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Thursday, December 13, 2018

भारत-पाकिस्तान का करतारपुर कनेक्शन



लोकतंत्र की विडंबना यह है कि सत्ता की निरंतरता की चाह दलों को अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए अंततः सबकुछ दाँव पर लगाने को उद्यत कर देती है और दल सत्ता के लिए ऐसा करने भी लग जाते हैं। दल, सत्ता के अपने पाँच सालों में लगभग हमेशा ही कुछ यों अपनी गतिविधियाँ रखते हैं कि उन्हें चुनाव में इसका फायदा अवश्य मिले। भारत-पाकिस्तान संबंध भी सीमा के दोनों ओर की सरकारों की इस मानसिकता से लगातार प्रभावित होता रहा है। पंजाब, जो कि सीमा के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देशों का महत्वपूर्ण राज्य है, संबंधों की इस अनिश्चितता से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला नागरिक-समुदाय है। खालिस्तान-संघर्ष का भयावह अध्याय इसमें सुरक्षा व आतंकवाद के महत्वपूर्ण तत्व भी जोड़ता है, जिससे सरकारें और भी एहतियात बरतती हैं और संबंधों में एकप्रकार की ठंडी जड़ता पसरी रहती है। इन ठिठके रिश्तों में सहसा एक हलचल हुई जब भारतीय पंजाब के राज्य सरकार के एक मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू अपने क्रिकेटर मित्र इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने पाकिस्तान पहुँचे और मंच पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले लग गए। यह तस्वीर और विडियो सीमा के दोनों ओर सनसनीखेज रही और दलों ने भी जमकर इसपर छींटाकशी की। गौरतलब है कि भारतीय पंजाब में अभी कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार है और केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार आरूढ़ है। भाजपा और कांग्रेस ने बयानों की रस्साकशी शुरू कर दी और नवजोत सिंह सिद्धू बेतहाशा ट्रोल किये जाने लगे। सिद्धू, चूँकि भाजपा के स्टार प्रचारक रह चुके हैं और हाल ही में उन्होंने कांग्रेस से खुद को जोड़ा है तो यों भी उनपर ट्रोलर्स मेहरबान थे। लेकिन जब सिद्धू ने यह कहा कि कमर बाजवा ने उनसे यह कहा कि आख़िरकार पाकिस्तानी सरकार करतारपुर गलियारा खोलने पर विचार कर रही है तो उनसे रहा नहीं गया और झूमकर उन्होंने बाजवा को गले लगा लिया तो इस बात ने सियासत को एक अलग ही मोड़ दे दिया। पंजाब के जो भाजपा नेता अभी सिद्धू की देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर नुकीली आलोचना कर रहे थे, उन्हें भी अपना स्वर संयत करना पड़ा क्योंकि मामला अब सिख धर्म से जुडी भावनाओं से जुड़ गया था। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत केंद्र की मोदी सरकार भी सकते में थी क्योंकि इस आशय का कोई संचार फ़िलहाल पाकिस्तानी सरकार ने भारत की सरकार से नहीं किया था। 

विभाजन के समय कई बेहद महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल पाकिस्तान की सीमा में आ गए थे जिसमें गुरद्वारा जनम अस्थान ननकाना साहिब, पंचमुखी हनुमान मंदिर कराची, कटसराज मंदिर पंजाब, क्राइस्ट चर्च रावलपिंडी, सेंट कैथेडरल कराची, गुरद्वारा डेरा साहिब लाहौर, हिंगराज मंदिर बलूचिस्तान, सेक्रेड हार्ट कैथेडरल लाहौर, हसन अब्दाल स्थित गुरद्वारा पंजा साहिब और गुरद्वारा करतारपुर साहिब प्रमुख हैं। यों तो भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों में इतने हिलोर रहे हैं कि दोनों देशों के नागरिकों के लिए अपने-अपने धार्मिक स्थलों पर पहुँचना एक बेहद कठिन बात रही है लेकिन सितम्बर 14, 1974 को दोनों देशों ने ‘प्रोटोकॉल ऑन विजिट्स टू रिलीजियस श्राइन्स’ पर हस्ताक्षर किये जिसमें एक निश्चित वीजा व समय के लिए चिन्हित धार्मिक स्थलों पर जाया जा सकता है। हालाँकि, संबंधों के बनते-बिगड़ते आयामों के बीच इस सुविधा में भी नानुकर होती रही, पर यह भी सच है कि शांतिकाल में प्रतिवर्ष दोनों ही ओर से लाखों श्रद्धालु आवागमन करते हैं। गुरद्वारा करतार साहिब को पहला गुरद्वारा होने का गौरव प्राप्त है जहाँ गुरु नानकदेव ने अपनी लगभग 25 बरस की यात्रा (जिसमें उन्होंने श्रीलंका, तिब्बत, ईरान, बंगाल तक की खाक छानी) के बाद जीवन के आख़िरी 18 बरस एक किसान की तरह बिताया था। कहते हैं कि अपने समकालीन कबीर की तरह ही इनके प्रयाण पर भी हिन्दुओं और मुस्लिमों में विवाद हो गया था और कबीर की तरह ही गुरु नानक के पार्थिव शरीर के स्थान पर कुछ फूल मिले जिसे लेकर समाधि भी बनी और कब्र भी। गुरु नानकदेव ने कबीर की ही तरह सभी धर्मांधों की कटु आलोचना की और जीवनपर्यंत यह संदेश देते रहे कि सभी धर्म अपने शुद्धतम रूप में एक ही सच कहते हैं। यह करतारपुर ही था, जहाँ गुरु ने सभी भेदभावों को मिटाकर लंगर की प्रथा कायम की जो आज सिख धर्म की बेहद महत्वपूर्ण विशिष्टता है। इसलिए ही, करतारपुर साहिब, सिख धर्म के प्रत्येक अनुयायी के लिए एक बेहद धार्मिक स्थल है जहाँ जाने की हसरत सभी श्रद्धालुओं को होती है। भारतीय श्रद्धालु अपनी यह हसरत उन दूरबीनों  से देखकर भी पूरी करते हैं जो जिला गुरदासपुर में स्थित डेरा बाबा नानक गुरद्वारे पर दर्शन हेतु लगाई गयी है। अटल बिहारी वाजपेयी अपनी लाहौर बस यात्रा में पहली बार करतारपुर साहिब गलियारे की चर्चा करते हैं और लगभग पिछले 25 वर्षों से सीमा के दोनों ओर से इस सन्दर्भ में प्रयास जारी थे। पाकिस्तान के नरोवाल जिले में स्थित करतारपुर साहिब गुरद्वारा और डेरा बाबा नानक गुरद्वारा में महज 4 किमी का फासला है पर रावी नदी यहीं बीच में भारत-पाकिस्तान की सीमा बनाती है। एक चुनाव रैली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने इसी सीमा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस को सिख भावनाओं की कद्र होती तो करतारपुर साहिब भारतीय सीमा में होता। यह बेहद ही खतरनाक और हास्यास्पद बयान है यदि इतिहास के पन्नों को न भुलाया जाय। जाहिर है, मोदी सरकार को बिलकुल अंदेशा नहीं था कि पाकिस्तान की नयी इमरान सरकार यदि करतारपुर गलियारा खोलने को राजी होती भी है तो उसका संदेसा पहले सिद्धू को मिलेगा और धार्मिक भावनाओं के दबाव में मोदी सरकार इस अवसर को मना भी नहीं कर सकती थी। गौरतलब है कि 22 नवम्बर से गुरु नानकदेव का 550वां प्रकाशवर्ष भी प्रारम्भ हो गया है जिसकी तैयारी जोरशोर से चल रही और मोदी सरकार ने भी इसे  भव्यता से मनाने का निर्णय लिया है और भारत सरकार को अपनी ओर से भी करतारपुर गलियारा के शिलान्यास का निर्णय लेना पड़ा। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा का पशोपेश में होना सुषमा स्वराज के उस बयान से बखूबी झलकता है जहाँ वह कहती हैं कि करतारपुर गलियारा खोलने पर पाकिस्तान सरकार की सहमति आने का अर्थ यह नहीं है कि भारत, पाकिस्तान से शांति वार्त्ताओं के लिए तैयार हो जायेगा। यकीनन, आज जो नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में होते तो भारत सरकार इसे पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2, ट्रैक-3 नीति की शांति प्रयासों से जोड़ती और चुनावों में बड़ी सकारात्मकता से उतरती। भाजपा से कांग्रेस में गए नवजोत सिंह सिद्धू के हाथ इस इक्के के लग जाने से अब कांग्रेस में उनकी स्थिति मजबूत तो हुई ही है, पंजाब में भी उनके लिए एक गुडविल बनी है। 

भारत की तरफ से करतारपुर गलियारे का शिलान्यास करते हुए नितिन गडकरी ने इसे चार-पाँच महीने में ही पूरा कर लेने का दावा किया, जिससे बिना वीजा के श्रद्धालुओं की आवाजाही हो सके। इसी मंच से बोलते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन अटकलों का जवाब दिया जिनमें गलियारे की आतंकवादियों द्वारा सुरक्षा संबंधी दुष्प्रयोग का अंदेशा जतलाया गया है। उन्होंने पाकिस्तानी जनरल कमर बाजवा को कड़ी चेतावनी दी और कहा कि पंजाबी लड़ना जानते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की यह चिंता वैसे जायज है कि इस गलियारे का दुष्प्रयोग संभव है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब इसे खोलने की सूचना सीधे पाकिस्तानी जनरल कमर बाजवा की ओर से सबसे पहले आती है वह भी पाकिस्तान के नयी सरकार के शपथ ग्रहण के अवसर पर, तो निश्चित ही यह इमरान सरकार का फैसला नहीं लगता। पाकिस्तान में यों भी विदेशी मामलों में सरकार से अधिक सेना की चलती है और इमरान सरकार सेनापरस्त सरकार मानी भी जाती है। ऐसे में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की एक चिंता यह भी है कि यह पाकिस्तानी सेना का एक गेमप्लान भी हो सकता है। एक वीजाफ्री गलियारा दोनों ओर के खालिस्तानी अतिवादियों को भी मौका देगा और यह देशव्यापी आतंकवाद का भी एक जरिया बन सकता है। दो देशों के बीच जब तनावपूर्ण संबंध होते हैं और संयोग से वे एक-दूसरे के पड़ोसी होते हैं तो न शांति के प्रयास थामे जाते हैं और न ही सुरक्षा व ख़ुफ़िया तैयारियों में कोई ढील दी जाती है, इसलिए इस आशंका के समानांतर किसी भी प्रकार के शांति प्रयासों को रोका नहीं जा सकता और सरकार दूसरी ओर इस गलियारे के लिए अपनी सुरक्षा तैयारियों पर भी गंभीरता से काम अवश्य करे।

करतारपुर साहिब गलियारा, भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नयी ऊर्जा फूंक सकता है जो सीमा की दोनों ओर की सरकारें गंभीर हों। पाकिस्तान में नयी सरकार आ चुकी है और भारत में नयी सरकार आने को है। पाकिस्तान के साथ भारत की एक कशमकश यह रहा करती थी कि वार्ता किससे की जाय पर अभी इमरान खान ने गलियारे का अपनी तरफ से शिलान्यास करते हुए ठीक ही कहा कि सरकार, सेना और नागरिक समाज सारे ही इस मुद्दे पर एक पेज पर हैं। इमरान खान का एक पर्सनल कनेक्ट भी सिख धर्म से है। इमरान खान जबसे महान बाबा फरीद के अनुयायियों के संपर्क में आये हैं, खासे आध्यात्मिक हुए हैं और इन बाबा फरीद के महत्वपूर्ण उद्धरण नानकदेव के गुरुग्रंथ साहिब में ही पहली बार मिलते हैं। बचपन से इमरान खान जिस मेला मियांमीर में शिरकत करते रहे हैं और उनकी माँ की कब्र जिस मियांमीर की कब्र के पास है उन्हीं मियांमीर ने गुरु अर्जनदेव के आग्रह पर अमृतसर स्थित हरमिंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखी थी। गुरु नानकदेव ने अपने जीवन के तमाम वर्ष कई देशों की सीमायें लांघते हुए शांति का पाठ पढ़ाने में व्यतीत किया, उनके 550वें  प्रकाशवर्ष के अवसर पर भारत-पाकिस्तान शांति का एक नया सोपान प्रारम्भ कर सकते हैं। यह गलियारा पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था को धार्मिक पर्यटन के रूप में लाभ पहुँचायेगा। क्षेत्र में रूस की मंशा अमेरिकी प्रभाव को सीमित करते हुए यह है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत और चीन अपने पारस्परिक विवाद निपटाते हुए ईरान से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, चीन होते हुए रूस तक एक सशक्त ऊर्जा गलियारा बनायें जिससे क्षेत्र में अमेरिका पर निर्भरता कम हो। गौरतलब है कि ईरान, पाकिस्तान और चीन से रूस से रिश्ते अच्छे हैं और रूस, भारत से भी अपने रिश्तों में जान फूंककर अफगानिस्तान, ईरान के जरिये मध्य-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति पुख्ता करना चाहता है। भारत, संबंधों के इस वितान पर होने वाले सुखद संभावनाओं की अनदेखी नहीं ही कर सकता तो करतारपुर गलियारा एक महत्वपूर्ण प्रारंभन बिंदु हो सकता है। सिख डायस्पोरा की ताकत भी कनाडा, यूके, यूरोप सहित समूचे विश्वभर में है तो यह गलियारा इस सिख़-विस्तार को भी आकर्षित करेगा और अंततः भारतीय कूटनीति को लाभ भी पहुँचायेगा।   


Tuesday, September 25, 2018

नेपाल सौदेबाज, दगाबाज नहीं


साभार: गंभीर समाचार 

स्वतंत्र संप्रभु देश की विदेश नीति जब गढ़ी जाती है तो उन प्रभावी कारकों की पड़ताल की जाती है, जिनकी अवहेलना नुकसानदायक हो सकती है। भारत की ओर से तीन तरफ से और चीन की तरफ से एक तरफ से घिरे नेपाल को भी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की बुनियाद गढ़नी है। एक समय लगभग असंभव लग रहे संविधान-निर्माण की प्रक्रिया के सकुशल लोकतांत्रिक रीति से संपन्न हो जाने के पश्चात् नेपाल ने विधिसम्मत लोकतांत्रिक चुनाव आयोजित कर स्वयं को स्पष्ट बहुमत वाली नयी सरकार भी प्रदान कर दिया है। संगठित वामपंथ की सरकार के बनने से भारत के साथ नेपाल के संबंधों में वह जोश तो नहीं ही है, किंतु भारत-नेपाल संबंधों में आयी यह जकड़न दरअसल उस अविश्वास से उपजती है जिसका मूल नेपाली नवगठित ओली सरकार के चीन के प्रति दिखाई जा रहे झुकाव में है। चीन दुनिया की प्रमुख सामरिक-आर्थिक शक्ति है, न यह तथ्य नज़रअंदाज के काबिल है और न ही यह कि भारत तेजी से उभरती विश्व शक्ति है। चीन ओबोर नीति के आधार पर अपना खजाना खोले हुए है जो नेपाल की नवनिर्माण की आकांक्षा के लिए एक बेहद ही स्वाभाविक आकर्षण है। लोकतांत्रिक नेपाल आर्थिक मजबूती के लिए यदि भविष्य के व्यापारिक लाभों को लेकर उत्सुक है तो भारत की भी अवहेलना महंगी पड़ सकती है। अब जबकि, किसी एक देश पर निर्भरता भी भावी हितों को देखते हुए खतरनाक है, ऐसे में यदि भारत और चीन के संबंध भी सीधी रेखा में न हों तो नेपाल की कठिनाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। नेपाल अपनी भू-राजनीतिक स्थिति को देखते हुए भारत और चीन की भू-राजनीतिक स्थिति की भी अनदेखी नहीं कर सकता, यह उसकी विदेशनीति निर्माण-प्रक्रिया की प्राथमिक बाध्यता है। 

ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक संबंधों के संदर्भ में यदि नेपाल के भारत और चीन से संबंध परस्पर तौले जाएँ तो यकीनन भारत-नेपाल संबंध, नेपाल-चीन संबंध से अधिक स्वाभाविक, अधिक गहरे और कभी भी अपनी महत्ता नहीं खोने वाले नज़र आएंगे, किन्तु नेपाल भी अपने कूटनीतिक व सामरिक संबंधों में एक सुरक्षित संतुलन की सम्भावना तो तलाशेगा ही। इसी संतुलन की तलाश उसे चीन से नए-नए समझौतों की तरफ ले जाती है। कोई भी तटस्थ विदेश नीति विश्लेषक यदि नेपाल के दृष्टिकोण से विचारे तो यही कहेगा कि नेपाल अपनी स्वाभाविक चाल चल रहा है। मन में कहीं भूटान को रखते हुए भारतीय विश्लेषक जब नेपाल से भारतीय अपेक्षाओं की पड़ताल करते हैं तो उन्हें निराशा हाथ लगती है। लेकिन बदलती परिस्थितियों के हिसाब से भारतीय विदेश नीति में नेपाल के प्रति जो तत्परता आनी चाहिए थी उसकी अनुपस्थिति पर भी ध्यान जाना चाहिए। भारत और नेपाल के संबंध उतार-चढ़ावों के बावजूद अमूमन बेहतरीन ही रहे हैं। किन्तु जिस तरह बदलते नए नेपाल की नब्ज महसूस करते हुए भारत को अपनी नेपाल नीति को अद्यतन करना था, वह नहीं हो सका और भारत की नेपाल नीति में एक आलस्य व जड़ता बनी रही। भारत और चीन के मध्य स्थलबद्ध नेपाल एक सैंडविच की तरह महज बफर स्टेट तो नहीं बनना चाहेगा। नेपाल में नयी सरकार के शपथ लेने तक भारत सरकार को ‘नव-नेपाल’ को देखते हुए एक नयी व बहुआयामी नेपाल नीति तैयार रखनी थी जिसमें भूराजनीतिक कारक व चीनी संदर्भ तफ्सील से लक्षित होते। किंतु अभी तक भारतीय रवैया देखकर यही लगता है कि भारत, नेपाल के हर कूटनीतिक कदम पर चौंक ही रहा है। 

2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद तथाकथित भारतीय सीमाबंदी के बाद नेपाली जनमानस ने एक राष्ट्र पर अतिनिर्भरता के दुष्परिणाम पर सोचने को मजबूर हुए। इसीसमय चीन ने भी तातोपानी में अपना एकमात्र व्यापारिक चेकपॉइंट यह कहते हुए बंद किया था कि वहाँ उन्हें चीन विरोधी गतिविधियों की आशंका है लेकिन नेपाली जनमानस पर फ़िलहाल राजसत्ता के विरुद्ध हुई क्रांति के वामपंथी नायक इतने प्रभावी हो चुके हैं कि उन्होंने चुनाव में तथाकथित भारतीय सीमाबंदी को अधिक तूल दिया। भारत-नेपाल मुक्त सीमा के दोनों ओर रहने वाले मधेसियों से भारतीयों की सामाजिक-सांस्कृतिक साम्यता और उनकी नेपाली राष्ट्रीय राजनीति में कम होती महत्ता ने भी इसमें जैसे आग में घी का काम किया। यही वह नाजुक समय था जब भारतीय कूटनीति को अधिक तत्पर व भारतीय उपस्थिति को अधिक मुखर होना था, किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा हो न सका। नेपाल, चीन के ओबोर नीति को समर्थन देने वाले प्रथम पंक्ति के देशों में है। नवनिर्माण के आकांक्षी नेपाल को इसमें निश्चित ही अपनी अवसरंचना को नयी दिशा देने का अवसर दिखाई पड़ता है। चीन ने नेपाल में भारी-भरकम निवेश किया है और नयी-नयी घोषणाएँ भी जब-तब होती जाती हैं। चीन केरांग-काठमांडू रेल परियोजना पर काम कर रहा है और साथ ही परस्पर वायु व भूमि संपर्कों के फैलाव पर ध्यान दे रहा है। कोसी, गंडकी और करनाली आर्थिक गलियारे पर भी प्रगति देखी जा सकती है। 2017 में चीन ने नेपाल के लिए 8.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की घोषणा की थी। उसी साल प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए चीनी रक्षा मंत्री चांग वानक्वान ने 32.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता नेपाली सेना को देने की घोषणा की थी। पिछले वित्तीय वर्ष के शुरुआती दस महीनों में ही नेपाल में चीनी निवेश, नेपाल के कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का 87% है। हाल ही में चीन ने नेपाल के साथ नए ट्रांजिट प्रोटोकॉल के तहत अपने चार बंदरगाह तियानजिन, शेनजेन, लिआन्यूंगांग व झांजीआंग खोल दिए, इसमें तीन लैंझाउ, ल्हासा व शिगास्ते जैसे शुष्क बन्दरगाह भी शामिल हैं। इसके तुरंत बाद ही नेपाली सरकार ने भारत द्वारा आयोजित बिम्सटेक बे ऑफ़ बंगाल प्रथम संयुक्त सैन्य अभ्यास में परिभाग करने से सहसा ही इंकार कर दिया हालाँकि कूटनीतिक संबंधों को देखते हुए नेपाल ने अपना पर्यवेक्षक भारत भेज दिया। तथ्य यह भी है कि नेपाल इसी समय चीन के साथ सागरमाथा सैन्य अभ्यास के द्वितीय संस्करण में परिभाग कर रहा है। 

इसतरह देखा जाय तो यह कहना मुनासिब होगा कि नेपाल अब एक स्वतंत्र सौदेबाज देश के रूप में व्यवहार कर रहा है। चीन के साथ वह यकीनन अपने संबंध प्रगाढ़ करना चाहता है परंतु भारत से अपने संबंधों को भी वह सम्हालना चाहता है। नेपाल के कूटनीतिक हलकों में भारत के सापेक्ष चीन को लेकर एक पक्षपात अवश्य है किन्तु अभी जो कूटनीतिक विश्वास भारत को लेकर है, वह चीन को लेकर नहीं है। यहीं भारतीय कूटनीति के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। चीन के भारी-भरकम निवेश पर एक तरह के ऋण-बंधन में फंसने का भय स्पष्ट है। श्रीलंका के उदाहरण से नेपाली कूटनीतिक समाज भी अवगत है। तथ्य यह भी है कि सन 2015 से ही नेपाल-चीन तातोपानी व्यापारिक सीमापॉइंट बंद है और एकमात्र रासूवगाड़ी-केरुंग पॉइंट अपने ख़राब अवसंरचना विकास के कारण सुस्त पड़ा है। इसके अलावा ध्यातव्य यह भी है कि नेपाल ने आख़िरकार पूर्वघोषित पश्चिमी सेती हाइड्रोप्रोजेक्ट में चीनी मदद को दरकिनार करते हुए खुद के संसाधनों से विकसित करने का निर्णय लिया है। चीन ने अवश्य ही स्थलबद्ध नेपाल के लिए अपने चार बंदरगाह खोल दिए हैं किन्तु नेपाली घरेलू मीडिया में यह भी विमर्श समानान्तर चल रहा है कि नजदीकी चीनी बंदरगाह भी 2600 किमी दूर है जबकि भारत का हल्दिया पोत काठमांडू के दक्षिण में महज 800 किमी की दूरी पर है। भारत-नेपाल सीमा से कोलकाता की दूरी जहाँ 742 किमी है, वहीं विशाखापत्तनम 1400 किमी की दूरी पर है। परेशानी भारतीय सीमा पर कस्टम संबंधी लालफीताशाही वाले प्रावधानों से है। एक स्रोत के अनुसार कोलकाता से जर्मनी के हैम्बर्ग जाने वाले कारगो के खर्च की तूलना में काठमांडू से कोलकाता जाने वाले कारगो का खर्च तीन गुना है। वैसे, नेपाली व्यापारी विशाखापत्तनम में हाल ही में प्रस्थापित इलेक्ट्रिक कारगो ट्रैफिकिंग सिस्टम से होने वाली सहूलियत से संतुष्ट हैं। नेपाल ने तिब्बत-सन्दर्भ में चीन से कहा है कि वह अपनी जमीन चीन-विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल नहीं होने देगा, इसीतरह उसने भारत को भी आश्वासन दिया है कि उसकी भारत के साथ खुली सीमा का दुरूपयोग आतंकवादी गतिविधियों में वह नहीं होने देगा।

नेपाल का कूटनीतिक रवैया अप्रत्याशित नहीं है कि उसे एक धोखबाज देश की तरह देखा जाय, किन्तु यकीनन नेपाल एक सौदेबाज देश के रूप में उभर रहा है। कहना होगा कि भारत ने नयी परिस्थितियों के अनुरूप तैयारियाँ नहीं कीं और इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भारत के तनिक सुलझे व गंभीर प्रयासों से परस्पर संबंधों में पुनः नयी ऊष्मा भी लाई जा सकती है। भारत और नेपाल का इतिहास व समाज एक-दूसरे का स्वाभाविक साझीदार बनाते हैं और भूगोल इसमें भारत को चीन के सापेक्ष नेपाल के लिए हमेशा ही वरीय देश बनाकर रखता है। इस स्थिति में भारत को अपना अवसर अवश्य ही साधना चाहिए।  



Friday, September 7, 2018

एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन

#एनेमीऑफ़नन

साभार: गंभीर समाचार 

जिस दिन भारत अपनी आजादी की इकहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने में मशगूल था उसीदिन अमेरिका के छोटे-बड़े तकरीबन साढ़े तीन सौ मीडिया-प्रतिष्ठानों ने  अमेरिकी प्रेस की आजादी के पक्ष में सम्पादकीय प्रकाशित किया । यह एक अभूतपूर्व घटना थी। पर कहना होगा कि यह उस अभूतपूर्व रवैये के विरुद्ध एकजुट प्रदर्शन था जो किसी भी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति में यों नहीं रही । पिछले एक अरसे से मीडिया द्वारा हो रही अपनी हर आलोचना को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ‘फेकन्यूज’ कह रहे हैं और जोर देकर दुहराते हैं कि मीडिया द्वारा कहा गया, दिखाया गया कुछ भी तथ्य नहीं है। ट्रम्प के अनुसार मीडिया, विपक्षी दल की तरह व्यवहार कर रहा है और यह देशहित में नहीं है। ट्रम्प यहाँ तक कहने लगे कि मीडिया उनकी दुश्मन नहीं बल्कि देश की दुश्मन है। ट्रम्प अपने ट्विटर अकाउंट से बमबारी करते हैं तो उसी ट्विटर पर एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन चलाया गया। बोस्टन ग्लोब की अपील पर अमेरिकी मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रम्प के इस मीडिया विरोधी रवैये का एकजुट विरोध किया। 

कमोबेश पूरी दुनिया में सत्ता के साथ मीडिया के जो संबंध हैं वे बहुरंगी हैं। एक लंबे समय तक यह संबंध श्वेत-श्याम था। या तो मीडिया, सरकार की निर्भीक आलोचना करती थी अथवा स्वयं ही सरकारी बन उसका भोंपू बन जाती थी। बाजार की दखलंदाजी ने इस भूमिका में एक अवसरवादी संतुलन भर दिया था। सत्ता और शक्ति के खेल को परोसते-परोसते मीडिया खुद एक बड़ी किरदार हो गयी। इंटरव्यू लेने वालों के इंटरव्यू लिए जाने लगे। प्रश्नकर्ता, द्रष्टा व विचारक बनते गए, प्रश्न छूटते गए, दृश्य धुंधले होते गए और आयातित विचारों की बमबारी ही एजेंडे में शामिल हो गए। चुनाव जो कि एक लोकतांत्रिक उत्सव है अब मीडिया के लिए महज अवसर में तब्दील हो गया। समकालीन मीडिया एक रंगारंग मेला है। हर दुकान पर एक लाउडस्पीकर बंधा है। सारे लाउडस्पीकर चालू हैं चौबीस घंटे और चीख रहे हैं। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाउडस्पीकर चुन लिए हैं। उद्योगपतियों ने इन लाउडस्पीकरों की खरीददारी में मदद की है। अब अधिकांश लाउडस्पीकर वही रिकॉर्ड बजाने को मजबूर हैं, जो उन्हें पहुँचाया जाता है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का चुनाव, सांगठनिक रूप से पहला बड़ा सफल कैम्पेन माना जाता है जब मीडिया का इस्तेमाल खुलकर किया गया। पश्चिमी देशों में यह पहले हुआ, अपने देश में यह अब देखा जा सकता है। नरेंद्र मोदी के चुनाव कैम्पेन में मीडिया की भूमिका से इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। प्रवृत्तियाँ काफी पहले से कार्यरत हैं, परन्तु यह दशक जैसे पर्दादारी जानता ही नहीं। बाजार का साथ पाकर मीडिया एक समय बाद स्वयं में ही एक औद्योगिक घराना बन जाता है। इस बिंदु पर आकर लाउडस्पीकर अपने रेकॉर्ड बजाने की भी हैसियत रखता है। ट्रम्प से वह संतुलन टूट गया है। भारत में यह संतुलन अगले दशक में टूट सकता है। राजनीतिक दल जो मीडिया का इस्तेमाल कर कैम्पेन करते हैं अब अपनी आलोचना के जवाब में मीडिया पर ही तंज कसते हैं। ट्रोलर्स की खेती करने वाले दूसरों के ट्रोलर्स को खर-पतवार बताते हैं। फेकन्यूज फिनोमेना अब एक आत्मघाती बम है।  

विश्व राजनीति में मीडिया


 “जो मीडिया को नियंत्रित करता है वह मन को नियंत्रित करता है।  (जिम मॉरिसन )”


साभार: गंभीर समाचार 

अभिव्यक्ति के लिए भाषा और उसके संकेत चिन्हों को दर्ज करने की तकनीक के सहारे मानव ने अभूतपूर्व प्रगति की है। साझी सामाजिक स्मृति सहेजी जा सकती है और भविष्य के लिए प्रयोग में भी लाई जा सकती है। मानव-अभिव्यक्ति के अनगिन माध्यम विकसित हुए। उन सभी मीडियम्स का बहुवचन ही मीडिया कहलाता है । जैसे-जैसे राजनीतिक संरचनाएँ विकसित होती गयीं, मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती गयी। यों तो इतिहास के पन्नों में मीडिया के कितने ही रंग हैं लेकिन अब जबकि संपूर्ण विश्व में एक राजनीतिक मूल्य के रूप में लोकतंत्र स्वीकार्य हो चला है, मीडिया की भूमिका कमोबेश अब यह स्थापित है कि वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जवाबदेही व पारदर्शिता सुनिश्चित करता है और नागरिक-समाज एवं सरकार के मध्य सेतु बनकर राजनीतिक संक्रियाओं के निर्वहन में योग देता है। 

वैश्वीकरण और मीडिया का वैश्विक स्वरूप 

संचार क्रांति ने समूचे दुनिया से एक क्लिक पर संपर्क-सम्बद्धता उपलब्ध करा दिया है। इंटरनेट ने पूरी दुनिया को चौबीसों घंटे जोड़ रखा है। सूचनाएँ अभूतपूर्व ढंग से इतिहास में पहली बार साझा हो रही हैं और इसलिए ही मार्शल मैकलुहान ने विश्व को ‘वैश्विक-ग्राम’ की संज्ञा दी। मीडिया शब्द में अब अख़बार, टेब्लॉयड, पत्रिका, रेडिओ, टीवी, सोशल साइट्स, ब्लॉग्स, वेबसाइट्स, ऐप आदि सभी माध्यम आते हैं। औद्योगिक क्रांति से उपजे पूँजीवाद के उत्कर्ष ने, उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद और दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका के पश्चात जो वैश्विक व्यवस्था दी है उसमें अब वैश्वीकरण की बयार चल रही है। वैश्वीकरण एक ऐसी विशद सतत प्रक्रिया है जो विश्व-व्यवस्था के देशों को राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक संस्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ने को बाध्य करती है। राष्ट्रीय सीमाएँ वैश्वीकरण के लिए उतनी मायने नहीं रखतीं और सम्प्रभुताएँ यदि तैयार न हों तो भी वैश्वीकरण का दबाव महसूस करती हैं। तकनीक के उत्कट विकास ने वैश्वीकरण को और भी शक्तिमान बनाया है जो कुशल राष्ट्र को जहाँ और भी अवसर प्रदान करती है वहीं अकुशल राष्ट्र स्वयं को इसमें नव-उपनिवेशवाद जैसी स्थिति में स्वयं को बिधा पाते हैं।

विश्व इतिहास और समकालीन वैश्वीकरण ने मीडिया का एक ‘वैश्विक स्वरूप’ गढ़ा है। अब राष्ट्रगत मीडिया, वैश्विक मीडिया से अप्रभावित नहीं रह सकती। वैश्विक मीडिया, वैश्वीकरण की शक्तियों के साथ मिलकर इस स्थिति में है कि वह किसी भी देश की मीडिया को मुद्दे पकड़ाने लगे और उसको   नियोजित विषयवस्तु भी थोपने लगे। इस स्थिति में राष्ट्रहित कब दाँव पर लग जाता है, पता ही नहीं चलता। संपूर्ण विश्व में सरकारें उदारवादी राजनीतिक व्यवस्था में पनप रही हैं। उदारवादी व्यवस्था पूँजी के मुक्त प्रवाह में यकीन करती है और उसी व्यक्ति और व्यवस्था को लाभ पहुँचाती है जो पूंजीसंपन्न होती है। इसके विपरीत मीडिया अपने विकासक्रम में इस आदर्श में आगे बढ़ी है कि उसे जनपक्षधर रहना है और राज्य-उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए उस सीमान्त व्यक्ति के प्रश्न भी सत्ता से करने हैं जिसके पास कोई कुशलता, कोई पूँजी शेष नहीं है। उदारवादी व्यवस्था और मीडिया के सत्व के मध्य यह संघर्ष फिर स्वाभाविक है। चूँकि राष्ट्र-राज्य शून्य में स्थित नहीं होते, वे एक वैश्विक व्यवस्था में होते हैं तो विश्व व्यवस्था की प्रकृति के बदलाव का प्रभाव यकीनन राष्ट्र-राज्य पर भी पड़ेगा। गहराते वैश्वीकरण ने राष्ट-राज्यों की मीडिया के लिए दरअसल और भी कम श्वाँस-स्थान रख छोड़ा है खासकर तब जब सरकारें पूंजीसमर्थक हों। मुनाफा ही मूल्य है बाजार का। बाजार की शक्तियाँ कुछ इस तरह से कार्य करती हैं कि मीडिया को भी पत्रकारिता के मूल्य के ऊपर बाजार के मूल्य को तवज्जो देना पड़ता है। नागरिक, मनोरंजन की चाशनी में परोसे जाने वाले समाचार की निष्पक्षता के लिए कोई मूल्य नहीं चुकाना चाहते और महज मूक दर्शक बनते चले जाते हैं।   

भारतीय मीडिया कवरेज में वैश्वीकरण व वैश्विक मामलों का नकार 

अपने देश भारत की सामान्य मीडिया कवरेज देखें तो ऐसा लगता ही नहीं कि विश्व में वैश्वीकरण घट रहा है जिससे कि हर लोकल खबर का एक वैश्विक मायने बनता है और हर वैश्विक खबर के लोकल मायने बनते हैं। अभी भी वैश्विक राजनीति के लिए अख़बारों में एक-आध पन्ना, पत्रिकाओं में एक नियमित-अनियमित स्तम्भ, टीवी चैनलों पर एक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम को समेटता कोई साप्ताहिक कार्यक्रम ही दिखाई पड़ता है, जो महत्ता के अनुपात में नगण्य है । कुछ अंग्रेजी अख़बारों को छोड़ दें तो अधिकांश हिंदी के अख़बारों में वैश्विक मामलों पर प्रस्तुतीकरण अत्यल्प है। हिंदी अख़बारों के लिए अभी भी विदेश सात समंदर पार है। उनमें छपने वाले संपादकीय आलेखों में बेहद कम आलेख वैश्विक राजनीति पर होते हैं और वह भी अधिकांश कुछ यों होते है जिसमें भारतीय विदेश नीति की उपलब्धियाँ बता दी जाती हैं। यह दौर विश्व- राजनीति के वैश्वीकरण का है और राष्ट्रीय घटनाक्रम, वैश्विक घटनाक्रमों के परिप्रेक्ष्य में यदि नहीं देखे और विश्लेषित किये जा रहे तो देश समानांतर बड़े मीडिया कोलाहलों के बीच भी लगातार अधूरे सच में जी रहा है। होना यह चाहिए कि मीडिया में यह शऊर आना चाहिए कि वह हर खबर को वैश्विक परिदृश्य में परोसे और विश्लेषण की गुंजायश बनाये। बिना इसके कोई भी मीडिया कवरेज सामान्यतः वैश्वीकरण के प्रभावों का नकार है, जो सही नहीं है। इस दोषपूर्ण कवरेज का असर भारतीय जनमत पर यों हुआ है कि जहाँ दुनिया के ज्यादातर देशों के आम चुनावों में विदेश नीति और वैश्विक मामले प्रमुख चुनावी मुद्दे होते हैं वहीं भारतीय आमचुनावों में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो वैश्विक मुद्दे, चुनावी मुद्दे बनते ही नहीं। एक ऐसा देश जिसे जवाहर लाल नेहरू के रूप में ऐसा प्रधानमंत्री मिला था जो एक वैश्विक नेता रहे, एक ऐसा देश जो आजादी के शुरुआती दशकों में ही निर्गुट आंदोलन के माध्यम से तीसरी दुनिया के देशों का अगुआ बन गया, एक ऐसा देश जिसकी भू-राजनीतिक स्थिति लार्ड कर्जन की नजर में भी विशिष्ट थी और आज भी जो देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वैश्विक राजनीति के केंद्र में है, वहाँ वैश्विक मामलों की मुख्यधारा मीडिया द्वारा की जा रही अनदेखी कितनी शोचनीय व दुखद है। यह सच है कि ‘वैश्वीकरण का प्रभाव’ मीडिया में खासा चर्चा घेरता है पर ज्यादातर वह आर्थिक व सामाजिक स्तर पर ही विश्लेषित होता है। उसीप्रकार जबकि मीडिया सूचनाओं के लिए अब इंटरनेट पर खासा निर्भर है तो भी वैश्विक मामलों का महत्त्व यदि नहीं समझा जायेगा तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। समकालीन तथ्य के रूप में मीडिया द्वारा वैश्वीकरण और वैश्विक मामलों की अनदेखी राष्ट्रहित के लिए घातक है। 

मीडिया साम्राज्यवाद व विश्व राजनीति 

उदारवादी बाहुल्य ने विश्व के प्रत्येक देश के अभिजन को व्यक्तिवादी होकर पूँजी बटोरने और सहेजने में मदद दी है। वैश्वीकरण मीडिया मॉडल इतने खर्चीले हैं कि वे परम्परागत आर्थिक मॉडल पर चल ही नहीं सकते। बाजारवाद और उपभोक्तावाद की अतिशयता ने आधुनिक जीवन मूल्यों में जो घुसपैठ की है उससे मीडिया को नागरिक आधारित मॉडल चलाने में बड़ी ही परेशानियाँ हैं। यह आर्थिक विकलांगता मीडिया घरानों को विज्ञापन के लिए या तो सरकार या फिर बाजार के समक्ष घुटने टेकने को मजबूर करती है। पूरी दुनिया में यह सामान्य प्रवृत्ति बनी है कि मीडिया घराने अब किसी न किसी औद्योगिक घरानों की इकाइयाँ बन गयी हैं। यह स्थिति अभिजन को निर्भीक हो पूँजी बटोरने और सहेजने में मदद देती है। उपयुक्त चुनाव-सुधार न होने की वजह से चुनाव इतने खर्चीले होते गए हैं कि यहाँ भी चंदों के माध्यम से औद्योगिक घरानों को राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका मिल जाती है। वैश्वीकरण ने दुनिया भर के औद्योगिक घरानों को हाथ मिलाने का जो मौका दिया है उससे मीडिया घरानों का भी क्रमशः वैश्वीकरण हुआ है। यह स्थिति वैश्विक जनमत निर्माण में  मीडिया को बेहद ताकतवर बना देती है। सीएनएन, बीबीसी, नेटवर्क-18 आदि के अनगिन मीडिया प्रकोष्ठ अमेरिकी इशारे पर चीन को शांतिपूर्ण पांडा नहीं खतरनाक ड्रैगन से प्रदर्शित करते हैं। इजरायल का महिमा-मंडन स्वाभाविक रीति से होगा तो ईरान एक विलेन की तरह नज़र आएगा। आतंकवाद और इस्लाम का फर्क मिटेगा और उत्तर कोरिया का तानाशाह शैतान लगने लगेगा। 

आशय यह नहीं है कि अमेरिका अथवा पश्चिमी शक्तियाँ अनिवार्य रूप से गलत ही हैं अथवा अन्य शक्तियाँ अनिवार्य रूप से सही ही हैं, लेकिन यह सुस्पष्ट है कि उदारवादी बाहुल्य के वैश्वीकरण में पश्चिमी शक्तियाँ अवश्य ही विश्व-जनमत को प्रभावित कर पाने की स्थिति में हैं।  यह एकदम अकारण और सहसा नहीं है कि आजकल अधिकांश वैकल्पिक मीडिया माध्यम इंटरनेट पर जो प्रचलित हैं उनका मूलस्थान देश अमेरिका है, जैसे- फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सप्प, गूगल, जीमेल आदि। इंटरनेट पर एकदम खुले आम अमेरिकी साम्राज्यवाद नज़र आएगा। एक व्यक्ति जब एप्पल, एंड्राइड या विंडो के सेलफोन से क्रोम ब्राउजर में गूगल सर्च से फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, विकिपीडिया पर पहुँचता है, सामग्री डाउनलोड कर माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस से संपादन करता है फिर जीमेल का प्रयोग कर उसे एक मित्र के पास प्रेषित करता है, तो उसे भान भी नहीं रहता कि वह उन्हीं माध्यमों का प्रयोग कर रहा है जिनसे मीडिया साम्राज्यवाद की पृष्ठभूमि बनती है, क्योंकि उनका स्रोत एक ही देश अमेरिका है। 

इस संदर्भ में एक भारतीय उदाहरण बेहद समीचीन है जहाँ वैश्विक मीडिया कवरेज और बहुधा उनकी सूचनाओं पर आधारित भारतीय मीडिया के प्रभावित होकर कार्य करने से घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति पर खासा प्रभाव पड़ा। मनमोहन सिंह सरकार में कुशल कूटनीतिज्ञ नटवर सिंह, देश के विदेश मंत्री थे। नटवर सिंह ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान गैस पाइपलाईन पर काम कर रहे थे जो भारत होते हुए चीन तक पहुँचती और इन देशों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती। इस राह में चुनौतियाँ कई थीं पर इसके सफल होने पर भारत की केवल ऊर्जा जरुरत ही नहीं पूरी होती बल्कि इसके दूसरे महत्वपूर्ण कूटनीतिक परिणाम भी होते। ऊर्जा जरूरतों के माध्यम से पाकिस्तान, भारत व चीन की पारस्परिक कटुता यकीनन कम होती, मध्य-पूर्व एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक एक सहयोगी क्षेत्र उभरता, जिससे अमेरिकी अथवा रूसी जैसी किसी सुपरपॉवर शक्ति के क्षेत्र में दखलंदाजी भी कम होती। एक नया ऊर्जा गलियारा विकसित होता जो कूटनीतिक रूप से भी शक्तिशाली होता और क्षेत्र में शांति और विकास की गारंटी होती। ज़ाहिर है यह क्षेत्र में अमेरिकी हितों को एक चुनौती होती। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र संघ के संचलन में बेहद प्रमुख आर्थिक योगदानकर्ता है। मध्य-पूर्व एशिया में ‘तेल के बदले अनाज योजना’ में हुए भ्रष्टाचार की संयुक्त राष्ट्र समर्थित स्वतंत्र एजेंसी (वोल्कर कमिटी) से जाँच कराई गयी, जिसमें विभिन्न देशों के राजनयिकों के नाम आये। एक नाम उसमें नटवर सिंह का भी था। वैश्विक मीडिया में इस वोल्कर कमिटी रिपोर्ट की खूब चर्चा हुई पर फिर भी किसी और देश में किसी का इस्तीफ़ा नहीं लिया गया। लेकिन भारत में स्थानीय मीडिया ने वैश्विक मीडिया के इनपुट्स पर वो हंगामा किया जिसकी आड़ में मनमोहन सरकार ने आखिर नटवर सिंह से इस्तीफा ले लिया। ऐसा नहीं है कि इस्तीफे के बाद नटवर सिंह पर कोई अभियोजन या जांच चलायी गयी, वह मामला वहीं ठप रहा। इसके कुछ ही समय बाद भारत-अमेरिका परमाणू समझौते को अमली जामा पहनाया गया और गैस पाइपलाइन योजना का आज कोई जिक्र भी नहीं करता।     

वैश्विक मीडिया का एक सकारात्मक उभार 

इन सभी चिंताओं के बीच फिर भी काफी कुछ सकारात्मक भी है। वैश्विक मीडिया ने वह संतुलन साधने की कोशिश की है जिसमें सरोकारिता और मुनाफा दोनों में संतुलन बिठाया जा सके। इंटरनेट पर सीधे पाठकों से मूल्य वसूलकर समाचार व विश्लेषण देने का आत्मनिर्भर मॉडल विकसित हो रहा है। दुनिया भर के अभिजनों ने अपने-अपने देश में टैक्सचोरी करते हुए जो दूसरे मुल्कों में धन संचित किया है, उसका डेटा लीक होकर वैश्विक मीडिया के तहत राष्ट्रगत मीडिया में भी रिसकर आ रहा। विकीलीक्स, एडवर्ड स्नोडेन के लीक्स ने पूरी दुनिया के सामने कुछ शक्तिशाली सरकारों के दूसरे देशों में की जा रही जासूसी का भंडाफोड़ कर दिया, इसमें अमेरिका सर्वप्रमुख था। यह भी इससे पता चला कि विश्व की शक्तिशाली सरकारें, बाकी सरकारों पर गोपनीय सूचनाओं के जरिये नियंत्रण रखती हैं और कई बार मुख्यधारा की मीडिया का वें इस्तेमाल भी करती हैं। पैराडाइज पेपर्स व पनामा पेपर्स जैसे कई लीक्स ने पूरी दुनिया को झिंझोड़ दिया और इस खतरे की तरफ ध्यान दिलाया कि वैश्विक मीडिया व शक्तिशाली सरकारों का गठजोड़ बेहद घातक साबित हो सकता है। अब दुनिया में कई समूह काम कर रहे हैं जिनका नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय है और वे इसतरह के लीक्स के लिए जरूरी अवसंरचना और उनके सटीक वितरण पर जिनका ध्यान है। उदाहरण के लिए एक नाम इंटरनेशनल कंसोरिटियम ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स का लिया जा सकता है जिसमें भारतीय इंडियन एक्सप्रेस मीडिया समूह भी प्रतिभाग करता है। यह सकारात्मक विकास है जो इस वैश्वीकरण युग की वैश्विक मीडिया के प्रति आशाएँ जगाता है। मीडिया पर जनजागरूकता बेहद जरूरी है अथवा कब जनमन नियंत्रित होने लग जाये, यह पता ही नहीं चलता और भाग्यविधाता फिर वही शक्तियाँ बन जाती हैं जो अपनी प्रकृति में अधिनायक हैं। 

Monday, August 13, 2018

आर्मी अरमानों के कप्तान इमरान


साभार: गंभीर समाचार 

पहचान की औपनिवेशिक जिद की बुनियाद पर बने पाकिस्तान का इतिहास इतना उलटफेर वाला है कि एक राष्ट्र के तौर पर इसकी इमारत को कभी मुकम्मल छत नसीब ही नहीं हुई। भारत को जहाँ 1950 में ही एक दुरुस्त संविधान मिला, वहीं पाकिस्तानी अवाम को उनका आईन आजादी के 26 साल बाद नसीब हुआ। इन बीते छब्बीस सालों में एक सशक्त राजनीतिक व्यवस्था और कुशल नेतृत्व के दारुण अभाव ने पाकिस्तान के ‘राजनीतिक विकास’ को गहरी चोट पहुंचाई और यहाँ लोकतंत्र आकाशकुसुम सा बन गया। जैसा कि औपनिवेशिक अतीत के नवस्वतंत्र राष्ट्रों में होता है कि बहुधा वहाँ ईमानदार, कुशल, लोकतांत्रिक नेतृत्व के अभाव में ‘सहज राजनीतिक विकास की प्रक्रिया’ अवरुद्ध हो जाती है और लोकतंत्र के पनपने की जमीन पर अनायास अनचाही तानाशाही की घास उग आती है, दक्षिण एशियाई परिदृश्य में पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । 

अदृश्य हाथ वाला इस्टैब्लिशमेंट और उसका डीप स्टेट 
पाकिस्तान में इस अनचाही तानाशाही घास की खेती कभी प्रकट तो कभी अप्रकट रहकर सेना करती है। लोकतंत्र के सामान्य लक्षणों में से एक महत्वपूर्ण लक्षण है, नियमित अंतराल पर स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव करवाया जाना। पाकिस्तान के सबसे सफल तानाशाहों में से एक रहे, जनरल परवेज मुशर्रफ की तानाशाही के बाद पाकिस्तान में क्रिकेटर इमरान खान के नेतृत्व में बनने वाली यह तीसरी लोकतांत्रिक सरकार होगी जब देश के इतिहास में इन इकहत्तर सालों में पहली बार लगातार दो शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण संभव हुआ। पाकिस्तान के व्यतिक्रमित इतिहास और ठिठके राजनीतिक विकास ने औपनिवेशिक परंपरा से संगठित सेना में सत्ता और शक्ति के लिए एक अलोकतांत्रिक हवस पैदा कर दी। औपनिवेशिक अतीत शिक्षा का पारम्परिक ढाँचा तोड़ देता है और आधुनिकता का ऐसा अनिच्छुक अधपका शैक्षिक ढांचा थोपता है। इस कारण ही पाकिस्तान में कठमुल्लों को भी सियासती सौदागर बनने का मौका मिलता है। 

भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था जब जर्जर लोकतंत्र की छननी में से जनता की आकाँक्षाओं को छानकर उन्हें पूरा करने में अक्षम होती है तो वह देशभक्ति के नारों के बीच अपनी असफलता छिपाती है और सेना के संगीनों के साये में राष्ट्रवादी द्वेष का तंबू तानती है। भारत से संघर्षों और युद्धों के लिए जरूरी खाद-पानी पाकिस्तानी हुकूमतों की नाकामयाबी से मिलता है और उनके नापाक इरादों का खामियाजा मुल्कों की अवाम को भुगतना पड़ता है। हुक्मरानों के भ्रष्टाचारों से बेहाल मुल्क, जो कि एक असफल राज्य में तेजी से तब्दील हो सकता है; वह आसानी से विश्व-शक्तियों का मुहरा बन जाता है। इससे द्विपक्षीय संबंधों में जटिलता तो बढ़ती ही है, क्षेत्र की राजनीति को भी यह प्रवृत्ति कठिन बना देती है। इसलिए ही यह स्पष्ट है कि अमेरिका के बाद पाकिस्तान ने अब चीन और रूस का कंधा कसकर पकड़ रखा है। सेना, नौकरशाही, कठमुल्ले आदि मिलकर पाकिस्तानी सत्ता का प्रतिष्ठान (इस्टैब्लिशमेंट) रचते हैं। इस्टैब्लिशमेंट का अदृश्य हाथ, पाकिस्तानी स्टेट के भीतर का ‘डीप स्टेट’ गढ़ता है जो असल में सत्तासुख भोगता है। अपनी सत्तालोलुपता और भ्रष्टता छिपाने के लिए यह इस्टैब्लिशमेंट सन 2008 से दो बार लोकतंत्र का लबादा सिलकर ओढ़ चुका है और अब तीसरी बार तैयारी पूरी हो गयी है। एक संगठित सेना कितनी ही बार क्यों न राष्ट्र को टूटने से बचाये फिर भी उसे लोकतंत्र निर्णायक शक्ति नहीं देता। लोकतंत्र में निर्णायक शक्ति सर्वदा ही लोक में निहित होती है जो उसके चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। उथलपुथल इतिहास वाले पाकिस्तान में सेना की साख एक उद्धारक की तरह है और जब-तब चुने गए नागरिक सरकार के भ्रष्टाचार के उदाहरणों ने सेना के भ्रष्टाचार को सहनीय बना दिया है। 

नवाज़ से मुशर्रफ फिर मुशर्रफ से नवाज़ 
1999 में जब जनरल मुशर्रफ ने चुनी हुई नवाज़ शरीफ सरकार को अचानक पदच्युत किया था तो अनुशासित शक्तिशाली सेना के शासन में भ्रष्टाचारमुक्त राष्ट्र बनाने का स्वप्न गढ़ा था। एक अध्यादेश से पाकिस्तान में तब नेशनल एकाउंटिबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) का गठन किया गया था जो स्वायत्त एवं सांविधानिक निकाय था। यकीनन एनएबी ने भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किये और सजा भी दिलवाई, पर सेना और न्यायपालिका के मसलों पर यह औपचारिक तर्कों से काम चला लेती है। दुनिया के हर तानाशाह की ख्वाहिश होती है कि दुनिया उसे लोकतांत्रिक कहे और उसके शासन को तानाशाही कहकर उसके कतिपय योगदानों को कमतर न आँका जाय। 9/11 की घटना के बाद मुशर्रफ एक चालाक व सफल कूटनीतिक सिद्ध हुए थे, जिन्होंने पाकिस्तान को एक राष्ट्र के तौर पर जीवनदान दिया था। इस्टैब्लिशमेंट पर अपनी पकड़ रखते हुए तानाशाह मुशर्रफ अपनी लोकप्रियता को लोकप्रिय लोकतांत्रिक नेता की लोकप्रियता से बदलने को आतुर थे। 2002 में मुशर्रफ ने संविधान में अपने अनुरूप बदलाव करते हुए लीगल फ्रेमवर्क आर्डर जारी किया और उसी साल के आम चुनाव में पीएमएल-क्यू पार्टी के साथ जीत हासिल कर अपने शासन को वैधता देने की कोशिश की। कुछ समय बाद ही कार्यपालिका शक्ति मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री को दे दी। भ्रष्टाचार के आरोपों से स्वयंनिष्काषित लोकप्रिय नेता बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ 2007 में पाकिस्तान लौटे। बेनज़ीर भुट्टो का जहाँ क़त्ल हो गया वहीं सऊदी अरब के हस्तक्षेप से नवाज़ शरीफ दस साल राजनीति से दूर रहने की शर्त को मानने को बाध्य हुए। पांच साल और राष्ट्रपति पद चाहने वाले मुशर्रफ को 2007 में पाकिस्तान में फिर से आपातकाल लागू करना पड़ा और सक्रिय न्यायपालिका व अमरीकी हस्तक्षेप से फरवरी-मार्च 2008 में आम चुनाव करवाने पड़े। यह चुनाव पाकिस्तान के इतिहास के सबसे लोकतांत्रिक, स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव माने जाते हैं जिसमें सहानुभूति की लहर पर सवार बेनज़ीर भुट्टो की पार्टी ने में जीत दर्ज की। नवाज़ शरीफ और सत्तारूढ़ पीपीपी  एकमत होकर मुशर्रफ पर पद छोड़ने का दबाव बनाया और महाभियोग की औपचारिक प्रक्रिया शुरू की। अंततः अगस्त, 2008 में मुशर्रफ ने त्यागपत्र दे दिया और नवम्बर 2008 में देश छोड़ दिया। यह मौका पाकिस्तानी राजनीति के कुछ विरले लोकतांत्रिक अध्यायों में से एक है जब नागरिक सरकार के पास लोकप्रिय जनसमर्थन रहा हो और सेना अपनी निश्चित भूमिका में हो। लेकिन कालांतर में पीपीपी सरकार अपने लोकप्रिय जनसमर्थन को इतनी मजबूत नहीं बना पायी कि इस्टैब्लिशमेंट को मजबूत होने से पुनः रोक पाती। पीपीपी सरकार के भ्रष्टाचार के हवालों ने इसे और कमजोर बनाया। सक्रिय नागरिक समाज, न्यायपालिका और वैश्विक दबाव में पाकिस्तान ने सफलतापूर्वक एक और आम चुनाव संपन्न किया और 2013 में पीएमएल (एन) के नवाज़ शरीफ ने बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई।  

पनामा पेपर्स का प्रकोप: नवाज़ और एनएबी 
देश से बाहर के व्यक्तिगत निवेशों के कानूनी मामलों को देखने वाली दुनिया की चौथी सबसे बड़ी फर्म मोजैक फोंसेका जो कि पनामा देश में स्थित है उसके ऑफिस से अभूतपूर्व रूप से तकरीबन सवा करोड़ दस्तावेज लीक हुए और जर्मन समाचारपत्र सुईदाईचे जाइटुंग द्वारा एक गुमनाम स्रोत से अर्जित किये वे रिकॉर्ड्स इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स को साझा किये गए। यह सूचनाएँ फिर सहभागी द गार्जियन, बीबीसी आदि से साझी की गयीं और इसतरह इन्होने दुनिया भर के राजनयिकों, धनिकों आदि के उन संपत्तियों का हवाला दिया जिनपर उनका देश कोई कर नहीं लगा सकता था क्योंकि इसकी जानकारी ही नहीं थी। यह सीधा-सीधा करचोरी का मामला है। इन खोजी जानकारियों को ही दुनिया भर में पनामा पेपर्स के नाम से जाना गया। यों तो इतिहास के इस सबसे बड़े लीक में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या रॉय, केपी सिंह, विनोद अडानी जैसे कई नाम हैं और कई मुल्कों के कई दिग्गज इसके घेरे में हैं, पर पाकिस्तान की पॉलिटिक्स में पनामा पेपर्स ने भूचाल ही ला दिया। 1999 में स्थापित नेशनल अकाउंटिबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) जो कि भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल करती है उसने पनामा पेपर्स में आये नवाज़ शरीफ परिवार के लोगों पर इस आधार पर ही शिकंजा कसना शुरू किया। नवाज़ शरीफ पाकिस्तान के उन नेताओं में से हैं जो सेना की भूमिका को एक स्तर से अधिक बर्दाश्त नहीं करना चाहते। सेना और नवाज़ शरीफ की तनातनी पाकिस्तानी राजनीति का एक ज़ाहिराना तथ्य है। नवाज़ एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे पर पनामा पेपर्स के सहसा खुलासे के लिए वे तैयार नहीं थे। एनएबी अपनी स्थापना से ही सेना के प्रभाव में रही है और इसका स्वायत्त व सांविधानिक होना इसे और भी शक्तिशाली बनाता है। एनएबी के अधिकारियों ने आख़िरकार नवाज़ शरीफ, उनकी बेटी मरयम, आदि को न्यायालय तक घसीट ही दिया। शरीफ़ को अंततः उनके पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया और नवाज़ शरीफ़ ने जब 29 जुलाई 2017 को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो उनके सरकार में ही सेना के करीबी माने जाने वाले कम विवादित पेट्रोलियम प्रभार सम्हालने वाले शाहिद खाकान अब्बासी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी। 

इमरान का उभार और आम चुनाव 2018 
आम चुनाव 2018 के परिणाम यह निश्चित करते हैं कि पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री तहरीके इंसाफ (पीटीआई) के इमरान खान होंगे। यह परिणाम चुनाव पंडितों के कयासों से थोड़ा विपरीत है। ज्यादातर का मानना था कि क़ौमी मजलिस (नेशनल असेंबली-निम्न सभा) इसबार त्रिशंकु रहेगी। नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल (एन) पनामा पेपर्स से त्रस्त थी तो बिलावल भुट्टो की पीपीपी इसबार बिलकुल भी आक्रामक नहीं थी। इसके अलावा पाकिस्तानी राजनीति में उसके राज्य मुख्यधारा के दलों के पारम्परिक वोटबैंक भी माने जाते हैं, जो यह चुनाव परिणाम भी सिद्ध करते हैं। जैसे- पंजाब को पीएमएल (एन) का तो सिंध को पीपीपी का और खैबर पख्तूनख्वा को पीटीआई का पारम्परिक गढ़ समझा जाता है। बाकी राज्यों में इन बड़ी पार्टियों के बाद ज्यादातर धार्मिक पहचान वाले दल हावी रहते हैं। धार्मिक पहचान वाले दलों में ब्लेस्फेमी (ईशनिंदा) मुद्दे के साथ खादिम हुसैन रिजवी के आक्रामक नेतृत्व में सहसा मजबूत हुई पार्टी तहरीके लब्बाइक से कयास लगाया जा रहा था कि यह पार्टी छितराए धार्मिक कट्टर मतों को ध्रुवीकृत कर लेगी। ऐसी बाकी पार्टियों के मुकाबले इस पार्टी का प्रदर्शन कम से कम निराशाजनक नहीं कहा जायेगा क्योंकि अधिकांश जगहों पर यह नंबर दो की पार्टी रही। इससे यह भी पता चलता है कि अगले आम चुनावों तक यह पार्टी अपने पूरे दमखम के साथ चुनौती पेश करेगी। इन वजहों से ही ऐसा लगने लगा था कि संभवतः नेशनल असेंबली में किसी एक दल को भी सरकार बनाने लायक सीट न मिले। सभी का मानना था कि इमरान खान की पार्टी पीटीआई को अच्छी खासी बढ़त मिलेगी पर जिसतरह से न्यायपालिका, एनएबी और चुनाव आयोग ने एक के बाद एक ऐसे फैसले किये और ऐसे-ऐसे समय में किये जिनसे नवाज़ शरीफ और बिलावल की पार्टी को अपरोक्ष-परोक्ष नुकसान उठाना पड़ा और इमरान की पार्टी को जिससे सीधा फायदा पहुँचा, उससे कई चुनावी पंडित खुलकर कहने लगे थे- कि इमरान कप्तान बनेंगे। नवाज शरीफ़ और उनकी बेटी मरयम का आख़िरी समय में देश आकर गिरफ्तारी देने के फैसले से उम्मीद की गयी थी कि एक प्रकार की सहानुभूति उपजेगी पर वह भी कहीं दिखी नहीं। 

क्रिकेटर इमरान अपने रिवर्स स्विंग के लिए जाने जाते रहे हैं। उनका प्रदर्शन यों ही चौंकाऊ रहता है, वह वापस आकर बढ़िया कर जाते हैं । व्यक्तिगत जीवन में भी उतार-चढाव रहा, उनके क्रिकेट जीवन में भी उतार-चढ़ाव रहा और ठीक इसी तरह उनके राजनीतिक जीवन को भी उतार-चढ़ावों से ही भरा कहेंगे। एक बात तो तय है कि इमरान जीतने में यकीन रखते हैं चाहे कितने ही रंग बदलने पड़ें। लाहौर में जन्मे पश्तून इमरान खान ने दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र विषय के साथ ऑक्सफ़ोर्ड से स्नातक किया है। यह पृष्ठभूमि उन्हें खासा आधुनिक सोच का बनाती है। क्रिकेटर इमरान खान की पारी काफी ग्लैमरस रही। सन्यास के बाद लौटे और पाकिस्तान को अपनी कप्तानी में वर्ल्ड कप दिलाया। फिर 1996 में अपनी नयी पार्टी के साथ राजनीतिक पारी खेलने के लिए आ जुटे। यकीनन, उन्हें किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया और वे खुद भी 2011 तक कुछ गंभीर नहीं लगे। इनकी तीनों बीबियों की पृष्ठभूमि ध्यान से देखें तो उससे भी अंदाजा लगता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्रमशः बदली हैं। राजनीति में भी उनके कई रंग देखने को मिले। 1996 के इमरान, खासा आदर्शवादी रहे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 2008 के आम चुनावों का उन्होंने बहिष्कार किया था, फिर 2010-11 आते-आते उनमें एक चालाक आक्रामक राजनीतिज्ञ दिखने लगा। आज के इमरान जानते हैं कि बिना इस्टैब्लिशमेंट में पैठ बनाये पाकिस्तान की सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन है। इमरान खान की आज की राजनीति के फॉर्मूले में दुनिया की दूसरी युवा आबादी को अपील करने वाली उनकी खिलंदड़ छवि है, पाकिस्तान के डीएनए में रचा धर्म है, इस्टैब्लिशमेंट की रीढ़ सेना को समर्थन करते हुए उसकी अनुशासित छवि भुनाने का शऊर है और उम्मीद रखने वालों के लिए ‘नया पाकिस्तान’ का जुमला है। इसका असर चुनाव परिणामों पर कुछ इस कदर हुआ कि पाकिस्तान के चुनाव-परिणाम मैप को देखने से लगता है कि एकमात्र पीटीआई पार्टीं ही सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी है।   

इमरान खान की जीत में कुछ और दूसरे महत्वपूर्ण अपरोक्ष कारकों का उल्लेख करना जरूरी है। चुनाव आयोग आख़िरी समय तक प्रत्याशियों की उम्मीदवारी ख़ारिज करता रहा। मतदान के तुरत बाद में पाकिस्तान में मतगणना की परम्परा है और फिर परिणामों की घोषणा कर दी जाती है, पर इसबार अचानक रात के दो बजे मतगणना रोक दी गयी और परिणाम तयशुदा समय से लगभग छप्पन घंटे की देरी से आया। पीएमएल (एन) के आवाज उठाने पर चुनाव आयोग ने प्रेस कांफ्रेंस किया और कारण तकनीकी बताकर पल्ला झाड़ लिया। बिलावल भुट्टो ने ट्विटर पर जगह-जगह फॉर्म-45 न देने की बात कही। फॉर्म-45 चुनाव मतगणना के बाद पार्टी एजेंटों को दिया गया आधिकारिक एवं हस्ताक्षरित वह प्रपत्र है जिसमें उस बूथ के मतदान और परिणाम की प्रत्येक जानकारी होती है। कई जगह इसे सादे कागज पर ही दे दिया गया। लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए ईयू ने पाकिस्तान के पिछले तीन आम चुनावों की भाँति इसबार भी अपना पर्यवेक्षक दल भेजा पर उनका वीजा क्लियरेंस में पाकिस्तान ने इसबार देरी की। इसबार दबे स्वर से लगभग सभी विश्लेषकों ने माना कि मीडिया सेंसरशिप अघोषित रूप से लागू रही। पर्यवेक्षक टीम के मुखिया माइकल गाहलर के हवाले से पाकिस्तान का डॉन जहाँ यह छापता है कि चुनाव संतोषजनक रहे और 2013 के आम चुनाव से भी स्वच्छ व निष्पक्ष रहे वहीं ब्रिटिश अख़बार द गार्जियन के अनुसार माइकल गाहलर ने इन चुनावों के मुकाबले 2013 के चुनावों को अधिक स्वच्छ व निष्पक्ष कहा। पहली बार ऐसा हुआ कि पांच प्रमुख दलों ने पुनर्मतदान एवं धांधलियों की कराने की माँग की। आतंकी घटनायें इस चुनाव में भी होती रहीं, बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में चुनाव के दिन ही आत्मघाती हमला हुआ और तकरीबन पैतीस लोग मारे गए और पैतालीस से अधिक घायल हुए। सेना की भारी तैनाती जमी रही और चुनाव में फिर भी मत प्रतिशतता पहले के मुकाबले अधिक बताई जा रही। इस्टैब्लिशमेंट की पकड़ इस चुनाव में कुछ इस कदर है कि चुनाव परिणामों के बाद विपक्षी दलों ने मिलकर धांधलियों की जांच की मांग उठाने का फैसला किया लेकिन पीपीपी के बिलावल और पीएमएल के नवाज़ अंततः उस साझे विरोध से पीछे हट गए। 

लोकतंत्र की प्रक्रिया में ‘राजनीतिक क्षय’
प्रसिद्द राजनीति विज्ञानी सैमुअल पी हटिंगटन ने नवस्वतंत्र देशों के राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए एक बेहतरीन सिद्धांत दिया है। उनका कहना है कि किसी देश में राजनीतिक विकास तब होता है जब राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना एवं उनका विकास उसी अनुपात में हो जितनी उस देश की जनता की राजनीतिक मुद्दों के प्रति जुटान (पॉलिटिकल मोबिलाईजेशन) हो। यदि किसी देश में राजनीतिक संस्थीकरण की प्रक्रिया किसी कारण से तीव्र हो और उस अनुपात में पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन न हो, अथवा जितनी मात्रा में पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन हो उस अनुपात में किसी कारण से राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना न हो पा रही हो तो समय के सापेक्ष राजनीतिक विकास न होकर ‘राजनीतिक क्षय’ होता है जो उस देश की राजनीतिक संस्कृति को अंततः नुकसान पहुँचाता है। 

पाकिस्तान के उथल-पुथल राजनीतिक इतिहास में मुशर्रफ के बाद बड़े प्रयासों से 2008 में एक लोकतांत्रिक सरकार यथासंभव स्वच्छ व निष्पक्ष रीति से चुनी गयी थी, जो यदि प्रतिबद्धता से कार्य करती तो लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी-अपनी मर्यादा में रहती और सेना अपने बैरकों में ही रहती। पीपीपी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और 2013 के चुनाव में पाकिस्तान के इतिहास का पहला शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण सम्भव हुआ और नवाज़ शरीफ़ को सत्ता मिली। दुर्भाग्य से पीएमएल सरकार भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे और शरीफ सरकार, सेना और कटटरपंथियों के समक्ष घुटने टेकती रही। दो चुनी हुई सरकारों का लचर प्रदर्शन पाकिस्तान के संभावित ‘राजनीतिक विकास’ को अब ‘राजनीतिक क्षय’ में बदलेगा क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया दुहराई तो गयी है पर निभायी नहीं गयी है। इन सरकारों के भ्रष्टाचारों व लचर प्रदर्शनों ने एकबार फिर आम अवाम का सेना के अनुशासन के प्रति दृष्टिकोण सकरात्मक किया है, इस्टैब्लिशमेंट फिर से शक्तिशाली हुई है और उस इमरान खान की पार्टी इसबार सत्ता में आयी है जो सेना को पाकिस्तान का एकमात्र हीरो मानता है और नवाज़ शरीफ को महज इसलिए देश का गद्दार मानता है कि उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकातें कीं। यों तो इमरान खान अपने जीवन में अचानक रिवर्स स्विंग कराने लगते हैं और विरोधी उन्हें मास्टर ऑफ़ युटर्न्स भी कहते हैं, तो सम्भव है कि इमरान कुछ रिस्क लें और सचमुच एक ‘नया पाकिस्तान’ बनाने की कोशिश नज़र आये, वरना अभी तो वह बस इस्टैब्लिशमेंट का लोकतांत्रिक लिहाफ लग रहे जिसके भीतर रहकर वह सत्तासुख सेना भोगने को आतुर है। 

इमरान खान के लिए चुनौतियाँ 
पाकिस्तान भीषण जलसंकट और नकदी के संकट से गुजर रहा है। अर्थव्यवस्था जर्जर है और बेरोजगारी चरम पर है। अर्थव्यवस्था के लिए आईएमएफ से दूसरे आर्थिक पैकेज की माँग और पूर्ति कठिन होने वाली है। जल संरक्षण तकनीक व नहरों के निर्माण में समय व धन की दरकार है। उग्र आतंकवादी संगठनों से निपटना अगली बड़ी चुनौती है और इससे निपटना इसलिए भी आसान नहीं होगा क्योंकि इमरान के सुर धार्मिक कट्टरपंथियों के लिए खासा अच्छे रहे हैं और वे उसी इस्टैब्लिशमेंट के हिस्से हैं, जिन्होंने इमरान खान की पार्टी को मदद पहुंचाई है। विदेश नीति में अमेरिका से होते खट्टे रिश्तों को पटरी पर लाना असली चुनौती होगी तो इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, सऊदी अरब, रूस और चीन से संगति बिठाना आसान नहीं होगा। पिछले दो-तीन सालों से भारत के साथ रिश्ते भी बिलकुल जमे से हैं, जिद्दी इस्टैब्लिशमेंट के साथ उन जमी रिश्तों को आंच देना काफी मुश्किल होगा। यह रिस्की भी होगा क्योंकि पाकिस्तान में कहते हैं कि कोई चुनी हुई नागरिक सरकार तभी खतरे में आती है जब सुरक्षा और विदेश नीति के मामले में सेना से इतर फैसले लेती है, जो कि उसका पारम्परिक क्षेत्र माना जाता है और इसमें ‘लाडले इमरान’ की दखलंदाजी भी सेना बर्दाश्त तो नहीं करेगी।   


Saturday, July 7, 2018

कश्मीरी कशमकश: नेपथ्य कथ्य

साभार: गंभीर समाचार 


जम्मू एवं कश्मीर के मायने सबके लिए एक नहीं हैं। सबकी अपनी-अपनी नज़र है और अपनी-अपनी समझ। इन सबके अपने-अपने नारे हैं और सब अपने-अपने सवालों के साथ हैं। इतिहास में आपस में लड़ते अध्याय हैं। राजनीति विरोधाभासी माँगों के जायज़-नाजायज़ होने में उलझी है। भूगोल इन सबसे बेखबर पर्यावरण की चुनौतियों को खामोशी से सह रहा। अर्थशास्त्र उस हिसाब में है कि केंद्र ने कश्मीर और जम्मू को कितना भेजा। लोक प्रशासन दफ्तर की फाइलों में हुए विकास और जमीन पर हुए विकास का अंतर मन मसोस स्वीकार कर रहा। शिक्षा, इस राज्य में अपना कोई लक्ष्य ही नियत नहीं कर पा रही। विज्ञान महज उन्हें उपलब्ध है जिनकी पहचान कश्मीरी तो है पर आबोहवा किसी मेट्रो शहर की है। दर्शन में कश्मीरीयत है पर उसकी मकबूलियत कश्मीरी नहीं है। साहित्य और भाषा के अपने संकट हैं, लिखे जा रहे तो पढ़े नहीं जा रहे, पढ़े जा रहे तो समझे नहीं जा रहे, समझे जा रहे तो फिर बोले नहीं जा रहे, बहसें एकतरफ़ा हैं लोग लामबंद हैं। 

जो जम्मू है वह कश्मीर नहीं है। लद्दाख अपनी साख अलग ही छिपाए बैठा है। चीड़, चिनार, देवदार आपसे में बात नहीं कर रहे। झेलम, चिनाब, सिंधु, तवी एक-दूसरे के दुखों से अनजान हैं। पाकिस्तान और चीन एक-एक हिस्सा अपने पास दबाये बैठे हैं। मुंबई के लिए जो कश्मीर है वही दिल्ली के लिए नहीं है। और तो कितने शहरों के लिए कश्मीर महज एक खबर है जो चौबीस घंटे अनसुनी सी चलती रहती है। भारत के आम अवाम के लिए यह राज्य देशभक्ति और राष्ट्रवाद का लिटमस टेस्ट है। भाजपा को यहाँ धारा 370 की याद आती है तो कांग्रेस को यहाँ महज अल्पसंख्यक याद आते हैं। 

कश्मीर को लेकर कश्मीरी नेता भी ईमानदार नहीं हैं। भविष्य की कोई रुपरेखा नहीं, बस राजनीतिक लाभ की सियासत। मुस्लिम दिल्ली से नाराज हैं कि वह केवल दमन की भाषा जानती है, लेकिन कश्मीरी पंडितों के साथ हुए ज्यादतियों के बारे में उनकी युवा पीढ़ी न केवल अनभिज्ञ है बल्कि इसे लेकर उनके मन में किसी गलती का भाव भी नहीं है। मुस्लिम समाज ने कश्मीरी पंडितों से वार्ता और सामंजस्य का कोई उदाहरण भी पेश नहीं किया है और एक सर्वमान्य हल के रूप में उनके पास कोई सकारात्मक योजना भी नहीं है। कश्मीरी पंडित, दिल्ली से खफा होते हैं कि उनकी सुधि कोई नहीं लेता। सत्ता जब पक्ष में हो तो सामंजस्य की कोशिशों का सर्वाधिक महत्त्व होता है। आगे बढ़कर कश्मीरियत के लिए इनके प्रयास भी नगण्य ही हैं। प्रतिकार की राजनीति दलों को लाभ देती है लेकिन समाज को तो तोड़ती ही है। ये दोनों कौमें अपनी भावी पीढ़ियों को वही सब कुछ विरासत में देने वाली हैं जो इन्हें मिला हुआ है। इतिहास किसी के लिए भी कुछ अधिक टेसुएँ नहीं बहायेगा। कमोबेश उन्हीं जुमलों और तर्कों से भाजपा ने पीडीपी के साथ हाथ मिलाकर कश्मीर में सरकार बनाई थी जिनका हवाला देकर तीन साल बाद गठबंधन तोड़ा है। हिंसा इन तीन सालों में अधिक बढ़ी ही और शांति के तर्क से दमन के कुछ तरीकों को पूरी बेशर्मी के साथ जायज़ करार देने की कोशिशें भी हुईं। शांति के लिए कौन लड़ रहा इस समय कश्मीर में कहना मुश्किल है। क्या राजनीतिक दल, क्या मुस्लिम, क्या हिन्दू, क्या युवा, क्या बुजुर्ग, क्या सेना क्या समाज। सभी बस डटे हुए हैं अपनी-अपनी शैली में दिशाहीन।  

कश्मीर को लेकर हर एक की जवाबदेही है, कुछ ज़िम्मेदारी है। देश की स्वतंत्रता के बाद एक बड़ी चुनौती राष्ट्र-निर्माण की थी, जो अभी भी पूरी नहीं हुई है। राष्ट्र-निर्माण महज एक सरकारी मिशन नहीं है। नागरिक समाज की भी इसमें भूमिका है। अलग-अलग संस्कृतियों को राष्ट्रीयता के एक सूत्र में उनका अपना निजी स्पेस देकर ही बांधा जा सकता है, कहीं न कहीं ऐसी कोशिशें असफल हुई हैं। शिक्षा व्यवस्था ने भारत के आम-अवाम को कश्मीर के इतिहास, भूगोल और संस्कृति के बारे में कोई व्यापक समझ नहीं दी है। कश्मीरी सरकारों ने भी देश के दूसरे राज्यों से अपनी सरोकारिता कितनी निभायी है। दिल्ली, कश्मीर में महज चुनाव करवाकर लोकतंत्र की लाज बचाती रही है। पाकिस्तान और भारत के हुक्मरान अपनी-अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए जीते-जागते कश्मीर को महज एक खौलता मुद्दा बनाते रहे । राजनीतिक दल केवल सत्ता की ओर ताकते रहे। सारे कश्मीरी गुट इसमें अपना-अपना सियासी हिस्सा तलाशते रहे। देश तब तो एकजुट होकर साथ देने को उद्यत हो जाता है जब भारत-पाकिस्तान युद्ध में उतरते हैं, भले ही वह मैदान खेल का हो, लेकिन रोजमर्रा के वारदातों पर लगाम लगाने की कोशिशों पर देश का अवाम दिल्ली पर एकजुट होकर दबाव नहीं बनाता। देश का अवाम अपने केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर के स्कूलों, अस्पतालों, खेतों, बागों, घरों, महिलाओं, बच्चों, बेरोजगारों, बुजुर्गों की हिफाजत पर सवाल नहीं पूछता। अवाम, सेना की ज्यादतियों पर उसीतरह आँख फेर लेती है जिसतरह कश्मीर पत्थरबाजों पर। एक राज्य है भारत का जम्मू व कश्मीर, जिसमें जिंदा कौमें रहती हैं, जिनकी जिंदगी जहन्नुम बनती है तो यह सवाल बनकर भारत के प्रत्येक नागरिक के गले में अटकता क्यों नहीं?

जो महज अख़बार और टीवी के पक्षपातपूर्ण रपटों से इतर जम्मू और कश्मीर को जानने की मंशा हो, देश से प्यार जो समूचा हो, जो समझते हों कि देश महज राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, तिरंगा और अशोक चक्र नहीं, कि देश महज नदी, पहाड़, जंगल, सड़क, नहर नहीं, कि देश महज शहर, कारखाना, मॉल नहीं, बल्कि देश सबसे पहले उसके नागरिकों से बनता है, आप और हम ही देश को बनाते हैं तो यह समझना भी आसान नहीं कि ‘कश्मीर हमारा है’ से अधिक महत्वपूर्ण नारा ‘कश्मीरी हमारे हैं’ है और अपनों से पेश आने की एक तहजीब होती है। जैसे ही ‘जम्मू व कश्मीर’ टीवी, अख़बार से निकलकर एक जीता-जागता समुदाय महसूस होगा तो फिर तुरत ही समझ आएगा कि कश्मीर के राजनीतिक धड़े, राजनीतिक दल और भाजपा-कांग्रेस महज चुनाव की तैयारी कर रहे हैं और अपने-अपने वोटबैंक सहेजने की कोशिश में हैं। इन्हें प्यार महज सत्ता से है क्योंकि कश्मीर इनके लिए राज्य न होकर महज एक मुद्दा है, जिसे जिन्दा रखना जरूरी है भले ही कश्मीर एक जिन्दा लाश बना रहे। ये यूँ इसलिए हैं क्योंकि हम, भारत के लोग सवाल नहीं कर रहे, क्योंकि सही और गलत की पड़ताल किये बिना हम अपना वोट जाया कर रहे, क्योंकि हमें इतिहास, भूगोल और राजनीति बकवास लगते हैं, क्योंकि हमने अपनी अगली पीढ़ी का मकान और मुकाम अमेरिका और यूरोप में तलाशना शुरू कर दिया है।   

Wednesday, June 13, 2018

फिर वही दिल लाया हूँ...!

गंभीर समाचार 


निस्संदेह, भारतीय विदेश नीति के इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्याय रुचिकर रहेगा। नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में व्यक्तिगत रूचि है और विश्व नेताओं से एक व्यक्तिगत रिश्ता बनाने में यकीन रखते हैं। लेकिन विदेश यात्राओं के मामले में उनका रिकॉर्ड यदि बेहद उल्लेखनीय है तो इसका एक कारण मौजूदा वैश्विक परिघटनाओं का बेहद अनिश्चित होना भी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक सुपरपॉवर राष्ट्र जहाँ अपने लिए ध्रुवीकृत और स्पष्ट समर्थन चाहता है वहीं एक वर्ल्डपॉवर राष्ट्र सभी अन्य राष्ट्रों से संतुलित संबंध की आकांक्षा रखता है। अमेरिका का अपने सहयोगियों से निर्बाध समर्थन की अपेक्षा रखना ठीक वैसे ही उचित है जैसे भारत जैसे देशों का लगभग सभी महत्वपूर्ण राष्ट्रों से संबंधों की अपेक्षा रखना उचित है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के आर्थिक परिप्रेक्ष्य ने जहाँ सर्वोच्च शक्ति अमेरिका को यह सहिष्णुता दी है कि विश्व के राष्ट्र संबंधों के मनचाहे आयामों यथा- द्विपक्षीय, बहुपक्षीय आदि में अपने अंतरराष्ट्रीय संबंध बना सकते हैं वहीं भारत जैसे देश वैश्वीकरण से उपजी अपनी नयी शक्ति व स्वीकार्यता को ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ के प्रदर्शन के निमित्त मनचाहा ‘ठोस पक्ष’ अपना सकते हैं। 

बिखरे अफ़ग़ानिस्तान, अशांत पाकिस्तान, उत्कट चीन, विकट रूस और बेतरतीब हिंद महासागर के देशों से घिरे भारत को अमेरिका का सामरिक-रणनीतिक साथ चाहिए था। भारत-अमेरिकी संबंध की गहरी आयोजना जार्ज बुश, बराक ओबामा से होते हुए ट्रम्प तक आ पहुँची थी। युक्रेन विवाद के बाद रूस का चीन की तरफ झुकना, चीन का आक्रामक ओबोर नीति अपनाना, चीन का पाकिस्तान के साथ गलबहियां करना और फिर रूस का पाकिस्तान को पुचकारना, यह सभी परिस्थितियाँ भारत के लिए कठिन चुनौतियाँ पेश कर रहे थे। शक्ति-संतुलन के लिए भारत, अमेरिका की ओर झुकता गया और जापान, आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक अनौपचारिक सामरिक गठबंधन चतुष्क (QUAD) का भाग बन गया जिसकी पृष्ठभूमि मालाबार अभ्यास से बनी थी। अमेरिका ने इसलिए ही भारत को महत्वपूर्ण वैश्विक भूमिका निभाने को आश्वस्त किया और समूचे प्रशांत- हिंद क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक’ कहकर रणनीतियाँ बनानी शुरू की। डोकलाम विवाद से चीन ने भारत-अमेरिका की नयी बनती समझ की शक्ति जाननी चाही और भारत ने भी अपने रुख से जतला दिया कि वह तैयार है। इस बीच चीन और रूस के राष्ट्राध्यक्ष जहाँ अपने-अपने देशों में लगभग सबसे बड़े निर्णायक शक्तिकेंद्र बनकर उभरे वहीं भारत से उनके रिश्ते ठिठकने लगे थे। ऊर्जा जरूरतों ने जरूर भारत को मजबूर किया था कि वह मध्य एशिया के देशों से अपने संबंध प्रगाढ़ बनाये रखे और इसी क्रम में चीन-पाकिस्तान के द्वारा की गयी नाकेबंदी को तोड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के काम को द्रुत गति से संपन्न करने में मदद दी। 

पेशे से व्यापारी ट्रम्प ने जबसे अमेरिकी विदेश नीति में भी अपनी वणिक बुद्धि लगाई है, सभी देश, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समीकरण की नई व्युत्पत्ति (डेरिवेशन) खोजने में लगे हैं। घरेलू राजनीति के अपने ‘अमेरिका फर्स्ट’ नारे को महज जुमला न रखते हुए ट्रम्प अपने देश के हित में कुछ ऐसी संरक्षणवादी नीतियों का सहारा ले रहे हैं जिनसे फौरी तौर पर आर्थिक रूप से यदि अमेरिका को लाभ होगा भी तो दीर्घावधि में सामरिक रूप से काफी हानि उठानी पड़ सकती है। ट्रम्प, विदेश नीति में भी खासा कारोबारी (ट्रांजैक्शनल) रुख अख्तियार कर रहे हैं। वह बहुपक्षीय रिश्तों से अधिक द्विपक्षीय रिश्तों को तरजीह दे रहे हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी देश को अमेरिका का सहयोगी राष्ट्र बनने से किसी क्षेत्र विशेष में लाभ है तो उसका भार उठाने में वह देश भी स्पष्टतया आगे आये। इससे पहले एकलौते सुपरपॉवर अमेरिका की यह वरीय जिम्मेदारी होती थी। इसलिए ही भारत से जब-तब मांग की जाती है कि वह अफग़ानिस्तान में अपने सुरक्षा बल भी भेजे। ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ कहने के पीछे भी अमेरिका की यही मंसा है क्योंकि यदि चीन का उभार केवल अमेरिका के लिए ही नहीं एक चिंता का विषय है तो भारत को भी हिन्द महासागर क्षेत्र से प्रशांत क्षेत्र तक की जिम्मेदारी उठानी होगी। 

ट्रम्प, अमेरिका की विदेश नीति को खासा घरेलू बना रहे हैं और ओबामा प्रशासन के समय विकसित हुई सभी बड़े मसलों पर पनपी समझ से अपने कदम पीछे खींच रहे हैं। ट्रम्प का यह अनिश्चित व्यवहार, उनका अडवेंचरिज्म, अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को एक बेहद कठिन और अनिश्चित स्थिति में डालता है। ट्रम्प के हालिया CAATSA प्रावधान ने तो अति ही कर दी जिसके मुताबिक अमेरिका, ईरान, रूस और उत्तर कोरिया से पर प्रतिबंध लगाने की बात की है जिससे इन राष्ट्रों के साथ-साथ, इनसे जुड़े दूसरे राष्ट्रों के व्यापारिक हितों पर कुप्रभाव पड़ना तय है। तेल और रक्षा जरूरतों के लिए भारत सीधे क्रमशः ईरान और रूस से जुड़ा हुआ है। CAATSA के प्रावधानों की आलोचना जहाँ ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी सहित दूसरे यूरोपीय देशों ने एक-स्वर में की है वहीं उन्होंने अमेरिकी अनिश्चितत्ता के सापेक्ष दृढ़ रूस की प्रशंसा उसे यूरोप का पारम्परिक-अभिन्न अंग बताकर की है। 

वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति के इस बदलते टेम्पलेट में भारत, रूस और चीन से अपने रिश्तों को सम्हालने को मजबूर हो गया है। यों भी क्षेत्रीय राजनीति के तथ्यों को नजरअंदाज कर वैश्विक राजनीति नहीं की जा सकती। हिंद महासागर में बढ़ते चीन का प्रभाव और मध्य एशिया व मध्य-पूर्व एशिया में रूस की बढ़ती अहमियत ने भारत को विवश किया है कि वह अपना गियर बदले और रुख बीजिंग और मास्को की ओर मोड़े। इधर उत्तर कोरिया के दक्षिण कोरिया और अमेरिका से बढ़ते ताल्लुकातों के मद्देनज़र चीन और रूस के लिए भी जरूरी था कि ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान के साथ-साथ भारत को भी लुभाया जाय। रूस ने भारत की पैरवी कर चीन संचालित बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक संगठन शंघाई सहयोग संगठन की पूर्ण सदस्यता दिलवाई, भारत के लिए एन. एस. जी. और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् में सदस्यता की वकालत की। रूस ने भारत को यह इंगिति दे दी है कि बदलते वक्त में भारत का चीन की उपेक्षा करना समझदारी नहीं होगी जबकि अमेरिका काफी स्वार्थी रुख अपना रहा है। 

भारत ने संकेत लेते हुए अपना रुख लचीला किया और चीन और रूस से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू कीं। अप्रैल के आखिरी दिनों में मोदी सहसा चीन के शहर वुहान पहुँचे, जिसकी तैयारियाँ दोनों देशों के अधिकारी महीनों से कर रहे थे। दोनों देशों ने इसे एक ‘अनौपचारिक भेंट’ का नाम दिया जिसमें पहले से कोई भी एजेंडा नियत नहीं था। दो दिनों की अपनी इस यात्रा में मोदी और शी जिनपिंग लगभग दस घंटे के पारस्परिक वार्ता में रहे। बताया गया कि दोनों नेताओं ने लगभग सभी पारस्परिक मुद्दों पर प्रभावी बातचीत की।  भारत-चीन ने अफगानिस्तान में संयुक्त आर्थिक प्रक्रम पर सहमति जताई और सीमा पर तैनात अपने-अपने देश की सुरक्षा को नवीन सामरिक निर्देश देने की बात की। दोनों नेताओं ने भविष्य में सामरिक और रक्षा सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था पर भी सहमति जताई। चीन से बढ़ती नजदीकी का लाभ निश्चित ही भारत-पाकिस्तान संबंधों में भी एक सरलता लाएगा। आपसी व्यापारिक चिंताओं पर बात करते हुए मोदी और जिनपिंग ने बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपनी आस्था व्यक्त की। ‘वुहान अनौपचारिक भेंट’ की सफलता पर जहाँ चीनी अख़बार उल्लास व्यक्त कर रहे थे वहीं इस ‘अनौपचारिक भेंट’ की अगली कड़ी के रूप में मोदी का जिनपिंग को 2019 में भारत यात्रा का निमंत्रण भी छाया रहा। वुहान अनौपचारिक भेंट की ही तर्ज पर मोदी ने 21 मई को रूस के शहर सोची की यात्रा की जहाँ राष्ट्रपति पुतिन से उनकी गहन वार्ता हुई। दोनों देशों ने पारंपरिक संबंधों का हवाला दिया और लगभग सभी द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर विमर्श किया। राष्ट्रपति पुतिन स्वयं, मोदी को छोड़ने हवाई अड्डे पर आये और पश्चिमी मीडिया भारत के इस ‘अनौपचारिक भेंट कूटनीति’ पर टिप्पणी करता रहा। 

रूस और चीन के लिए ‘फिर वही दिल लाकर’ मोदी ने एक संतुलन साधने की कोशिश अवश्य की है लेकिन अमेरिका द्वारा पिछले 30 मई को अपने बेहद महत्वपूर्ण पैसिफिक कमांड का नामकरण ‘इंडो-पैसिफिक’ करना बताता है कि भारत दरअसल एशियाई राजनीति की ऐसी धुरी बन गया है जिसपर सभी विश्वशक्तियाँ झूलने को तैयार हैं। यह भारत को कूटनीतिक अवसर तो देता है पर चुनौतियों की नयी गंभीरता भी बनाता है।         

Thursday, May 31, 2018

त्रेता में मोदी और कल में ओली

साभार: गंभीर समाचार 



जब हम पैदल होते हैं तो तेज रफ़्तार गाड़ियों पर कोफ़्त होती है और जब हम गाड़ी में होते हैं तो कई बार बीच में आ जाने वाले पैदल यात्रियों पर कोफ़्त होती है। यहाँ, नैतिकता से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न वरीयता का है। विश्व-राजनीति में कुछ इस तरह ही अपने राष्ट्र के हित ही वरीय होते हैं चाहे हमारा अतीत कुछ भी हो और वर्तमान जैसा भी हो। एक समझदार राष्ट्र और उसके कुशल कूटनीतिज्ञ यह समझते हैं कि अपने राष्ट्र के राष्ट्रहित किसी दूसरे राष्ट्र के सापेक्ष तभी और उसी सीमा तक साधे जा सकते हैं, जब और जिस सीमा तक हमारे हितों की आयोजना में उस राष्ट्र को अपना राष्ट्रहित भी दिखे। भारत-नेपाल संबंधों में भारतीय कूटनीति से यह त्रुटि हाल के वर्षों में हुई है। 

भारत अपने गहरे सांस्कृतिक संबंधों की थाती पर नेपाल और भूटान से आधुनिक संबंधों का निर्वहन करता रहा है। इसलिए ही भारत से लगी दोनों राष्ट्रों की सीमायें ‘ओपन बॉर्डर सिस्टम’ में हैं और दोनों राष्ट्रों के नागरिक भारतीय सीमा में आवाजाही कर सकते हैं। राष्ट्रहित कोई स्थिर मूल्य नहीं हैं। वैश्विक राजनीतिक हलचलों के अनुरूप उनमें गतिक सम्भावना बनती रहती है। पड़ोस में उभरते शक्तिशाली चीन के बीचो-बीच भूटान और नेपाल, भारत के लिए बफर-स्टेट हैं, इसलिए ही भारत के दोनो  राष्ट्रों से संबंध अहम हैं। भूटान और नेपाल के चीन के साथ संबंधों का कोई मजबूत पारंपरिक आधार नहीं रहा है और इसलिए भी भूटान और नेपाल, भारत के साथ अपनी नजदीकियाँ स्वाभाविक मानते रहे और चीन से उनकी कमोबेश दूरियाँ बनी रहीं। दोनों ही देश स्थलबद्ध (लैंडलॉक्ड) देश हैं और सामुद्रिक व्यापार के लिए भारत पर निर्भर हैं। बुद्ध की मंदस्मित से भूटान और राम की आदरणीय दृष्टि से नेपाल, भारत को देखता रहा। ‘मुक्त सीमाओं’, पर होने वाले पारस्परिक लाभों के अनुपात में भ्रष्ट भारतीय नौकरशाही से होने वाली हानियाँ नज़रअंदाज़ की जाती रहीं। 

संपूर्ण विश्व के लिए एक शानदार उदाहरण बनाते हुए भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने अपने देश में पहले लोकतांत्रिक संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक चुनाव कराया और 2007-2008 में यह देश राजशाही छोड़ एक लोकतांत्रिक सांविधानिक राजशाही वाला देश बन गया, जहाँ संसद के दो-तिहाई बहुमत से राजा पर महाभियोग भी आरोपित किया जा सकता है। इधर अपने तीन दशक के त्रासद राजनीतिक अस्थिरता से जूझते नेपाल ने भी राजशाही समाप्त कर और माओवादियों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाकर 2008 में संविधान-सभा गठित कर लोकतंत्र को अपनाने की प्रक्रिया शुरू की । नेपाल के तिब्बत से सटे ऊंचाई पर बसे इलाके हिमाल कहलाते हैं, पहाड़ के लोग मध्य नेपाल के निवासी हैं और भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार से जुड़े सीमाई लोग मधेसी अस्मिता वाले तराई के कहलाते हैं। यह विभाजन इतना सरल नहीं है, पर नेपाली राजनीति में इनकी जटिलताएं महत्त्वपूर्ण हैं और इसीलिए नेपाल की संविधान निर्माण की यात्रा इतनी दुरूह रही है। सितम्बर 2015 में  दूसरा नया लोकतांत्रिक संविधान स्वीकार किया गया। इस नए संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक नेपाल में नयी सरकार वामपंथी गठबंधन के खड्ग प्रसाद ओली के नेतृत्व में बन चुकी है और फ़िलहाल वामपंथी गठबंधन 17 मई 2018 को दो अध्यक्षों के साथ एक दल ‘नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी’ में परिणत हो गया।  

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की चुनी हुई सरकार किसी भी अन्य चीजों की बजाय अपना राष्ट्रहित ही प्रथम रखेगी। इसलिए ही डोकलम मुद्दे के बाद प्रधानमंत्री शेरिंग ताबगे का भूटान सचेष्ट हुआ है और ओली का नेपाल, भारत और चीन के मध्य बफर स्टेट की स्थिति के लाभों के दोहन को लेकर आतुर हुआ है। लगभग इसी दशक में शक्तिशाली चीन ने दक्षिण एशिया में भारत के पड़ोसियों से संपर्क घना करते हुए भारत को अपनी स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की नीति से घेरना शुरू किया है। चीन ने अपने शक्तिशाली नेता शी जिनपिंग को अब उनके पूरे जीवनकाल के लिए चुन लिया है। ग्लोब पर नेपाल तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है और ऊपर की और उत्तर में इसका मुहाना चीन की ओर खुलता है। भारत की नेपाल से 1950 में की गयी ‘फ्रेंडशिप ट्रीटी’ के ‘मुक्त-सीमा प्रबंधन’की तर्ज पर सजग चीन ने 1968 में अपनी सीमा भी ‘फ्रेंडशिप हाइवे’ के नाम से लगभग खोल ही दी। अब जबकि नए नेपाल में वामपंथी सरकार बनी है, चीन और नेपाल के संबंध निश्चित ही प्रगाढ़ होने वाले हैं। 

नेपाल विषय पर कहना होगा कि मोदी सरकार से बार-बार ग़लतियाँ हुई हैं। प्रधानमंत्री बनते ही नेपाल उन देशों में रहा जहाँ मोदी ने शुरू में ही यात्रा की। लेकिन राजनीति में परसेप्शन और प्रतीकों का महत्त्व जानने वाले समझते हैं कि अपनी पहली यात्रा और हालिया की गयी तीसरी यात्रा में मोदी ने वही ग़लतियाँ दोहराई हैं। संभवतः भारतीय कूटनीतिक कुटुंब अभी भी नेपाल को हिन्दू राजतंत्र की तरह ही देख रहा है। मोदी की पहली यात्रा अगस्त 2014 में एक ऐसे समय में हुई जब नेपाल में विभिन्न नागरिक-अस्मिताएँ आगामी संविधान में अपनी जगह बनाने को संघर्षरत थीं। राजशाही के बाद यह तय था कि आगामी लोकतांत्रिक संविधान में जो नया नेपाल गढ़ा जायेगा वह महज बहुसंख्यक हिन्दू अस्मिता को सर्वोपरि नहीं रखेगा। विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण और इंटरनेट के इस दौर में नेपाल की जनता सजग होकर कदम उठा रही थी कि नए नेपाल की राजनीतिक पहचान महज धार्मिक कत्तई न हो। ऐसे में मोदी की पहली यात्रा में जो उनकी छवि निर्मित हुई वह पशुपतिनाथ मंदिर में 2500 किग्रा चंदन चढ़ाने वाले और धर्मशाला के लिए 25 करोड़ रूपये देने वाले एक ऐसे भारतीय नेता की हुई जो अपनी धार्मिक पहचान को राष्ट्रप्रमुख रहते हुए भी व्यक्त करना चाहते हैं। 

इसके कुछ महीने बाद ही सार्क सम्मेलन (नवंबर 2014 ) में हिस्सा लेने गए मोदी चाहते थे कि वे नेपाल के धार्मिक स्थल जनकपुर, मुक्तिनाथ व लुंबिनी के दर्शन भी करें पर उन्हें अनुमति नहीं मिली थी। नेपाली राजनीति में राजशाही के दौर से ही हिमाल और पहाड़ के बाहुन और खेत्री/छेत्री समुदाय लगभग 29% जनसंख्या के साथ सर्वाधिक प्रभावी रहे हैं और तराई के मधेशी, 35% जनसंख्या के साथ भी राजनीति में सीमान्त ही रहे हैं। मधेसी समुदाय, भारतीय सीमा में घुला-मिला समुदाय है और भारत से इनके गहरे आर्थिक-सांस्कृतिक संबंध हैं। नेपाल के प्रोविंस नंबर-2 में मधेस सर्वाधिक तादात में हैं और जनकपुर इस प्रोविंस का हेडक्वार्टर भी है। सार्क-सम्मेलन के दौरान जबकि नेपाल में नए संविधान के पूरे होने की समय-सीमा में महज दो महीने शेष थे, संविधान सभा की कार्यकारी सरकार ने मोदी की जनकपुर यात्रा पर मुहर नहीं लगाई ताकि किसी किस्म की लामबंदी न हो। 

अप्रैल 2015 में आये विनाशक भूकंप में भारत और चीन ने नेपाल की मानवीय मदद की, किन्तु प्रधानमंत्री मोदी के उत्कट लोकसभा विजय-अभियान की ख़ुमारी में ही रहने वाले कुछ अतिवादी मीडिया टीवी चैनल की अतिवादी प्रस्तुति ने भारतीय कूटनीति के कमाए गुडविल फैक्टर को लील लिया। चीन ने मौके का फायदा उठाया और नेपाल की कई अवसरंचनात्मक प्रोजेक्ट्स में निवेश किया। नेपाल ने उसके महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड (एक मेखला एक मार्ग ) नीति से जुड़ने में भी दिलचस्पी दिखाई। पिछले तीन सालों से चीन के जिस प्रस्ताव की खूब चर्चा है और जिसपर मौजूदा ओली सरकार काफी गंभीर भी है उसमें चीन अपने केरोंग क्षेत्र से काठमांडू और काठमांडू से पोखरा और लुंबिनी तक रेलवे लाइन बिछाने पर काम करने को इच्छुक है। यकीनन इससे चीन की पहुँच भारतीय सीमा तक होगी। चीन और नेपाल, मुक्त व्यापार समझौते की तरफ भी बढ़ रहे हैं। 

2015 के सितम्बर महीने में ही रक्सौल-बीरगंज पॉइंट पर स्थानीय मधेसियों द्वारा की गई पांच महीने की नाकाबंदी, जिससे कि दैनंदिन आवश्यक चीजों की आपूर्ति बाधित हुई और नेपालीजन को काफी मुश्किलात का सामना करना पड़ा था, भारत सरकार इस घटना पर सावधानी नहीं बरत पाई तथा नेपाल का आम जनमानस आज भी मानकर चलता है कि यह भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी थी और भारत ने इसकी समाप्ति के लिए कोई ठोस कदम भी नहीं उठाया। हालाँकि, भारत ने बार-बार दुहराया था कि यह नाकाबंदी नेपाल के आंतरिक तनावों की देन है, पर हालिया चुनावों में इस प्रकरण का वामपंथी दलों ने भरपूर लाभ उठाया। दरअसल, वामपंथ के मुख्यधारा में आने के कारण नेपाल में आम विमर्शों की तर्क आयोजना ही बदल गई है, पर भारत का कूटनीतिक कुटुंब अब भी नेपाल को उसी पारंपरिक दृष्टि से देखे जा रहा है, जहां नेपाल अपनी सुरक्षा और आर्थिक जीवन के लिए अधिकांशतया भारत पर निर्भर रहता था। लगभग साढ़े तीन साल बाद की गयी मोदी की तीसरी नेपाल यात्रा (11-12 मई) में उस तथाकथित नाकाबंदी का प्रभाव देखा जा सकता है जब सोशल मीडिया में नेपाली नागरिकों ने फब्तियां कसीं। इसी साल अप्रैल के पहले हफ्ते में हुई नेपाली प्रधानमंत्री के पी ओली की भारत यात्रा के महज छत्तीस दिनों के भीतर ही भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की तीसरी नेपाल यात्रा हुई। अधिकांश महत्त्व के समझौतों जैसे- भारत व नेपाल के इनलैंड जलमार्ग, तेल पाइपलाइन, पंचेश्वर-तराई रोड, कृषि, आदि ओली की भारत-यात्रा के दौरान ही संपन्न हुए। 

नेपाल-यात्रा के दौरान नेपाल के नवगठित सरकार के मुखिया खड्ग प्रसाद ओली ने इसबार प्रधानमंत्री मोदी की जनकपुर और मुक्तिनाथ धाम जाने की मंसा पूरी कर दी। इसप्रकार अपनी पहली यात्रा की तरह ही एक बार फिर मोदी की इस यात्रा में भी मंदिर, पूजा, पुजारी छाये रहे और रामायण सर्किट की घोषणा के साथ ही जनकपुर से अयोध्या तक की बस आवागमन की सुविधा का उद्घाटन भी किया गया, जिसकी अगवानी स्वयं योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में की। 900 मेगावाट का अरुण हायडेल प्रोजेक्ट, रक्सौल-काठमांडू रेल लिंक के लिए सर्वे आदि घोषणाओं के साथ अंततः मोदी की धार्मिक अस्मिता ही अधिक उजागर हुई। उसी समय चल रहे कर्नाटक चुनाव से भी इसे जोड़ा तो गया ही बल्कि  नेपाल के भीतर भी प्रोविंस नंबर-4 के मुख्यमंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने मोदी के मंदिर विजुअल्स पर आपत्ति जताई। 

मोदी की इस नेपाल यात्रा की जैसी कवरेज भारतीय मीडिया ने की, उससे संभवतः भारतीय मतदाता पर एक खास प्रभाव पड़े, लेकिन मुकाबले में जहाँ चीन हो, भारत ऐसी विदेश नीति के साथ तो अपने द्विपक्षीय संबंधों में फिर ऊष्मा नहीं ला सकेगा। प्रधानमंत्री ओली का यह कहना कि वह भारत की चिंता समझते हैं तथा कभी भी नेपाल की ज़मीन का इस्तेमाल भारत विरोधी हितों में नहीं होने देंगे और फिर अपने संसद में जोर देकर जल्द ही चीन की यात्रा करने का आश्वासन देना; यह दिखलाता है कि नेपाल के प्रधानमंत्री ओली की नज़र जहाँ नेपाल के कूटनीतिक कल पर है वहीं 2019 के आम चुनाव को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की नज़र त्रेता के राम पर है। 




Tuesday, May 22, 2018

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क

मोदी सरकार के चार वर्ष: विदेश नीति समीक्षा




"लोग उतना झूठ कभी नहीं बोलते जितना कि शिकार के बाद, युद्ध के दरम्यान और चुनाव के पहले बोलते हैं। " - ऑटो वॉन बिस्मार्क
अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश नीति का आधार, झुकाव और कार्यशैली कमोबेश एक-सी रही। उसमें ‘परिवर्तन और सततता’ का गुण विद्यमान था। अवसर अनुकूल जोखिम लिए गए और मूलभूत मुद्दों पर दृढ़ता बनी रही। दोनों सरकारों ने अपने क्षेत्र के पड़ोसियों से संबंध बनाये रखने का महत्त्व समझा था और विश्व-राजनीति में एक स्पष्ट रुख रखते हुए जहाँ-तहाँ संबंधों को बनाने की दिशा में प्रयासरत रहे। विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव अमेरिका बना हुआ था और उसके सबप्राइम क्राइसिस से दुनिया उबरी ही थी। भारत के संबंध अमेरिका से क्रमशः प्रगाढ़ हो रहे थे और रूस से संबंध सततता में थे। पर्यावरण, खाद्य-सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारतीय रुख स्पष्ट था और लोकतांत्रिक समानता पर आधारित था। भारत के पड़ोस में परेशानियाँ थीं फिर भी दक्षेस की बैठकें जारी थीं।
भारत में जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बहुमत से चुनी गयी थी उस समय दुनिया में वैश्विक आतंकवाद का चेहरा दाएश (आईएस), पश्चिम एशिया में अपनी जड़ें जमा रहा था, रूस यूक्रेन मुद्दे से अपने को कोकून से निकाल रहा था, चीन, दक्षिणी चीन सागर पर अपनी धमक बनाने की कोशिश कर रहा था, यूरोपीय यूनियन ग्रीस संकट से निपट रहा था और अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर अपनी कमजोरियाँ दुरुस्त कर रहा था। अटल-मनमोहन से इतर मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला जो विदेश नीति संचलन दृष्टि से आदर्श स्थित्ति थी। मोदी सरकार ने विदेश मंत्री के पद पर अनुभवी, तेजतर्रार सुषमा स्वराज को, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर दृढ़ मिज़ाज अजीत डोवाल को और विदेश सचिव एस. जयशंकर को चुनकर अपने इरादे और प्राथमिकता स्पष्ट कर दी।
अब जबकि यह उपयुक्त समय है कि मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति का सम्यक आकलन किया जाय, यह उचित होगा कि इन चार सालों में विश्व-राजनीति में हुए बदलावों पर भी चर्चा हो क्योंकि विदेश नीति, विश्व-राजनीति के सापेक्ष ही गढ़ी जाती है। नब्बे के दशक से यों लगने लगा था कि अमेरिका ही विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव है किन्तु नयी सहस्राब्दि के पहले दशक के गुजरते-गुजरते विश्व-राजनीति बहुध्रुवीय प्रकृति की दिखने लगी। अमेरिका के अलावे, चीन, जापान, ईयू (जर्मनी, फ़्रांस, आदि ), रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, दक्षिण कोरिया, ईरान, सऊदी अरब, आसियान आदि दूसरे ध्रुव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उभरने लगे और विश्व द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के तौर-तरीकों से चलता दिखा। दुनिया के देश हार्ड पॉवर (सैन्य, अर्थ, गणनीय क्षमता) बनने के साथ-साथ सॉफ्ट पॉवर (सांस्कृतिक, अगणनीय क्षमता) बनने की दिशा में भी कार्यशील हुए। विश्व-राजनीति में एशिया का महत्त्व सर्वाधिक बढ़ा और विकसित सभी देश अपने एशियाई पार्टनरों को पुचकारने लगे। लेकिन वैश्विक आतंकवाद, आणविक विकास स्पर्धा और विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण ने एकबार फिर दुनिया को कुछ-कुछ शीतयुद्ध सदृश गुटबाज़ी में मशगूल कर दिया। पिछले चार सालों में विश्व में दो गुट फिर से दिखने लगे हैं जिसे चतुष्क और प्रतिचतुष्क कहा जा रहा है। चीन, रूस, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के रणनीतिक प्रतिचतुष्क के जवाब में अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत का चतुष्क कार्यरत हो गया। विश्व-राजनीति में ऐसे नेता उभर रहे हैं जो अपनी घरेलू राजनीति में लगभग अपराजेय रहते हुए अपने देश की अपराजेयता के स्वप्न पाल बैठे हैं। रूस के पुतिन, जापान के शिंजो अबे, चीन के शी जिनपिंग, जर्मनी की एंजेला मोर्केल, आदि सभी नेता आज की विश्व-राजनीति में बेहद निर्णायक हैं। इन दोनों गुटों में चीन सबसे आक्रामक दिखाई पड़ता है और गुटनिरपेक्ष राजनीति करने वाला भारत अमेरिका से बने नए द्विपक्षीय समझ के तहत एक गुट में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। रूस, कूटनीतिक इतिहास में पहली बार पाकिस्तान को हथियार भेज रहा है और पाकिस्तान, चीन के साथ एक गुट में है। हिन्द महासागर और प्रशांत में बढ़ती चीन की दखलंदाजी को देखते हुए अमेरिका ने भारत की भूमिका बढ़ाने की गरज से इस समूचे क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक रीज़न (हिन्द-प्रशांत क्षेत्र )’ कहना शुरू किया है।
मोदीयुगीन ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’
‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ इस शब्द-युग्म की बड़ी चर्चा थी जब उम्मीदों की मोदी सरकार ने शपथ लिया था। मोदी, व्यक्तिगत रूप से विदेश नीति में बेहद रूचि लेते रहे और उन्होंने विदेश यात्राओं की झड़ी लगा दी। इस लेख के लिखे जाने तक मोदी 36 विदेश यात्रायें कर चुके हैं जिसमें कुल 56 देशों की ज़मीन पर मोदी पांव रख चुके हैं। इनमें से कई ऐसे देश हैं जहाँ काफी समय से कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुँचा ही नहीं। विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए भी यह एक ‘जुड़ाव’ का मौका होता है और इस तरह की यात्रायें निश्चित तौर पर देश को सॉफ्ट पॉवर के रूप में भी स्थापित होने का मौका देती हैं। बहुत सारे देशों में द्विपक्षीय वार्ताएं जो ठिठकी पडी थीं, वह पुनः शुरू हुई हैं।
अफ्रीका महाद्वीप से संबंध हमारे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा की गारंटी देते हैं। मनमोहन सिंह के समय से शुरू हुई हर तीन साल पर होने वाली ‘इंडिया-अफ्रीका समिट’ को मोदी ने 2015 में बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया। जुलाई, 2016 में मोदी ने अपनी अफ्रीका यात्रा में मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंज़ानिया, केन्या आदि देशों की यात्रा की और जापान के साथ मिलकर ‘अफ्रीका विकास बैंक’ के संदर्भ में गुजरात के गांधी नगर में बैठक करते हुए ‘एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर’ पर काम शुरू किया। दक्षिण चीन सागर विवाद और आसियान, जापान, उभरते चीन, फिर से होड़ में आने को बेताब रूस आदि की वज़ह से पूर्व एशिया व प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती सामरिक महत्ता ने भारत को विवश किया कि वह हिलेरी क्लिंटन की सुझाई ‘ऐक्ट ईस्ट’ शब्दावली को अपनाये और इधर अपनी सक्रियता बढ़ाये। मोदी ने अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत म्यांमार और थाईलैंड को अपना स्तम्भ बनाया और इनसे द्विपक्षीय संबंधों पर श्रम किया। कनेक्टिविटी, कॉमर्स और कल्चर के नारे के साथ मोदी उस सामरिक हिचक से बाहर आये जिसमें भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के रणनीतिक जगहों का अवसरंचना विकास जानबूझकर नहीं किया जाता था ताकि कोई अन्य देश इसका फायदा न उठा ले। मई, 2017 में आसाम में मोदी ने एक सड़क पुल का उद्घाटन किया और ‘भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे परियोजना’ में निवेश किया। जापान और आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में भारत के विश्वसनीय साझेदार बनकर उभरे हैं। जापान ने जहाँ भारत से आणविक संधि संपन्न की वहीं उसने ‘बुलेट ट्रेन’ और ‘दिल्ली-मुंबई इन्डस्ट्रीअल कॉरिडोर’ परियोजना में निवेश किया है। मोदी ने, आस्ट्रेलिया, जापान, फ़ीजी, मंगोलिया समेत सभी आसियान देशों की यात्रा की और इस वर्ष 26 जनवरी की परेड में सभी आसियान देशों के प्रतिनिधि उनके निमंत्रण पर भारत भी आये। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की औचक अमेरिका-पैसिफिक हेडक़्वार्टर कैंप स्मिथ की यात्रा बताती है कि दक्षिणी चीन सागर की सुरक्षा को लेकर भारत, अमेरिका प्रतिबद्ध हैं।
2017 में मोदी ने यूरोपीय देशों यथा- जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन और रूस की यात्रा की और ईयू के सर्वाधिक प्रभावशाली देश जर्मनी से अपनी साझेदारी बेहतर की। भारत और फ़्रांस अपने सामरिक संबंधों को लेकर बेहद गंभीर हैं और नवनिर्मित सामरिक गुट चतुष्क में भी अपनी सहभागिता की मंशा जतलाई है। भारत में दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक समुदाय मुसलमानों का है, इसलिए भारत और मध्य-पूर्व दोनों ही पारस्परिक संबंधों का महत्त्व समझते हैं। भारत के व्यापारिक अन्तर्क्रियाओं के लिए अरब सागर की सुरक्षा और लाल सागर में प्रवेश की सुविधा भी अहम् मुद्दे हैं। मोदी ने अपनी संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इजरायल, फलस्तीन, ओमान, क़तर, जॉर्डन की यात्राओं से अपनी ‘लिंक वेस्ट पॉलिसी’ को ‘थिंक वेस्ट पॉलिसी’ में परिणत कर दिया और इज़रायल व फलस्तीन दोनों से संबंधों का संतुलन बनाने की कोशिश की। मोदी सरकार की तारीफ करनी होगी जब अमेरिका के येरूशलम राजधानी घोषणा करने पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अरब समुदाय के पक्ष में मत दिया और इराक, यमन आदि देशों में फँसे भारतीयों को निकालने में तत्परता दिखाई।
नेबरहुड फर्स्ट से नेबरहुड लॉस्ट
मध्य एशिया में जहाँ गैसीय ऊर्जा के भंडार क्षेत्र हैं, एक अरसे से वहाँ रूस का दबदबा है और रूस की सहायता से ही चीन की पकड़ बन रही है; मोदी ने काँग्रेसी पूर्व मंत्री ई. अहमद की शब्दावली उधार ली और अपनी सक्रियता ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी’ के नारे के साथ जुलाई 2015 में क्षेत्र के पांच देशों की यात्रा की। चीन-पाकिस्तान आर्थिक सहयोग गलियारा जो भारत का मध्य एशिया से संपर्क समाप्त कर देता है उसका जवाब मोदी सरकार ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर तुर्कमेनिस्तान और कजाखस्तान रेलवे परियोजना का लाभ लेते हुए पुनः संपर्क स्थापित करके दिया। प्रधानमंत्री बनते ही मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता दिया और वे सम्मिलित भी हुए। दक्षिण एशिया में भी मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ ‘लैंड बॉर्डर एग्रीमेंट’ कर ‘एन्क्लेव्स’ मुद्दे को समाप्त किया। नेपाल में भूकंप आने पर यथासंभव मदद दी। प्रधानमंत्री बनते ही पहली यात्रा के तौर पर भूटान को चुना डोकलाम मुद्दे पर डटे भी रहे। अलग-अलग समयों में मोदी की गयी अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको, ब्राज़ील की यात्रा बताती है कि उनके लक्ष्य में अमेरिकी महाद्वीप भी शामिल हैं। मोदी सरकार की अन्य उपलब्धियों में निश्चित ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस हेग में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना आदि अवश्य शामिल किये जाने चाहिए।

मोदी सरकार की शुरुआत तो बड़े जोरशोर से ‘नेबरहुड फर्स्ट’ के नारे से हुई थी पर मोदी सबसे अधिक विफल कहीं हैं तो अपने इर्द-गिर्द पड़ोस में हैं। विश्व-राजनीति का अध्ययन कहता है कि बिना अपने आस-पड़ोस को सम्हाले कोई राष्ट्र, विश्व-राजनीति में कहीं टिक ही नहीं सकता। इस ‘नेबरहुड लॉस्ट’ से मोदी की सारी ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ की कवायद यकीनन धरी की धरी रह जाएगी। अपने पड़ोस में चीन सहित दक्षिण एशियाई सभी पड़ोसी देशों से आर्थिक साझेदारी वहीँ धीमी गति से चल रहे हैं और कूटनीतिक संबंध खिंचे हुए हैं। चीन ने अपनी ‘ओबोर नीति’ के तहत भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशों से अवसंरचना विकास के नाम पर भारी निवेश किया है और हालिया डोकलम विवाद से भी एक दबाव बनाने की कोशिश की। पाकिस्तान से संबंध कभी सामान्य हुए ही नहीं और मोदी सरकार ने कोई रचनात्मक शुरुआत भी नहीं की। कुछ विश्लेषकों की राय में चीन का एक आर्थिक-सांस्कृतिक असर अवश्य भूटान पर भी पड़ने लगा है और 2018 के देश के तीसरे आम चुनाव में नेपाल के हालिया चुनाव की तरह ही यहाँ भी भारत-विरोधी भावनाओं का उभार दिख सकता है । हाल के रोहिंग्या संकट पर भारत का कमोबेश ठंडा रवैया बांग्लादेश को ठीक तो नहीं ही लगा है। नेपाल के नए संविधान की घोषणा के तुरंत बाद ही असंतुष्ट मधेसियों के द्वारा रक्सौल-बीरगंज पॉइंट नाकाबंदी पर भारत का शांत रह जाना जहाँ वाम दलों और आम नेपालियों को खला है और अब वामपंथियों के सत्ता में आने से और उनकी चीन की तरफ तथाकथित झुकाव से भी भारत-नेपाल संबंध नाजुक तो हुए ही हैं, यह नेपाली प्रधानमंत्री की यात्रा में भी महसूस किया गया । हाल-फ़िलहाल भारत के श्रीलंका से संबंध भी खास चर्चा में नहीं हैं और श्रीलंका ने अभी अपने एक प्रमुख बंदरगाह का स्वामित्व चीन को एक समयसीमा के लिए के लिए सौपा है। चीन ने दक्षिणी चीन सागर और हिन्द महासागर में अंडरवाटर सर्वेलियांस नेटवर्क्स बिछाकर यकीनन जहाँ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। मालदीव विवाद में भी भारत की अनदेखी की गयी और बिसात पर चालें चीन चलता रहा। एक चिंता की बात यह भी है कि इधर भारत के पड़ोस में अलग अलग कारणों से भारत विरोधी भावनाओं में इज़ाफा हुआ है। पाकिस्तान के बाद, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में यह देखा जा सकता है। कुछ कारण ऐतिहासिक हैं तो कुछ सम-सामयिक हैं। चीन इस स्थिति का अक्सर यह कहते हुए लाभ उठाता है कि उसका दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध बराबरी पर आधारित हैं।

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क
मोदी, सरदार वल्लभ भाई पटेल को आदर्श मानते हैं, जिनके लिए प्रशा के शक्तिशाली चांसलर बिस्मार्क का नाम प्रयुक्त होता है। शुरू में ऐसा लगा कि बिलकुल बिस्मार्क की तरह मोदी हर स्टीरियोटाइप तोड़ देंगे और भारत का राष्ट्रहित साधने के लिए कोई भी जोखिम लेंगे। मोदी का शपथग्रहण, सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान में जाकर सहसा बिरयानी खाना, इज़रायल की यात्रा, वेनेजुएला का गुटनिरपेक्ष सम्मेलन जानबूझकर छोड़ना, सार्क सम्मेलन में दिलचस्पी न लेना, फलस्तीन-जॉर्डन की यात्रा, भारत के संयुक्त राष्ट्र में किये गए मत आदि ढेरों अवसरों पर मोदी विश्लेषकों को चौंकाते रहे पर इतनी उछलकूद का जब हासिल खोजा जाए तो ठोस उपलब्धियाँ नदारद मिलती हैं। रूस की पारंपरिक दोस्ती मोदी को छोड़ कोई भी भारतीय सरकार नहीं गंवाना चाहेगी। सार्क को पुनर्जीवित करने की कोई कोशिश नहीं की गयी। मालदीव में जब अमेरिका सहित समूचा पश्चिम भारत की ओर देख रहा था, मोदी मौन रहे। ईरान ने चाबहार पर व्यापार करने के लिए पाकिस्तान को भी न्यौता दे दिया है। पास के ग्वादर बंदरगाह पर पहले ही चीन और पाकिस्तान काबिज हैं। भारत, येरुशलम मुद्दे पर मध्यस्थता कर सकने की पहल कर सकता था पर चीन पहले ही अरब-इजरायल संवाद का आयोजक है। मोदी उम्मीद तो बिस्मार्क की तरह जगाते रहे और उनके अधिकारी चीन की नाराजगी के भय से दलाई लामा का ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम तक स्थगित करा दिया।
मोदी की विदेश नीति में दरअसल एक विजन और तारतम्यता का अभाव दिखा। प्लान बी की झलक कहीं नहीं मिली। विदेश नीति के हलचलों को भी चुनावों में पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग के लिए पहली बार बेशर्मी से प्रयोग किया गया। इराक़ में चालीस मजदूरों की मौत महज इसलिए छिपाई गयी कि यह पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग बर्बाद न हो जाये। विदेश नीति के क्षेत्र की उपलब्धियाँ और नाक़ामियाँ दोनों ही दूरगामी प्रभावों वाली होती हैं। सफलता, दूसरी कई सफलताओं के रास्ते खोलती है वहीं असफलताएँ आसानी से रफू नहीं होतीं क्यूँकि विश्व-राजनीति के अधिकांश कारक बाहरी होते हैं। मोदी सामरिक चतुष्क के सदस्य बनकर भी न मालदीव, न अफ़ग़ानिस्तान और न प्रशांत क्षेत्र में कोई रचनात्मक हस्तक्षेप करते हैं और न ही चीन, रूस, पाकिस्तान से संबंध सुधारकर दक्षिण कोरिया-उत्तर कोरिया की तरह महाशक्तियों की क्षेत्र में दखलंदाजी रोकने की कवायद करते हैं। मोदी विदेश नीति को संचालित करने वाली उस स्थाई नौकरशाही में भी कोई संरचनात्मक सुधार नहीं करते जो अभी भी कितने ही पर्सेप्शन्स में उन्हीं पुराने तरीकों से काम करती है, जिससे किसी नवीन दृष्टिकोण की उम्मीद नहीं की जा सकती। मोदी, विश्व और अपने पड़ोस के लिए अमेरिका, चीन, रूस, जापान की तर्ज पर कोई आर्थिक सहायता मॉडल भी नहीं बनाते जिससे राष्ट्रों को आर्थिक सहयोग तंत्र से जोड़ा जा सके। यों तो मोदी कार्यकाल के लगभग दस महीने शेष हैं पर इसमें अधिक से अधिक अपनी नीतियों का फॉलो-अप ही यदि ले सकें तो भारतीय विदेश नीति को लाभ होगा। क्योंकि विश्व भर की यात्राओं का जितना हासिल है भी वह भी यह सरकार इसलिए खोती नज़र आ रही है क्योंकि फॉलो-अप उचित रीति से नहीं किये जा रहे । कहना होगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मोदी को स्पष्ट बहुमत, खुला अमेरिकी समर्थन और चतुष्क की सदस्यता का जो सुन्दर अवसर प्राप्त हुआ था, वह अवसर वह लगभग गँवा चुके हैं बल्कि आने वाली सरकारों को एक बार फिर से रूस सहित एशिया के बाकी देशों से संबंध दुरुस्त करने में नाको चने चबाने होंगे। भारत को निश्चित ही अपनी विदेश नीति के लिए एक बिस्मार्क सरीखा शक्तिशाली राजनीतिक नेतृत्व नसीब हुआ तो था पर वह अमूमन बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क साबित हुआ। वैसे बिस्मार्क ने यह भी कहा था :
“राजनीति अगले बेहतरीन को पाने की कला है !”



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