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Friday, September 21, 2018

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश: एकीकरण बनाम महासंघ के तर्क


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

लाहौर में जन्में प्रसिद्द भारतीय फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा की 2004 में आयी फिल्म वीर-ज़ारा में मशहूर गीतकार जावेद अख्तर का लिखा एक गीत है जो सुर-साम्राज्ञी लताजी और उदित नारायण की आवाज में बेहद मकबूल हुआ था। 'धरती सुनहरी अम्बर नीला, हर मौसम रंगीला, ऐसा देश है मेरा हो...ऐसा देश है मेरा !' आख़िरी बंद में यह गीत कुछ यों हो जाता है- 'तेरे देश को मैंने देखा, तेरे देश को मैंने जाना...,....ऐसा ही देश है मेरा, जैसा देश है तेरा...!' यह फिल्म, इसके निर्देशक, इसकी कहानी, इसके लेखक और गीतकार यह निश्छल संदेश देते हैं कि भारत और पाकिस्तान में एक-दूसरे के लिए नफरत की कोई गुंजायश नहीं होनी चाहिए और कायनात की अनगिन खूबसूरत नेमतों को दोनों देश की धरती साझा करती है। कहना होगा कि लोकप्रिय कला माध्यम में यह एक अद्भुत प्रयास था जो एक 'मानवीय पाकिस्तान' की छवि गढ़ता था। लेकिन संस्कृति, समाज, इतिहास और राजनीति ये अलग-अलग शब्द हैं और अपनी पूरी अर्थवत्ता में इनके गंभीर निहितार्थों की अवहेलना कत्तई नहीं की जा सकती। राष्ट्र, राज्य व राष्ट्र-राज्य, 'राजनीति' के पारिभाषिक शब्द हैं और इनके अपने विशिष्ट मायने हैं। एम. फिल. की कक्षा में मेरे पाकिस्तानी सहपाठी को इस सुंदर गाने के आख़िरी बंद से क्यों आपत्ति थी, यह मै धीरे-धीरे समझ पाया था क्योंकि वे पंक्तियाँ अनजाने में ही उसके राष्ट्र-राज्य 'पाकिस्तान' के 'रेजन डेटा (राज्य स्थापना का आधारभूत तर्क)' को चोट पहुँचा रही थी। 

राष्ट्र जहाँ राजनीतिक व सामाजिक अस्तित्व का परिचायक है वहीं राज्य मूर्त अस्तित्व का जिसमें जरूरी तत्वों के रूप में निश्चित भू-भाग, जनता, सरकार और संप्रभुता पाए जाते हैं। आधुनिक 'राष्ट्र-राज्य' होने के लिए राष्ट्र और राज्य दोनों की विषेशताओं का होना आवश्यक है। यह समझ लेना बेहद आवश्यक है कि एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान का प्रादुर्भाव 1940 से ही माना जाता है जो 1947 में राज्य की जरूरी विशेषताएँ पाकर एक 'राष्ट्र-राज्य' बनने की अपनी कोशिशों में लग गया। औपनिवेशिक अतीत से मुक्त हुए देशों के बारे में इसलिए ही कहा जाता है कि यहाँ राष्ट्र-निर्माण एवं राज्य-निर्माण की समांनातर प्रक्रियाएँ सतत चलती रहती हैं। यहीं उद्धृत करना समीचीन होगा कि जिन्ना जहाँ भारत-पाकिस्तान को साझे मातृभूमि के दो राष्ट्र के रूप में देखने के हिमायती थे वहीं गाँधी इन्हें 'एक राष्ट्र' के 'दो राज्यों' के रूप में स्वीकार करना चाह रहे थे। आगे चलकर पाकिस्तान का एक और विभाजन हुआ और बांग्लादेश अस्तित्व में आया। यह ठीक है कि दो या दो से अधिक राष्ट्र-राज्य अपने इतिहास, समाज, संस्कृति के कुछ या अधिकांश पन्ने साझा करते हैं पर इस आधार पर उनके 'एकीकरण' का एकतरफा तर्क गढ़ना व उसका एकपक्षीय आरोपण द्विपक्षीय संबंधों में और अधिक तनाव ही भरेगा। कोई भी दो या दो से अधिक राष्ट्र-राज्य अपने-अपने राष्ट्रवाद को सुरक्षित रखते हुए एक 'महासंघ' बनकर काम करने को राजी हो सकते हैं जिससे विश्व-राजनीति में साझे राष्ट्र-हित साथ मिलकर सँवारे जा सकें। राष्ट्र और राज्य की पृथक-पृथक महत्ता समझते हुए ही पीछे कई बार गंभीर रूप से 'महासंघ' की योजना पर तो अवश्य ही विचार-विनिमय हुआ किन्तु किसी भी गंभीर विचारक अथवा राजनेता ने 'एकीकरण' की बात कभी नहीं चलायी। ‘महासंघ’ बनाकर विभाजन का सच नहीं बदला जा सकता लेकिन उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित किया जा सकता है। 'महासंघ' के तर्क को जिन्ना सहित, राम मनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, हामिद अंसारी आदि अनेक हस्तियाँ स्वीकार करती हैं और समय-समय पर इसकी आवश्यकता पर भी बात करती हैं, किन्तु 'एकीकरण' का एकतरफा तर्क सामान्यतया नहीं ही दिया गया।  

अक्टूबर 1990 में हुए पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी एकीकरण राष्ट्र-राज्यों का यकीनन एक सुंदर उदाहरण है, जिससे इतना अवश्य यकीन उपजता है कि एकीकरण की प्रक्रिया असम्भव नहीं है। पर यह उदाहरण भारत, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश पर आरोपित करने से पहले उनकी अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करना बेहद जरूरी है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीपीय सन्दर्भ में यह उदाहरण उपयुक्त नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते दुनिया उदारवादी एवं साम्यवादी विचारधारा के स्तर पर संयुक्त राज्य अमेरिका व सोवियत रूस के नेतृत्व में बंटकर फिर शीत युद्ध के आगोश में चली गयी थी। जर्मनी का पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी के रूप में विभाजन इसी रस्साकस्सी का परिणाम था। पृथक राष्ट्र-अस्तित्व के मूल में तर्क ‘विचारधारा व राजनीतिक व्यवस्था’ का था। 1986 में सोवियत रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने ‘ग्लासनोस्त’ व ‘पेरेस्त्रोइका’ की घोषणा कर दी थी, जिससे अंततः नब्बे के दशक में आते-आते सोवियत विखंडन की प्रक्रिया की शुरुआत हुई। इन नयी परिस्थितियों का लाभ लेते हुए पश्चिमी जर्मनी के चांसलर हेल्मुट कोल ने अमेरिकी तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज हर्बर्ट वाकर बुश के कूटनीतिक प्रयासों से जर्मन-एकीकरण संभव कर दिया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों ओर की जर्मन जनता इस एकीकरण को चाहती थी और बर्लिन की दीवार बिना किसी राजनीतिक रणनीतिक योजना के पूर्णतः स्वतः स्फूर्त जनता द्वारा ढहायी गयी। वह ‘विचारधारा व राजनीतिक व्यवस्था’ जो जर्मन-विभाजन को आधार देती थी, वही कमजोर पड़ती गयी थी।  इसके इतर पाकिस्तान के राष्ट्रगत अस्तित्व का मूल तर्क  ‘धार्मिक’ है और बांग्लादेशी राष्ट्रगत अस्तित्व का मूल तर्क ‘सांस्कृतिक (बंगाली)’ है, जो अभी भी पूरी मजबूती से बना हुआ है। इसलिए ‘भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश महासंघ’ के तर्कों में जहाँ सहयोग की ऐसी मंशा शामिल है जो किसी भी राष्ट्र-राज्य की राष्ट्र्रीय संकल्पना को बिना हानि पहुंचाए परस्पर सहयोग की अधिकतम सम्भवना को टटोलता है, वहीं ‘एकतरफा एकीकरण’ के तर्क की मंशा ‘राष्ट्रगत असुरक्षा’ पनपाती है। 

विश्व-राजनीति, दक्षिण एशियाई राजनीति एवं भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के वर्तमान संबंध एवं इनकी मौजूदा घरेलू राजनीति भी इस बात की ताकीद करती है कि यह समय ‘एकीकरण के तर्क’ का कत्तई नहीं है, बल्कि ऐसे समय में यदि ‘महासंघ’ बनाने का तर्क भी यदि इन तीनों देशों में से किसी एक देश का कोई एक नेता देने की कोशिश करे तो यह एक बेहद सकारात्मक बात मानी जाएगी। पाकिस्तान की राजनीति में अभी जो इमरान युग शुरू हुआ है उसका आधार वही सेना है जो भारत से अपने संबंधों को सुधारने की दिशा में उदासीन है। भारत-पाकिस्तान संबंध ठिठके पड़े हैं, सामान्य बातचीत का दौर भी स्थगित है। भारत का पारंपरिक मित्र रूस, पाकिस्तान को हथियार दे रहा और उनके सैनिकों को प्रशिक्षण भी दे रहा। तेजी से उभरते चीन से भारत के संबंधों में जहाँ डोकलम, तिब्बत, नेपाल और मालदीव का तनाव है तो उसी चीन से पाकिस्तान के गहराते संबंधों को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं!  बांग्लादेश एक सघन आंतरिक राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है और वहाँ भी बांग्लादेशी शरणार्थियों व धार्मिक चरमपंथी मुद्दों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक ऐंठन पैदा की है। यथार्थ में भारत-पाकिस्तान के सतत तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए 'महासंघ' का लक्ष्य जितना विशिष्ट व कठिन है, 'एकतरफा एकीकरण' का तर्कारोपण, ऐसे माहौल में 'एकीकरण' तो छोड़िये, 'महासंघ' के प्रयत्नों को भी जटिल बनाएगा और यह  चिढ़ाने जैसा बेतुका भी है। 

एक गहरे विजन और प्रतिबद्ध पारस्परिक सहयोगों की रूपरेखा के साथ भारत सरकार, पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ ‘महासंघ’ निर्मित करने की योजना पर तब ही काम कर सकती है जब पृष्ठभूमि में तीनों देशों में परस्पर सहयोग की बानगी हो, भले ही वह हालिया हो लेकिन एक पारस्परिक विश्वास बनने लगा हो। फिर और भी सकारात्मक होकर सोचें तो महासंघ की स्थिति साकार होने के बाद यदि इन देशों के नागरिक धीरे-धीरे यह महसूस करने लगें कि हमें ‘एकीकरण’ की ओर बढ़ना चाहिए तो उचित वैश्विक परिस्थिति में यकीनन यह एकीकरण संभाव्य हो सकता है। इसमें भी दशकों लगेंगे और यह प्रक्रिया निरंतर सहयोग व विश्वास की मांग करती है। हाल-फ़िलहाल तीनों देशों की सरकारें ऐसे किसी निरंतर सहयोग व विश्वास की प्रक्रिया में तो नहीं ही दिख रहीं।   

Tuesday, August 28, 2018

What is Ideology?

व्हाट इज आइडिओलॉजी: आंसर जेनरेशन नेक्स्ट के लिए 

साभार: दिल्ली की सेल्फी 


केवल शब्द से पकड़ें, माने लिटरली; विचारधारा को आइडियाज का एक स्ट्रीम होना चाहिए पर मामला इतना आसान नहीं है। अब यह वर्ड, टर्म (टर्मिनोलॉजी) बन गया है और एक स्पेशल मीनिंग में यूज़ होता है। विचारधारा; एक खास विचारों का पुलिंदा है जिसके आधार पर किसी भी घटना (फिनॉमिना) को देखा, परखा, समझा और कहा जाता है।उन खास विचारों की बुनावट लॉजिकल होगी ताकि किसी भी रेशनल माइंड को अपील करे। उन खास आइडियाज से एक नजरिया (पर्स्पेक्टिव) बनाने में मदद मिलती है। समझना जरूरी यह है कि किसी आइडियोलॉजी से जब हम किसी फिनॉमिना को देखने-समझने की कोशिश करते हैं तो वह अंडरस्टैंडिंग और वह कन्क्लूजन फाइनल नहीं होता। उसी घटना को किसी दूसरे आइडियोलॉजी से किसी दुसरी तरह देखा-समझा जा सकता है।

अब जब ऐसा है कि एक आइडियोलॉजी से टोटल ट्रुथ तक पहुँचा नहीं जा सकता तो फिर आइडियोलॉजी की इम्पोर्टेंस ही क्या है ? है, हुज़ूर ! बहुत जरूरी है समझना ! हम अगड़म बगड़म माने स्पोरेडिकली या ज़िगज़ैग में सोचते हैं नॉर्मली। और यही प्रॉब्लम की जड़ है। हम फुटबाल से सोचना शुरू करते हैं, फुटबाल से रोनाल्डो तक और फिर पुर्तगाल पहुँच जाते हैं और फिर कब वास्को डी गामा के बारे में सोचते हुए गोवा के वास्को डी गामा पहुँच जाते हैं। ऐसे सोचते हैं हम, हमेशा ! इस थिंकिंग से डेफिनिट और अक्सेप्टबल कन्क्लूजन आने की पॉसिबिलिटी है बंधू बहुत लिटिल। इसलिए डिसिप्लिंड वे में थिंकिंग करना जरूरी हो जाता है। विचारधारा यानी आइडियोलॉजी उन्हीं खास आइडियाज को मिलकर कंस्ट्रक्ट किये जाते हैं जो डिसिप्लिंड थॉट प्रॉसेस से लॉजिकली अर्रेंज किये जाते हैं और इसलिए ही वे एक रेशनल माइंड को अपील भी करते हैं।

चूँकि हर आदमी अलग अलग जगह होता है और अलग अलग जगह से किसी घटना को देखते हुए ज़िगज़ैग ही सही एक कन्क्लूजन पर पहुँचता तो है ही, अक्सर उसी कन्क्लूजन को फाइनल मानने की टेंडेंसी रहती है, अक्सर इसी को लोग कहते हैं-भैया, हम ग्राउंड पे थे, हमसे जानों रियल्टी ! कोई फिनॉमिना होती एक जगह है पर उसे अलग-अलग लोग अलग-अलग जगह से अलग-अलग तरीके से परसीव करते हैं और फिर उस रियल्टी के रीयल वर्जन भी उतने ही हो जाते हैं, जितने लोग उसके बारे में ग्राउंड रिपोर्ट करते हैं। एक बात और भी है, दो आँखें हैं अपने पास, पर मिलकर भी देखती वही है जहाँ माइंड का अटेंशन होता है। जब माइंड डिसाइड करता है कि किसी सीन में ‘क्या’ देखना है तो अक्सर अपनी पुरानी ट्रेनिंग के हिसाब से वह यह भी डिसाइड करता है कि उस ‘क्या’ को ‘कैसे’ देखना है ! फिर क्या- सब अपनी-अपनी ज़िद पे रहते हैं कि-भइया, हमरी सुनो, हम ग्राउंड पे थे ! सच ये है कि जितना पास होकर देखा जाता है, उतना ही खतरा होता है। इसलिए ही रिपोर्टर को एनालिस्ट की जरुरत होती है। जिस घटना के हम विटनेस होते हैं या जिस घटना के हम खुद ही पार्ट होते हैं, वह घटना हम पर ही जाने कितना इम्पैक्ट कर रही होती है। और यह जो इम्पैक्ट होता है वह माइंड को गाइड करता है कि उस फिनॉमिना को एक खास इम्पैक्ट में ही ज़ियादा परसीव किया जाय। फ्रंट के एक सिपाही को इसीलिये डिसीजन मेकिंग के लिए दूर खड़े जनरल या हेडक़्वार्टर का आर्डर लेना होता है।

रियल्टी के इसलिए ही कई एंगेल होते हैं। सच झुकता नहीं है, परेशान हो सकता है, साहब लेकिन सच का सच यह है कि इसे टोटैलिटी में परसीव करना एक टफ चीज है। इसलिए विचारधारा और सिद्धांतों की शुरुआत हुई। आइडियोलॉजी का जो ऑब्जेक्ट है वह एनिमेट डायनामिक रियलिटी है। ह्यूमन बींग पर कोई एक प्रिंसिपल काम कर ही नहीं सकता, इसलिए ही ह्यूमन बिहैवियर से जुड़े सब्जेक्ट्स में प्रिंसिपल से अधिक पर्स्पेक्टिव इम्पोर्टेन्ट होता है और यहीं चूक होती है उनसे, जिन्होंने पिछले कई सालों से महज साइंस के ऐकजैक्टनेस (exactness) की ट्रेनिंग से अपने माइंड को ट्रेन किया हुआ है। इसमें उनकी कोई फॉल्ट भी नहीं। अपने कंट्री में साइंस, मैनेजमेंट, मेडिकल के स्वैग का पूछो मत। जहाँ, पैसा नहीं; वहां नॉलेज नहीं, मान लिया जाता है, इसे कहते हैं सोशल सायकॉलॉजी ! आर्ट्स में जब इस प्रॉब्लम को महसूस किया गया कि रियलिटी के परसीव करने के प्रोसेस में पर्सनल बायसेस (biases) आ सकते हैं तो विचारधाराओं का चलन तेजी से हुआ।

एक आइडियोलॉजी, अपने तरह की खास विचारों से बने डिसिप्लिंड थॉट प्रोसेस को ऑफर करती है। यहाँ बायसनेस की गुंजायश तो पूरी है, पर आइडियोलॉजी यूज़ करने वाला शुरू से ही अवेयर है। इसी अवेयरनेस की गुंजायश ने आइडियोलॉजी का मान बढ़ाया। अब जब हम किसी फिनॉमिना को मार्क्सिज्म की आइडियोलॉजी से देखते हैं तो अवेयर रहते हैं कि थॉट प्रोसेस का बेस क्या है। इसप्रकार फिनॉमिना को समझ भी लेते हैं और थॉट प्रोसेस पर कंट्रोल भी बना रहता है, ज़िगज़ैग नहीं होने पाता। बस एक गलती हो जाती है अक्सर। इसी गलती की वजह से आइडियोलॉजी बदनाम बहुत हैं। लेकिन इसमें गलती आइडियोलॉजी से नहीं, बंदे से होती है। यही कि, उस पार्टिकुलर आइडियोलॉजी के यूज़ से मिले कन्क्लूजन को ही फाइनल समझना। भाई, दुनिया में बहुत विचारधाराएँ हैं, क्यूंकि दुनिया बहुत बड़ी है और लोग वैरायटी में हैं, तो किसी घटना के अनगिनत ऐंगल संभव हैं तो एक आइडियोलॉजी से कुछ ऐंगल्स पकड़ में आते हैं, ज्यादातर रह ही जाते हैं। ये समझना चाहिए। तभी तो किसी एक घटना को समझने के लिए कई आइडियोलॉजीज का इस्तेमाल होता है, ताकि ज्यादातर ऐंगल्स पकड़ में आएं। एनालिसिस इसलिए ही यों की जाती है कि उसमें ग्राउंड रिपोर्ट वाला भी हो और दूर से देख रहा एनालिस्ट भी हो ! ज़िंदा डायनामिक ह्यूमन बींग जिस फिनॉमिना के पार्ट हों, उससे निकलती घटना के रियलिटी का ट्रुथ पकड़ना कभी आसान नहीं था, पर कोशिश की जाती है लगातार ताकि फ्यूचर आज से बेहतर हो। डिबेट, डिस्कशन, एनालिसिस सारे ही इसलिए ही जरूरी हैं ताकि अधिक से अधिक एंगेल पकड़ में आये। जरूरी नहीं कि हर डिस्कशन, डिबेट का कन्क्लूजन आये ही, क्योंकि यह स्टेबल ऑब्जेक्ट वाला साइंस नहीं है, यहाँ अगर डिस्कशन से अधिकांश पॉसिबल एंगेल ही खोज लिए गए तो धीरे धीरे कन्क्लूजन परसीव होते रहेंगे।

एक आइडियोलॉजी एक चश्में से अधिक कुछ नहीं होती। हमें समझना चाहिए कि लाल रंग के चश्में से सब कुछ लाल दिखेगा और हरे रंग का ग्लास होगा तो सबकुछ ग्रीन दिखेगा। मुश्किल तब होती है जब परवरिश या एजुकेशन से कोई एक ही तरह का चश्मा लगा ही रह जाता है और बंदा आँख और चश्में में फर्क ही नहीं कर पाता। कलर लैब में जैसे फोटो डेवलपिंग में हम समझते हैं कि कोई फ्रेम किस कलर में ज़ियादा निखरेगा उसी कलर का यूज़ करके बेहतरीन फोटो बनाने की कोशिश की जाती है, इसलिए ही अलग-अलग विचारधाराओं का चश्मा पहनकर घटनाएं देखने की कोशिश होती है। बस परेशानी यह है कि कइयों को दूसरा चश्मा कभी मिल ही नहीं पाता, जो मिलता भी है तो पिछला चश्मा उतारना नहीं आता। और मान लीजिये कि नंगी आँख से सब दिखेगा तो जरूर पर माइंड का घालमेल बना रहेगा।

सबसे बेहतर तो यही है कि हमारी एडुकेशन हमें पढाई के दिनों में ही ढेरों चश्मों से मिलवा दे ताकि हम किसी एक चश्मे को आँख न मानने लगें और जब चाहें वैसा चश्मा यूज़ कर रियलिटी के अधिकांश ऐंगल पकड़ सकें। मोटीमोटा जान लीजिये कि किसी भी वर्ड के बाद जो इज्म लगा होता है तो ज्यादातर वह आइडियोलॉजी होता है, ज्यादातर ! जैसे मार्क्सिज्म, लिबरलिज्म, कैपिटलिज्म, फेमिनिज्म, एट्सेटरा. यूरोप में नेशनलिज्म की आइडियोलॉजी ने वो कहर बरपाया कि दो-दो वर्ल्ड वार्स हो गए। हुआ यही कि अपने अपने नेशन का चश्मा उन्होंने उतारा ही नहीं। सो, आइडियोलॉजी समझनी पड़ेगी देर-सबेर, नहीं तो डेंजर रहगी कि कोई क्लेवर कुछ बोलकर कोई चश्मा पहनाकर टोपी न पहना दे !


Monday, August 20, 2018

जीवंत अस्मिताओं को महज प्रतीक बनाने का उन्माद बेहद निष्ठुर

साभार: दिल्ली की सेल्फी 

अगर संजीदा लोग समावेशी बात नहीं करेंगे तो अंततः कितनी घृणा भर जाएगी अपने प्यारे देश में। लोग गलतियाँ करते हैं, अगर यों ही हम प्रतिक्रियावादी हो जाएंगे तो फिर हमारा यह देश कमजोर होगा उधर दूर स्वर्ग से चर्चिल ठठाकर हँसेगा कि मैंने तो पहले ही कहा था कि भारत की वह राष्ट्र संकल्पना जिसमें सभी पहचानों के लोग रह सकते हैं वह कपोल है। विनम्रतापूर्वक कह रहा हूँ कि विश्व इतिहास हमें सिखाता है कि जब जब राष्ट्र भावना आरोपित की जाती है वह विनाशक होती है किन्तु जब तक यह स्वयमेव व स्वतः स्फूर्त होती है, कल्याणकारी होती है। क्या यह ठीक है कि कोई कानून के डर से अथवा समूह/व्यक्ति दबाव में राष्ट्र प्रतीकों का सम्मान करे? क्या यह स्थिति हमारे राष्ट्रप्रेम की असुरक्षा को नहीं जतलाती ? अमेरिकन फ्लैग की चड्ढियां पहने एक अमेरिकी का राष्ट्रवाद नहीं आहत होता पर हेल्मेट पर तिरंगा लगाए सचिन को जवाब देना पड़ता है। और यह भी सोचिए न कि प्रतीक, राष्ट्र होते हैं या राष्ट्र से प्रतीक होते हैं? फिर राष्ट्र बनते हैं किनसे नागरिकों से ही न!

आधुनिक राष्ट्रराज्य की संकल्पना तो यही बताती है न कि व्यक्ति के लिए राज्य है और लोकतंत्र कहता है कि संप्रभुता जनता में निवास करती है!

मेरा इतना ही आग्रह है कि किसी ओर से भी जोर जबर्दस्ती नहीं होनी चाहिए! राष्ट्रगान गाने को उद्यत छात्र समूह को यदि कोई मौलाना राष्ट्रगान गाने से रोक देता है या व्यवधान डालता है तो मामला कोर्ट में जाए जहाँ उसे अपना पक्ष रखने का मौका मिले फिर कानून अपना काम करे! एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य कानून का पालन करना है न कि पालन करवाना, इसके लिए राज्य के दूसरे प्रकल्प हैं। इतिहास गवाह है कि मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी फेहरिश्त है और मुझे आज भी कितने ही मुसलमान भाई मिलते हैं जो पूरे शान से राष्ट्रगान गाते हैं, वन्दे मातरम बोलते हैं! जोर जबर्दस्ती किसी ओर से नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है। यह अंततः जोड़ने में है, तभी तो राष्ट्रगान गाना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। राष्ट्रगान न गाने के जुर्म में गिरफ्तारी नहीं की जा सकती, दंड निश्चित नहीं किया जा सकता। हाँ गाने को तैयार अथवा गाते हुए व्यवधान पहुँचाने वाले के लिए दंड का प्रावधान है। कोई राष्ट्रगान गाना चाहता है और कोई उन्हें गाने नहीं देता उसके लिए सजा का प्रावधान है पर कोई कानून यह नहीं कहता कि राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है।यह स्वतः स्फूर्त होना चाहिए, यही अभीष्ट था, है। राष्ट्र जिन घटकों से मिलकर बनता है उसमें नागरिक शामिल हैं, उनका एकीकृत प्रतीक है ध्वज व राष्ट्रगान! जोर जबर्दस्ती राष्ट्र के उत्स को खतरे में डालती है।

फिर कहूंगा अंततः राष्ट्र लोगों को जोड़ने में है! अजीब विडंबना है आजकल बहुत गहराई में देखिए तो जो लोग राष्ट्र को महज एक प्रतीक न मान जीवंत मान रहे उन्हें सहसा देशद्रोही करार दिया जा रहा। इस देश ने ऐसे ही गाँधी को महज प्रतीक बना दिया, नारी को त्याग, पवित्रता का प्रतीक बना दिया, स्त्री को इज्जत का प्रतीक, धर्म को वस्त्र बना दिया गया, कितना गिनाऊँ...ये जिंदा अस्मिताओं को महज प्रतीक बनाने का उन्माद बेहद निष्ठुर है, कम से कम मेरा देश जो सहज सनातन शाश्वत है और जिसमें विभिन्नताओं के संश्लेषण की अद्भुत विराट क्षमता है, जिसकी निर्झर परंपराएँ कालातीत हैं वह प्रतीकों की सुरक्षा का मोहताज नहीं है।

मै राष्ट्र प्रतीकों का आदर करता हूँ और दिल से चाहता हूँ कि देश का प्रत्येक व्यक्ति इनका आदर करे। पर अगर इन प्रतीकों का आदर करवाना पड़े तो बताइए न क्या यह इसे इंगित नहीं करता कि स्वतंत्रता पश्चात जो राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया हमने समवेत चलाई है उसमें और भी सुधार की आवश्यकता है? या कि जबरन आदर करवाएंगे। हमें हराना नहीं है देश विरोधी मानसिकता को, उन्हें जीतना है और पुष्यमित्र, अशोक, गाँधी, मौलाना आजाद, अबुल कलाम, टाटा का य‍ह देश जानता है कि जीता कैसे जाता है!

एक रोष में यदि प्रतीक पालन करवाया जाएगा तो राष्ट्र के नाम पर एक रोष पनपेगा और इस रोष को ध्रुवीकरण के लिए प्रयोग कर राजनीतिक दल लाभ लेंगे! क्या यही अंग्रेजों ने नहीं किया? क्या यही विभाजन के समय नहीं दिखा? क्या यही आजाद भारत के दल जब तब नहीं करते हैं?

Tuesday, August 14, 2018

क्या हम निष्पक्ष मीडिया के लिए तैयार हैं?


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

निष्पक्ष न्यूज-व्यूज पढ़ने-देखने के लिए हमें अपनी जेब से पैसे खर्च करने को धीरे-धीरे मन बनाना होगा। प्रायोजित न्यूज संस्कृति में सबसे बड़ा प्रायोजक सरकारी विज्ञापन के बहाने सरकार ही बन जाती है। प्रायोजित न्यूज संस्कृति में हम मीडिया और सरकार से इस सकारात्मक उम्मीद में होते हैं कि ये दोनों खुद राजनीतिक नैतिकता का अनुपालन करेंगे। यह अजीब स्थिति है। घर में बैठे-बैठे हम ये उम्मीद करते हैं कि मीडिया अपना काम करे और आपको न्यूज पहुँचाए और उसी भोलेपन से हम सोचते हैं कि सरकार चुन ली गई है और अब वह अपना काम करे! मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा इसलिए है क्यूँकि वह सार्वजानिक पक्ष पर प्रश्न कर सकता है।

प्रश्न करने के पीछे एक तैयारी करनी होती है। इस तैयारी में जीते-जागते, पढ़े-लिखे लोग होते हैं, जिनके दिन का 18-20 घंटा लगता है, उन्हें भी उसी रेट पर बाजार सामान देता है, उन्हें भी अपना परिवार चलाना है, यह तैयारी ही उनका रोजगार है। ग्लोबलाईजेशन और तगड़े बाजारवाद के दौर में एक पत्रिका, एक अखबार और एक चैनल चलाना बेहद ही चुनौती भरा काम है। एकबार पैसा लगाने के बाद अपना संस्थान बचाना ही इतना कठिन हो जाता है कि निष्पक्षता और पारदर्शिता का आदर्श बेहद निष्ठुर लगने लगता है। इन आदर्शों से उबकाई आने लगती है जब विज्ञापनों के लिए उन्हीं लालाओं और सरकार के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है जिनके अनियमितताओं के विरुद्ध न्यूज बनानी और चलानी होती है। यह संभव ही नहीं है तो इसलिए ऐसा होता भी नहीं। होता यही है कि न्यूज संस्थान धीरे-धीरे दलाल और धमकाऊ होते जाते हैं। न्यूज के नाम पर वे बेचते हैं जिनको वो एडिटर रूम में नहीं बेच पाते हैं।

इस क्षेत्र की बाजारू प्रतिस्पर्धा मीडिया मालिकों को एक बीच का रास्ता खोजने पर मजबूर करती है। मीडिया मालिक फिर सरकार, बाजार और समाज को छोटी-बड़ी मछलियों से बने झुंड की तरह देखने लगते हैं। मीडिया मालिक बड़े ही ध्यान से फिर मछली मारने के काम में खुद को लगा लेता है। जो मछलियाँ नई होती हैं उनकी एक छोटी गलती भी अखबार और चैनल पर पहाड़ बनकर दिखती है। यह स्थापित मछलियों के लिए चेतावनी भी होती है। सरकार सबसे बड़ी शार्क होती है, ऐसे में! उसके पास तो नुकीले दातों का भी बढ़िया इंतजाम होता है। फिर मीडिया एक ऐसा धंधा बन जाता है जिसमें ग्राहक को लगभग कुछ चुकाना ही नहीं पड़ता। जैसे ही हम नागरिक मीडिया के ग्राहक बन पाने की योग्यता खोते हैं, मीडिया हमारे उम्मीदों के आदर्श का कागज हवाई जहाज बनाकर उड़ाने लग जाता है। ऐसा करते हुए वे अपनी आत्मा का सौदा कर चुके होते हैं, लेकिन उन्हें भ्रष्ट कह आगे बढ़ जाना एक खतरनाक भूल होगी।

उन्हें भ्रष्ट बनने को मजबूर करते हैं हम और आप, क्योंकि हम और आप न्यूज मुफ्त में पढ़ना-देखना चाहते हैं। यहाँ हम अपनी जेबें ढीली करने को तैयार हों तो मीडिया इतनी सशक्त होगी कि सरकार के बहुतेरे पक्षों से भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और नतीजा ये होगा कि चीजें जो बेवज़ह महंगी हैं वे सस्ती होंगी और क्रय शक्ति भी बढ़ेगी। मीडिया पर खर्च करना राष्ट्रहित में एक देशभक्ति का काम भी होगा और यह नागरिक कर्तव्यों की भी पूर्ति करेगा। प्रायोजित न्यूज सामग्री पढ़कर और देखकर सार्वजानिक मामलों पर निष्पक्ष राय बनायी ही नहीं जा सकती। ऐसा सोचना कोरा भोलापन है कि सरकार जिसे अपना भारी-भरकम विज्ञापन देगी, वह सरकार की कोई भी और कैसी भी आलोचना कर सकेगा! मीडिया प्रतिष्ठान का वह मॉडल जिसमें विज्ञापन दिखाने-छापने के लिए व्यवसायी पैसे खर्च करते थे, बेहद पुराना और सरल मॉडल है। अब जबकि सत्ता और उद्योग का गठजोड़ जगजाहिर है ऐसे में इस मॉडल से निकलने वाले किसी भी न्यूज की विश्वसनीयता पर गहरे संकट हैं। बड़े-छोटे पत्रकार निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि सरकारें उनपर दबाव रखती हैं और यह कम-अधिक हर दौर में होता रहता है। परिचित कई मीडियाकर्मी स्वीकार करते हैं कि निष्पक्ष न्यूज कोई कैसे दे जबकि एक रुपया भी ग्राहक कोई एक लेख पढ़ने अथवा देखने में खर्चना नहीं चाहता। यदि दर्शक और पाठक एक रुपए भी प्रति लेख खर्चने को तैयार हो जाए तो मीडिया मछलियों को ठेंगा दिखाने लगें, फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो जाये।

मीडिया पर एकतरफा आदर्श निभाने का दबाव इसे और खोखला करेगा। एक अच्छा नेता हमारी तरफ दशकों से देख रहा कि हम उसे वोट देंगे और जिताएंगे। एक पत्रकार दशकों से हमारी तरफ देख रहा कि जब जान जोखिम में डाल वो न्यूज निकालेगा तो हम जनता उसकी सुरक्षा का, उसकी रोजी-रोटी का ख्याल रखेंगे। एक हम हैं कि लगभग मुफ्त में न्यूज चैनल देख रहे और लगभग 25 से 30 रुपये प्रति लागत के अखबार को 4 से 8 रुपए में पढ़ रहे हैं। हम भ्रष्ट हैं दरअसल। कभी लाइन में लगना नहीं चाहते। हमें यह इल्म ही नहीं कि एक एक बेहतर समाज और शासन के लिए नागरिकों को क्या-क्या करना पड़ता है? हमें लगता है कि सबकुछ अपने-आप हो जाएगा। अजी, अगर हम चाहते हैं कि मीडिया अपना काम जिम्मेदारी से करे, कि सरकार अपना काम जिम्मेदारी से करे, कि अधिकारी अपना काम जिम्मेदारी से करें तो सबसे पहले हम जनता को अपना कर्तव्य पहचान उसे जिम्मेदारी से निभाना होगा! और यह बात कोई किताबी आदर्श नहीं है, यह एकदम यथार्थ है, दूसरी कोई जुगत ही नहीं है, सूरत ही नहीं है।

मीडिया के प्रतिबद्ध लोगों को चाहिए कि सबसे पहले संस्थान का ऐसा टिकाऊ मॉडल विकसित करें जिसमें निर्भरता केवल और केवल जनता पर हो। यह कठिन लगता है पर जनता पर विश्वास रखिए, ईमानदारी से इसे शुरू तो करिए। मीडिया के कुछ लोगों ने इसे शुरू भी किया है। कुछ पोर्टल पर आपको यह संदेश दिखता भी होगा जहाँ वे निष्पक्ष पत्रकारिता के नाम पर आपसे कुछ अर्थदान की विनती कर रहे हैं! एक सशक्त नागरिक-समाज के लिहाज से यह शर्मनाक है कि निष्पक्ष पत्रकारिता की कोशिश करने वाला विनती कर रहा है। दोस्तों! आइए आगे बढ़कर ऐसे पत्रकारों, ऐसे प्लेटफॉर्म्स को सपोर्ट करें जो अपनी निर्भरता केवल जनता पर रखना चाहते हैं। आइए न्यूज के लिए अपनी जेबें ढीली करें! क्या आप तैयार हैं? क्या हम तैयार हैं?

Monday, July 23, 2018

भारत में समान नागरिक संहिता की स्थिति तब तक नहीं बन सकती


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

जटिल परतदार समस्याओं के समाधान भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्वों में रखे गए हैं। नीति निदेशक तत्व सरकार व समाज के लिए बाध्यकारी नहीं होते किन्तु उन तत्वों का नीति निदेशक तत्वों में होना यह बताता है कि वे तत्व संविधाननिर्माताओं के भविष्य के भारत में एक अनिवार्य तत्व के रूप में हैं, इसका सीधा मतलब यह है कि वे सभी तत्व जो नीति निदेशक तत्वों की श्रेणी में हैं, उन्हें भविष्य में कभी न कभी भारत की जमीनी हकीकत में उतारना ही है। उनमें से एक तत्व ‘समान नागरिक संहिता’ भी है।

आइये पहले समझते हैं कि क्या है यह ‘समान नागरिक संहिता’ ?
एक व्यक्ति के जीवन के कई आयाम होते हैं और वे सभी आयाम दूसरे व्यक्तियों को भी प्रभावित करते हैं। राजनीतिक जीवन के साथ ही साथ सामाजिक जीवन में भी दायित्व और उत्तरदायित्व का तत्व राजनीतिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है जिससे अंततः किसी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव होता है। बहुधा दायित्व और कर्तव्य के मार्गदर्शन के लिए एक-दूसरे पर बनती निर्भरता अपनी भूमिका निभाती है, किन्तु दायित्व-निर्वहन के न होने की स्थति में अथवा न्यून होने की स्थिति में उत्तरदायित्व का प्रश्न खड़ा होता है। कानून द्वारा निर्धारित उत्तरदायित्व की जाँच-परख तो कानूनी रूप से संभव है किन्तु मानव जीवन के वे व्यवहार जो समाज और धर्म द्वारा सामान्यतः निर्धारित होते हैं, वहाँ कानून-व्यवस्था असहाय हो जाती है। यदि किसी उचित रीति से मानव-जीवन के मूलभूत व्यवहारों में ‘दायित्व और उत्तरदायित्व’ की एकरूप नीति बनाई जा सके, जिसके आधार पर कानून व्यवस्था भी उन व्यवहारों का मूलाधिकार व मानवीय आधार पर नियमन व निर्वहन करा सके, तो उस व्यवस्था को ‘समान नागरिक संहिता पर आधारित व्यवस्था’ कहेंगे।

समान नागरिक संहिता और धर्म का पेंच 
राजनीति की संस्थाओं का जन्म मानव-विकास की हालिया उपलब्धि है। इन संस्थाओं के जन्म के बहुत पहले यदि मानव विकास के रुपहले सोपान चढ़ सका तो उसमें ‘धर्म’ की भूमिका सबसे अहम् है। सभी प्रकार की आधुनिक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक-आर्थिक आदि संस्थाओं के विकास के पहले का स्पेस ‘धर्म’ की विभिन्न संरचनाओं के द्वारा भरा गया। इसलिए ही मानव सभ्यताओं के विकास के प्रत्येक स्थलों पर धर्म की प्रभावी उपस्थिति मिलती है। धर्म के महत्त्व से किसी भी आधुनिक विचारक को इंकार नहीं हो सकता, क्योंकि धर्म ने वह सभी शून्य भरे जहाँ विज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र अब आधुनिक समय में कुशलतापूर्वक कार्यरत हैं। इसप्रकार से देखें तो आधुनिक समस्त उपलब्धियाँ विश्व के प्रत्येक धर्मों की ऋणी हैं, क्योंकि धर्मों के द्वारा बनाये गए प्रावधानों के क्रमशः सुधार का नाम ही आधुनिक ज्ञान-विज्ञान है। किसी एक भूगोल में रहने वाली मानव जाति अपने-अपने परिवेश की उत्तरजीविता (Survival) के अनुरूप जीवन के कतिपय अभ्यासों (Practices) को दोहराती है, जो कालांतर में परम्पराएँ, मूल्यों, रूढ़ियाँ, उत्सव, सभ्यताओं में बदलती हैं। एक अदृश्य आस्था धर्म बनकर इन सभी survival facts को जोड़े चलती है। विज्ञान के विकास ने विश्व के प्रत्येक भूगोल को परस्पर जोड़ दिया है। अब किसी राष्ट्र के भीतर इसलिए ही विभिन्न प्रकार के समाज मिलते हैं जो विभिन्न धर्मों को मानने वाले हो सकते हैं। विभिन्न धर्मों मानने सामाजिक-व्यवहार निश्चित ही भिन्न होगा। यहाँ किसी एक धर्म के व्यवहार को श्रेष्ठ अथवा निम्न नहीं कहा जा सकता क्योंकि सभी धर्म अपने-अपने भूगोल और उत्तरजीविता के तथ्यों से निर्मित हुए हैं। इसी के साथ ही आधुनिक राजनीति जब राज्य के भीतर रहने वाले समुदायों के सामाजिक-व्यवहारों के लिए ‘दायित्व व उत्तरदायित्व’ को तय करने की कोशिश करती है तो धर्म और राजनीति के मध्य एक द्वंद प्रारम्भ हो जाता है।

यहाँ यह सवाल भी मौजू है कि आखिर क्यों राज्य, धर्म के पारंपरिक स्कोप में दखल देना चाहता है? दरअसल, राज्य के चार मूलभूत अंग संप्रभुता (Sovereignty), जनता, सरकार और भू-भाग हैं। इन चारों अंगों को केवल ‘राष्ट्रीयता’ ही जोड़कर एक साथ रख सकती है। राष्ट्रीयता वह सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता है जिससे किसी एक निश्चित भू-भाग के व्यक्ति अपना जुड़ाव महसूस करते हैं। लेकिन व्यक्ति की सामाजिक-धार्मिक विभिन्नता अक्सर ‘संघर्ष’ की स्थिति पैदा करती है तथा यह विभिन्नता व्यक्ति के उस मौलिक अधिकारों के संरक्षण में भी आड़े आती है जिसकी बुनियाद पर राज्य व संविधान टिके होते हैं। यहीं राज्य, धर्म के परम्परागत क्षेत्र में प्रवेश करने को बाध्य हो जाता है। ‘आधुनिक विज्ञान व जीवन-शैली’ चूँकि एक आधुनिक राज्य के निश्चित तथ्य है तो राज्य की यह दखलंदाजी तर्कसंगत भी हो जाती है। संवैधानिक युग में ‘मौलिक अधिकार’ सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च मूल्य हैं, जिनका संरक्षण देश का सर्वोच्च न्यायालय स्वयं करता है।

पेंच कहाँ ?
कानून शून्य में नहीं बनते। उनके स्रोतों में मूल्य, अभिसमय, परम्पराएँ, धर्म भी हैं। इसलिए ही भारत का संविधान अपने नागरिकों को ‘धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (Art. 25)’ भी देता है और यह भारत की राजनीति को ‘पंथनिरपेक्षता (Secularism)’ का स्वरुप भी देता है। इसलिए ‘समान नागरिक संहिता’ की स्थिति तबतक नहीं बन सकती जबतक भारत में रहने वाले सभी धार्मिक समुदायों में इसके लिए एक सर्वमान्य स्वीकृति न हो। सर्वमान्य स्वीकृति के लिए लगभग भारत में रहने वाले सभी धार्मिक समुदायों की ‘आधुनिक विज्ञान व जीवन-शैली’ के प्रति बराबर जागरूकता (जो कि उचित शिक्षा से सम्भव है ) और उनका एक सामान्य मानकीय जीवन स्तर (यह, आर्थिक विकास से सम्भव है) आवश्यक है। जिस देश ने शताब्दियों की टूट-फुट और गुलामी देखी हो, वहाँ इस प्रकार की प्रगति के लिए कुछ वक्त की दरकार होती है, इसलिए हमारे देश के संविधाननिर्माताओं ने ‘समान नागरिक संहिता’ को 1950 से ही लागू न कर उसे भविष्य के लिए ‘नीति-निदेशक तत्वों’ में डालकर छोड़ दिया। 

क्या हमारे देश में भी "समान नागरिक संहिता" लागू होनी चाहिए?
ऊपर के विश्लेषण के पश्चात् अब इस प्रश्न का एक वाक्य में उत्तर होगा कि यदि भारत में रहने वाले सभी धार्मिक समुदायों की ‘आधुनिक विज्ञान व जीवन-शैली’ के प्रति बराबर जागरूकता और उनका एक सामान्य मानकीय जीवन स्तर वर्तमान समय तक हो चुका हो तो यकीनन समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। सरकारी आंकड़ें ही बताते हैं कि ऐसी स्थिति से काफी दूर हैं, अभी हम। इस स्थिति के पहले यदि समान नागरिक संहिता को मुद्दा बनाया जाता है तो यह केवल ‘अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वोटबैंक’ के लोभ में राजनीतिक दलों द्वारा फैलाया गया कोलाहल ही है।  


Monday, July 16, 2018

‘दौर-ए-दिखाऊ देशभक्ति’, देशप्रेमी या भ्रष्ट


साभार: दिल्ली की सेल्फी 
आजकल कुछ को देशद्रोही बताने के लिए स्वतः ही स्वयं को परम देशभक्त घोषित करने की परम्परा चली है। लोग उस छोटे भाई की तरह तात्कालिक लोभ में मझले भाई के विरोध पर उतर आये हैं जिसने अपने बड़े भाई के किसी गलत फैसले का महज विरोध कर दिया है। ‘देशभक्ति’ को ‘राष्ट्रवादी’ होना बताया जा रहा और इस साबुन से सारे कुकृत्य धुलकर लंबा गाढ़ा चन्दन लगाकर लोग भारत माता का जयकारा लगाकर सीना ताने ‘भारतीयता’ को ताक पर रख रहे। नारों, जुमलों, पोस्टरों, प्रोफाइल पिक्स और डीपी आदि की ‘दिखाऊ देशभक्ति’ को छोड़ दें तो किसकी रोजमर्रा की ज़िंदगी में ‘देश’ होता है? दिनभर के अपने फैसलों में कब ‘देश’ कसौटी बनता है कि कौन सोचता है कि मेरे किसी कदम से ‘देश’ को क्या नुकसान होगा या फायदा होगा! भ्रष्ट व्यक्तियों का तंत्र भ्रष्ट होता है। राज्य, कर वसूलती है और अपने नागरिकों की जरूरतों का पालन करती है। लेकिन नौकरीपेशा टैक्स बचाने के लिए सीए और वकील को जुगाड़ लगाने को कहता है। उद्योगपति, राजनीतिक दलों को चंदा दे उनसे अपने लिए छिपे-छिपे सहूलियतें बटोरते हैं और टैक्स से छूट जाते हैं, सो अलग। कितने तो कर देते ही नहीं। 

जब एक अध्यापक अपनी कक्षा में पढ़ाता नहीं तो यह एक प्रकार का भ्रष्टाचार है जो कत्तई एक देशभक्त नहीं कर सकता क्योंकि देश से प्रेम करने वाला अध्यापक देश की अगली पीढ़ी को अपाहिज नहीं बना सकता। देश, जिन छात्रों को आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण मानव-संसाधन के रूप में तैयार होने की बाट जोहता है, उनका अपनी कक्षा में अनुपस्थित रहना देशभक्ति नहीं है। एक वकील, दूसरे पक्ष के वकील से मिलकर मामले को लम्बा खींचकर हर लगने वाली तारीख पर उस नागरिक से पैसा नहीं ऐठ सकता और अगर ऐठता है तो इस भ्रष्टता के साथ वह ‘देशभक्त’ नहीं हो सकता, क्योंकि जिस संविधान को पढ़कर वह आया है कचहरी में उसकी मूल भावना ‘समाज के आखिरी आदमी’ तक को छूती है। एक अधिकारी जरूर सबसे पहले उस दीन-हीन की बात को तवज्जो देगा जो उसके द्वार तक महीनों की कशमकश के बाद पहुँचा है, उनकी नहीं जिन्होंने उसकी शान में नमकीन काजू के प्लेट रखे हैं और अधिकारी के एक इशारे पर  करारे नोटों को न्यौछावर करने को तैयार बैठा है। काजू और करारे नोटों को सुनते हुए वह ‘देशभक्त’ नहीं बल्कि ‘दीमक’ बनकर देश को चाटने की फ़िराक में होता है। बंद कमरे में अपने वकील के साथ किसी धनपशु की टेर सुनते जज को भी हम देशभक्त नहीं कह सकते जो कल के अपने फैसले में किसी गरीब को उसकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर देगा।   

देशभक्ति वो भी नहीं ही जब कोई अपनी बालिग बिटिया को महज इसलिए मारकर पेड़ पर लटका देता है क्योंकि उसने अपनी जाति, धर्म से बाहर शादी कर ली थी क्योंकि यह उस बच्ची के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। एक्सपायरी और महँगी दवा बेचते मेडिकल स्टोर, महँगा ईलाज बेचते डॉक्टर, अपना जमीर अपना कलम बेचते पत्रकार, टीवी एंकर, संपादक, चुप रहते या अन्याय के पक्ष में बोलते प्रोफ़ेसर, टैक्स चोरी करते, नकली सामान बेचते, मिलावट और जमाखोरी करते व्यवसायी, सब्जियाँ रंगते सब्जीवाले, चोरी करते दूकानदार, दलाली मांगते दफ्तरों के बाबू कोई भी देशभक्त नहीं हो सकता। भ्रष्ट कोई भी देशभक्त नहीं हो सकता, हाँ आजकल वह देशभक्ति पोत सकता है शकल पर और उसे ओढ़-बिछा सकता है। यह समझना होगा कि जैसे ही किसी क्षण विशेष में हमने किसी न्यायगत व्यवस्था से समझौता किया, कहीं न कहीं, किसी न किसी को देश में नुकसान पहुँचेगा और देश लोगों से ही बनता है। इंसान को, जानवर को, प्रकृति के किसी भी हिस्से को नुकसान पहुँचाते हुए आप ईश्वर की आरती नहीं कर सकते, यह निरा दोहरापन है, भ्रष्टता है। 

देशभक्ति के लिए पहले देश को समझना होगा। देश की प्रत्येक विभिन्नता और उसकी विशेषताओं को महसूस करना होगा। भारत की ‘अनेकता में एकता’ को समझे बिना हम देशप्रेमी नहीं हो सकते। मन के अनगिन विभाजन पाले हुए हम देशप्रेमी नहीं हो सकते। सारी रूढ़ियों को ढोते हुए हम देशप्रेमी नहीं हो सकते। अपनी परंपराओं पर उठने वाले वाजिब प्रश्न दबाते हुए हम देशप्रेमी नहीं हो सकते, उन्हें सुलझाते हुए और आधुनिकता से उचित का चयन करते हुए ही हम हो सकते हैं, देशप्रेमी। किसी एक दल, किसी एक महंथ, किसी एक मौलवी, किसी एक विचारधारा, किसी एक व्यक्ति का अंधसमर्थक होते हुए हम अपने देश की नींव में मट्ठा डाल रहे होते हैं और हमें पता भी नहीं होता। देश का व्यक्तित्व किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता, वह नागरिकों के समूचे व्यक्तित्व का योग होता है। इसलिए देशप्रेमी होने के लिए हमें देश की उस ‘समूचे व्यक्तित्व’ को समझना होगा और उसके अनुरूप ही अपनी मानसिकता दुरुस्त रखनी होगी।  

Wednesday, June 27, 2018

राजनीतिक दल से उम्मीदों की प्रश्नावली



देर-सबेर सभी राजनीतिक दल यह एहसास करा ही देते हैं कि उनका मकसद सत्ता भोगना ही है। एक समर्पित कार्यकर्त्ता को फिर दुसरे दलों के पुराने करतूतों का कच्चा-चिट्ठा रखने के अलावा और कुछ सूझता नहीं है। कई बार कार्यकर्ता व्यक्तिगत दुश्वारियाँ और दुश्मनी पाल लेते हैं और अक्सर चुनाव के बाद जब उनके राजनीतिक आका आपस में गलबहियाँ कर लेते हैं तो उस वक्त दिल में कहीं नश्तर सा लगता है और दुनिया के बड़े ज़ालिम होने का एहसास होता है। राजनीतिक दल अपनी परिभाषा में ही सत्ता के लिए संघर्षशील होते हैं, तो सत्ता के लिए संघर्ष करने में कोई बुराई नहीं है। किन्तु राजनीतिक दल, महज सत्ताप्राप्ति के ही निमित्त नहीं होते हैं। हाँ, यह अवश्य ही है कि सत्ताप्राप्ति ही उनका एकमात्र ध्येय बनकर रह गया है। 

संविधान सभा की मंशा यह नहीं थी कि नागरिक, किसी दल विशेष के होकर रह जाएँ। देश के भीतर अनगिनत मुद्दे होते हैं और वे मुद्दे अपनी बदलती प्राथमिकता और प्रासंगिकता में परिदृश्य पर उभरते हैं। किसी मुद्दे के सार्थक निस्तारण हेतु सम्यक नीति और कार्ययोजना की आवश्यकता होती है जिससे अधिकतम नागरिकों का वृहत्तम हित सधे। एक राजनीतिक दल में भाँति-भाँति के लोग मिलकर देश के सभी आवश्यक मुद्दे पर अपने दल के लिए एक एकीकृत नीति और कार्ययोजना गढ़ते हैं। नीतियों में अन्तर्निहित विरोधाभास न हो इसलिए राजनीतिक दल अपना एक वृहद् उद्देश्ययोजना तैयार करते हैं। इससे ही उस राजनीतिक दल की प्रकृति और चरित्र का निर्धारण होता है। किसी भी मुद्दे का कोई एक अंतिम निस्तारणनीति और कार्ययोजना नहीं हो सकता। इसलिए ही किसी देश में एक से अधिक राजनीतिक दलों की गुंजायश बनाई जाती है। भारत में विविधता अन्याय स्तरों पर है तो यहाँ बहुदलीय दल अनिवार्य ही हैं जिससे सभी विविधताओं को स्वर मिले और वे एक सिम्फनी में राष्ट्र के लिए कार्य कर सकें। एक नागरिक, किसी दल विशेष की वृहद् कार्ययोजना, उसकी नेतृत्व शक्ति एवं सांगठनिक क्षमता से प्रभावित होकर उसकी प्राथमिक सदस्यता लेकर अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकता है। यह उसका अधिकार है। लेकिन इससे उसके व्यक्तित्व पर कोई लेबल लगाना ठीक नहीं है। वह चाहे जब उस दल से अलग हो सकता है। वह सामान्य मतदाता बने रह सकता है अथवा वह किसी दूसरे दल की सदस्यता ले सकता है। 

प्रश्नों की एक चेकलिस्ट बनाई है मैंने, जिससे हम यह जान सकते हैं कि एक मतदाता और एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में हम तथा कोई राजनीतिक दल कितने खरे उतरते हैं। यह चेकलिस्ट अनंतिम है, पर उपयोगी है। इस बेहद आवश्यक कसौटी से हर नागरिक को जरूर गुजरना चाहिए: 


एक मतदाता के रूप में 

१. क्या अमुक राजनीतिक दल ने यदि राष्ट्रीय स्तर का है तो देश के लिए और यदि प्रांतीय स्तर पर है तो उस राज्य के लिए वृहद् उद्देश्ययोजना निर्मित की है? क्या आपने उसे कभी पढ़ा है?
२. क्या उसमें देश/प्रांत स्तर की सभी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं?
३. समस्याओं के वर्गीकरण में क्या सभी देश/प्रांत के सभी विभिन्नताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व है?
४. समस्याओं के निस्तारण नीति उपलब्ध है?
५. क्या आपने निस्तारण नीतियों की परख के लिए किसी चर्चा में परिभाग किया है?
६. निस्तारण नीतियों के कार्ययोजनाओं में क्या देश/प्रांत के सभी विभिन्नताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व है?
७. क्या राजनीतिक दल के सदस्य चुनाव के अलग समयों में आपसे मिलते हैं?
८. क्या आपने राजनीतिक दल के सदस्यों से अपनी समस्याएँ साझा की हैं? 
९. क्या आपको समस्याओं के हल की कोई योजना राजनीतिक दल के द्वारा सुझाई गयी या आश्वासन ही मिला?
 १०. क्या अमूमन यही होता है कि आपके क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे राजनीतिक दल निर्धारित करते हैं? अथवा उस क्षेत्र विशेष के मतदाता वहाँ के मुद्दे निर्धारित करते हैं और राजनीतिक दल उसे अपना मुद्दा बनाकर संघर्ष करते हैं?
११. राजनीतिक दल के सदस्यों, नेताओं का मतदाताओं से चुनाव से इतर व्यवहार कैसा है? क्या वे सुलभ हैं?
१२. किसी राजनीतिक-सामाजिक हल की प्रक्रिया में अमुक राजनीतिक दल की कार्ययोजना समावेशी है अथवा एकांतिक है ? एकांतिक समाधान सामाजिक विखंडन को न्यौता देते हैं।  
१३. राजनीतिक दल के सदस्य स्वयं लाभ को वरीयता देते हैं या क्षेत्रहित को वरीयता देते हैं?
१४. सांविधानिक तौर-तरीकों में उस दल-विशेष की कितनी आस्था है?
१५. सार्वजनिक संपत्ति के साथ उस राजनीतिक दलों के सदस्यों का कैसा बर्ताव है?
१६. क्या आप जांचते हैं कि क्षेत्र के किसी नेता और राजनीतिक दलों के सदस्यों की आपराधिक पृष्ठभूमि कैसी है?
१७. क्या आप किसी राजनीतिक दल के वादों की सम्यक समीक्षा करते हैं?
१८. क्या आपके पास दलों का मैनिफेस्टो होता है?
१९. मैनीफेस्टो की गुणवत्ता कैसी है?क्या उसमें आपके क्षेत्र, प्रांत, राष्ट्र की समस्याओं का उचित प्रतिनिधित्व एवं सम्यक निस्तारण रीति स्पष्ट है?
२०. प्रति चुनाव मैनीफेस्टो में क्या कोई गुणात्मक परिवर्तन है?

एक दल-विशेष के सदस्य के रूप में 

१. क्या आपका राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित रीति से पंजीकृत है?
२. क्या आपके पास उस राजनीतिक दल की सदस्यता का प्रामाणिक पत्र है?
३. क्या आपका राजनीतिक दल राष्ट्र की मूलभूत अवधारणा में यकीन रखता है?
४. क्या आपका राजनीतिक दल संविधान में और सांविधानिक प्रक्रियाओं में आस्था रखता है?
५. क्या आपका राजनीतिक दल लोकतंत्र में यकीन रखता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रायोगिक एवं दार्शनिक दोनों स्तरों पर मान्यता देता है?
६. क्या राजनीतिक दल के भीतर लोकतंत्र है?
७. क्या आपका राजनीतिक दल आपको स्पष्ट करता है कि वह क्यों सत्ता प्राप्त करना चाहता है?
८. क्या आपका राजनीतिक दल राष्ट्र/प्रांत/क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के निर्धारण में आपकी राय को महत्ता देता है?
९. क्या आपके राजनीतिक दल में जनता के मुद्दों को पहचानने एवं उसके हल की कार्ययोजना को लेकर कोई आयोजना है और क्या आप इससे परिचित हैं?
१०. आपके राजनीतिक दल में विभिन्न मुद्दों को लेकर आवश्यक शोध की व्यवस्था है?
११. क्या आपका राजनीतिक दल समावेशी है?
१२. क्या आपका राजनीतिक दल आपके असहमतियों को स्थान देता है और तदनुरूप अपनी कार्ययोजनाओं में तब्दीलियाँ करता है?
१३. क्या आपका राजनीतिक दल अनैतिक कृत्यों की संस्तुति सत्ता प्राप्ति के लिए करता है?
१४. क्या आपके दल के सदस्यों को लेकर लोकतांत्रिक समानता बरती जाती है?
१५. क्या आपके राजनीतिक दल के निर्णय सामान्य सभा लेती है अथवा यह किसी एक व्यक्ति में निहित है?
१६. क्या आपका राजनीतिक चंदों और बहीखातों को लेकर पारदर्शी है? क्या सभी जानकारियाँ पब्लिक डोमेन में हैं?
१७. क्या आपका राजनीतिक दल राजनीतिक शुचिता के लिए लोकतांत्रिक रीति से अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ बिना किसी भेदभाव के करता है?
१८. क्या आपके राजनीतिक दल में महत्वपूर्ण पदों और निर्णयों के लिए किसी खास वर्ग, समूह, जाति, समुदाय अथवा परिवार की ओर देखना होता है?
१९. क्या आपका राजनीतिक दल अपनी नीतियों और कार्ययोजनाओं को समकालीन चुनौतियों के अनुरूप अद्यतन करता है?
२०. क्या आपके राजनीतिक दल के सभी सदस्य अपने कृत्यों के लिए जनता और आपके लिए जवाबदेह हैं? 


यह कसौटी अपने विषयों में अंतिम नहीं है। किसी राष्ट्र की प्रगति का दारोमदार उस राष्ट्र की राजनीति पर होता है। राजनीति बड़े ही महत्त्व का विषय है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की होती है। नागरिक जितना ही मौन और उदासीन होता है, उसके राष्ट्र की राजनीति उतनी ही असह्यनीय, अश्लील और गैर-जिम्मेदार होती है। एक बार जरा मतदाता अथवा किसी राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में इन कसौटियों के समक्ष स्वयं को और अपने राजनीतिक दल को रखिये, लगभग तुरत ही स्पष्ट हो जायेगा कि हमारा प्यारा देश क्यों प्रगति के उस सोपान पर चढ़ने की बजाय राजनीतिक अवनति को प्राप्त हो रहा। जवाब इसका भी मिलेगा कि आखिर क्यों राजनीतिक दल सत्ता में आते ही जनता के नहीं उद्योगपतियों के हो जाते हैं और यह भी कि क्यों राजनीतिक दल नागरिकों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि वोटबैंक के रूप में देखते हैं। मुझे उम्मीद है कि इस प्रश्नावली से एक उत्तर और मिलेगा कि आखिर क्यों एक राजनीतिक दल सत्तासुख भोगने के बाद बिना कोई ठोस जनहित के काम किये बिना ही अगले चुनाव के सीटों का अश्लील लक्ष्य रखता है और उसे क्यों मतदाताओं से अधिक अपने चुनाव-मैनेजमेंट टीम पर यकीन होता है ?देखिये जरा, कहीं कोई हमें बस मैनेज तो नहीं कर रहा?   

Thursday, May 31, 2018

‘आई हेट पॉलिटिक्स': एक पिछड़ा और गैर-जिम्मेदार जुमला





राजनीति' एक अद्भुत शब्द है। यह विषय भी है और व्यवहार भी, प्रक्रिया भी है और कला भी। इतनी घुली-मिली है कि जो इसमें रूचि नहीं लेता यह उसमें भी रूचि लेती है। राजनीति का केवल एक 'सार्वजानिक' पक्ष ही हमें दिखलाई पड़ता है और इस पक्ष के जो खिलाड़ी हैं उनके चरित्र से ही समूचे राजनीति का हम चरित्र-चित्रण कर देते हैं। राजनीति का यह 'सार्वजानिक पक्ष' भी हमें इतना प्रभावी रूप से दृष्टिगोचर इसलिए होता है क्योंकि हमनें 'लोकतांत्रिक' शासन प्रणाली अपनाई है और इसकी कई संक्रियाओं में हमें स्वयं को परिभाग करने का अवसर मिलता है। किन्तु 'राजनीति' को केवल उसके इस सार्वजानिक पक्ष से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उससे पहले यह इस सार्वजानिक पक्ष का दर्शन तैयार करती है, इस प्रश्न का उत्तर तैयार करती है कि आखिर हमें कोई व्यवस्था क्यों चाहिए और अंततः यह व्यवस्था हम कैसे आत्मसात करने जा रहे हैं! यह सभी महत्वपूर्ण बिंदु हैं।

विषय के रूप में 'राजनीति' पल-पल बदलते व्यक्ति के बहुमुखी विकास की चिंता करती है। व्यवहार के रूप में 'राजनीति' उन प्रक्रियाओं की तमीज देती है, जिनसे 'अधिकतम का वृहत्तम हित' सधे। कला के रूप में 'राजनीति' विरोधाभासी हितों में संतुलन की प्रेरणा देती है। चूँकि लोकतंत्र सभी को राजनीति में परिभाग करने की स्वतंत्रता देती है तो 'राजनीतिक अध्ययन' से अधिक 'राजनीतिक व्यवहार' की महत्ता दिखने लगती है। गाड़ी चलाने वाला हर ड्राइवर न ट्रैफिक नियम जानता है और न ही वह निश्चितरूप से ट्रैफिक की गलतियाँ ही करता है। प्राकृतिक विज्ञानों के अलावा ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में 'अनुभवजन्य बोध' भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने कि सैद्धांतिक बोध क्योंकि यहाँ ऑब्जेक्ट डायनामिक ह्यूमन बींग है। इसलिए अच्छा ड्राइवर होना और एक अच्छा मोटर इंजीनियर होने में फर्क है और ‘पोलिटिकल लिटरेसी’ समय की मांग है। 

राजनीति के लोकतांत्रिक हस्तक्षेप ने मिस्त्री लोगों को भी पर्याप्त अवसर दिया है और वे हर बार निराश ही नहीं कर रहे हैं। समझना होगा ये हम हैं कि अपने लोकतंत्र के लिए 'इंजीनियर' के ऊपर 'मिस्त्री' प्रेफर कर रहे हैं। अरस्तु ने राजनीति को 'विषयों का विषय' कहा है और प्लेटो ने राजनीति में सबके आवाजाही की मनाही की है। प्लेटो राजा भी दार्शनिक चाहते हैं। इसलिए ही अरस्तु ने 'लोकतंत्र' को भीड़तंत्र कहा है क्योंकि इसमें योग्यता से अधिक संख्या का महत्त्व हो जाता है।

लोकतंत्र फिर क्यों? क्योंकि औद्योगीकरण के पश्चात् ज्यों-ज्यों पूंजी की हवस बढ़ी, उपनिवेशवाद आया जिसने व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना शुरू किया। उपनिवेश ज्यों-ज्यों स्वतंत्र होते गए उन्होंने सबसे पहले अपने नागरिकों वह देना चाहा, जिससे वह वंचित थे, वह था व्यक्ति का व्यक्तित्व-स्वतंत्रता। केवल लोकतंत्र में ही समानता संभव है और उपनिवेशवाद ने समूचे उपनिवेश के प्रत्येक व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व छीना था इसलिए आधुनिक समय में 'लोकतंत्र' एक 'व्यवस्था' से अधिक एक उदात्त 'मूल्य' बनकर उभरा।

भारत का एक औपनिवेशिक अतीत है और इतिहास कहता है कि भारत की जनसँख्या में भांति-भांति के लोगों का सुंदर सम्मिश्रण है। आजाद भारत लोकतंत्र के अलावे कोई और व्यवस्था अपना ही नहीं सकता था क्योंकि यहाँ के लोगों में विभिन्नता है और केवल लोकतंत्र उनमें 'समानता' और 'स्वतंत्रता' का विश्वास उपजा सकता था। यह विश्वास उस सद्यजात राष्ट्र को आवश्यक भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता प्रदान करता है जिसने तुरंत ही विभाजन का दंश झेला हो और जिसकी 500 से अधिक रियासतों का एकीकरण किया जाना हो। भारत के लोकतंत्र में सभी आवाजों के लिए जगह होनी चाहिए, सो सभी चुनाव लड़ सकते हैं। निर्दलीय भी। 17% साक्षरता वाले राष्ट्र को आधुनिक राजनीतिक-समाजीकरण की प्रक्रिया से साक्षात्कार कराना जरूरी थी पर यह राज्य की तरफ से न हो नहीं तो निष्पक्ष नहीं होगा और इसके बिना व्यवस्था के ढहने का भी डर था। फिर जनता के विभिन्न मांगों को पूरा करने का कोई एक तरीका ही थोपना आगे चलकर खतरनाक हो सकता था। इसलिए राजनीतिक दलों की प्रणाली लाई गयी। भारत की महान विभिन्नता देखते हुए द्विदलीय व्यवस्था को नहीं स्वीकारा गया। बहुदलीय व्यवस्था में चेक एंड बैलेंस प्रणाली भी चल सकती है। बहुमत दल का नेता सरकार बनाये अथवा मिनिमम कॉमन प्रोग्राम के हिसाब से गठबंधन की सरकार बने और शेष सांसद उनपर पैनी नज़र रखें।

विपक्ष उतना ही जरूरी है जितना की सत्ता पक्ष। दलविहीन व्यवस्था अथवा सर्वदलीय व्यवस्था में विपक्ष अनुपस्थित होगा अथवा अंतर्निहित होगा तो कमजोर होगा, जो कि एक खतरनाक स्थिति होगी। पॉँच साल तक किसी भी तरह का सार्वजानिक नियंत्रण ही नहीं होगा। लोकतंत्र की चिंता येनकेनप्रकारेण केवल सरकार बनवा देना नहीं है, बल्कि राजनीतिक मूल्यों का संवहन करते हुए राजनीतिक विकास की गुंजायश टटोलना है। एक नया चुनाव हमेशा एक सस्ता विकल्प है बनिस्बत एक भ्रष्ट स्थिर सरकार के, जिनके घोटाले ही न पकडे जा सकें और जो पकड़ें जा सकें तो कभी उनका निपटारा ही न हो सके। गठबंधन की सरकार भारत की विभिन्नता देखते हुए स्वाभाविक है और उनकी खींचातान भी जायज है क्योंकि विरोधाभासी मांगों का संतुलन यों भी कठिन है। राजनीतिक व्यवस्था अपने संविधान के अनुरूप इतनी खूबसूरत है कि बहुमत के साथ वही दल सत्ता में आ सकता है जिसके प्रतिनिधियों में विभिन्नता से प्रतिनिधित्व बंटा हो। ऐसा नहीं होता तो गठबंधन से यह शर्त पूरी होती है।

ध्यान रहे, हमारे राष्ट्र के दो अमूर्त आधार हैं: १. एकता और २. विभिन्नता। इसलिए ही यहाँ राष्ट्रपति है तो प्रधानमंत्री भी है, मुख्यमंत्री भी है और राज्यपाल भी। किसी भी दूसरे विकसित राष्ट्र से अपने राष्ट्र की सीधी तूलना नहीं हो सकती। कांग्रेस जो कभी अपराजेय थी और भाजपा जो अभी अपराजेय लगती है, राज्यसभा में उन्हें अवश्य नियंत्रण में रहना पड़ता है। हमारा संविधान बेहद शानदार है। पर परेशानी यही हैं। हम, अपना संविधान जानते कितना हैं? 

सत्ता, ऐसी शिक्षा बनाती है जिससे पीढियाँ 'राजनीतिक अध्ययन' का महत्त्व विस्मृत कर जाती हैं। इससे राज करना आसान हो जाता है क्योंकि राजनीतिक रूप से जागरूक जनता तीखे सवाल करेगी और मीडिया का निष्पक्ष न रहना उसे तुरंत दिखेगा। सत्ता, राजनीतिक-अध्ययन से मिलने वाले रोजगार पर चोट करेगी जिससे राजनीति पढ़ने वाले साधनविहीन आदर्शवादी लगेंगे। ध्यान से देखिये, सरकार चाहेगी कि सारे महत्वपूर्ण पद जहाँ इलेक्शन नहीं सिलेक्शन की जरुरत होती है, उन्हें 'कमिटेड ब्यूरोक्रेसी' से भरा जाय, जिससे शासन आसान हो। यह माहौल बनेगा जब जनता 'कोउ नृप होय, हमें का हानि' की मानसिकता में आये और हम जनता-जनार्दन अपने-अपने घरों की जो नयी पीढ़ी है उसका सबसे बेहतर टैलेंट-पूल नौकर (ब्यूरोक्रेसी अथवा डॉक्टर, इंजीनियर ) बनाने में करते हैं और लोकतंत्र में जहाँ बॉस जनता होती है उसे अपने घर का हारा-थका, लापरवाह सेक्शन मायूसी से सौंपते हैं कि कुछ नहीं तो सरकारी ठेकेदार तो बनी जायेगा । वोट नहीं देने जाते, आसानी से वोटबैंक बन जाते हैं।

राज्य और नागरिक समाज साथ-साथ ही स्वास्थ्य के साथ पनपते हैं। इनमें से एक की अक्रियता दूसरे को रुग्ण बनाती है। नागरिक समाज, राज्य के सरकार नामक तत्व पर नियंत्रण रखती है। किन्तु भ्रष्ट सरकारें और दिशाहीन अक्रिय नागरिक-समाज 'राजनीतिक-शिक्षा (पोलिटिकल लिटरेसी) के प्रचार-प्रसार में उसी तरह चुप्पी साध लेती हैं जैसे भ्रष्ट दुकानदार दवा की एक्सपायरी डेट छुपाता है। हमें अपने-अपने स्तर पर अध्ययन-मनन और व्यवहार की पद्धति से राजनीतिक जागरूकता बढ़ानी होगी।

संविधान का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद बाबा आंबेडकर ने कहा था कि-वह नागरिक ही होते हैं, जो किसी देश के संविधान को सफल बनाते हैं। देखिये न, अमेरिका का संविधान कितना तो छोटा है और संसद की जननी ब्रिटेन में लिखित संविधान ही नहीं है। हमारे पास दुनिया के सबसे बड़े संविधानों में से एक संविधान है बस हम राजनीति में अपने-अपने रीति से योग ही नहीं कर रहे। जो चाहते हैं कि चुनाव के बाद आपको सचमुच फायदा हो तो आप प्रधानमंत्री नहीं, अपने-अपने क्षेत्र से सुयोग्य सांसद चुनिए. और हाँ, ये न कहिए कि विकल्‍प नहीं है. आपके क्षेत्र में जरूर एक संकल्पवान, ईमानदार प्रत्याशी खड़ा मिलेगा, पर शायद उसके साथ कोई खड़ा न मिले. आप अपना एक बहुमूल्य मत उसे दें, कम से कम बाकियों की तरह अपना मत व्यर्थ न होने दें. वह हारेगा भी तो संघर्ष करने का माद्दा मन में भरेगा और अगली बार फिर मैदान में होगा.

अपने-अपने क्षेत्र में आप विकल्‍प चुनिए, भारतीय राजनीति, राष्ट्रीय परिदृश्य में सहसा नए विकल्‍प उपस्थित कर देगी. यह नया विकल्‍प अपने साथ किसी उद्योगपति का बकाया नहीं लेकर आएगा, जात-पात, धरम और सेना का नाम लेकर नहीं आएगा तो खुलकर काम करेगा. आप अचानक राजनीति में परिवर्तन भर देंगे और आप तब केवल नागरिक कहलाने की सच्ची परिभाषा ही नहीं पूरी करेंगे बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान-निर्माताओं के सपनों का भारत बनाने की दिशा में काम करने वाले सच्चे देशभक्त बनेंगे. तब राजनीति आपके लिए कोई खेल या मनोरंजन अथवा गॉसिप की चीज नहीं होगी, बल्कि इसमें आप सीधा योग करेंगे. क्योंकि, फिर कहता हूँ कि भाजपा, कांग्रेस में कोई अंतर है नहीं. एक के मुकदमे की सुनवाई की अगली तारीख दूसरा ले लेता है.

मैंने जो कहा है वह आपको यूटोपियन लग सकता है, इसलिए नहीं कि मै गलत कह रहा, बल्कि इसलिए कि पहले तो आप मत देने जाएंगे ही नहीं और जो जाएंगे भी तो अपना मत किसी परिचित, जात वाले, धरम वाले को देकर आ जाएंगे. फिर जो आपको अपना वोटबैंक समझते हैं, उन्हें ही वोट देकर आप सोचेंगे कि मेरा वोट व्यर्थ नहीं गया, जबकि आपका मत केवल व्यर्थ ही नहीं होता इससे, बल्कि अगले पांच साल का भविष्य दाँव पर लग जाता है और अगली पीढ़ी भी आपकी तरह 'आई हेट पॉलिटिक्स' का पिछड़ा, गैर-जिम्मेदार जुमला कहने लग जाती है.



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