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Monday, December 25, 2017

विश्व पटल पर उभरता भारत

डॉ. श्रीश पाठक*



भारत के मित्र समझे जाने वाले खूबसूरत देश मालदीव से अभी चीन ने मुक्त व्यापार संधि संपन्न की, पर फिर भी कहना होगा कि वैश्विक पटल पर और खासकर एशियाई क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। दरअसल, चीन के बढ़ते प्रभावों के उत्तर में अमेरिका के पास भारत के अलावा कोई दूसरा ऐसा विकल्प नहीं है, जिसकी भू-राजनीतिक स्थिति कमाल की हो, बाजार के लिए अवसर प्रचुर हों और वैश्विक लोकतान्त्रिक साख भी विश्वसनीय हो।

अपने कार्यकाल के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यनीति में ट्रम्प सरकार ने जहाँ पाकिस्तान के लिए सख्त रवैया अपनाया वहीं एक ‘विश्वशक्ति’ के तौर पर भारत का ज़िक्र आठ बार किया और भारत के साथ सामरिक-आर्थिक हितों के और बेहतर विकास की वकालत की । हाल ही में हुए आठवें वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन के आयोजन के लिए भी अमेरिका के स्टेट विभाग ने भारत को चुना, जो कि दक्षिण एशिया का पहला ऐसा आयोजन था। ट्रम्प की पुत्री इवांका, ट्रम्प परिवार की एक प्रभावशाली व्यक्तित्व मानी जाती हैं और अपने यहूदी पति जेरेड कुशनर की तरह ही जिनकी मंत्रणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए उनके चुनाव अभियानों के समय से ही मायने रखती है। इस वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन में इवांका की फैशन कूटनीति की भी चर्चा हुई।

वाशिंगटन की अपनी प्रेसवार्ता में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी हाल ही में हुई दक्षिण-पूर्व एशियाई यात्रा को 'जबर्दस्त सफल' करार दिया था । उन्होंने पत्रकारों से बिना कोई सवाल लिए एक लम्बा उद्बोधन दिया और कहा कि एक वैश्विक नेता के तौर पर अपनी भूमिका में अमेरिका वापस आ गया है और उनके प्रयासों ने  उन्मादी उत्तर कोरिया के खिलाफ विश्व को एकजुट कर दिया है। उत्तर कोरिया ने अभी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण किया जिसमें उसका दावा है कि अब अमेरिका का पूरा भू-भाग उनके आक्रमण-क्षेत्र में आ गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने एक ट्वीट में इस पर चिंता जताते हुए अपनी सरकार और सेना के लिए और अधिक वित्त की आवश्यकता पर बल दिया। इसी दिन के एक ट्वीट में डोनाल्ड ट्रम्प ने इवांका की भारत यात्रा के उनकी सक्रियता की प्रशंसा भी की।   ट्रम्प की एशिया-प्रशांत यात्रा एक ऐसे क्षेत्र में हुई जहाँ तेजी से चीन की दखलंदाज़ी बढ़ी है और एक ऐसे समय में हुई जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के उन्नीसवें अधिवेशन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने तीन घंटे तेईस मिनट के लम्बे भाषण में चीन की वैश्विक और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पुनः दोहराया है।

माना जा रहा है कि इवांका की मंत्रणा से ही ट्रम्प की इस यात्रा में चीन का समावेशन अमेरिका के आर्थिक हितों के सुचारू संचलन के लिए किया गया था।  समझा जा सकता है कि इस यात्रा के अन्य पड़ावों के रूप में में बाकी देशों जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और वियतनाम का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि वे सभी चीन के संतुलन में अलग-अलग दृष्टिकोण से अमेरिका के मजबूत स्तम्भ हैं। जापान जहाँ सामरिक और आर्थिक रूप से अमेरिकी कूटनीति में प्रतिभाग कर रहा, वहीं दक्षिण कोरिया दरअसल उत्तर कोरिया के संतुलन में है। वियतनाम और फिलीपींस की भू-राजनैतिक स्थिति दक्षिण-चीन सागर के लिहाज से अहम है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में एपेक और आसियान सहयोग के मद्देनज़र भी दोनों देश अमेरिकी हितों को आकर्षित करते हैं। चीन पर इस अमेरिकी घेराव को और धार मिल जाती है जब ट्रम्प द्वारा इस क्षेत्र को ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र कहा जाता है।  चर्चित जापान-भारत-अमेरिका-आस्ट्रेलिया चतुष्क (क्वाड) के साथ ही यहाँ बहरहाल पाकिस्तान-चीन-रूस-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।  

गौरतलब है कि अपने आप को पहला पैसिफिक प्रेसिडेंट कहने वाले अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति ओबामा ने अपनी महत्वाकांक्षी पिवट पॉलिसी का प्रतिपादन किया था जिसमें अमेरिकी संबंधों का झुकाव मध्य-पूर्व एशिया से हटाकर एशिया-पैसिफिक की तरफ करने की बात की गयी थी। अमेरिका की कोशिश थी कि देश की विदेश नीति में मध्य-पूर्व एशिया की जटिल राजनीति की भूमिका कम करके एशिया-पैसिफिक के व्यापारिक-वाणिज्यिक एवं सामरिक महत्त्व को प्रमुखता दी जाए। किन्तु ओबामा प्रशासन में इस ओर ठोस कदम नहीं उठाये जा सके। न ही अमेरिका की सक्रियता वहाँ कुछ कम की जा सकी और न ही एशिया-पैसिफिक में अमेरिकी इरादों को अमली जामा पहनाया जा सका। इससे अलग ट्रम्प मध्य-पूर्व एशिया में अमेरिकी सक्रियता कम किये जाने के पक्ष में तो नहीं हैं किन्तु एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में भी अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की फिराक में हैं। इसे कुछ विशेषज्ञ ट्रम्प की 'पोस्ट पिवट पॉलिसी' कह रहे हैं जिसमें ट्रम्प का दबाव इसपर ज्यादा है कि क्षेत्रीय संतुलन की जिम्मेदारी में सभी सहयोगी देशों को साझीदारी करनी होगी।

ट्रम्प व्यवसायी हैं और अमेरिका का चुनाव अमेरिकी हितों की प्राथमिकताओं को वरीयता देने के वादे से जीत कर आये हैं। क्षेत्र में चीन के साथ उनके देश की सर्वाधिक व्यापारिक हित जुड़े हैं, जिसे उन्होंने इस बार की यात्रा में भी महत्ता दी है ट्रम्प ने 'आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है' का नारा देकर अपना मंतव्य भी स्पष्ट कर दिया।  इसके साथ ही हिंद महासागर से प्रशांत महासागर के व्यापारिक समुद्री मार्गों की मुक्तता एवं सुरक्षा के लिए वे भारत की महत्ता को रेखांकित करने से नहीं चुके हैं। उन्हें अमेरिका का दबदबा कम तो नहीं होने देना है किन्तु ट्रम्प चाहते हैं कि जिन देशों को अमेरिकी वैश्विक संलग्नता से फायदा है, वे इसे मिलकर वहन करें। आर्थिक दृष्टिकोण से हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर के बीच की समुद्री मार्ग को ट्रम्प सुगम व व्यवधानरहित बनाना चाहते हैं।  चतुष्क के तीनों देशों ने दरअसल अमेरिकी इशारों के अनुरूप जवाब देना शुरू भी कर दिया है। डोकलाम विवाद में भारत ने जताया कि अब वह कूटनीतिक चुप्पी से कहीं अधिक की भूमिका में आने को तत्पर है और वहीं एक्ट ईस्ट पॉलिसी का इज़हार करते हुए दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में भी भारत ने अपनी बढ़ती सक्रियता के सुबूत दिए हैं। ग़ौरतलब है कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में म्यांमार एक मजबूत स्तम्भ है और हालिया रोहिंग्या विवाद में भारत ने म्यांमार के खिलाफ निष्क्रिय रहना ही उचित समझा। इस प्रकार भारत की एक्ट एशिया पॉलिसी ट्रम्प की पोस्ट पॉलिसी के साथ सुसंगति में है। जापान ने जहाँ द्वितीय युद्ध के बाद की अपनी पैसिफिस्ट पॉलिसी (शांतिप्रिय नीति) में बदलाव के संकेत दिए हैं वहीं आस्ट्रेलिया ने भी अपनी अमेरिकी संलग्नता दुहराई है। पोस्ट पिवट पॉलसी की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें अमेरिका की ओबामाकालीन 'बहुपक्षीय (मल्टीलैटरलिज़्म) 'संबंधों के स्थान पर 'द्विपक्षीय (बाईलैटरलिज़्म )'संबंधों को वरीयता दी जा रही है। ट्रम्प प्रत्येक सहयोगी देशों से एक कुशल व्यापारी की तरह अलग-अलग सुनिश्चित प्रतिबद्धता चाहते हैं।

एशिया की बदलती परिस्थितियों में भारत के लिए जैसी अनुकूल परिस्थिति निर्मित हुई है; इसका लाभ लेना एक अवसर तो है पर यह मौजूदा सरकार के लिए एक चुनौती भी है। भारत इसका लाभ कुछ यों ही सुनिश्चित कर सकता है, जब वह विश्व में और क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियों के राष्ट्रहित को समझते हुए स्वयं के राष्ट्रहित की गुंजायश खंगाल सके।  यह इतना सरल नहीं हैं, क्योंकि वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में कोई एक स्वयंभू केंद्र नहीं है, यहाँ राष्ट्र-राज्यों को स्वयं ही अपने हित सुरक्षित रखने होते हैं ।ऐसे में तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही सन्दर्भ में अधिकाधिक राष्ट्र-राज्यों से संबंधों की ऐसी बुनावट करनी होती है, जिससे अधिकतम राष्ट्रहित सधे ।अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि मौजूदा सरकार इन परिस्थितियों का कितना लाभ देश को पहुंचाने में सफल हो सकी।  


*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं.



Friday, November 17, 2017

पाकिस्तान में मुशर्रफ का महागठबंधन

डॉ. श्रीश पाठक
दुबई में राजनीतिक रूप से स्वनिर्वासित जीवन जी रहे पाकिस्तान के भूतपूर्व सैनिक तानाशाह और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने गत शुक्रवार (१०.११.१७) को विडिओ टेलीकांफ्रेंसिंग के जरिये हुई एक प्रेसवार्ता में एक बार फिर पाकिस्तान लौटकर सक्रिय राजनीति में परिभाग की अपनी मंशा जताई है. उनका कहना है कि वे सत्तारुढ़ ‘पाकिस्तान मुस्लिम लींग (नवाज़)’ और पिछली बार सरकार बनाने वाली ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ को देश को बर्बाद नहीं करने देंगे. बेनजीर भुट्टो हत्या मामले में न्यायालय ने मुशर्रफ को राजद्रोह का दोषी और भगौड़ा करार दिया था. न्यायालय और नागरिक सरकार से काफी  जद्दोजहद के बाद आखिरकार चिकित्सा का कारण बताने पर उन्हें मार्च २०१६ में दुबई जाने की इजाज़त मिली. तब से मुशर्रफ ने कई बार देश लौटकर राजनीति से देश सेवा करने की बात दोहराई है पर कभी सुरक्षा कारणों से अथवा कभी किसी वजह से यह टलता रहा है.  इस बार की उनकी मंशा में पुरी तैयारी भी दिख रही है. उन्होंने कुल तेईस अन्य दलों के साथ मिलकर अपने नेतृत्व में एक महागठबंधन बनाने की भी घोषणा की है, जिसका नाम ‘पाकिस्तान अवामी एतेहाद’ रखा है और जिसका मुख्यालय इस्लामाबाद में होगा. हालांकि महागठबंधन के ये दल, देश के कोई बड़े प्रभाव वाले दल नहीं हैं, किन्तु मुशर्रफ के अपने दल ‘आल पाकिस्तान मुस्लिम लींग’ सरीखे ही यत्र-तत्र प्रभाव अवश्य ही रखते हैं. नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ शरीफ ने मुशर्रफ़ की इस घोषणा पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया में उन्हें निशान-- इबरत (कलंक) की संज्ञा दे डाली है.
दिल्ली की पैदाइश और लखनऊ के नौनिहाल मुशर्रफ पाकिस्तानी राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं और इस वक्त पाकिस्तान के किसी भी प्रभावी राजनीतिक हस्ती से केवल उम्र में ही नहीं बल्कि अनुभव में भी बीस पड़ते हैं. उनकी हालिया तैयारी एक ऐसे समय में है जब पनामा पेपर्स विवाद ने नवाज़ शरीफ को उनके पद से हटा दिया है और शरीफ परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप में न्यायलय का डंडा अभी और चलने को है. इस बीच नवाज़ शरीफ के बाद दल में दूसरा प्रमुख चेहरा समझी जाने वाली उनकी बड़बोली बेटी मरियम नवाज़ शरीफ ने परिवार के भीतर ही राजनीतिक उत्तराधिकार की बहस को बेवक्त ही सतह पर ला दिया है. नवाज़ शरीफ के ही चुने हुए सेना प्रमुख मुशर्रफ ने १९९९ में सैनिक तख्तापलट करते हुए शरीफ सरकार को अपदस्थ कर दिया था और फिर आपातकाल के बाद फिर चुनाव कराकर स्वयं ही देश के राष्ट्रपति बन बैठे थे. मुशर्रफ का कार्यकाल यों तो बेहद ही विवादों से भरा रहा है पर कारगिल के इस मास्टरमाइंड ने अपने देश पाकिस्तान को ९/११ की घटना के बाद अमेरिकी गुस्से से न केवल बचाया था बल्कि पाकिस्तानी पारम्परिक शक्ति- प्रतिष्ठान (एस्टाब्लिशमेंट) की पुरानी नीति में सहसा बदलाव लाते हुए पाकिस्तानी सेना को अफ़गानिस्तान में तालिबान के विरुद्ध झोंककर अमेरिकी सौगात भी बटोरी थी. पाकिस्तान में यों तो लोकतंत्र है पर १९४७ में अपने अस्तित्व में आने बाद से ही औपनिवेशिक विरासत में मिले मजबूत सांगठनिक नौकरशाही और सेना, धार्मिक कट्टरता का ही नीति निर्णयन और क्रियान्यवन में हाथ रहा है. बार-बार उपजते राजनीतिक संकट और वैश्विक पटल पर शीत युद्ध की आवक ने इसमें अमेरिकी दखलंदाजी भी जुड़ गयी. यह सब मिलकर ही पाकिस्तान का शक्तिशाली शक्ति-प्रतिष्ठान निर्मित करते हैं. अपनी तानाशाही में मुशर्रफ ने पाकिस्तान को वैश्विक पटल पर तो सुरक्षित रखा परन्तु लोकतंत्र की कमर ही तोड़ दी. वैश्विक परिदृश्य बदला, पाकिस्तानी नागरिक समाज ने एकजुट होकर न्यायपालिका के साथ मिलकर मुशर्रफ को लोकतान्त्रिक दिखावा करने को मजबूर कर दिया. २००७ में निर्वासन से नवाज़ शरीफ भी आये और बेनजीर भुट्टो भी वापस लौटीं. पाकिस्तान में चुनावों की घोषणा हुई और बेनजीर भुट्टो की निर्मम हत्या के पश्चात उनके दल ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ ने २००८ में सरकार बनाई. पांच साल के बाद पाकिस्तान ने अपने इतिहास का पहला शांतिपूर्ण लोकतान्त्रिक सत्ता-परिवर्तन देखा और नवाज़ शरीफ के दल ने जून, २०१३ में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. कतिपय अपवादों को छोड़ दें तो इन दस सालों में मुशर्रफ पाकिस्तानी राजनीति में अप्रासंगिक रहे.

लेकिन पिछली ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ की सरकार ने जहाँ पाकिस्तानी पारम्परिक शक्ति-प्रतिष्ठान के समक्ष समझौते करती रही, वहीं ‘पाकिस्तान मुस्लिम लींग (नवाज़)’ की मौजूदा सरकार ने जब तब नागरिक सरकार की ताकत का एहसास सेना प्रशासन को कराया है. पाकिस्तानी पारम्परिक शक्ति-प्रतिष्ठान जहाँ एक कमजोर नागरिक सरकार के साथ लोकतांत्रिक छवि बनाते हुए मनमाना करते रहना चाहते हैं, वहीं पाकिस्तान के पारम्परिक मित्र अमेरिका के लिए भी वांछित स्थिति यही रही है कि एक ऐसा शक्ति प्रतिष्ठान पाकिस्तान में शक्तिशाली रहे जो दक्षिण एशियाई मामलों में अमेरिकी हितों के अनुरूप त्वरित निर्णय ले सके. किसी भी तानाशाह की सत्ता का अंत पाकिस्तान में सुखद नहीं रहा, पर यह मुशर्रफ की राजनीतिक कुशलता ही है कि वह अब भी राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें यकीनन उनकी पाकिस्तानी सेना और शक्ति-प्रतिष्ठान में पकड़ का अंदाजा लगता है. संभव है कि शक्ति-प्रतिष्ठान उनमें एक राजनीतिक विकल्प ढूंढ रही हो. गौरतलब है कि मुशर्रफ ने अपने इस टेलीकांफ्रेंसिंग प्रेसवार्ता में यह भी कहा कि यदि चुनाव पाकिस्तान की समस्याओं का हल नहीं देते हैं तो देश को वापस उसकी रह पर लाने के लिए दुसरे उपाय किये जाने चाहिए. महागठबंधन बनाकर उन्होंने वरीयता में चुनाव को ही रखा है किन्तु राजनीतिक सौदेबाजी के जादूगर मुशर्रफ के इरादे भांपना आसान नहीं है.
पाकिस्तान में अगले आम चुनाव २०१८ में होने हैं. पिछले दस साल में सत्ता दो ही बड़े दल ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ और ‘पाकिस्तान अवामी लींग (नवाज़)’ के पास रही है. दक्षिण-पारम्परिक विचारधारा वाला नवाज़ के दल का गढ़-राज्य देश का सबसे धनी राज्य पंजाब है वहीं देश का दूसरा महत्वपूर्ण राज्य सिंध लोकतान्त्रिक समाजवादी विचारधारा वाला दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रभावों का राज्य है. सिंध के पड़ोस में बलूचिस्तान राज्य है जो आतंकग्रस्त है. अफ़ग़ानिस्तान सीमा से लगा फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राईबल एरियाज ), खैबर पख्तुनखवा और गिलगित-बाल्टीस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी अशांत क्षेत्र हैं; यहाँ कोई एक दल प्रभाव की स्थिति में नहीं है. ऐसे में मुशर्रफ के महागठबंधन को हलके में लेना भूल हो सकती है. मौजूदा कौमी असेम्बली (निम्न सदन) में पाकिस्तानी क्रिकेटर का दल ‘पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई)’  दुसरे नंबर का दल है और खैबर पख्तुनखवा राज्य में इसी दल की सरकार है. मुशर्रफ गाहे-बगाहे इमरान खान की प्रशंसा करते रहते हैं और उन्होंने अपने प्रेसवार्ता में उनके दल से अपील की है कि उनके महागठबंधन को समर्थन दें. नवाज़ के दल से अलग हुई ‘पाकिस्तान मुस्लिम लींग (क्यू)’ ने पहले ही महागठबंधन को अपना समर्थन दे दिया है. सिंध राज्य का कराची, पाकिस्तान का वाणिज्यिक शहर है और यह मुहाजिर राजनीति का अखाड़ा भी है. विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान आये मुस्लिम मुहाजिर कहलाये जो अमूमन उर्दू बोलते हैं और जिन्हें पाकिस्तान में अपने लिए खासा जद्दोजहद करनी पड़ी. मुशर्रफ स्वयं मुहाजिर हैं और मुहाजिरों का सबसे बड़ा दल जो छात्र राजनीति से निकलकर आया वह ‘मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम)’ है जिसे फ़िलहाल लन्दन में रह रहे अल्ताफ हुसैन ने खड़ा किया था. पाकिस्तान में एमक्यूएम को फारुक सत्तार ने सम्हाला था, जो अगस्त २०१६ में सत्तार के ही नेतृत्व में ‘मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (पाकिस्तान)’ के नाम से एक नया दल बन गया. अल्ताफ हुसैन के ही दल से कराची के मेयर रहे तेज-तर्रार सैयद मुस्तफा कमाल ने भी मार्च २०१६ में अलग होकर एक नया दल ‘पाक सरज़मीन पार्टी’ बना ली और अल्ताफ हुसैन सिंधी राजनीति में फिलहाल अलग-थलग पड़ गए हैं. पिछले दिनों पाकिस्तानी शक्ति-प्रतिष्ठान के प्रभाव में फारुक सत्तार और सैयद मुस्तफा कमाल के दल ने एक गठबंधन बनाने की घोषणा की. मुशर्रफ ने इसे अप्राकृतिक गठबंधन कहा पर मुहाजिरी एकता पर संतोष भी व्यक्त किया. फ़िलहाल यह गठबंधन बन नहीं सका है और काफी नाटकीय ढंग से सहयोग की गुंजायश बनी हुई है.
मुशर्रफ ने बोल टीवी पर अपने साप्ताहिक साक्षात्कार कार्यक्रम से और अपने बयानों से पूरे साल पाकिस्तान में सुर्खियाँ बटोरी हैं और आगामी आम चुनाव के मद्देनज़र उन्होंने अपनी कमर कस ली है. आने वाले समय में यदि मुशर्रफ पाकिस्तान लौटते हैं तो निश्चित ही वह एक प्रभावी कोण बनकर उभरेंगे. मुशर्रफ को पाकिस्तानी न्यायालयों पर सहसा विश्वास हो आया है और वे देश वापस आकर अपने खिलाफ सभी मामलों का सामना करने को तैयार हैं. मुशर्रफ के मुताबिक पहले न्यायालय नवाज़ के इशारे पर चल रही थीं, पर अब तो नवाज़ को ही न्यायलय ने सबक दे दिया है. पाकिस्तान की राजनीति में यदि मुशर्रफ फिर उभरते हैं तो इससे पाकिस्तान के भारत और अमेरिका से संबंधों पर तो असर होगा ही, क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों में भी सुगबुगाहट कुछ कम न रहेगी.




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