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Thursday, December 13, 2018

भारत-पाकिस्तान का करतारपुर कनेक्शन



लोकतंत्र की विडंबना यह है कि सत्ता की निरंतरता की चाह दलों को अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए अंततः सबकुछ दाँव पर लगाने को उद्यत कर देती है और दल सत्ता के लिए ऐसा करने भी लग जाते हैं। दल, सत्ता के अपने पाँच सालों में लगभग हमेशा ही कुछ यों अपनी गतिविधियाँ रखते हैं कि उन्हें चुनाव में इसका फायदा अवश्य मिले। भारत-पाकिस्तान संबंध भी सीमा के दोनों ओर की सरकारों की इस मानसिकता से लगातार प्रभावित होता रहा है। पंजाब, जो कि सीमा के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देशों का महत्वपूर्ण राज्य है, संबंधों की इस अनिश्चितता से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला नागरिक-समुदाय है। खालिस्तान-संघर्ष का भयावह अध्याय इसमें सुरक्षा व आतंकवाद के महत्वपूर्ण तत्व भी जोड़ता है, जिससे सरकारें और भी एहतियात बरतती हैं और संबंधों में एकप्रकार की ठंडी जड़ता पसरी रहती है। इन ठिठके रिश्तों में सहसा एक हलचल हुई जब भारतीय पंजाब के राज्य सरकार के एक मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू अपने क्रिकेटर मित्र इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने पाकिस्तान पहुँचे और मंच पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले लग गए। यह तस्वीर और विडियो सीमा के दोनों ओर सनसनीखेज रही और दलों ने भी जमकर इसपर छींटाकशी की। गौरतलब है कि भारतीय पंजाब में अभी कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार है और केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार आरूढ़ है। भाजपा और कांग्रेस ने बयानों की रस्साकशी शुरू कर दी और नवजोत सिंह सिद्धू बेतहाशा ट्रोल किये जाने लगे। सिद्धू, चूँकि भाजपा के स्टार प्रचारक रह चुके हैं और हाल ही में उन्होंने कांग्रेस से खुद को जोड़ा है तो यों भी उनपर ट्रोलर्स मेहरबान थे। लेकिन जब सिद्धू ने यह कहा कि कमर बाजवा ने उनसे यह कहा कि आख़िरकार पाकिस्तानी सरकार करतारपुर गलियारा खोलने पर विचार कर रही है तो उनसे रहा नहीं गया और झूमकर उन्होंने बाजवा को गले लगा लिया तो इस बात ने सियासत को एक अलग ही मोड़ दे दिया। पंजाब के जो भाजपा नेता अभी सिद्धू की देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर नुकीली आलोचना कर रहे थे, उन्हें भी अपना स्वर संयत करना पड़ा क्योंकि मामला अब सिख धर्म से जुडी भावनाओं से जुड़ गया था। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत केंद्र की मोदी सरकार भी सकते में थी क्योंकि इस आशय का कोई संचार फ़िलहाल पाकिस्तानी सरकार ने भारत की सरकार से नहीं किया था। 

विभाजन के समय कई बेहद महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल पाकिस्तान की सीमा में आ गए थे जिसमें गुरद्वारा जनम अस्थान ननकाना साहिब, पंचमुखी हनुमान मंदिर कराची, कटसराज मंदिर पंजाब, क्राइस्ट चर्च रावलपिंडी, सेंट कैथेडरल कराची, गुरद्वारा डेरा साहिब लाहौर, हिंगराज मंदिर बलूचिस्तान, सेक्रेड हार्ट कैथेडरल लाहौर, हसन अब्दाल स्थित गुरद्वारा पंजा साहिब और गुरद्वारा करतारपुर साहिब प्रमुख हैं। यों तो भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों में इतने हिलोर रहे हैं कि दोनों देशों के नागरिकों के लिए अपने-अपने धार्मिक स्थलों पर पहुँचना एक बेहद कठिन बात रही है लेकिन सितम्बर 14, 1974 को दोनों देशों ने ‘प्रोटोकॉल ऑन विजिट्स टू रिलीजियस श्राइन्स’ पर हस्ताक्षर किये जिसमें एक निश्चित वीजा व समय के लिए चिन्हित धार्मिक स्थलों पर जाया जा सकता है। हालाँकि, संबंधों के बनते-बिगड़ते आयामों के बीच इस सुविधा में भी नानुकर होती रही, पर यह भी सच है कि शांतिकाल में प्रतिवर्ष दोनों ही ओर से लाखों श्रद्धालु आवागमन करते हैं। गुरद्वारा करतार साहिब को पहला गुरद्वारा होने का गौरव प्राप्त है जहाँ गुरु नानकदेव ने अपनी लगभग 25 बरस की यात्रा (जिसमें उन्होंने श्रीलंका, तिब्बत, ईरान, बंगाल तक की खाक छानी) के बाद जीवन के आख़िरी 18 बरस एक किसान की तरह बिताया था। कहते हैं कि अपने समकालीन कबीर की तरह ही इनके प्रयाण पर भी हिन्दुओं और मुस्लिमों में विवाद हो गया था और कबीर की तरह ही गुरु नानक के पार्थिव शरीर के स्थान पर कुछ फूल मिले जिसे लेकर समाधि भी बनी और कब्र भी। गुरु नानकदेव ने कबीर की ही तरह सभी धर्मांधों की कटु आलोचना की और जीवनपर्यंत यह संदेश देते रहे कि सभी धर्म अपने शुद्धतम रूप में एक ही सच कहते हैं। यह करतारपुर ही था, जहाँ गुरु ने सभी भेदभावों को मिटाकर लंगर की प्रथा कायम की जो आज सिख धर्म की बेहद महत्वपूर्ण विशिष्टता है। इसलिए ही, करतारपुर साहिब, सिख धर्म के प्रत्येक अनुयायी के लिए एक बेहद धार्मिक स्थल है जहाँ जाने की हसरत सभी श्रद्धालुओं को होती है। भारतीय श्रद्धालु अपनी यह हसरत उन दूरबीनों  से देखकर भी पूरी करते हैं जो जिला गुरदासपुर में स्थित डेरा बाबा नानक गुरद्वारे पर दर्शन हेतु लगाई गयी है। अटल बिहारी वाजपेयी अपनी लाहौर बस यात्रा में पहली बार करतारपुर साहिब गलियारे की चर्चा करते हैं और लगभग पिछले 25 वर्षों से सीमा के दोनों ओर से इस सन्दर्भ में प्रयास जारी थे। पाकिस्तान के नरोवाल जिले में स्थित करतारपुर साहिब गुरद्वारा और डेरा बाबा नानक गुरद्वारा में महज 4 किमी का फासला है पर रावी नदी यहीं बीच में भारत-पाकिस्तान की सीमा बनाती है। एक चुनाव रैली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने इसी सीमा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस को सिख भावनाओं की कद्र होती तो करतारपुर साहिब भारतीय सीमा में होता। यह बेहद ही खतरनाक और हास्यास्पद बयान है यदि इतिहास के पन्नों को न भुलाया जाय। जाहिर है, मोदी सरकार को बिलकुल अंदेशा नहीं था कि पाकिस्तान की नयी इमरान सरकार यदि करतारपुर गलियारा खोलने को राजी होती भी है तो उसका संदेसा पहले सिद्धू को मिलेगा और धार्मिक भावनाओं के दबाव में मोदी सरकार इस अवसर को मना भी नहीं कर सकती थी। गौरतलब है कि 22 नवम्बर से गुरु नानकदेव का 550वां प्रकाशवर्ष भी प्रारम्भ हो गया है जिसकी तैयारी जोरशोर से चल रही और मोदी सरकार ने भी इसे  भव्यता से मनाने का निर्णय लिया है और भारत सरकार को अपनी ओर से भी करतारपुर गलियारा के शिलान्यास का निर्णय लेना पड़ा। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा का पशोपेश में होना सुषमा स्वराज के उस बयान से बखूबी झलकता है जहाँ वह कहती हैं कि करतारपुर गलियारा खोलने पर पाकिस्तान सरकार की सहमति आने का अर्थ यह नहीं है कि भारत, पाकिस्तान से शांति वार्त्ताओं के लिए तैयार हो जायेगा। यकीनन, आज जो नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में होते तो भारत सरकार इसे पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2, ट्रैक-3 नीति की शांति प्रयासों से जोड़ती और चुनावों में बड़ी सकारात्मकता से उतरती। भाजपा से कांग्रेस में गए नवजोत सिंह सिद्धू के हाथ इस इक्के के लग जाने से अब कांग्रेस में उनकी स्थिति मजबूत तो हुई ही है, पंजाब में भी उनके लिए एक गुडविल बनी है। 

भारत की तरफ से करतारपुर गलियारे का शिलान्यास करते हुए नितिन गडकरी ने इसे चार-पाँच महीने में ही पूरा कर लेने का दावा किया, जिससे बिना वीजा के श्रद्धालुओं की आवाजाही हो सके। इसी मंच से बोलते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन अटकलों का जवाब दिया जिनमें गलियारे की आतंकवादियों द्वारा सुरक्षा संबंधी दुष्प्रयोग का अंदेशा जतलाया गया है। उन्होंने पाकिस्तानी जनरल कमर बाजवा को कड़ी चेतावनी दी और कहा कि पंजाबी लड़ना जानते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की यह चिंता वैसे जायज है कि इस गलियारे का दुष्प्रयोग संभव है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब इसे खोलने की सूचना सीधे पाकिस्तानी जनरल कमर बाजवा की ओर से सबसे पहले आती है वह भी पाकिस्तान के नयी सरकार के शपथ ग्रहण के अवसर पर, तो निश्चित ही यह इमरान सरकार का फैसला नहीं लगता। पाकिस्तान में यों भी विदेशी मामलों में सरकार से अधिक सेना की चलती है और इमरान सरकार सेनापरस्त सरकार मानी भी जाती है। ऐसे में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की एक चिंता यह भी है कि यह पाकिस्तानी सेना का एक गेमप्लान भी हो सकता है। एक वीजाफ्री गलियारा दोनों ओर के खालिस्तानी अतिवादियों को भी मौका देगा और यह देशव्यापी आतंकवाद का भी एक जरिया बन सकता है। दो देशों के बीच जब तनावपूर्ण संबंध होते हैं और संयोग से वे एक-दूसरे के पड़ोसी होते हैं तो न शांति के प्रयास थामे जाते हैं और न ही सुरक्षा व ख़ुफ़िया तैयारियों में कोई ढील दी जाती है, इसलिए इस आशंका के समानांतर किसी भी प्रकार के शांति प्रयासों को रोका नहीं जा सकता और सरकार दूसरी ओर इस गलियारे के लिए अपनी सुरक्षा तैयारियों पर भी गंभीरता से काम अवश्य करे।

करतारपुर साहिब गलियारा, भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नयी ऊर्जा फूंक सकता है जो सीमा की दोनों ओर की सरकारें गंभीर हों। पाकिस्तान में नयी सरकार आ चुकी है और भारत में नयी सरकार आने को है। पाकिस्तान के साथ भारत की एक कशमकश यह रहा करती थी कि वार्ता किससे की जाय पर अभी इमरान खान ने गलियारे का अपनी तरफ से शिलान्यास करते हुए ठीक ही कहा कि सरकार, सेना और नागरिक समाज सारे ही इस मुद्दे पर एक पेज पर हैं। इमरान खान का एक पर्सनल कनेक्ट भी सिख धर्म से है। इमरान खान जबसे महान बाबा फरीद के अनुयायियों के संपर्क में आये हैं, खासे आध्यात्मिक हुए हैं और इन बाबा फरीद के महत्वपूर्ण उद्धरण नानकदेव के गुरुग्रंथ साहिब में ही पहली बार मिलते हैं। बचपन से इमरान खान जिस मेला मियांमीर में शिरकत करते रहे हैं और उनकी माँ की कब्र जिस मियांमीर की कब्र के पास है उन्हीं मियांमीर ने गुरु अर्जनदेव के आग्रह पर अमृतसर स्थित हरमिंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखी थी। गुरु नानकदेव ने अपने जीवन के तमाम वर्ष कई देशों की सीमायें लांघते हुए शांति का पाठ पढ़ाने में व्यतीत किया, उनके 550वें  प्रकाशवर्ष के अवसर पर भारत-पाकिस्तान शांति का एक नया सोपान प्रारम्भ कर सकते हैं। यह गलियारा पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था को धार्मिक पर्यटन के रूप में लाभ पहुँचायेगा। क्षेत्र में रूस की मंशा अमेरिकी प्रभाव को सीमित करते हुए यह है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत और चीन अपने पारस्परिक विवाद निपटाते हुए ईरान से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, चीन होते हुए रूस तक एक सशक्त ऊर्जा गलियारा बनायें जिससे क्षेत्र में अमेरिका पर निर्भरता कम हो। गौरतलब है कि ईरान, पाकिस्तान और चीन से रूस से रिश्ते अच्छे हैं और रूस, भारत से भी अपने रिश्तों में जान फूंककर अफगानिस्तान, ईरान के जरिये मध्य-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति पुख्ता करना चाहता है। भारत, संबंधों के इस वितान पर होने वाले सुखद संभावनाओं की अनदेखी नहीं ही कर सकता तो करतारपुर गलियारा एक महत्वपूर्ण प्रारंभन बिंदु हो सकता है। सिख डायस्पोरा की ताकत भी कनाडा, यूके, यूरोप सहित समूचे विश्वभर में है तो यह गलियारा इस सिख़-विस्तार को भी आकर्षित करेगा और अंततः भारतीय कूटनीति को लाभ भी पहुँचायेगा।   


Wednesday, October 3, 2018

भारत और चीन के मध्य नेपाल ब्रिज या बफर स्टेट?


साभार: नवभारत टाइम्स 

चीन-नेपाल संबंधों के बारे में इतिहास के पन्ने बहुत कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं और इसका एक बेहद महत्वपूर्ण कारण भौगोलिक रूप से नेपाल का चीन से केवल उत्तर की ओर से जुड़ना है। तिब्बत की ओर से चीन से जुड़े नेपाल पर चीन की नज़र हमेशा रही है लेकिन भारत-नेपाल संबंध व भारत की तिब्बत मुद्दे पर दिलचस्पी को देखते हुए चीन सशंकित ही रहता आया था। नेपाल के राजतांत्रिक लोकतंत्र से लोकतांत्रिक गणतंत्र बनने की विकासयात्रा के मध्य उभरे वामपंथी नेतृत्व की उपस्थिति से चीन को नेपाल के करीब आने में एक सहूलियत अवश्य हुई है। नेपाल जहाँ चीन की ओबोर नीति को समर्थन देने वाले देशों में अग्रणी देश बना वहीं उसी ओबोर नीति के तहत चीन ने नेपाल में भारी निवेश करना शुरू किया। सितम्बर माह में ही चीन ने 2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की घोषणा की जो चीन-नेपाल क्रॉस बॉर्डर रेलवे लाइन विकसित करने में प्रयुक्त होगा। चीन और नेपाल ट्रांजिट प्रोटोकॉल के लिए सहमत हुए हैं जिससे नेपाल अपनी जरुरत के मुताबिक छह बॉर्डर पॉइंट्स यथा- रसुवा, तातोपानी, कोरला, कीमाथांका, यारी और ओलांगचुंग गोला का इस्तेमाल कर सकेगा। इसके तहत चीन ने अपने चार बंदरगाह तियानजिन, शेनजेन, लिआन्यूंगांग व झांजीआंग खोल दिए, इसमें तीन लैंझाउ, ल्हासा व शिगास्ते जैसे शुष्क बन्दरगाह भी शामिल हैं। चीन केरांग-काठमांडू रेल परियोजना (ट्रांस हिमालयन मल्टीडाईमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क) पर काम कर रहा है और साथ ही परस्पर वायु व भूमि संपर्कों के फैलाव पर भी ध्यान दे रहा है। कोसी, गंडकी और करनाली आर्थिक गलियारे पर प्रगति देखी जा सकती है। नेपाल-चीन के मध्य सांस्कृतिक-शैक्षणिक सहयोग की अन्य घोषणाएँ तो जब-तब आती ही हैं, इनके मध्य सैन्य कूटनीति में आयी तेजी भी गौरतलब है। माह अप्रैल में सागरमाथा फ्रेंडशिप मिलिटरी एक्सरसाइज फेज वन के बाद इस महीने नेपाल चेंगदू में इसके दूसरे संस्करण में भी परिभाग कर रहा है। यों तो नेपाल, भारत के साथ एक वर्ष में दो बार होने वाले सूर्यकिरण मिलिटरी एक्सरसाइज में भी परिभाग करता है, जिसमें सागरमाथा मिलिटरी एक्सरसाइज के मुकाबले कहीं अधिक सैन्य बल संलग्न होता है लेकिन नेपाली सरकार ने इसी महीने भारत द्वारा आयोजित बिम्सटेक बे ऑफ़ बंगाल जॉइंट मिलिटरी एक्सरसाइज के पहले संस्करण में परिभाग करने से सहसा ही इंकार कर दिया और कूटनीतिक संबंधों को देखते हुए नेपाल ने अपना पर्यवेक्षक भारत भेज दिया।

ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक संबंधों के संदर्भ में यदि नेपाल के भारत और चीन से संबंध परस्पर तौले जाएँ तो यकीनन भारत-नेपाल संबंध, नेपाल-चीन संबंध से अधिक स्वाभाविक, अधिक गहरे और कभी भी अपनी महत्ता नहीं खोने वाले नज़र आएंगे। लेकिन 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद तथाकथित भारतीय सीमाबंदी के बाद नेपाली जनमानस ने एक राष्ट्र पर अतिनिर्भरता के दुष्परिणाम पर सोचने को मजबूर हुए। इसीसमय चीन ने भी तातोपानी में अपना एकमात्र व्यापारिक चेकपॉइंट यह कहते हुए बंद किया था कि वहाँ उन्हें चीन विरोधी गतिविधियों की आशंका है लेकिन नेपाली जनमानस पर फ़िलहाल राजसत्ता के विरुद्ध हुई क्रांति के वामपंथी नायक इतने प्रभावी हो चुके हैं कि उन्होंने चुनाव में तथाकथित भारतीय सीमाबंदी को अधिक तूल दिया। चीन के भारी-भरकम निवेश पर एक तरह के ऋण-बंधन में फंसने का भय स्पष्ट है। श्रीलंका के उदाहरण से नेपाली कूटनीतिक समाज भी अवगत है। तथ्य यह भी है कि सन 2015 से ही नेपाल-चीन तातोपानी व्यापारिक सीमापॉइंट बंद है और एकमात्र रासूवगाड़ी-केरुंग पॉइंट अपने ख़राब अवसंरचना विकास के कारण सुस्त पड़ा है। चीन ने अवश्य ही स्थलबद्ध नेपाल के लिए अपने चार बंदरगाह खोल दिए हैं किन्तु नेपाली घरेलू मीडिया में यह भी विमर्श समानान्तर चल रहा है कि नजदीकी चीनी बंदरगाह भी 2600 किमी दूर है जबकि भारत का हल्दिया पोत काठमांडू के दक्षिण में महज 800 किमी की दूरी पर है। भारत-नेपाल सीमा से कोलकाता की दूरी जहाँ 742 किमी है, वहीं विशाखापत्तनम 1400 किमी की दूरी पर है। परेशानी भारतीय सीमा पर कस्टम संबंधी लालफीताशाही वाले प्रावधानों व भ्रष्टाचार से है। हालाँकि, रक्सौल-काठमांडू और जयनगर-जनकपुर-कुर्था रेलवे लाइन पर इस वक्त भारत जोरशोर से काम कर रहा है। बीरगंज-रक्सौल, बिराटनगर-जोगबनी, भैरहवा-सोनौली और नेपालगंज-रेपड़िया सहित चार बड़े कस्टम चेकपॉइंट्स और नेपाल के तराई क्षेत्र से जुडी सडकों का विस्तारण व उनकी मरम्मत का काम भी प्रगति पर है। 

मन में कहीं भूटान-भारत संबंध को रखते हुए जब नेपाल से भारतीय अपेक्षाओं की पड़ताल की जाएगी तो निराशा हाथ लगेगी ही। भारत-नेपाल संबंधों की तूलना मालदीव चुनावों से उभरे नए समीकरणों से भी करना उचित नहीं होगा क्योंकि जिसतरह मालदीविअन जनमानस ने सत्ता दबाव को धता बताते हुए चीनपरस्त सरकार के खिलाफ मत दिया उसीप्रकार नेपाली जनता ने भी वामपंथ की ऐसी सरकार चुनी है, जिसका झुकाव चीन की तरफ है। यह सच स्वीकारना होगा कि नेपाल अपने कूटनीतिक व सामरिक संबंधों में एक सुरक्षित संतुलन की सम्भावना तो तलाशेगा ही और इसी संतुलन की तलाश उसे चीन से नए-नए समझौतों की तरफ ले जाती है। एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में यकीनन नेपाल एक सौदेबाज देश के रूप में व्यवहार कर रहा है। नेपाल ने तिब्बत-सन्दर्भ में चीन से कहा है कि वह अपनी जमीन चीन-विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल नहीं होने देगा, इसीतरह उसने भारत को भी आश्वासन दिया है कि उसकी भारत के साथ खुली सीमा का दुरूपयोग आतंकवादी गतिविधियों में वह नहीं होने देगा। यह एक तथ्य है कि भारत के तनिक सुलझे व गंभीर प्रयासों से परस्पर संबंधों में पुनः नयी ऊष्मा भी लाई जा सकती है। भारत और नेपाल का इतिहास व समाज एक-दूसरे का स्वाभाविक साझीदार बनाते हैं और भूगोल इसमें भारत को चीन के सापेक्ष नेपाल के लिए हमेशा ही वरीय देश बनाकर रखता है। इस स्थिति में भारत को अपना अवसर अवश्य ही साधना चाहिए।  

नेपाल के नवगठित सरकार के मुखिया खडग प्रसाद ओली बेहद ही कूटनीतिक तरीके से कहते हैं कि नेपाल दो शक्तिशाली राष्ट्रों चीन व भारत के मध्य एक बफर स्टेट की तरह नहीं अपितु ब्रिज स्टेट की तरह अपना भविष्य देखता है। पहली नज़र में यह एक बेहद सकारात्मक बयान लगता है लेकिन नेपाली सरकार की तरफ से फ़िलहाल ऐसी कोई पहल नहीं दिखती, जिससे भारत और चीन के संबंधों में नेपाल एक सेतु की तरह कार्यरत दिखे। वैसे रणनीतिक रूप से भी नेपाल अभी स्थिति में है भी नहीं कि वह इन दोनों शक्तियों के मध्य कोई पुल बना सके लेकिन इस बयान से उसकी यह मंसा अवश्य ही स्पष्ट है कि नेपाल एक बफर स्टेट की तरह दोनों शक्तियों भारत एवं चीन के सुझाये संकेतों के अनुरूप चलने की बजाय उनके मध्य एक निर्णायक शक्ति के रूप में परस्पर संबंधों का निर्वहन करना चाहता है। 

Friday, September 21, 2018

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश: एकीकरण बनाम महासंघ के तर्क


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

लाहौर में जन्में प्रसिद्द भारतीय फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा की 2004 में आयी फिल्म वीर-ज़ारा में मशहूर गीतकार जावेद अख्तर का लिखा एक गीत है जो सुर-साम्राज्ञी लताजी और उदित नारायण की आवाज में बेहद मकबूल हुआ था। 'धरती सुनहरी अम्बर नीला, हर मौसम रंगीला, ऐसा देश है मेरा हो...ऐसा देश है मेरा !' आख़िरी बंद में यह गीत कुछ यों हो जाता है- 'तेरे देश को मैंने देखा, तेरे देश को मैंने जाना...,....ऐसा ही देश है मेरा, जैसा देश है तेरा...!' यह फिल्म, इसके निर्देशक, इसकी कहानी, इसके लेखक और गीतकार यह निश्छल संदेश देते हैं कि भारत और पाकिस्तान में एक-दूसरे के लिए नफरत की कोई गुंजायश नहीं होनी चाहिए और कायनात की अनगिन खूबसूरत नेमतों को दोनों देश की धरती साझा करती है। कहना होगा कि लोकप्रिय कला माध्यम में यह एक अद्भुत प्रयास था जो एक 'मानवीय पाकिस्तान' की छवि गढ़ता था। लेकिन संस्कृति, समाज, इतिहास और राजनीति ये अलग-अलग शब्द हैं और अपनी पूरी अर्थवत्ता में इनके गंभीर निहितार्थों की अवहेलना कत्तई नहीं की जा सकती। राष्ट्र, राज्य व राष्ट्र-राज्य, 'राजनीति' के पारिभाषिक शब्द हैं और इनके अपने विशिष्ट मायने हैं। एम. फिल. की कक्षा में मेरे पाकिस्तानी सहपाठी को इस सुंदर गाने के आख़िरी बंद से क्यों आपत्ति थी, यह मै धीरे-धीरे समझ पाया था क्योंकि वे पंक्तियाँ अनजाने में ही उसके राष्ट्र-राज्य 'पाकिस्तान' के 'रेजन डेटा (राज्य स्थापना का आधारभूत तर्क)' को चोट पहुँचा रही थी। 

राष्ट्र जहाँ राजनीतिक व सामाजिक अस्तित्व का परिचायक है वहीं राज्य मूर्त अस्तित्व का जिसमें जरूरी तत्वों के रूप में निश्चित भू-भाग, जनता, सरकार और संप्रभुता पाए जाते हैं। आधुनिक 'राष्ट्र-राज्य' होने के लिए राष्ट्र और राज्य दोनों की विषेशताओं का होना आवश्यक है। यह समझ लेना बेहद आवश्यक है कि एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान का प्रादुर्भाव 1940 से ही माना जाता है जो 1947 में राज्य की जरूरी विशेषताएँ पाकर एक 'राष्ट्र-राज्य' बनने की अपनी कोशिशों में लग गया। औपनिवेशिक अतीत से मुक्त हुए देशों के बारे में इसलिए ही कहा जाता है कि यहाँ राष्ट्र-निर्माण एवं राज्य-निर्माण की समांनातर प्रक्रियाएँ सतत चलती रहती हैं। यहीं उद्धृत करना समीचीन होगा कि जिन्ना जहाँ भारत-पाकिस्तान को साझे मातृभूमि के दो राष्ट्र के रूप में देखने के हिमायती थे वहीं गाँधी इन्हें 'एक राष्ट्र' के 'दो राज्यों' के रूप में स्वीकार करना चाह रहे थे। आगे चलकर पाकिस्तान का एक और विभाजन हुआ और बांग्लादेश अस्तित्व में आया। यह ठीक है कि दो या दो से अधिक राष्ट्र-राज्य अपने इतिहास, समाज, संस्कृति के कुछ या अधिकांश पन्ने साझा करते हैं पर इस आधार पर उनके 'एकीकरण' का एकतरफा तर्क गढ़ना व उसका एकपक्षीय आरोपण द्विपक्षीय संबंधों में और अधिक तनाव ही भरेगा। कोई भी दो या दो से अधिक राष्ट्र-राज्य अपने-अपने राष्ट्रवाद को सुरक्षित रखते हुए एक 'महासंघ' बनकर काम करने को राजी हो सकते हैं जिससे विश्व-राजनीति में साझे राष्ट्र-हित साथ मिलकर सँवारे जा सकें। राष्ट्र और राज्य की पृथक-पृथक महत्ता समझते हुए ही पीछे कई बार गंभीर रूप से 'महासंघ' की योजना पर तो अवश्य ही विचार-विनिमय हुआ किन्तु किसी भी गंभीर विचारक अथवा राजनेता ने 'एकीकरण' की बात कभी नहीं चलायी। ‘महासंघ’ बनाकर विभाजन का सच नहीं बदला जा सकता लेकिन उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित किया जा सकता है। 'महासंघ' के तर्क को जिन्ना सहित, राम मनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, हामिद अंसारी आदि अनेक हस्तियाँ स्वीकार करती हैं और समय-समय पर इसकी आवश्यकता पर भी बात करती हैं, किन्तु 'एकीकरण' का एकतरफा तर्क सामान्यतया नहीं ही दिया गया।  

अक्टूबर 1990 में हुए पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी एकीकरण राष्ट्र-राज्यों का यकीनन एक सुंदर उदाहरण है, जिससे इतना अवश्य यकीन उपजता है कि एकीकरण की प्रक्रिया असम्भव नहीं है। पर यह उदाहरण भारत, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश पर आरोपित करने से पहले उनकी अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करना बेहद जरूरी है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीपीय सन्दर्भ में यह उदाहरण उपयुक्त नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते दुनिया उदारवादी एवं साम्यवादी विचारधारा के स्तर पर संयुक्त राज्य अमेरिका व सोवियत रूस के नेतृत्व में बंटकर फिर शीत युद्ध के आगोश में चली गयी थी। जर्मनी का पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी के रूप में विभाजन इसी रस्साकस्सी का परिणाम था। पृथक राष्ट्र-अस्तित्व के मूल में तर्क ‘विचारधारा व राजनीतिक व्यवस्था’ का था। 1986 में सोवियत रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने ‘ग्लासनोस्त’ व ‘पेरेस्त्रोइका’ की घोषणा कर दी थी, जिससे अंततः नब्बे के दशक में आते-आते सोवियत विखंडन की प्रक्रिया की शुरुआत हुई। इन नयी परिस्थितियों का लाभ लेते हुए पश्चिमी जर्मनी के चांसलर हेल्मुट कोल ने अमेरिकी तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज हर्बर्ट वाकर बुश के कूटनीतिक प्रयासों से जर्मन-एकीकरण संभव कर दिया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों ओर की जर्मन जनता इस एकीकरण को चाहती थी और बर्लिन की दीवार बिना किसी राजनीतिक रणनीतिक योजना के पूर्णतः स्वतः स्फूर्त जनता द्वारा ढहायी गयी। वह ‘विचारधारा व राजनीतिक व्यवस्था’ जो जर्मन-विभाजन को आधार देती थी, वही कमजोर पड़ती गयी थी।  इसके इतर पाकिस्तान के राष्ट्रगत अस्तित्व का मूल तर्क  ‘धार्मिक’ है और बांग्लादेशी राष्ट्रगत अस्तित्व का मूल तर्क ‘सांस्कृतिक (बंगाली)’ है, जो अभी भी पूरी मजबूती से बना हुआ है। इसलिए ‘भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश महासंघ’ के तर्कों में जहाँ सहयोग की ऐसी मंशा शामिल है जो किसी भी राष्ट्र-राज्य की राष्ट्र्रीय संकल्पना को बिना हानि पहुंचाए परस्पर सहयोग की अधिकतम सम्भवना को टटोलता है, वहीं ‘एकतरफा एकीकरण’ के तर्क की मंशा ‘राष्ट्रगत असुरक्षा’ पनपाती है। 

विश्व-राजनीति, दक्षिण एशियाई राजनीति एवं भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के वर्तमान संबंध एवं इनकी मौजूदा घरेलू राजनीति भी इस बात की ताकीद करती है कि यह समय ‘एकीकरण के तर्क’ का कत्तई नहीं है, बल्कि ऐसे समय में यदि ‘महासंघ’ बनाने का तर्क भी यदि इन तीनों देशों में से किसी एक देश का कोई एक नेता देने की कोशिश करे तो यह एक बेहद सकारात्मक बात मानी जाएगी। पाकिस्तान की राजनीति में अभी जो इमरान युग शुरू हुआ है उसका आधार वही सेना है जो भारत से अपने संबंधों को सुधारने की दिशा में उदासीन है। भारत-पाकिस्तान संबंध ठिठके पड़े हैं, सामान्य बातचीत का दौर भी स्थगित है। भारत का पारंपरिक मित्र रूस, पाकिस्तान को हथियार दे रहा और उनके सैनिकों को प्रशिक्षण भी दे रहा। तेजी से उभरते चीन से भारत के संबंधों में जहाँ डोकलम, तिब्बत, नेपाल और मालदीव का तनाव है तो उसी चीन से पाकिस्तान के गहराते संबंधों को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं!  बांग्लादेश एक सघन आंतरिक राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है और वहाँ भी बांग्लादेशी शरणार्थियों व धार्मिक चरमपंथी मुद्दों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक ऐंठन पैदा की है। यथार्थ में भारत-पाकिस्तान के सतत तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए 'महासंघ' का लक्ष्य जितना विशिष्ट व कठिन है, 'एकतरफा एकीकरण' का तर्कारोपण, ऐसे माहौल में 'एकीकरण' तो छोड़िये, 'महासंघ' के प्रयत्नों को भी जटिल बनाएगा और यह  चिढ़ाने जैसा बेतुका भी है। 

एक गहरे विजन और प्रतिबद्ध पारस्परिक सहयोगों की रूपरेखा के साथ भारत सरकार, पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ ‘महासंघ’ निर्मित करने की योजना पर तब ही काम कर सकती है जब पृष्ठभूमि में तीनों देशों में परस्पर सहयोग की बानगी हो, भले ही वह हालिया हो लेकिन एक पारस्परिक विश्वास बनने लगा हो। फिर और भी सकारात्मक होकर सोचें तो महासंघ की स्थिति साकार होने के बाद यदि इन देशों के नागरिक धीरे-धीरे यह महसूस करने लगें कि हमें ‘एकीकरण’ की ओर बढ़ना चाहिए तो उचित वैश्विक परिस्थिति में यकीनन यह एकीकरण संभाव्य हो सकता है। इसमें भी दशकों लगेंगे और यह प्रक्रिया निरंतर सहयोग व विश्वास की मांग करती है। हाल-फ़िलहाल तीनों देशों की सरकारें ऐसे किसी निरंतर सहयोग व विश्वास की प्रक्रिया में तो नहीं ही दिख रहीं।   

Tuesday, May 22, 2018

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क

मोदी सरकार के चार वर्ष: विदेश नीति समीक्षा




"लोग उतना झूठ कभी नहीं बोलते जितना कि शिकार के बाद, युद्ध के दरम्यान और चुनाव के पहले बोलते हैं। " - ऑटो वॉन बिस्मार्क
अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश नीति का आधार, झुकाव और कार्यशैली कमोबेश एक-सी रही। उसमें ‘परिवर्तन और सततता’ का गुण विद्यमान था। अवसर अनुकूल जोखिम लिए गए और मूलभूत मुद्दों पर दृढ़ता बनी रही। दोनों सरकारों ने अपने क्षेत्र के पड़ोसियों से संबंध बनाये रखने का महत्त्व समझा था और विश्व-राजनीति में एक स्पष्ट रुख रखते हुए जहाँ-तहाँ संबंधों को बनाने की दिशा में प्रयासरत रहे। विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव अमेरिका बना हुआ था और उसके सबप्राइम क्राइसिस से दुनिया उबरी ही थी। भारत के संबंध अमेरिका से क्रमशः प्रगाढ़ हो रहे थे और रूस से संबंध सततता में थे। पर्यावरण, खाद्य-सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारतीय रुख स्पष्ट था और लोकतांत्रिक समानता पर आधारित था। भारत के पड़ोस में परेशानियाँ थीं फिर भी दक्षेस की बैठकें जारी थीं।
भारत में जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बहुमत से चुनी गयी थी उस समय दुनिया में वैश्विक आतंकवाद का चेहरा दाएश (आईएस), पश्चिम एशिया में अपनी जड़ें जमा रहा था, रूस यूक्रेन मुद्दे से अपने को कोकून से निकाल रहा था, चीन, दक्षिणी चीन सागर पर अपनी धमक बनाने की कोशिश कर रहा था, यूरोपीय यूनियन ग्रीस संकट से निपट रहा था और अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर अपनी कमजोरियाँ दुरुस्त कर रहा था। अटल-मनमोहन से इतर मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला जो विदेश नीति संचलन दृष्टि से आदर्श स्थित्ति थी। मोदी सरकार ने विदेश मंत्री के पद पर अनुभवी, तेजतर्रार सुषमा स्वराज को, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर दृढ़ मिज़ाज अजीत डोवाल को और विदेश सचिव एस. जयशंकर को चुनकर अपने इरादे और प्राथमिकता स्पष्ट कर दी।
अब जबकि यह उपयुक्त समय है कि मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति का सम्यक आकलन किया जाय, यह उचित होगा कि इन चार सालों में विश्व-राजनीति में हुए बदलावों पर भी चर्चा हो क्योंकि विदेश नीति, विश्व-राजनीति के सापेक्ष ही गढ़ी जाती है। नब्बे के दशक से यों लगने लगा था कि अमेरिका ही विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव है किन्तु नयी सहस्राब्दि के पहले दशक के गुजरते-गुजरते विश्व-राजनीति बहुध्रुवीय प्रकृति की दिखने लगी। अमेरिका के अलावे, चीन, जापान, ईयू (जर्मनी, फ़्रांस, आदि ), रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, दक्षिण कोरिया, ईरान, सऊदी अरब, आसियान आदि दूसरे ध्रुव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उभरने लगे और विश्व द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के तौर-तरीकों से चलता दिखा। दुनिया के देश हार्ड पॉवर (सैन्य, अर्थ, गणनीय क्षमता) बनने के साथ-साथ सॉफ्ट पॉवर (सांस्कृतिक, अगणनीय क्षमता) बनने की दिशा में भी कार्यशील हुए। विश्व-राजनीति में एशिया का महत्त्व सर्वाधिक बढ़ा और विकसित सभी देश अपने एशियाई पार्टनरों को पुचकारने लगे। लेकिन वैश्विक आतंकवाद, आणविक विकास स्पर्धा और विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण ने एकबार फिर दुनिया को कुछ-कुछ शीतयुद्ध सदृश गुटबाज़ी में मशगूल कर दिया। पिछले चार सालों में विश्व में दो गुट फिर से दिखने लगे हैं जिसे चतुष्क और प्रतिचतुष्क कहा जा रहा है। चीन, रूस, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के रणनीतिक प्रतिचतुष्क के जवाब में अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत का चतुष्क कार्यरत हो गया। विश्व-राजनीति में ऐसे नेता उभर रहे हैं जो अपनी घरेलू राजनीति में लगभग अपराजेय रहते हुए अपने देश की अपराजेयता के स्वप्न पाल बैठे हैं। रूस के पुतिन, जापान के शिंजो अबे, चीन के शी जिनपिंग, जर्मनी की एंजेला मोर्केल, आदि सभी नेता आज की विश्व-राजनीति में बेहद निर्णायक हैं। इन दोनों गुटों में चीन सबसे आक्रामक दिखाई पड़ता है और गुटनिरपेक्ष राजनीति करने वाला भारत अमेरिका से बने नए द्विपक्षीय समझ के तहत एक गुट में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। रूस, कूटनीतिक इतिहास में पहली बार पाकिस्तान को हथियार भेज रहा है और पाकिस्तान, चीन के साथ एक गुट में है। हिन्द महासागर और प्रशांत में बढ़ती चीन की दखलंदाजी को देखते हुए अमेरिका ने भारत की भूमिका बढ़ाने की गरज से इस समूचे क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक रीज़न (हिन्द-प्रशांत क्षेत्र )’ कहना शुरू किया है।
मोदीयुगीन ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’
‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ इस शब्द-युग्म की बड़ी चर्चा थी जब उम्मीदों की मोदी सरकार ने शपथ लिया था। मोदी, व्यक्तिगत रूप से विदेश नीति में बेहद रूचि लेते रहे और उन्होंने विदेश यात्राओं की झड़ी लगा दी। इस लेख के लिखे जाने तक मोदी 36 विदेश यात्रायें कर चुके हैं जिसमें कुल 56 देशों की ज़मीन पर मोदी पांव रख चुके हैं। इनमें से कई ऐसे देश हैं जहाँ काफी समय से कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुँचा ही नहीं। विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए भी यह एक ‘जुड़ाव’ का मौका होता है और इस तरह की यात्रायें निश्चित तौर पर देश को सॉफ्ट पॉवर के रूप में भी स्थापित होने का मौका देती हैं। बहुत सारे देशों में द्विपक्षीय वार्ताएं जो ठिठकी पडी थीं, वह पुनः शुरू हुई हैं।
अफ्रीका महाद्वीप से संबंध हमारे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा की गारंटी देते हैं। मनमोहन सिंह के समय से शुरू हुई हर तीन साल पर होने वाली ‘इंडिया-अफ्रीका समिट’ को मोदी ने 2015 में बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया। जुलाई, 2016 में मोदी ने अपनी अफ्रीका यात्रा में मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंज़ानिया, केन्या आदि देशों की यात्रा की और जापान के साथ मिलकर ‘अफ्रीका विकास बैंक’ के संदर्भ में गुजरात के गांधी नगर में बैठक करते हुए ‘एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर’ पर काम शुरू किया। दक्षिण चीन सागर विवाद और आसियान, जापान, उभरते चीन, फिर से होड़ में आने को बेताब रूस आदि की वज़ह से पूर्व एशिया व प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती सामरिक महत्ता ने भारत को विवश किया कि वह हिलेरी क्लिंटन की सुझाई ‘ऐक्ट ईस्ट’ शब्दावली को अपनाये और इधर अपनी सक्रियता बढ़ाये। मोदी ने अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत म्यांमार और थाईलैंड को अपना स्तम्भ बनाया और इनसे द्विपक्षीय संबंधों पर श्रम किया। कनेक्टिविटी, कॉमर्स और कल्चर के नारे के साथ मोदी उस सामरिक हिचक से बाहर आये जिसमें भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के रणनीतिक जगहों का अवसरंचना विकास जानबूझकर नहीं किया जाता था ताकि कोई अन्य देश इसका फायदा न उठा ले। मई, 2017 में आसाम में मोदी ने एक सड़क पुल का उद्घाटन किया और ‘भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे परियोजना’ में निवेश किया। जापान और आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में भारत के विश्वसनीय साझेदार बनकर उभरे हैं। जापान ने जहाँ भारत से आणविक संधि संपन्न की वहीं उसने ‘बुलेट ट्रेन’ और ‘दिल्ली-मुंबई इन्डस्ट्रीअल कॉरिडोर’ परियोजना में निवेश किया है। मोदी ने, आस्ट्रेलिया, जापान, फ़ीजी, मंगोलिया समेत सभी आसियान देशों की यात्रा की और इस वर्ष 26 जनवरी की परेड में सभी आसियान देशों के प्रतिनिधि उनके निमंत्रण पर भारत भी आये। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की औचक अमेरिका-पैसिफिक हेडक़्वार्टर कैंप स्मिथ की यात्रा बताती है कि दक्षिणी चीन सागर की सुरक्षा को लेकर भारत, अमेरिका प्रतिबद्ध हैं।
2017 में मोदी ने यूरोपीय देशों यथा- जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन और रूस की यात्रा की और ईयू के सर्वाधिक प्रभावशाली देश जर्मनी से अपनी साझेदारी बेहतर की। भारत और फ़्रांस अपने सामरिक संबंधों को लेकर बेहद गंभीर हैं और नवनिर्मित सामरिक गुट चतुष्क में भी अपनी सहभागिता की मंशा जतलाई है। भारत में दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक समुदाय मुसलमानों का है, इसलिए भारत और मध्य-पूर्व दोनों ही पारस्परिक संबंधों का महत्त्व समझते हैं। भारत के व्यापारिक अन्तर्क्रियाओं के लिए अरब सागर की सुरक्षा और लाल सागर में प्रवेश की सुविधा भी अहम् मुद्दे हैं। मोदी ने अपनी संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इजरायल, फलस्तीन, ओमान, क़तर, जॉर्डन की यात्राओं से अपनी ‘लिंक वेस्ट पॉलिसी’ को ‘थिंक वेस्ट पॉलिसी’ में परिणत कर दिया और इज़रायल व फलस्तीन दोनों से संबंधों का संतुलन बनाने की कोशिश की। मोदी सरकार की तारीफ करनी होगी जब अमेरिका के येरूशलम राजधानी घोषणा करने पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अरब समुदाय के पक्ष में मत दिया और इराक, यमन आदि देशों में फँसे भारतीयों को निकालने में तत्परता दिखाई।
नेबरहुड फर्स्ट से नेबरहुड लॉस्ट
मध्य एशिया में जहाँ गैसीय ऊर्जा के भंडार क्षेत्र हैं, एक अरसे से वहाँ रूस का दबदबा है और रूस की सहायता से ही चीन की पकड़ बन रही है; मोदी ने काँग्रेसी पूर्व मंत्री ई. अहमद की शब्दावली उधार ली और अपनी सक्रियता ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी’ के नारे के साथ जुलाई 2015 में क्षेत्र के पांच देशों की यात्रा की। चीन-पाकिस्तान आर्थिक सहयोग गलियारा जो भारत का मध्य एशिया से संपर्क समाप्त कर देता है उसका जवाब मोदी सरकार ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर तुर्कमेनिस्तान और कजाखस्तान रेलवे परियोजना का लाभ लेते हुए पुनः संपर्क स्थापित करके दिया। प्रधानमंत्री बनते ही मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता दिया और वे सम्मिलित भी हुए। दक्षिण एशिया में भी मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ ‘लैंड बॉर्डर एग्रीमेंट’ कर ‘एन्क्लेव्स’ मुद्दे को समाप्त किया। नेपाल में भूकंप आने पर यथासंभव मदद दी। प्रधानमंत्री बनते ही पहली यात्रा के तौर पर भूटान को चुना डोकलाम मुद्दे पर डटे भी रहे। अलग-अलग समयों में मोदी की गयी अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको, ब्राज़ील की यात्रा बताती है कि उनके लक्ष्य में अमेरिकी महाद्वीप भी शामिल हैं। मोदी सरकार की अन्य उपलब्धियों में निश्चित ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस हेग में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना आदि अवश्य शामिल किये जाने चाहिए।

मोदी सरकार की शुरुआत तो बड़े जोरशोर से ‘नेबरहुड फर्स्ट’ के नारे से हुई थी पर मोदी सबसे अधिक विफल कहीं हैं तो अपने इर्द-गिर्द पड़ोस में हैं। विश्व-राजनीति का अध्ययन कहता है कि बिना अपने आस-पड़ोस को सम्हाले कोई राष्ट्र, विश्व-राजनीति में कहीं टिक ही नहीं सकता। इस ‘नेबरहुड लॉस्ट’ से मोदी की सारी ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ की कवायद यकीनन धरी की धरी रह जाएगी। अपने पड़ोस में चीन सहित दक्षिण एशियाई सभी पड़ोसी देशों से आर्थिक साझेदारी वहीँ धीमी गति से चल रहे हैं और कूटनीतिक संबंध खिंचे हुए हैं। चीन ने अपनी ‘ओबोर नीति’ के तहत भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशों से अवसंरचना विकास के नाम पर भारी निवेश किया है और हालिया डोकलम विवाद से भी एक दबाव बनाने की कोशिश की। पाकिस्तान से संबंध कभी सामान्य हुए ही नहीं और मोदी सरकार ने कोई रचनात्मक शुरुआत भी नहीं की। कुछ विश्लेषकों की राय में चीन का एक आर्थिक-सांस्कृतिक असर अवश्य भूटान पर भी पड़ने लगा है और 2018 के देश के तीसरे आम चुनाव में नेपाल के हालिया चुनाव की तरह ही यहाँ भी भारत-विरोधी भावनाओं का उभार दिख सकता है । हाल के रोहिंग्या संकट पर भारत का कमोबेश ठंडा रवैया बांग्लादेश को ठीक तो नहीं ही लगा है। नेपाल के नए संविधान की घोषणा के तुरंत बाद ही असंतुष्ट मधेसियों के द्वारा रक्सौल-बीरगंज पॉइंट नाकाबंदी पर भारत का शांत रह जाना जहाँ वाम दलों और आम नेपालियों को खला है और अब वामपंथियों के सत्ता में आने से और उनकी चीन की तरफ तथाकथित झुकाव से भी भारत-नेपाल संबंध नाजुक तो हुए ही हैं, यह नेपाली प्रधानमंत्री की यात्रा में भी महसूस किया गया । हाल-फ़िलहाल भारत के श्रीलंका से संबंध भी खास चर्चा में नहीं हैं और श्रीलंका ने अभी अपने एक प्रमुख बंदरगाह का स्वामित्व चीन को एक समयसीमा के लिए के लिए सौपा है। चीन ने दक्षिणी चीन सागर और हिन्द महासागर में अंडरवाटर सर्वेलियांस नेटवर्क्स बिछाकर यकीनन जहाँ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। मालदीव विवाद में भी भारत की अनदेखी की गयी और बिसात पर चालें चीन चलता रहा। एक चिंता की बात यह भी है कि इधर भारत के पड़ोस में अलग अलग कारणों से भारत विरोधी भावनाओं में इज़ाफा हुआ है। पाकिस्तान के बाद, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में यह देखा जा सकता है। कुछ कारण ऐतिहासिक हैं तो कुछ सम-सामयिक हैं। चीन इस स्थिति का अक्सर यह कहते हुए लाभ उठाता है कि उसका दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध बराबरी पर आधारित हैं।

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क
मोदी, सरदार वल्लभ भाई पटेल को आदर्श मानते हैं, जिनके लिए प्रशा के शक्तिशाली चांसलर बिस्मार्क का नाम प्रयुक्त होता है। शुरू में ऐसा लगा कि बिलकुल बिस्मार्क की तरह मोदी हर स्टीरियोटाइप तोड़ देंगे और भारत का राष्ट्रहित साधने के लिए कोई भी जोखिम लेंगे। मोदी का शपथग्रहण, सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान में जाकर सहसा बिरयानी खाना, इज़रायल की यात्रा, वेनेजुएला का गुटनिरपेक्ष सम्मेलन जानबूझकर छोड़ना, सार्क सम्मेलन में दिलचस्पी न लेना, फलस्तीन-जॉर्डन की यात्रा, भारत के संयुक्त राष्ट्र में किये गए मत आदि ढेरों अवसरों पर मोदी विश्लेषकों को चौंकाते रहे पर इतनी उछलकूद का जब हासिल खोजा जाए तो ठोस उपलब्धियाँ नदारद मिलती हैं। रूस की पारंपरिक दोस्ती मोदी को छोड़ कोई भी भारतीय सरकार नहीं गंवाना चाहेगी। सार्क को पुनर्जीवित करने की कोई कोशिश नहीं की गयी। मालदीव में जब अमेरिका सहित समूचा पश्चिम भारत की ओर देख रहा था, मोदी मौन रहे। ईरान ने चाबहार पर व्यापार करने के लिए पाकिस्तान को भी न्यौता दे दिया है। पास के ग्वादर बंदरगाह पर पहले ही चीन और पाकिस्तान काबिज हैं। भारत, येरुशलम मुद्दे पर मध्यस्थता कर सकने की पहल कर सकता था पर चीन पहले ही अरब-इजरायल संवाद का आयोजक है। मोदी उम्मीद तो बिस्मार्क की तरह जगाते रहे और उनके अधिकारी चीन की नाराजगी के भय से दलाई लामा का ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम तक स्थगित करा दिया।
मोदी की विदेश नीति में दरअसल एक विजन और तारतम्यता का अभाव दिखा। प्लान बी की झलक कहीं नहीं मिली। विदेश नीति के हलचलों को भी चुनावों में पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग के लिए पहली बार बेशर्मी से प्रयोग किया गया। इराक़ में चालीस मजदूरों की मौत महज इसलिए छिपाई गयी कि यह पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग बर्बाद न हो जाये। विदेश नीति के क्षेत्र की उपलब्धियाँ और नाक़ामियाँ दोनों ही दूरगामी प्रभावों वाली होती हैं। सफलता, दूसरी कई सफलताओं के रास्ते खोलती है वहीं असफलताएँ आसानी से रफू नहीं होतीं क्यूँकि विश्व-राजनीति के अधिकांश कारक बाहरी होते हैं। मोदी सामरिक चतुष्क के सदस्य बनकर भी न मालदीव, न अफ़ग़ानिस्तान और न प्रशांत क्षेत्र में कोई रचनात्मक हस्तक्षेप करते हैं और न ही चीन, रूस, पाकिस्तान से संबंध सुधारकर दक्षिण कोरिया-उत्तर कोरिया की तरह महाशक्तियों की क्षेत्र में दखलंदाजी रोकने की कवायद करते हैं। मोदी विदेश नीति को संचालित करने वाली उस स्थाई नौकरशाही में भी कोई संरचनात्मक सुधार नहीं करते जो अभी भी कितने ही पर्सेप्शन्स में उन्हीं पुराने तरीकों से काम करती है, जिससे किसी नवीन दृष्टिकोण की उम्मीद नहीं की जा सकती। मोदी, विश्व और अपने पड़ोस के लिए अमेरिका, चीन, रूस, जापान की तर्ज पर कोई आर्थिक सहायता मॉडल भी नहीं बनाते जिससे राष्ट्रों को आर्थिक सहयोग तंत्र से जोड़ा जा सके। यों तो मोदी कार्यकाल के लगभग दस महीने शेष हैं पर इसमें अधिक से अधिक अपनी नीतियों का फॉलो-अप ही यदि ले सकें तो भारतीय विदेश नीति को लाभ होगा। क्योंकि विश्व भर की यात्राओं का जितना हासिल है भी वह भी यह सरकार इसलिए खोती नज़र आ रही है क्योंकि फॉलो-अप उचित रीति से नहीं किये जा रहे । कहना होगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मोदी को स्पष्ट बहुमत, खुला अमेरिकी समर्थन और चतुष्क की सदस्यता का जो सुन्दर अवसर प्राप्त हुआ था, वह अवसर वह लगभग गँवा चुके हैं बल्कि आने वाली सरकारों को एक बार फिर से रूस सहित एशिया के बाकी देशों से संबंध दुरुस्त करने में नाको चने चबाने होंगे। भारत को निश्चित ही अपनी विदेश नीति के लिए एक बिस्मार्क सरीखा शक्तिशाली राजनीतिक नेतृत्व नसीब हुआ तो था पर वह अमूमन बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क साबित हुआ। वैसे बिस्मार्क ने यह भी कहा था :
“राजनीति अगले बेहतरीन को पाने की कला है !”



Saturday, March 24, 2018

संघर्ष के एक मुहाने पर फिर श्रीलंका


जबसे हिंद महासागर की अंगड़ाई लेती लहरें चीन की नज़रों में चढ़ी है, क्षेत्र के द्वीपीय देशों को जैसे उसकी नज़र ही लग गयी है। मालदीव की सरकार के द्वारा देश में आपातकाल की सीमा बढ़ाये जाने के एक पखवाड़े बाद ही श्रीलंका के कुछ ऐसे हालात हो गए कि सरकार को आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी। वैसे यह दोनों आपातकाल किसी भी रीति से आपस में संबद्ध नहीं हैं; यह ज़रुर है कि दोनों देशों का औपनिवेशिक अतीत ही है जिससे वर्तमान में भी शांति और विकास आकाश कुसुम बने हुए हैं l मालदीव का आपातकाल सत्तालोलुपता में जहाँ लोकतंत्र के खिलाफ है वहीं श्रीलंका का आपातकाल सत्तासीन सरकार द्वारा सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों के खिलाफ लिया गया एक सख्त कदम है जो देश के लोकतंत्र को मजबूती देगा l भारत के नज़रिये से देखें तो दोनों ही देशों के आंतरिक मामलों में अलग-अलग समयों में भारत द्वारा हस्तक्षेप किया गया है l दोनों ही अवसरों पर भारत को आमंत्रित किया गया l श्रीलंका में 1987 में भारत उलझ गया था वहीं 1988 में मालदीव में शांति स्थापित करने में सफल रहा था l भारत अपनी ऐतिहासिक वैश्विक एवं क्षेत्रीय भूमिका को देखते हुए हिन्द महासागर की इन घटनाओं से निरपेक्ष नहीं रह सकता l 

ऐतिहासिक-सांस्कृतिक-प्राकृतिक रूप से श्रीलंका बेहद ही समृद्ध और वैविध्यशाली रहा है l तकरीबन ईसा के पांच सौ साल पहले भारत के उत्तर क्षेत्र से इंडो-आर्यन प्रवसन श्रीलंका में हुआ माना जाता है, जिसमें सिंहली प्रजाति ने पूरे द्वीप पर अपना प्रसार किया l इसके करीब दो सौ सालों बाद भारत के तमिल इस खूबसूरत द्वीप पर पहुंचे l सन 1505 ई. में पहली बार इस द्वीप पर जब पुर्तगाली बेड़ा पहुँचा तो श्रीलंका ने उपनिवेशवाद के चरण में प्रवेश किया l आखिरकार 1815 ई. में इस द्वीप के सबसे बड़े साम्राज्य कैंडी को ब्रिटिश शक्ति ने पराजित कर दिया और अपने चाय, क़ॉफ़ी, नारियल के वाणिज्यिक बागानों में काम कराने के लिए अपने सबसे बड़े उपनिवेश भारत के दक्षिणी क्षेत्र से तमिल लोगों को मंगवाया l श्रीलंका का अतीत में सिंहलद्वीप से सीलोन कहलाया जाना, इसकी ऐतिहासिक यात्रा को प्रदर्शित करता है l संस्कृत का ‘सिंहल’ शब्द ही पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आदि प्रभावों के क्रमशः योग से अंग्रेजी का सीलोन बन गया l इसप्रकार यह देश एक बहुप्रजातीय एवं बहुसांस्कृतिक इकाई बन गया l आधुनिक काल की राजनीतिक व्यवस्था में यदि लोकतंत्र की स्थापना अपने सरोकारों और परंपराओं के साथ क्रमशः नहीं हुई तो निश्चित ही अस्मिता-संघर्ष उपजता है।  ब्रिटिश दासता से 1948 ई.में मुक्त हुआ यह देश अपने औपनिवेशिक नाम सीलोन से 1972 ई. में तो मुक्त होकर श्रीलंका बन सका, किन्तु देश प्रजातिगत खूनी संघर्षों में सन 2009 ई. तक जकड़ा रहा l 1956 ई. की अपनी पहली आज़ाद सरकार के साथ ही श्रीलंका में ‘सिंहली राष्ट्रवाद’ अपनी कुंडली मारकर बैठ गया और आजतक डंस रहा है l श्रीलंका के प्रसिद्ध अख़बार डेली मिरर के नियमित स्तंभकार श्री डी. बी. एस. जेयराज के अनुसार- ‘आज़ादी की लड़ाई में सिंहली फिर भी डोमिनियन स्टेटस की मांग से संतुष्ट थे और कहीं न कहीं अपरोक्ष रूप से ब्रिटिश सत्ता का लाभ ले रहे थे किन्तु तमिल सहित अन्य समूह साम्राज्यवादी शक्ति के खिलाफ प्रखर संघर्ष कर रहे थे l ‘ 


किन्तु आज़ादी आयी भी तो बस बहुसंख्यकों के इशारों की जैसे ग़ुलाम बनकर रह गयी l प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक जे. एस. मिल ने लोकतंत्र की इसी प्रवृत्ति को ‘बहुसंख्यक की निरंकुशता’ कहा है जो लोकतंत्र की आत्मा को ही कुचल देती है l औपनिवेशिक अतीत के कमोबेश सभी देश इस कुप्रवृत्ति के शिकार हो जाते हैं l श्रीलंका में प्रजातिगत वितरण सिंहली, तमिल, मलय, मूर, बर्घर्स और वेददा आदि, क्रमशः 74.9%, 15.2%, 0.22%, 9.3%, 0.19% और 0.13% है और यह क्रमशः बौद्ध, हिन्दू, मुस्लिम (मलय और मूर), ईसाई, आदि धर्म विश्वास को मानते हैं l सिंहली राष्ट्रवाद, इसप्रकार बौद्ध राष्ट्रवाद भी रहा और अन्य मतावलंबी समूह व प्रजातियाँ अस्मिता-संघर्ष में संलिप्त हो गयीं l बहुसंख्यकों के सापेक्ष अल्पसंख्यकों में पनपी असुरक्षा को सत्ता ने कभी गंभीरता से नहीं लिया और लोकतांत्रिक रीति से एकात्मक शासन व्यवस्था के संघीय वितरण पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया l प्रजातिगत संघर्ष के साथ-साथ धार्मिक संघर्ष भी सतह पर जब-तब उभरते रहे l सिंहली बहुसंख्यक जहाँ बौद्ध मतावलंबी हैं वहीं तमिल और मलय-मूर प्रजातियाँ क्रमशः हिन्दू और इस्लाम मतावलंबी हैं l प्रारंभ में सिंहली बहुसंख्यकवाद के विरूद्ध हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही एक स्वर में विरोध कर रहे थे किन्तु समय-समय पर होते हिन्दू-बौद्ध-मुस्लिम दंगों और अंततः 1981 ई. में ‘श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस’ के हुए गठन ने यह स्पष्ट असुरक्षा गहरी कर दी कि जाफना जैसे क्षेत्रों के स्वतंत्र होने की स्थिति में भी मुस्लिम महज अल्पसंख्यक ही बनकर रह जायेंगे l सोलोमन भंडारनायके के नेतृत्व वाली देश की पहली स्वतंत्र सरकार 1956 ई. में सिंहली राष्ट्रवाद के लहर में चुनकर आयी और इस सरकार ने कई ऐसे कार्य किये जिससे अन्य अस्मिताएं स्वयं को केंद्र से इतर सीमा पर महसूस करने लगीं l बागानों के तमिल मज़दूरों सहित कइयों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया l सिंहली को अकेले ही राज्यभाषा घोषित कर दिया गया l 

हालाँकि, 1978 ई. के नए संविधान में सिंहली के साथ तमिल को भी राज्य की भाषा घोषित किया गया और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रियाओं में तेजी लाने के लिए अंग्रेजी को लिंक-लैंग्वेज के तौर पर मान्यता दी गयी, किन्तु इस संविधान के लागू होने के बाद भी व्यावहारिक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जीवन में  ‘सिंहल राष्ट्रवाद’ की विषबेलि फलती-फूलती रही l ‘बहुसंख्यक की इस निरंकुशता’ के जवाब में देश में श्रीलंका से अलग एक तमिल राष्ट्र बनाने का हिंसक आन्दोलन एक उग्र संगठन (एल.टी.टी.ई.: लिट्टे) के रूप में पैदा हुआ और इसने पूरे राष्ट्र को 2009 ई. तक गृहयुद्ध की भयंकर आग में झोंके रखा l यह आग इतनी भयानक थी कि इसमें कितने ही तमिल, कितने ही सिंहली व अन्य मारे गए और इसने भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की भी बलि ले ली l लिट्टे एक संगठन के तौर पर समाप्त हो गया है किन्तु अलगाववादी सोच अभी भी जिंदा ज़रुर है और साथ ही सिंहली राष्ट्रवाद की लपट भी एक बार फिर से सर उठा रही है l 

श्रीलंका की मौजूदा सरकार एक गठबंधन की सरकार है जिसमें श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के मैत्रीपाल सिरिसेना, राष्ट्रपति और युनाईटेड नेशनल पार्टी के रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री पद पर विराजमान हैं। यह एक उदारवादी सरकार ज़रूर है किन्तु कमजोर गठबंधन की सरकार है। लिट्टे-आतंक समाप्ति के नायक पूर्व राष्ट्रप्रमुख महिंद्रा राजपक्षे द्वारा समर्थित पार्टी एस. एल. पी. पी. ने स्थानीय चुनावों में ज़ोरदार जीत दर्ज की है, जिसमें सत्तारुढ़ दलों सहित अन्य सभी दलों का प्रदर्शन निष्प्रभावी रहा है और इसी से आम चुनावों की भी मांग तेज आकर दी गयी है। विश्लेषक कहते हैं कि राजपक्षे ‘सिंहल राष्ट्रवाद’ के पोषक हैं और बहुत संभव है कि सत्तालोभ में सांप्रदायिक तनावों को हवा दे दी गयी हो अन्यथा कुछ मुस्लिम युवकों द्वारा एक बौद्ध ड्राइवर की गयी हत्या इतना उग्र रूप न ले लेती। श्रीलंका से लगभग बाइस सौ किमी दूर म्यांमार में भी हाल ही में बौद्ध-मुस्लिम दंगे हुए और लाखों रोहिंग्या (मुस्लिम) शरणार्थी, बांग्लादेश में जाने को मजबूर हुए। धर्म और राजनीति का कुत्सित मिश्रण बेहद खतरनाक है नहीं तो समता पर आधारित इस्लाम, विविधता का सनातन धर्म और शांति का बौद्ध धर्म, हिंसा की इतनी भौंडी आग से न खेलते। 



राहत की बात फिलहाल यह रही कि सिरिसेना सरकार ने सांप्रदायिक तनावों को देखते हुए तुरंत कार्यवाही की और आपातकाल की घोषणा कर दी। सांप्रदायिक तनाव जैसी समस्याओं पर सामान्यतया किसी देश में आपातकाल जैसे बड़े कदम नहीं लिए जाते, किन्तु श्रीलंका का आधुनिक राजनीतिक-सामाजिक इतिहास यही कहता है कि एक आंतरिक वर्ग-संघर्ष से उबरे अभी जिस देश को एक दशक भी न हुए हों, किसी दूसरी इसप्रकार की संभावना को आपातकाल लगाकर समाप्त करना जरूरी हो जाता है। सिरिसेना का आपातकाल की घोषणा के महज तीन दिनों बाद ही ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भारत आना और फिर जापान की यात्रा पर निकलना यह इंगित करता है कि फ़िलहाल इस समस्या से पूरे आत्मविश्वास के साथ निपटा जा रहा है। मालदीव की आपातकाल की समस्या पर जहाँ क्षेत्रीय शक्तियों और भारत-चीन सहित अन्य महाशक्तियों की भौंहें टिका रखी हैं वहीं सिरिसेना सरकार ने गठबंधन की सरकार होने के बावजूद समस्या से अपने दम भिड़ने का दमखम दिखाया है और महाशक्तियों को फ़िलहाल देश की आंतरिक राजनीति से यथासंभव दूर ही रखा है। इस बौद्ध-मुस्लिम संघर्ष को हलके में नहीं लिया जाना चाहिये क्योंकि अभी भी देश में सिंहल राष्ट्रवाद अपनी उग्रता में है, बौद्ध उग्रवादी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों के संपर्क में हो सकते हैं और विश्व में इस्लामिक आतंकवाद की समस्या बनी हुई है। एक छोटी सी असावधानी इस संघर्ष को न केवल श्रीलंका का दूसरा बड़ा आंतरिक वर्ग-संघर्ष बना सकती है अपितु इसके वैश्विक आयाम और भी खतरनाक हो सकते हैं।    

Sunday, February 11, 2018

मालदीव संकट और भारत



महज सवा चार लाख की आबादी वाले छोटे से देश मालदीव ने अपने राजनीतिक संकट से पूरी दुनिया की नज़र भारत पर केंद्रित कर दी है। मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने मालदीव के पहले लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद सहित हाई प्रोफ़ाइल नौ राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और 12 सांसदों की सदस्यता बहाल करने का निर्देश दिया। संसद सदस्यता के बहाल होने का अर्थ यह है कि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की सरकार अल्पमत में आ जाएगी और उनके विरुद्ध संसद महाभियोग पारित कर सकेगी। यामीन ने खतरा भांपते हुए और संभवतः अपना आखिरी दांव चलते हुए देश में 15 दिवसीय आपातकाल की घोषणा कर संसदीय कामकाज सहित सारे कामकाज ठप कर दिए हैं, आशंका है वे इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं । उनके निर्देश पर सेना ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व यामीन के भाई पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया है तथा संसद को घेर लिया है। निर्वासित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भारत से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाई है और अमेरिका से भी मदद की दरख्वास्त की है। भारत ने कड़े शब्दों में मालदीव से लोकतंत्र बहाली की अपील तो जरूर की है पर किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर एक चुप्पी बनाई हुई है। तीस साल पहले 1988 में भी जब कुछ स्थानीय व्यापारियों की शह पर तमिल आतंकवादियों की सहायता से गयूम की सरकार को अपदस्थ करने की साजिश रची गयी थी तो गयूम की गुहार पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने नौ घंटे के भीतर ही भारतीय सैन्य टुकड़ी भेजकर गयूम की सत्ता बहाल की थी। एकबार फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से लोकतंत्र बचाने की गुहार लगाई गयी है। भारत के पास चुनने के जो विकल्प हैं, यकीनन कोई उनमें से आसान नहीं हैं।

1965 में ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता से मुक्त होने के बाद मालदीव में  सल्तनत राजशाही 1968 के जनमत संग्रह तक चलती रही जब इब्राहिम नासिर के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना हुई। 1978 से मालदीव में मौमून अब्दुल गयूम का काल शुरू हुआ जो लोकतान्त्रिक तो नहीं रहा किन्तु मालदीव को एक राजनीतिक स्थिरता मिली, जिसकी लम्बे समय से दरकार थी। गयूम हिंदमहासागर में विश्व-शक्तियों का हस्तक्षेप नहीं चाहते रहे। मालदीव की इस विदेश नीति के साथ उसकी राजनीतिक स्थिरता भारत के हित में थी, इसलिए 1988 के गयूम शासन के तख्तापलट को भारत ने सैन्य हस्तक्षेप से सफलतापूर्वक रोक लिया था। 2003 में पेशे से पत्रकार मोहम्मद नशीद ने मालदीवियन डेमोक्रैटिक पार्टी का गठन किया और गयूम प्रशासन पर राजनीतिक सुधारों के लिए दबाव बनाया। नागरिक समाज के लोकतान्त्रिक आंदोलनों से आखिरकार 2008 में मालदीव को नया लोकतान्त्रिक संविधान मिला जो बहुदलीय व्यवस्था प्रणाली पर आधारित था। अक्टूबर 2008 में चुनाव हुए और गयूम को हराकर विपक्षी नेता मोहम्मद नशीद नवम्बर, 2008 में देश के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति चुने गए। तीन साल बाद ही नशीद सरकार को राजनीतिक संकट से जूझना पड़ा और आखिरकार 2012 में नशीद को त्यागपत्र देना पड़ा। 2013 के नवम्बर में गयूम के प्रयासों से उनके भाई अब्दुल्ला यामीन ने राष्ट्रपति की कुर्सी अपने नाम की और तबसे यामीन और नशीद में राजनीतिक संघर्ष जारी है। 

1988 से 2013 और 2018 तक मालदीव के राजनीतिक परिदृश्य में कई तब्दीलियां हुई हैं। मोहम्मद नशीद ने राष्ट्रपति रहते देश की पर्यटन नीति में जो बदलाव किये थे उनसे अब्दुल गयूम और अब्दुल्ला यामीन के आर्थिक हितों को ठेस लगी थी। फिर नशीद ने देश के कुछ द्वीपों को सामरिक हितों के लिए ब्रिटेन और अमेरिका को प्रयोग करने की इजाजत दे दी थी जो गयूम की विश्व-शक्तियों को हिन्द महासागर क्षेत्र से बाहर रखने की नीति से भी अलग थी। इस बीच सबसे रुचिकर राजनीतिक विकास यह हुआ कि गयूम और यामीन में आपस में ही ठन गयी है । यामीन ने गयूम के बेटे पर गंभीर आरोप लगाए हैं और अब गयूम विपक्षी पाले में दिखाई दे रहे हैं। गयूम की राजनीति में इस्लामिक राष्ट्रवाद के लिए जगह रही है, उन्होंने इस्लाम को मालदीव का राज्यधर्म भी घोषित किया। मालदीव की नजदीकियाँ पाकिस्तान और अरब राज्यों से भी रही हैं। यह स्थिति मालदीव को देर-सबेर चीन के करीब ले ही जाती, जबकि शी जिनपिंग का चीन अपने आक्रामक ओबोर नीति से तेजी से हिन्द महासागर क्षेत्र में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। 

हिन्द महासागर सामरिक दृष्टि से इस समय सबसे महत्वपूर्ण हो चला है। अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य के बीच की समस्त व्यापारिक गतिविधियाँ हिन्द महासागर से होती हैं। चीन की क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता और रूस व पाकिस्तान की चीन के साथ जुगलबंदी ने ब्रिटेन-अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत को विवश किया है कि वे हिन्द महासागर को अधिक तवज्जो दें। जुलाई 2017 में संपन्न मालाबार नौसेना अभ्यास और बहुप्रसिद्ध चतुष्क (क्वाड) इसी शृंखला का एक सामरिक विकास है। डियागो गार्सिआ, एक सामरिक लघुद्वीप जो ब्रिटेन-अमेरिका-भारत के संयुक्त निगरानी में संचालित है, क्षेत्र पर निर्णायक पकड़ बनाने में मदद करता है और चीन की स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स नीति को संतुलित करता है। यहाँ, मारीशस का चागोस प्रायद्वीप के लिए चीन की तरफ सौदेबाजी के लिए उद्यत होना भी ध्यान में रखा जाना चाहिए जो ब्रिटेन-अमेरिका के सामरिक हितों के विरूद्ध विकास है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद चीन ने मालदीव के साथ मुक्त व्यापार समझौता संपन्न कर लिया है और श्रीलंका, मारीशस के साथ बेहद तेजी के साथ इस दिशा में वार्त्ता जारी है। इससे क्षेत्र में चीन की बढ़ती पकड़ का अंदाजा लगता है।  

भारत के कूटनीतिक कुटुंब के पास मालदीव संकट पर चुप रह जाने का विकल्प ही नहीं है। चुप्पी का अर्थ यामीन सरकार के अलोकतांत्रिक कदम का समर्थन कर देना होगा। मालदीव की तरफ से हस्तक्षेप का जो आग्रह है वह 1988 की तरह आधिकारिक नहीं है, अपितु यह निर्वासित राष्ट्रपति नशीद की तरफ से है। 1988 में हिन्द महासागर में चीन का दखल नहीं था जो आज के मालदीव सरकार का निर्णायक मित्र है। यामीन ने इस संकट पर अपने विशेष दूत अपने मित्र देशों यथा- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को भेज दिए हैं। बाद में भारत से भी संवाद की कोशिश की गयी, जिसे भारत ने यामीन सरकार की प्राथमिकताओं को समझने के बाद ठुकरा दिया। यामीन सरकार ने भी यूरोपीय यूनियन और श्रीलंका के विशेष दूतों से माले में मिलने से इंकार कर दिया है। ज़ाहिर है यामीन सरकार चाहती है कि चीन ही अपनी प्रभावी भूमिका से उनकी सरकार बचा ले । किन्तु चीन ने मालदीव सरकार को इस संकट से निपटने में सक्षम बताते हुए यह संकेत दिए हैं कि उसकी मंसा है कि कोई भी वाह्यशक्ति इस आंतरिक संकट में हस्तक्षेप न करे। चीनी अधिकारियों ने अपने भारतीय समकक्षों को भी आपसी द्विपक्षीय संबंधों में कोई दूसरा विवादित बिंदु न जोड़ने का आग्रह किया है। चीन ने अपने मालदीव पर्यटकों को कुछ सुरक्षा निर्देश भी जारी किये हैं। चीन ने अभी तक किसी मित्र देश के लिए खुलकर सामरिक हस्तक्षेप नहीं किया है इसलिए मालदीव में भी इसकी सम्भावना कम ही है। 

इस संकट पर पश्चिमी जगत एकमत हैं कि लोकतंत्र बहाली के तर्क से भारत को किसी भी प्रकार के आवश्यक हस्तक्षेप के लिए तैयार रहना चाहिए। ट्रम्प के अमेरिका की यह रट रही है कि भारत को अपनी वैश्विक भूमिका निभानी चाहिए। अमेरिका, भारत, पाकिस्तान, चीन, सऊदी अरब और यूरोपीय यूनियन आपस में मालदीव संकट पर अलग-अलग स्तरों पर वार्त्तारत हैं और बारीकी से मामले को देख रहे हैं। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत अपनी भूमिका से बच नहीं सकता, विश्व-शक्ति भूमिका के अपने खतरे तो हैं ही किन्तु अक्रियता अन्ततः मालदीव को भारत से दूर ले जाएगी और भारतीय कूटनीतिक साख को भी मद्धम करेगी। भारत के पास प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का विकल्प तो है, किन्तु निश्चिततः यह अंतिम विकल्प है क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप अविश्वासों और विवादों का नया सिलसिला शुरू करेगा और फिर हिन्द क्षेत्र आँगन में वाह्य विश्व-शक्तियों का हस्तक्षेप और बढ़ जायेगा। भारत के पास कूटनीतिक विकल्प उपलब्ध हैं। संयुक्त राष्ट्र विशेष दल की निगरानी में मालदीव में लोकतंत्र बहाली के प्रयास किये जा सकते हैं। भारत की यह कोशिश रहनी चाहिए कि अपने कूटनीतिक प्रभाव का प्रयोग करके अमेरिका, सऊदी अरब, यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय समाज के संयुक्त दबाव से चीन के प्रभाव को कम किया जाए और मालदीव में लोकतंत्र बहाली की जाय।  

Friday, December 1, 2017

संविधान और मै से हम


राजनीति एक दिलचस्प चीज है। ये सबमे है, सबकी है और सबसे है। इसके बावजूद अक्सर ये ताने सुनती है। गुनाह हम बुनते हैं, इल्जाम राजनीति पर आ चिपटती है। जैसे ही ‘मै’, ‘हम’ में तब्दील होता है, राजनीति का क्षेत्र शुरू हो जाता है। यूपी-बिहार में ‘मै’ कम ‘हम’ ज्यादा बोला जाता है, इल्जाम भी इन्हीं दो पर ज्यादा आता है राजनीति करने का।  खैर..! जैसे ही कहीं सबकी बात शुरू होगी, राजनीति वहां होगी। ‘राजनीतिक’ का सैद्धांतिक अर्थ ही है-‘सबसे सम्बंधित’। हालाँकि अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग परिस्थितियों में राजनीति-व्यवस्था अलग-अलग प्रकार की बनी मिलती है। कहीं राजनीति सबकी और सबसे होती है, इसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था कहते हैं और कहीं राजनीति कुछ की और कुछ्से होती है, उसे अलोकतांत्रिक व्यवस्था कहते हैं। यह दोनों बड़े सरल विभाजन हैं, इसलिए विश्व में सीधे-साफ़ दिखलाई नहीं पड़ते। दरअसल विश्व में तो सब गड्ड-मड्ड है। कहीं राजनीति सबसे है पर सबकी नहीं है। कहीं कुछ्से है पर सबकी होने का वादा है। कहीं वह है तो सबसे पर काम किसी और की कर रही है। और दावा सबका है तेज आवाज में कि -वे एक लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था हैं। 

लोकतंत्र अब व्यवस्था से अधिक एक राजनीतिक मूल्य के रूप में स्थापित हो चला है, जिसे प्रत्येक व्यवस्था अपने सीने से चिपकाये फिरती है, भले ही वह मूल्य वहां हो या ना। अर्थशास्त्र की चिंता जहाँ  मूर्त-अमूर्त संसाधनों के बेहतर प्रयोग की है, वहीं राजनीति की चिंता उनके न्यायपूर्ण वितरण की है। इसी रिश्ते से राजनीति एवं अर्थनीति गलबहियाँ करते रहते हैं। जमीन और जनता, मूर्त-अमूर्त संसाधनों के प्रमुख स्रोत एवं वाहक हैं, इसीलिये संघर्ष की विषयवस्तु भी यही होते हैं। संघर्ष शक्ति मांगता है, इसलिए इतिहास का अध्ययन अक्सर राजनीति को रक्तरंजित कह देता है। इल्जाम तो लगने ही हैं राजनीति पे, सबकी बात जो करता है और सबका जो होता है वह किसी एक का नहीं हो पाता, किसी का नहीं हो पाता। इसलिए अब हर इल्जाम पे राजनीति इठलाती है और खिलखिलाते हुई आगे बढ़ जाती है। अध्ययन के बाकी उपागम व्यक्तिगत हो सकते हैं, इतिहास किसी राजा का हो सकता है, साहित्य किसी एक की पीड़ा पर बात हो सकती है, अर्थशास्त्र में किसी एक के लाभ की आयोजना संभव है, मनोविज्ञान बड़े हूमास से किसी एक की कुंठा पर कुंडली मार अध्ययन कर सकता है किन्तु राजनीति व्यक्तिगत संभव ही नहीं है। व्यक्तिगत अधिकारों की अवधारणा भी समान रूप से सभी के व्यक्तिगत अधिकारों की प्रस्तावना पर ही टिकी होगी। अपनी परिभाषा से ही राजनीति सबकी है, सबसे सम्बंधित है। इसको व्यक्तिगत करने की कोई कोशिश इसे ‘राजनीति’ नहीं रहने देती, षडयंत्र अथवा साजिश में बदल देती है। 

एक निश्चित भूभाग संसाधनों के वितरण को तनिक आसान बनाता है। इसप्रकार सीमायें उपजीं। वितरण अनुशासन मांगता है सो अनुशासक को संप्रभु होना था। इसप्रकार सीमा व संप्रभुता से राज्य पनपे। यूरोप में मशीनों की आवक से वस्तुओं का उत्पादन अब ‘जरुरत’ से हटकर ‘लाभ’ की मंशा से होने लगे। ‘लाभ’ की लिप्सा ‘बाजार’ मांगती है जिससे नयी नयी दुनिया की खोजें शुरू हुईं। किस्से-किवदंतियों का भारत ढूंढते-ढूंढते कोई अमरीका जा टकराया। जंगल काटे, मूल निवासियों की बस्तियां जलायीं। अब दुनिया में दो दुनिया थी। देश और उपनिवेश। बाजार की हवस में कोई भारत भी आ पहुंचा। उस भारत को फिर तो गुलाम बनना ही था,  चूँकि वहां भगवान् के लोग और थे, हथियार के लोग और, व्यापार-बाजार के लोग और थे और माटी के लोग और ही थे। हम टूटे-फूटे, चोट लगी, गीरे-उठे, भिड़े-लड़े और अंततः आजाद हुए।


आजाद देश में विभाजन का दंश गहरा था, दर्द गहरा था।  देशनायकों ने देश अनथक प्रयासों से समेटा और जोड़े रखा। अब आजाद भारत को शेष विश्व से कदमताल करना था। पहली चुनौती देश को बनाए-बचाए रखने की थी और दूसरी इसे दौड़ाने की। कायदा-कानून की जरुरत थी। देश को अब अदद आईन की दरकार थी। अपने लिए अपना संविधान वक्त की मांग थी। इसे कौन बनाएगा....? इसे उस ‘हम’ को बनाना चाहिए, जिसमें देश का सतरंगी प्रत्येक व्यक्ति अपना ‘मै’ महसूस कर सके। अपने देश महान भारत के शानदार संविधान की प्रस्तावना का पहला शब्द ‘हम’ ही होना चाहिए।
डॉ. श्रीश पाठक

Thursday, October 5, 2017

चीन की ओबोर नीति ओर भारत-अमरीका सहयोग

डॉ. श्रीश पाठक
भारत की पहली महिला रक्षा मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की हालिया अमरीका यात्रा के दौरान अपने समकक्ष रक्षा सचिव जेम्स मैटिस के साथ हुयी मुलाकात खासा सफल जान पड़ती है l जेम्स मैटिस ने बेहद स्पष्ट शब्दों में पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारे की आलोचना करते हुए भारत का पक्ष दुहराया कि यह गलियारा एक विवादित भू-भाग का हिस्सा है और कोई भी राष्ट्र एकतरफा किसी क्षेत्रीय मेखला ओर मार्ग पहल (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) की घोषणा नहीं कर सकता l अब निश्चित ही अमरीका एशिया में अपने क्षेत्रीय हितों के लिए ठोस भूमिका निभाने को तैयार दिखता है l इस भूमिका में भारत स्वाभाविक रूप से अमरीका का रणनीतिक साझीदार है l भारत ने भी जतला दिया है कि वह एशिया ओर दक्षिण एशियाई मामलों में अमरीका के साथ मिलकर अपने राष्टीय हितों का सरंक्षण करने को तत्पर है l
दरअसल चीन की पाकिस्तान के साथ आर्थिक गलियारे बनाने की कोशिश उसकी एक अतिमहत्वाकांक्षी परियोजना ओबोर नीति का एक हिस्सा है l ओबोर नीति चीन के मौजूदा राष्ट्रपति जी जिनपिंग की सामरिक दिमाग की उपज है l घरेलू राजनीति में भ्रष्टाचार पर बेहद ठोस कदम उठाकर जी जिनपिंग ने अपने देश में माओ के बाद सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व की छवि गढ़ ली है और विदेश नीति के क्षेत्र में भी वे चीन को आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में सर्वाधिक प्रमुख स्थान दिलाना चाहते हैं l ओबोर नीति में जिनपिंग प्राचीन रेशम मार्ग को पुनर्जीवित करने की वकालत कर रहे हैं l प्राचीन रेशम मार्ग जहाँ स्वाभाविक तौर पर उपजा भुमिबद्ध व्यापारिक मार्गों का संजाल था वहीँ ओबोर नीति में चीन ने इसमें सामुद्रिक व्यापारिक मार्ग को भी सम्मिलित किया है l यह मेखला विवादित इसलिए है क्यूंकि यह एकतरफा चीन द्वारा प्रायोजित ओर चिन्हित भुमिबद्द एवं सामुद्रिक व्यापारिक मार्ग है जो अपने प्रारूप में तीन महाद्वीपों की क्षेत्रीय संप्रभुता ओर सामुद्रिक संप्रभुता के साथ साथ व्यापारिक संबंधों पर असर डालेगी l यकीनन इससे भारत के राष्ट्रहित पर तो आंच आयेगी ही अपितु विश्वशक्ति अमरीका की यूरेशिया में उपस्थिति को भी चुनौती मिलेगी l चीन की ओबोर नीति यदि जमीन पर सफल होती है तो यह एक मेखला का निर्माण करेगा जो चीन के जियान से निकलकर मध्य एशिया के बीचोबीच होते हुए पश्चिमी एशिया तक पहुंचेगी, फिर टर्की होते हुए यूरोप में प्रवेश कर इटली को जोड़ेगी l यह मेखला यहाँ से भूमध्यसागर से निकलकर लाल सागर होते हुए हिन्द महासागर में पहुंचेगी, फिर प्रशांत क्षेत्र से होते हुए अंततः चीन के फुझु से मिल जायेगी l


चीन की मंशा चाहे जो हो, पर अमरीका की चिंता यह है कि इससे उसकी एशिया ओर यूरोप में उसकी क्षेत्रीय उपस्थिति को चुनौती मिलेगी l भारत के लिए भी यह मेखला शुभ नहीं कही जा सकती और इसलिए ही  संप्रभुता के मुद्दे का हवाला देते हुए अभी बीते मई माह में ‘एक मेखला एक मार्ग’ फोरम की बैठक में भाग लेने का निमंत्रण भारत ने स्वीकार नहीं किया l चीन की ओबोर नीति भारत के लिए एक प्रत्यक्ष चुनौती है अथवा कम से कम देश की अपनी सामरिक तैयारियों के लिहाज से इसे चुनौती के रूप में ही लिया जाना चाहिए l यह चुनौती भारत के हितों को एशिया में, हिन्द महासागर क्षेत्र में, प्रशांत क्षेत्र में और खासकर विवादित पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में असुरक्षित बनाता है, जिसे यकीनन भारत नहीं चाहेगा l

भारत ने यकीनन यह रणनीतिक चुनौती को भांपते हुए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं l अमरीका का स्पष्ट शब्दों में भारत के पक्ष का समर्थन करना ओर खुलकर ओबोर नीति की आलोचना करना भारत के सफल प्रयासों की पुष्टि भी करता है l भारत द्वारा आयोजित मालाबार अभ्यास में अमरीका के साथ साथ जापान का जुड़ना भी एक शुभ संकेत है जिससे भारत की सामरिक स्थिति को बल मिलता है l एशिया में रूस, चीन, नार्थ कोरिया, पाकिस्तान का सक्रिय होकर संबंधों का नया आयाम उकेरना एक नयी स्थिति है जिसमें अमरीका भारत, जापान, दक्षिण कोरिया ओर आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर शक्ति संतुलन साधने की कोशिश अवश्य करेगा l यह स्थिति भारत के अपने हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है l अमरीका के साथ संबंधों की यह नवीन परिस्थितियां निश्चित ही भारत के साथ सहयोग के कई दुसरे संभावनाओं के दरवाजे भी खोलेगी l  अमरीका भारत के साथ संबंधों के नए वितान के लिए प्रतिबद्ध है यह उसके भारत के लिए नए राजदूत के चयन से भी झलकती है l हार्वर्ड शिक्षित केनेथ जस्टर बेहद अनुभवी राजनयिक हैं जिन्हें दोनों बुश प्रशासन में काम करने का अनुभव है ओर वे ट्रंप प्रशासन में भी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मामलों की समिति के सलाहकार रहे हैं l यह चयन महत्वपूर्ण है और केनेथ जस्टर के हालिया बयान भारत के लिहाज से बेहद उत्साहजनक हैं जिनमें भारतीय हित में अमरीकी हित का संलग्न होना कहा गया है l

Sunday, December 11, 2016

त्योहारों के रेलें, मेले और भारत

डॉ. श्रीश पाठक

भारत में भानमती के कुनबे बहुत है । ये इसकी खूबसूरती है, पहचान भी और है इसकी मजबूती भी । अपने देश में जाने कितने देश बसते हैं । तरह-तरह के लोग, तरह-तरह की आदतें, रस्में तरह-तरह की और तहजीबें तरह-तरह की । तरह-तरह के पकवान, तरह-तरह के परिधान, तरह-तरह की बोलियाँ और तरह-तरह के त्यौहार । हाँ, त्यौहार...! अपना देश तो त्योहारों का देश है और भारत देश है मेलों का भी । हमारे यहाँ मंडी तो नहीं पर मेलों की रिवायत रही है । कोस-कोस पे पानी का स्वाद बदलता है और तीन-चार कोस पे बोली बदल जाती है और तकरीबन हर पंद्रह-बीस कोस बाद भारत में कोई न कोई मेले का रिवाज मिल जायेगा । प्रसिद्द मेलों की बड़ी लम्बी फेहरिश्त है और कमोबेश पूरे भारत में है यह । मेले जो कभी हर महीने लगते हैं, कुछ बड़े मौसम-परिवर्तन पर लगते हैं और कुछ साल के अंतराल पर लगते हैं । इन सतरंगी मेलों में भांति-भांति के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, एक-दूसरे की खासियतें समझते हैं, जरूरतें साझा करते हैं, रिश्ते बनते हैं, नाटक, खेल देखते हैं, इसप्रकार मेले दरअसल स्थानीयता का उत्सव होते हैं । त्योहारों का भी मूलभूत दर्शन उत्सव ही है । कभी प्रकृति-परिवर्तन का उत्सव है, कभी संबंधों का उत्सव है, कभी फसल पकने का उत्सव है तो कभी आस्था का उत्सव है । आस-पास की प्रत्येक वस्तु की महत्ता समझना, हो रहे हर परिवर्तन का स्वागत करना सिखलाते हैं ये उत्सव, ये त्यौहार ।
भारत का राष्ट्रवाद, पश्चिमी राष्ट्रवाद से मूलतः भिन्न है । पश्चिमी राष्ट्रवाद के हिसाब से चलते तो इस देश के जाने कितने विभाजन सहसा ही हो जाते और यकीन मानिए लोकतंत्र की राह को अपनाने वाला भारत लोकतंत्र के अंतर्गत आने वाले ‘आत्मनिर्णयन के अधिकार (Right to Self-Determination)’ की वज़ह से उन्हें शायद ना रोक पाता ना नाज़ायज ही ठहरा पाता..! पर स्वतंत्रता-संघर्ष के जमाने से ही लड़ते-भिड़ते हमारे युगनायकों ने भविष्य के भारत की यह तस्वीर भांप ली थी और उन्होंने राष्ट्रवाद के भारतीय संस्करण के मूलभूत मायने ही बदल दिए । भारतीय राष्ट्रवाद ‘अनेकता में एकता’ के सिद्धांत पर चलता है । यह Heterogeneity (विभिन्नता-विविधता) का आदर करता है जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद  Homogeneity (समुत्पन्नता-समरूपता) पर आधारित है। हमारे देश के राष्ट्रवाद की करारी नींव में जो इटें जमी हैं वे सतरंगी हैं, वे एक रंग की नहीं हैं । इसलिए जैसे ही और जिस मात्रा में हम साम्प्रदायिक होते हैं, उतनी ही मात्रा में हम राष्ट्रवादी नहीं रह जाते । आँख मूंदकर हम पश्चिमी राष्ट्रों से तुलना करते हैं और उनके राष्ट्रवाद के मानकों से हम अपने सतरंगी समाज के बाशिंदों को चाहते हैं एक ही रंग में रंगना, यहीं चूक होती है ।
भानमती के भिन्न-भिन्न कुनबों से भारत एक राष्ट्र बन सका है तो राष्ट्रवाद की स्वदेशी संकल्पना से ही । राष्ट्रवाद की यह स्वदेशी संकल्पना ‘अनेकता में एकता’ की चाशनी में भीगी-पगी है और आधुनिक राष्ट्रवाद के मानकों को भी संतुष्ट करती है । समझने की जरुरत है कि –भारत की एकता, ‘एक-जैसे’ होने से नहीं हैं बल्कि भारत की एकता, अनेकताओं की मोतियों को एक सूत्र में जोड़ने वाली भारतीय राष्ट्रप्रेम से उर्जा पाती है और निखरती जाती है । जिस क्षण से हमने भारत की विविधता को मान देना समाप्त किया, हमारा राष्ट्रीय कलेवर, सारा ताना-बाना बिखर जायेगा । चर्चिल जैसे लोग हमारे राष्ट्रवाद में अन्तर्निहित कमजोरी देखते थे, मजाक उड़ाते थे, कहते थे-आजादी के पंद्रह साल भीतर ही यह कुनबा बिखर जाएगा, हमने उन्हें गलत साबित किया; हमने जता दिया कि पश्चिमी राष्ट्रवाद जिसकी विश्व कवि रवीन्द्र खुलकर आलोचना करते थे, उस राष्ट्रवाद से विश्वयुद्ध उपजते हैं, यूरोप में छोटे-बड़े कई विभाजन होते हैं, कई छोटे राष्ट्र उभरते हैं, पर भारतीय राष्ट्रवाद से अलग-अलग, तरह-तरह के लोग भी साथ मिलजुलकर उसकी अस्मिता अक्षुण्ण रखते हैं ।
भारतीय राष्ट्रवाद सफल हो सका, अपनी परम्पराओं को निभाने की जीवटता से । अलग-अलग धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, नृजाति, प्रजाति, समुदाय, खान-पान होने के बावजूद सभी लोग उत्साह से सभी के त्योहारों में शामिल होते हैं । सभी उत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं । सरकारें भी इन त्योहारों को मनाती हैं और अपना समसामयिक सहयोग देती हैं । फिर समय-समय पर जगह-जगह आयोजित मेले, पारस्परिक मेलजोल का खूब मौका देते है । सभी, सभी त्योहारों में शामिल हो सकें, मेलों में आमद दुरुस्त बनी रहे, इसमें भारतीय रेलों का महती योगदान है । आज का भी भारत इन रेलों से ही सफ़र करता है । रेलों की शुरुआत भले ही अंग्रेजों ने की हो पर हम भारतीयों ने इसे अंग्रेजीदां नहीं बनने दिया । आम आदमी इसपर चल सके यह प्राथमिकता पर रहा भले ही इसमें घाटे की मार सहनी पड़ी । अंग्रेजों का ध्यान माल ढो मुनाफा बटोर कही और पहुँचाना था हमारा ध्यान देश के हर नागरिक तक रेल पहुँचाने पर अधिक केन्द्रित रहा । इसप्रकार उन्नीस सौ इक्यावन में राष्ट्र को समर्पित इन रेलों ने भारतीय राष्ट्रवाद के मूलमंत्र ‘अनेकता में एकता’ को जीवंत बनाये रखा है । भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है । भारतीय रेल ने भारतीय राष्ट्रवाद के सफ़र में निर्णायक अप्रतिम  योगदान दिया है और यह जारी है ।
भारतीय रेलवे का महत्त्व इन अर्थों में रेखांकित किया जाना आवश्यक है । इसे निजी हाथों में सौपना, इसे बस एक वस्तु समझना है, जिसे गाहे-बगाहे बाजार में धकिया दिया जाना है । भारतीय रेलवे एक बड़ा कार्यस्थल है, इसका एक राष्ट्रीय महत्त्व है, यह देश के बड़े गतिमान प्रतीकों में है । उन्नीस सौ चौबीस में अकवर्थ कमिटी ने इसकी तत्कालीन महत्ता समझते हुए  आम बजट से इतर इसका बजट बनाने की अनुशंसा की थी ताकि यह सही मायनों में स्वायत्त रह सके, और संसाधनों की कमी इसके महत्त्व की पूर्ती के मार्ग में ना आये । भारत सरकार इसका बजट अगर आम बजट में ही जोड़ने की तैयारी में है तो यकीनन यह इसके सांगोपांग आयामों की अवहेलना है ।
C:\Users\Shree Tab\AppData\Local\Microsoft\Windows\INetCache\IE\2QF3WLOX\writing-pen-clean-black-icon-25429206[1].jpgडॉ. श्रीश  

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