About Me

Hailing from one of the most politically engaged areas of India, Eastern UP and after the completion of UG & PG from Gorakhpur University, I have shifted my academic orientation to Area Studies (International Relations). Written dissertation on India's Border Management and accomplished doctorate from SIS, JNU making comparative analysis between two different borders of India with Pakistan and Nepal.

Currently, I am heading the Department of Political Science, Galgotias University and majorly dealing with subjects of theoretical and diplomatic concerns global politics.

I, frequently share my humble opinions and perspectives through popular newspaper, digital mediums, journals and blogs in English as well as in Hindi.




Friday, April 27, 2018

इसकी एकमात्र दवाई बेशर्मी है !



साभार: गंभीर समाचार 

एक ज़माने तक 'मैन इज मेजरमेंट ऑफ़ एवरीथिंग' का जुमला काफी चला। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ वह सभी कुछ तार्किक और उपयोगी समझा गया जो महज मनुष्य के काम आये। इस एकांगी दृष्टिकोण ने पशु, पादप, जलज और अंततः मनुष्य को बेहद करारी चोट पहुंचाई क्योंकि मनुष्य के अहम् को यह संज्ञान बहुत बाद में हुआ कि पर्यावरण के सभी घटक महत्वपूर्ण हैं और उनमें अंतरनिर्भरता है। वह एकांगी दृष्टिकोण तब तक सामाजिकता के सभी संस्तरों तक जा पहुँचा और फिर मानव, मानवीयता के सन्दर्भ टटोलने में ही हांफने लगा। व्यक्तिवादिता और स्वार्थ के कोष्ठकों में बंद व्यक्ति के लिए, अब 'बेनिफिट इज एवरीथिंग' ही परम लक्ष्य बन गया है। व्यक्ति जितना, समाज से इतर व्यक्तिवादिता को महत्त्व देगा उतना ही अंतरनिर्भरता (इंटरडेपेंडेन्स) से भागेगा। अपने प्राकृतिक सामाजिक स्वभाव को नकारते हुए व्यक्ति ‘निजी स्पेस’ तलाशेगा और बाजार इस विसंगति का शोषण कर ऐसी आपूर्ति करेगा कि व्यक्ति में ‘इंडिपेंडेंट’होने का छद्म भाव उपजेगा। ऐसा निर्मम बाजार अपने लिए केवल 'प्रॉफिट इज एवरीथिंग' का टैग टाँकेगा। सामाजिकता-सामूहिकता से हीन जनता के लोकतंत्र से सत्ता बनाना, बाजार को बखूबी आता है और इसलिए ही अपने महान देश भारत के राजनीतिक दलों के लिए 'विनिंग इलेक्शन इज एवरीथिंग' ही एकमात्र ध्येय शेष रह गया है।

शिक्षा जिसे वह दीप बनना था, शिक्षक जिन्हें वह प्रकाश बनना था, जो जन मन को सभी विभेदों और विभाजनों से मुक्त कर सके; महज थोथी भूमिकाओं के रस्मी निर्वहन की बेसुध परम्परा बनकर रह गए हैं । इस सारहीन शिक्षा व्यवस्था ने मानवीय मूल्यों को कुछ यों खोखला किया है कि बेशर्म हो पढ़ाने के लिए, बेशर्म हो पढ़कर और ज्यों का त्यों लिखकर टॉप करने के लिए मानवीय मूल्य बचे हैं हमारे समाज के; अन्यथा समाज में 'स्मार्ट शख़्स' वही है जो होते रेप की विडिओ यूट्यूब पर डालकर पैसे बना ले। बुद्धिमान का अर्थ चतुर और समझदार का अर्थ होशियार हो गया है। किसी दूसरे ग्रह का कोई रोबोट हमारी पृथ्वी के सारे धर्मग्रन्थ और टेक्सटबुक पढ़ ले तो निस्संदेह वह मानव के समक्ष नतमस्तक हो जायेगा किन्तु जैसे ही वह कुछ दिन इस पृथ्वी पर रहकर हमारी करतूतों को निरखेगा तो यदि उसके बस में होगा तो समस्त पुस्तकों की राख से केवल एक ही शब्द लिखेगा- पाखंडी !

बेसुध जनता की बेसुध सरकारें अस्सी के दशक में खोखली होती भारतीय अर्थव्यवस्था की कंपकंपी देख ही न सकीं और नब्बे के दशक ने ज़िद करके उदारीकरण का चोला पहन लिया । सीमायें, खोली गयीं तो भारत की उस कामकाजी पीढ़ी ने सहसा धन का वह रेला देखा जो अकल्पनीय था। रासायनिक उर्वरकों वाले हरित क्रांति ने मंडियों में अनाजों की वो आवक लगायी कि चुपके से समाज की सारी सीमायें तोड़ते बाजार पर किसी को शक़ ही नहीं हुआ। इस दशक के अभिभावक, विद्यार्थी में चरित्र नहीं अपनी पूंजी तलाश रहे थे। नब्बे के दशक में हुए मजबूरी के उदारीकरण ने एक पूरी पीढ़ी में ऐसा आर्थिक हवस भर दिया कि बच्चों को जब पढ़ने भेजा गया तो आई.ए. एस., डॉक्टर, इंजीनियर, एमबीए आदि का इन्वेस्टमेंट समझते हुए भेजा गया। एजुकेशन का मतलब केवल प्रोफेशनल कोर्सेज हो गया और नौकरियाँ नीलाम होने लगीं। दहेज़ से या तो रिटायरमेंट प्लान गढ़ा गया या परिवार के दूसरे सदस्यों को पूँजी उपलब्ध करवाई गयी। 

अंग्रेजों ने केवल भारत पर राज नहीं किया था उन्होंने हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की सभी महीन रेशमी धागों को झुलसा दिया था और जब गए तो भारत कई बंजर अस्मिताओं का एक उलझा गुत्थम-गुत्था बन बचा था। हमारे स्वतंत्रता-सेनानी नेताओं ने यह समझा था और धीरे-धीरे अपने सार्वजनिक जीवन के त्याग से, उदाहरण बनते हुए नए भारत के लिए नए राष्ट्रीय प्रतीक गढ़े थे; जिनके आधार पर एक सशक्त समावेशी विविधतापोषी राष्ट्र पनप सकता था। पर वे अपने दूसरी-तीसरी पीढ़ी के नेताओं के चयन में चूक गए और राजनीतिक विकास की शैशवावस्था वाले राष्ट्र में क्रमशः राजनीति पेशा बनती गयी जिसे बाजार में अपनी पूंजी संजोनी थी। कद्दावर नेता मसखरे बनते गए, जनता की राजनीति को टीवी ने नीलाम कर दिया और जनता ने राजनीति को महज मनोरंजन मान लिया। अपने व्यक्तिगत जीवन में परम सेकुलर और लिबरल नेतागण जनता को जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग में बांटकर राज करते रहे। व्यवसायोन्मुखी शिक्षा में पनपे इतिहासबोध और समाजबोध से शून्य उत्साही युवा पीढ़ी उन्माद में दंगे और बंद का आयोजन करती रही।

सामाजिकता की मर्यादा से धीरे-धीरे मुक्त हुई पीढ़ी जिसे गांव की दुपहरी से अधिक शहर की शॉपिंग भाने लगी, स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता समझने लगी और भारत के सभी वर्गों, धर्मों के विविध उत्सवों से जो एक स्वाभाविक मानसिक विरेचन (कैथार्सिस) होता था, वह थमने लगा। बाजार ने पहले हमारे सारे उत्सव, जमीन से उठाकर कार्ड्स पर उकेरे; फिर मोबाइल के ग्रुप एसएमएस ने सभी सामाजिक संबंधों को औपचारिक मंथली इएमआई बना दिया। इधर ज्यों-ज्यों हम आधुनिक सभ्य होते गए, सोशल एनिमल से तथाकथित इंडिपेंडेंट इंडिविजुअल बनते गए। बाजार ने इस इंडिपेंडेंट इंडिविजुअल को यह छद्म तोष दिया कि ‘सब-कुछ’ बिकाऊ है और ‘सब-कुछ’ खरीदा जा सकता है। जिस पीढ़ी को बचपन से ही पढ़-लिखकर इंडिपेंडेंट बनना सिखाया गया हो वह सामाजिकता का इंटरडिपेंडेंस क्यों कर समझने लगी भला ? 

सत्ता जब-जब अलोकतांत्रिक रीति से आती है वह कमजोरों का शोषण करती है। अलोकतांत्रिक सत्ता, शिक्षा को हमेशा पंगु बनाये रखना चाहती है ताकि जागरूकता अटकी रहे। शिक्षा अपना कंटेंट और मकसद बदलकर ही जिन्दा रह पाती है और धीरे-धीरे बाजार से इशारे लेने लग जाती है।  अशिक्षा नारी को हमेशा कमजोर कहती है। बाजार नारी को परोसने लग जाता है। स्वच्छंद पीढ़ी नारी को उपभोग की सामग्री समझ लार टपकाने लग जाती है। फिर गाँव-शहर हर जगह सेक्सुअल कुंठा को सांस्कृतिक कपड़ों से ढंका गया, हर दुसरी पीढ़ी अपनी रंगरेलियों के सापेक्ष अगली पीढ़ी पर असफल बंदिशें लगाती रही और हिप्पोक्रेट्स की आबादी बढ़ती रही। बच्चों को मॉडर्न कपड़े पहनाये गए और अकल पर नफरत, कुंठा, लैंगिक विभेद की स्वार्थी परतें क्रमशः जमाई गयीं।

इसी बीच आठ साल की इक प्यारी बेटी का निर्मम सामूहिक बलात्कार हुआ और भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश में उस बाप को थाने में हँसते हुए-गालियाँ देते हुए पीट-पीट कर मार डाला गया, जिसकी सत्रह साल की बेटी की अस्मत किसी के कुलदीपक ने सरेशाम लूटी थी। लोग आहत हुए, कवियों ने कवितायेँ लिखीं, लेखकों ने लेख और फिर आख़िरकार अशिक्षा से उपजे अपने-अपने मन के विभाजनों के मुताबिक लोग एक-दूसरे को कोसने लगे। कुत्सित राजनीति फिर जीवनदान पा गयी। लोग बलात्कार के बैनर पर धर्म, जाति, राजनीतिक दल के हिसाब से आक्रोश व्यक्त करते करते फिर उन्हीं कोष्ठकों में बंद होने लगे जहाँ से कुत्सित राजनीति और बाजार को खुला मैदान तैयार और खाली मिलता है। 

बलात्कार मरते-बुझते समाज का एक लक्षण भर है, इसका हल कानूनी काफी नहीं है। अशिक्षा, राजनीतिक भ्रष्टाचार और बाजार की दखलंदाजी ने बेलगाम बरबस बलात्कार की घटनाओं को समझने में कई और गुथे-मुथे कारण जोड़े हैं। स्वाध्याय की परम्परा का धर्म, मूल्य आधारित होता है जहाँ नारी शक्ति होती है और पुरुष शिव। किन्तु स्वाध्याय का अभाव धर्म को महज कर्मकांडी बनाता है और राजनीति को मूल्यहीन और फिर यह दोनों ही अपने अस्तित्व के लिए बाजार के तराजू का बाँट बन जाते हैं। स्त्री वस्तु बनती है तो पुरुष तो पुरुष,  स्वयं स्त्री को भनक नहीं लगती। सबकुछ भोग लेने की हवस का खामियाजा केवल स्त्री ही नहीं, संस्कृति, समाज और भाषा भी भुगतती है। राष्ट्र महज राष्ट्रवाद के नारों से चलने लगता है और शासन की नाकामी सीमायें लाल करके छिपाई जाने लगती हैं। कुछ देर के लिए जब स्तब्ध हम होते हैं इन घटनाओं से तो सहसा सोचते हैं - आखिर, हम कर ही क्या सकते हैं ? इसका जवाब भीतर इस व्यवस्था ने चस्पा ही नहीं किया है तो कुछ दिन तक आक्रोशित रहते हैं फिर दोषारोपण करने लगते हैं और अंततः बाजार के सीजनल डिस्काउंट में खो जाते हैं। 

शायद हमें ऐसे ही सोये रहना है। चुनाव के वक्त हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित बने रहना है। भारत माँ तो भोली है, 'नारों' से खुश हो जाती है। लोहिया-जेपी तो भोले हैं, बस 'बंद' से खुश हो जाते हैं। फूले, अम्बेडकर तो भोले हैं बस 'रैलियों' से खुश हो जाते हैं। धिक्कार है ऐसी मानवता को, ऐसी ओढ़ी हुई मैच्योरिटी को। अगर ऐसा नहीं है तो हमें देश, समाज और स्वयं की निष्ठुर स्क्रूटिनी करनी होगी। हमें समझना होगा कि शिक्षा, पीढ़ियों और लिंगभेद से ऊपर उठकर संवाद की कला नहीं दे सकी है, बुजुर्गों ने परिवर्तन पर व्यंग कर अपनी भूमिका की इतिश्री कर ली है और जवानों ने धैर्य को कमजोरों का आभूषण समझ लिया है। समझना होगा कि भारत की सामाजिक व्यवस्थाएँ सड़ चुकी हैं, इन्हें फिर से तराशना होगा। राजनीति में जमकर परिभाग करना होगा। धर्म की सतत समानांतर व्याख्याएँ समझनी होंगी, उनकी दार्शनिकता को अपनाना होगा और संकीर्णता को दफनाना होगा। विविध परम्पराओं से सामाजिकता निचोड़ एक बार फिर उत्सवधर्मिता का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना गढ़ना होगा जिसमें मानसिक विरेचन की गुंजायश बराबर हो और आदमीयत की नेकनीयती तंदुरुस्त बनी रहे।  ऐसा सजग समाज अपनी राजनीतिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाएगा और शिक्षा को मूल्यों की जननी मानेगा। इसप्रकार बाजार अपनी हदों में लौटेगा और मंडियां फिर मेलों में तब्दील होंगी और मेलों में संस्कृतियाँ नाचेंगी, मिलेंगी और समरसता के गीत गुनगुनाएंगी।  

देश, समाज, स्वयं की निष्ठुर स्क्रूटिनी आसान नहीं होगी। यह हमारी अहम को बौना करेगी, हमारे उपलब्ध विशेषाधिकारों को सीमित करेगी और एक पंक्ति में खड़े होने को मजबूर करेगी। इतना धैर्य नहीं है जो, इतनी नीयत नहीं है जो और जो नहीं है इतना नैतिक साहस तो बंद करिये यह पाखंडी प्रलाप और ओढ़ कर सो जाइये फिर बेशर्मी की चादर। बीच-बीच में नींद उचटेगी जो कहीं फिर कोई बलात्कार की घटना दर्ज होगी। बाजार से नींद की गोली ले लीजियेगा और सपनों में गाना गाइएगा- मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती…!   

मुझे उबकाई आ रही, जानता हूँ इसकी एकमात्र दवाई बेशर्मी है!

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