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Thursday, December 14, 2017

भारत राष्ट्र की विविधता और चुनाव सुधार



भारत राष्ट्र की विविधता और चुनाव सुधार
डॉ. श्रीश पाठक* 






स्वतंत्र व निष्पक्ष और नियमित अंतराल पर होने वाले चुनाव किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक लक्षण हैं। चुनाव यदि स्वच्छ और निष्पक्ष न हों, तो राजनीतिक व्यवस्था के लिए ही घातक सिद्ध हो जाते हैं। राजनीतिक सरंचनाएं निर्बाध चलती तो रहती हैं किन्तु उनका अभिप्राय शेष नहीं रह जाता। दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र भारत में चुनाव वर्षपर्यन्त चलने वाले उत्सव हैं, जो न केवल बेहद खर्चीले हैं बल्कि इससे सामान्य प्रशासन के संचलन में भी बाधा पड़ती है। इसी वर्ष अप्रैल में नीति आयोग ने एक मसविदा तैयार करके सभी मुख्यमंत्रियों एवं दूसरे संबंधित लोगों को प्रेषित किया है जिसमें २०२४ से केंद्र-राज्य चुनाव एक साथ ही कराने की वकालत की गयी है, जिससे सुशासन की राह में आने वाली चुनाव-प्रचार संबंधित ख़लल न्यूनतम किये जा सके।


पड़ोसी देश नेपाल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य और केंद्र के चुनाव एक साथ ही दो चरणों में कराने का निर्णय लिया और सफलतापूर्वक संपन्न भी कर लिया है। इस केंद्र-राज्य समकालिक चुनाव व्यवस्था से संसाधनों का मितव्ययी प्रयोग तो होगा ही, आशा की जानी चाहिए कि इस प्रगतिवादी कदम से नेपाल अपने इस लोकतांत्रिक प्रयोग में सफल होकर एक सुदृढ़ राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ पायेगा। दक्षिण एशिया में श्रीलंका में भी यह विमर्श जारी है कि कम से कम सभी राज्यों के चुनाव एक साथ कराये जाएँ ! प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के समर्थन के बाद इस विमर्श को और बल मिला कि भारत देश में एक जरूरी चुनाव-सुधार के तौर पर केंद्र-राज्य चुनाव साथ-साथ कराये जाएँ। आज़ादी के बाद संविधान लागू होने के बाद से भारत में १९६७ तक केंद्र-राज्य चुनाव साथ-साथ ही होते रहे। किन्तु अविश्वास प्रस्ताव आदि प्रक्रियाओं वाली भारतीय संसदीय व्यवस्था में मध्यावधि चुनाव और राज्यों में राष्ट्रपति शासन की गुंजायश बनती है, इसलिए चुने जाने के बाद सरकारों की एक नियत अवधि स्थिर करनी होगी और कुछ राज्यों की सरकारें समयपूर्व ही स्थगित करनी होंगी। जाहिर है यह एक कठिन कार्य है और इसके लिए आवश्यक संवैधानिक सशोधनों के लिए व्यापक विमर्श के साथ आम सहमति की भी दरकार होगी। जहाँ इस संदर्भ में अमूमन राष्ट्रीय दल समर्थन में हैं, वहीं क्षेत्रीय दल और राज्य सरकारें इसके लिए असमय सरकारों के भंग किये जाने के खिलाफ हैं। यदि एक आम सहमति बन भी जाती है तो भी एक साथ चुनाव करवाने के लिए भारी मानव संसाधन और एकमुश्त धन की भी आवश्यकता होगी। कुछ विश्लेषकों ने इस तरह के चुनाव के दौरान अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती से देश की आंतरिक सुरक्षा स्तर पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को लेकर भी आशंका व्यक्त की है। ऐसे सभी प्रश्नों के जवाब के लिए नीति आयोग ने बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई नेतृत्व में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार  की है जो एक सुचिंतित आलेख है। ऐसे किसी भी योजना का क्रियान्यवन कितना ज़मीनी है और क्या सचमुच इससे चुनाव व्यवस्था मितव्ययी होगी और सुशासन के अवरोध क्या कम हो सकेंगे; इन सभी बिंदुओं पर पड़ताल देबरॉय-देसाई कमेटी ने की है। 


भारत की राजनीतिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों ही रीति से चुनाव होता है। देश का वास्तविक प्रधान, प्रधानमंत्री जहाँ प्रत्यक्ष रीति से चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन से चुना जाता है वहीं औपचारिक प्रधान राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रीति से चयनित किया जाता है। चुनाव की दो विधियां विश्व में सर्वाधिक प्रचलित हैं। पहली विधि फर्स्ट पास्ट दी पोस्ट सिस्टम (एफपीपी) सरल है और इसमें जो अधिक मत पहले पाता है उसे ही विजेता घोषित कर दिया जाता है। इस विधि में यदि मत प्रतिशत पैतालीस ही हो अर्थात सौ में से महज पैंतालीस  नागरिकों ने ही मत का प्रयोग किया हो और उस स्थान से केवल छः प्रत्याशी मैदान में हों तो संभव है कि पाँच प्रत्याशियों को सात या उससे कम मत मिलें और महज आठ या अधिकतम दस मत पाकर ही एक प्रत्याशी विजेता घोषित होकर समूचे सौ का प्रतिनिधित्व करे !  इसके उलट आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (हेयर प्रणाली) जटिल तो है, किन्तु इसमें एक भी मत व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि मतदाता प्रत्येक छः प्रत्याशियों को एक वरीयता में मत देता है। इस उदाहरण में यह वरीयता एक से लेकर छः तक होगी। यह प्रणाली छोटे-छोटे संख्या में रहने वाली अस्मिताओं की भी तदनुरूप उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। उथल-पुथल से भरे नए-नवेले राष्ट्र के लिए एफपीपी चुनाव पद्धति आदर्श थी जिसके तकरीबन बारह प्रतिशत नागरिक ही तब साक्षर थे। परन्तु अब उपयुक्त समय है कि भारत में मतदान रीति में बदलाव की एक बहस चले। इस समय भारत की साक्षरता प्रतिशत उल्लेखनीय है और वैश्वीकरण के प्रभावों के परितः भारत के प्रति एक अस्मिता के नागरिक राजनीतिक सहभागिता को आतुर हैं तो एफपीपी चुनाव पद्धति के स्थान पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है।   

*लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं.

Friday, November 24, 2017

चुनाव सुधार और नेपाल चुनाव



डॉ. श्रीश पाठक

नेपाल ने पिछले सात दशकों में सात संविधान देखे हैं। देश के पिछले तीन दशक बेहद त्रासद राजनीतिक अस्थिरता के रहे हैं, जिसमें तकरीबन दस साल भयंकर हिंसाके हैं। नेपाल में १९९० में बहुदलीय लोकतंत्रीय संसदीय व्यवस्था को अपनाया तो गया पर पिछले सत्ताईस सालों में देश में पच्चीस सरकारें आईं और एकबार बलात राजकीय सत्ता परिवर्तन भी हुआ। १९९९ में पिछली बार चुनाव संपन्न हुआ पर दो साल के भीतर ही २००१ में आपातकाल लागू कर दिया गया। २००५-०६ में भारत सरकार के प्रयासों से माओवादियों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल किया गया और नए गणतांत्रिक नेपाल के नए संविधान के गठन के लिए २००८ में प्रथम संवैधानिक सभा बनाई गयी। विभिन्न अस्मिताओं वाले नागरिकों के सम्यक प्रतिनिधित्वके मुद्दे पर खींचातानी चलती रही और २०१३ में द्वितीय संवैधानिक सभा का गठन किया गया। ये संविधान सभाएँ संविधान-निर्माण के लिए सहमति जोहती रहीं और साथ-साथ शासन-प्रशासन भी किसी प्रकार चलाती रहीं। अप्रैल, २०१५ में जहाँ नेपाल ने भूकंप की भयानक विभीषिका झेली, वहीं देश को सितम्बर, २०१५ में नया संविधान मिला जिसके अनुसार नेपाल एक गणतांत्रिक लोकतंत्र होगा, जिसमें राष्ट्रपति संवैधानिक प्रधान और प्रधानमंत्री के पास वास्तविक शक्तियाँ होंगी और देश सात राज्यों का एक संघीय ढाँचा बनेगा ।२०१३ के बाद से पिछले चार साल में चार सरकारें आ चुकी हैं जो नेपाली कांग्रेस के सुशील कोईराला, शेर बहादुर देउबा और माओवादी गठबंधन के प्रचंड और केपी ओली के नेतृत्व में बनीं। नए संविधान के मुताबिक देश में त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया है, जिसमें केंद्रीय संसदीय स्तर, राज्यस्तर और निकायों का स्थानीय स्तर भी समावेशित है। 



फिलहाल राहत की बात यह है कि निकाय स्तर के चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं और उन चुनावों में तीन बड़े दल क्रमशः कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल-यूनिफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट, नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल (माओइस्ट सेंटर) उभरे हैं। इन्हीं तीन दलों के चुने हुए प्रत्याशी अब नेपाल के उच्च सदन के सदस्य चुनेंगे। जनवरी २०१८ तक नए संविधान के अनुसार नयी सरकार गठित कर ली जाए और पिछले कई दशकों की उठापटक से उपजी भयंकर बेरोज़गारी का जवाब एक सुनियोजित विकास से दिया जा सके, इसलिए ही नेपाल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य और केंद्र के चुनाव एक साथ ही दो चरणों में कराने का निर्णय लिया है। इस केंद्र-राज्य समकालिक चुनाव व्यवस्था से संसाधनों कामितव्ययी  प्रयोग होगा और सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित देश को एक सशक्त प्रधानमंत्री भी मिलेगा, ऐसी अपेक्षा है। यह यकीनन एक प्रगतिवादी कदम है और आशा की जानी चाहिए कि नेपाल अपने इस लोकतांत्रिक प्रयोग में सफल होकर एक सुदृढ़ राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ पायेगा। दक्षिण एशिया में श्रीलंका में भी यह विमर्श जारी है कि कम से कम सभी राज्यों के चुनाव एक साथ कराये जाएँ ! 

नेपाल ने एक बेहतरीन सुधार और अपने चुनाव प्रणाली में किया है, जो सचमुच उल्लेखनीय है। नेपाल ने समानांतर मतदान प्रणाली व्यवस्था को चुना है जिसमें विभिन्न प्रत्याशी दो रीतियों से चुने जायेंगे। तकरीबन साठ प्रतिशत प्रत्याशी फर्स्ट पास्ट दी पोस्ट-एफपीपी (ज्यादा मत पाया, वह जीता ) पद्धति से और बाकी प्रत्याशी आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से चुने जायेंगे। जहाँ एफपीपी पद्धति एक सरल चुनाव पद्धति है वहीं आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति जटिल तो है परन्तु प्रत्याशियों का सम्यक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। नेपाल के संविधान-निर्माताओं ने अपने स्तर पर यह कोशिश की है कि गठित होने वाली आगामी संसद में सभी हित और अस्मिताएं सम्यक प्रतिनिधित्व के साथ प्रशासन में योग दें, ताकि देश फिर किसी अन्तर्संघर्ष की स्थिति में न फँसें।

उथल-पुथल से भरे नए-नवेले राष्ट्र भारत के लिए एफपीपी चुनाव पद्धति आदर्श थी जिसके तकरीबन अठ्ठासी प्रतिशत नागरिक साक्षर भी नहीं थे। किन्तु अब जबकि भारत की साक्षरता लगभग पचहत्तर प्रतिशत के करीब है, आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अपनाये जाने के लिए जरूरी विमर्श होना चाहिए क्योंकि यही पद्धति भारत की विशाल विविधताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व कर सकती है।  




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