कि relationship की quality important है। यह भी पाया गया कि अपने 90s में वही लोग happy, healthy और satisfied मिले जो relationships में deeply connected हैं। सबसे important conclusion यह है कि quality relationships न केवल physically benefit करते हैं बल्कि यह brain के लिए भी effective है। पाया गया कि quality relationships वालों की memory भी चुस्त मिली।
आह, life के जितने भी best lessons होते हैं वे इतने simple होते हैं, कि उनपर belief ही नहीं होता !!!

Monday, December 25, 2017

विश्व पटल पर उभरता भारत

डॉ. श्रीश पाठक*



भारत के मित्र समझे जाने वाले खूबसूरत देश मालदीव से अभी चीन ने मुक्त व्यापार संधि संपन्न की, पर फिर भी कहना होगा कि वैश्विक पटल पर और खासकर एशियाई क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। दरअसल, चीन के बढ़ते प्रभावों के उत्तर में अमेरिका के पास भारत के अलावा कोई दूसरा ऐसा विकल्प नहीं है, जिसकी भू-राजनीतिक स्थिति कमाल की हो, बाजार के लिए अवसर प्रचुर हों और वैश्विक लोकतान्त्रिक साख भी विश्वसनीय हो।

अपने कार्यकाल के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यनीति में ट्रम्प सरकार ने जहाँ पाकिस्तान के लिए सख्त रवैया अपनाया वहीं एक ‘विश्वशक्ति’ के तौर पर भारत का ज़िक्र आठ बार किया और भारत के साथ सामरिक-आर्थिक हितों के और बेहतर विकास की वकालत की । हाल ही में हुए आठवें वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन के आयोजन के लिए भी अमेरिका के स्टेट विभाग ने भारत को चुना, जो कि दक्षिण एशिया का पहला ऐसा आयोजन था। ट्रम्प की पुत्री इवांका, ट्रम्प परिवार की एक प्रभावशाली व्यक्तित्व मानी जाती हैं और अपने यहूदी पति जेरेड कुशनर की तरह ही जिनकी मंत्रणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए उनके चुनाव अभियानों के समय से ही मायने रखती है। इस वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन में इवांका की फैशन कूटनीति की भी चर्चा हुई।

वाशिंगटन की अपनी प्रेसवार्ता में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी हाल ही में हुई दक्षिण-पूर्व एशियाई यात्रा को 'जबर्दस्त सफल' करार दिया था । उन्होंने पत्रकारों से बिना कोई सवाल लिए एक लम्बा उद्बोधन दिया और कहा कि एक वैश्विक नेता के तौर पर अपनी भूमिका में अमेरिका वापस आ गया है और उनके प्रयासों ने  उन्मादी उत्तर कोरिया के खिलाफ विश्व को एकजुट कर दिया है। उत्तर कोरिया ने अभी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण किया जिसमें उसका दावा है कि अब अमेरिका का पूरा भू-भाग उनके आक्रमण-क्षेत्र में आ गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने एक ट्वीट में इस पर चिंता जताते हुए अपनी सरकार और सेना के लिए और अधिक वित्त की आवश्यकता पर बल दिया। इसी दिन के एक ट्वीट में डोनाल्ड ट्रम्प ने इवांका की भारत यात्रा के उनकी सक्रियता की प्रशंसा भी की।   ट्रम्प की एशिया-प्रशांत यात्रा एक ऐसे क्षेत्र में हुई जहाँ तेजी से चीन की दखलंदाज़ी बढ़ी है और एक ऐसे समय में हुई जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के उन्नीसवें अधिवेशन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने तीन घंटे तेईस मिनट के लम्बे भाषण में चीन की वैश्विक और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पुनः दोहराया है।

माना जा रहा है कि इवांका की मंत्रणा से ही ट्रम्प की इस यात्रा में चीन का समावेशन अमेरिका के आर्थिक हितों के सुचारू संचलन के लिए किया गया था।  समझा जा सकता है कि इस यात्रा के अन्य पड़ावों के रूप में में बाकी देशों जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और वियतनाम का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि वे सभी चीन के संतुलन में अलग-अलग दृष्टिकोण से अमेरिका के मजबूत स्तम्भ हैं। जापान जहाँ सामरिक और आर्थिक रूप से अमेरिकी कूटनीति में प्रतिभाग कर रहा, वहीं दक्षिण कोरिया दरअसल उत्तर कोरिया के संतुलन में है। वियतनाम और फिलीपींस की भू-राजनैतिक स्थिति दक्षिण-चीन सागर के लिहाज से अहम है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में एपेक और आसियान सहयोग के मद्देनज़र भी दोनों देश अमेरिकी हितों को आकर्षित करते हैं। चीन पर इस अमेरिकी घेराव को और धार मिल जाती है जब ट्रम्प द्वारा इस क्षेत्र को ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र कहा जाता है।  चर्चित जापान-भारत-अमेरिका-आस्ट्रेलिया चतुष्क (क्वाड) के साथ ही यहाँ बहरहाल पाकिस्तान-चीन-रूस-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।  

गौरतलब है कि अपने आप को पहला पैसिफिक प्रेसिडेंट कहने वाले अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति ओबामा ने अपनी महत्वाकांक्षी पिवट पॉलिसी का प्रतिपादन किया था जिसमें अमेरिकी संबंधों का झुकाव मध्य-पूर्व एशिया से हटाकर एशिया-पैसिफिक की तरफ करने की बात की गयी थी। अमेरिका की कोशिश थी कि देश की विदेश नीति में मध्य-पूर्व एशिया की जटिल राजनीति की भूमिका कम करके एशिया-पैसिफिक के व्यापारिक-वाणिज्यिक एवं सामरिक महत्त्व को प्रमुखता दी जाए। किन्तु ओबामा प्रशासन में इस ओर ठोस कदम नहीं उठाये जा सके। न ही अमेरिका की सक्रियता वहाँ कुछ कम की जा सकी और न ही एशिया-पैसिफिक में अमेरिकी इरादों को अमली जामा पहनाया जा सका। इससे अलग ट्रम्प मध्य-पूर्व एशिया में अमेरिकी सक्रियता कम किये जाने के पक्ष में तो नहीं हैं किन्तु एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में भी अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की फिराक में हैं। इसे कुछ विशेषज्ञ ट्रम्प की 'पोस्ट पिवट पॉलिसी' कह रहे हैं जिसमें ट्रम्प का दबाव इसपर ज्यादा है कि क्षेत्रीय संतुलन की जिम्मेदारी में सभी सहयोगी देशों को साझीदारी करनी होगी।

ट्रम्प व्यवसायी हैं और अमेरिका का चुनाव अमेरिकी हितों की प्राथमिकताओं को वरीयता देने के वादे से जीत कर आये हैं। क्षेत्र में चीन के साथ उनके देश की सर्वाधिक व्यापारिक हित जुड़े हैं, जिसे उन्होंने इस बार की यात्रा में भी महत्ता दी है l  ट्रम्प ने 'आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है' का नारा देकर अपना मंतव्य भी स्पष्ट कर दिया।  इसके साथ ही हिंद महासागर से प्रशांत महासागर के व्यापारिक समुद्री मार्गों की मुक्तता एवं सुरक्षा के लिए वे भारत की महत्ता को रेखांकित करने से नहीं चुके हैं। उन्हें अमेरिका का दबदबा कम तो नहीं होने देना है किन्तु ट्रम्प चाहते हैं कि जिन देशों को अमेरिकी वैश्विक संलग्नता से फायदा है, वे इसे मिलकर वहन करें। आर्थिक दृष्टिकोण से हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर के बीच की समुद्री मार्ग को ट्रम्प सुगम व व्यवधानरहित बनाना चाहते हैं।  चतुष्क के तीनों देशों ने दरअसल अमेरिकी इशारों के अनुरूप जवाब देना शुरू भी कर दिया है। डोकलाम विवाद में भारत ने जताया कि अब वह कूटनीतिक चुप्पी से कहीं अधिक की भूमिका में आने को तत्पर है और वहीं एक्ट ईस्ट पॉलिसी का इज़हार करते हुए दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में भी भारत ने अपनी बढ़ती सक्रियता के सुबूत दिए हैं। ग़ौरतलब है कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में म्यांमार एक मजबूत स्तम्भ है और हालिया रोहिंग्या विवाद में भारत ने म्यांमार के खिलाफ निष्क्रिय रहना ही उचित समझा। इस प्रकार भारत की एक्ट एशिया पॉलिसी ट्रम्प की पोस्ट पॉलिसी के साथ सुसंगति में है। जापान ने जहाँ द्वितीय युद्ध के बाद की अपनी पैसिफिस्ट पॉलिसी (शांतिप्रिय नीति) में बदलाव के संकेत दिए हैं वहीं आस्ट्रेलिया ने भी अपनी अमेरिकी संलग्नता दुहराई है। पोस्ट पिवट पॉलसी की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें अमेरिका की ओबामाकालीन 'बहुपक्षीय (मल्टीलैटरलिज़्म) 'संबंधों के स्थान पर 'द्विपक्षीय (बाईलैटरलिज़्म )'संबंधों को वरीयता दी जा रही है। ट्रम्प प्रत्येक सहयोगी देशों से एक कुशल व्यापारी की तरह अलग-अलग सुनिश्चित प्रतिबद्धता चाहते हैं।

एशिया की बदलती परिस्थितियों में भारत के लिए जैसी अनुकूल परिस्थिति निर्मित हुई है; इसका लाभ लेना एक अवसर तो है पर यह मौजूदा सरकार के लिए एक चुनौती भी है। भारत इसका लाभ कुछ यों ही सुनिश्चित कर सकता है, जब वह विश्व में और क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियों के राष्ट्रहित को समझते हुए स्वयं के राष्ट्रहित की गुंजायश खंगाल सके।  यह इतना सरल नहीं हैं, क्योंकि वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में कोई एक स्वयंभू केंद्र नहीं है, यहाँ राष्ट्र-राज्यों को स्वयं ही अपने हित सुरक्षित रखने होते हैं ।ऐसे में तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही सन्दर्भ में अधिकाधिक राष्ट्र-राज्यों से संबंधों की ऐसी बुनावट करनी होती है, जिससे अधिकतम राष्ट्रहित सधे ।अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि मौजूदा सरकार इन परिस्थितियों का कितना लाभ देश को पहुंचाने में सफल हो सकी।  


*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं.



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