About Me

Hailing from one of the most politically engaged areas of India, Eastern UP and after the completion of UG & PG from Gorakhpur University, I have shifted my academic orientation to Area Studies (International Relations). Written dissertation on India's Border Management and accomplished doctorate from SIS, JNU making comparative analysis between two different borders of India with Pakistan and Nepal.

Currently, I am heading the Department of Political Science, Galgotias University and majorly dealing with subjects of theoretical and diplomatic concerns global politics.

I, frequently share my humble opinions and perspectives through popular newspaper, digital mediums, journals and blogs in English as well as in Hindi.




Saturday, August 12, 2017

राजनीति शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने का क्या फायदा ?

राजनीति शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने का क्या फायदा ?

Hobbes को यही लगा था तो राजनीति को उसने फिजिक्स के तर्ज पर ढालकर विषय का पुनरोद्धार कर पॉलिटिक्स का गैलिलिओ बनने की ख्वाहिश पाली थी . एकबारगी डेविड ईस्टन को भी यही लगा था .

अंततः यह समझा गया कि मानविकी विषय में तथ्य (fact) और मूल्य (Values) का सुन्दर समावेशन (inclusion) हो . Exactness जहाँ विज्ञान का गुणधर्म है वहीँ dynamism मानविकी का. प्रचलित विज्ञान निर्जीव (inanimate) का अध्ययन अधिक करते हैं, जहाँ कहीं सजीव (animate ) का अध्ययन करते भी हैं तो उनके स्थिर सार्वत्रिक गुणधर्मों (universal properties) तक सीमित होते हैं . मानविकी जीवित मन का अध्ययन करती है . इसमें exactness ना होना इसकी खूबसूरती और खासियत है . यह अधिक सूक्ष्म और व्यापक (universal) है . इसमें केवल तथ्यों से काम नहीं चलता . ध्यान दें, इकोनोमिक्स और ज्योग्रोफ़ी क्रमशः objectification की ओर बढ़ रहे हैं, एक तरफ पृथ्वी ऑब्जेक्ट है और दुसरी तरफ अर्थ (Money). ऐसा नहीं है कि विज्ञान बिना मूल्यों के निर्वहन कर सकता है अथवा उसमें केवल exactness ही है. एक समय उसमें यह कल्पना की गयी कि नाभिक में इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रोन ठीक वैसे होंगे जैसे तरबूज में बीज. भूगोल को ध्यान से देखिये, उसकी शाखाएं देखिये, अधिकांश इतिहास, राजनीति और समाज से उधार ली हुई हैं और अर्थशास्त्र का जन्म ही राजनीति से है, तब उसे पोलिटिकल इकॉनमी कहा जाता था.


जाने कितने उपागमों (disciplines )के पिता अरस्तु ने यों ही नहीं राजनीति को मास्टर साइंस कहा है. प्लेटो की एकेडमी में गणित और विज्ञान की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जी दर्शन और राजनीति की शिक्षा दी जाती थी . आधुनिक अर्थव्यवस्था को ध्यान से देखें, उन्मुक्त बाजार जब जब वैश्विक मंदी लाता है, राजनीति का राज्य उसे अपने बाहों में लेकर बचाता है . हाँ, रोजगारपरक (Employment Oriented ) होना एक पृथक बात है . यहाँ राजनीतिविज्ञों की ये गलती है कि वे सिलेबस पर काम नहीं कर रहे और शिक्षाविदों और प्रशासन की यह गलती है कि वे विषय का महत्त्व नहीं समझ रहे . पर क्या दोष दें किसी को . विभाजन इतने गहरे हैं कि अभी भी विज्ञान को महज एक विषय माना जाता है जबकि कब का यह एक पद्धति बन चुका है जो सभी उपागमों में प्रयोग में लाई जाती है .

राजनीति में आज भी अपने टूल्स और अप्रोच हैं जो इस विज्ञान को प्रामाणिक (authentic) बनाते हैं. टूल्स और कार्यप्रणाली (systematic functions) की उत्तर व्यवहारवाद (Post Behaviouralism) के बाद बहुत अधिक मांग है, दोष देश की शिक्षा व्यवस्था का है कि वे विषयवस्तु (Content) अद्यतन (updated) नहीं कर रहे. इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री शोधित (well researched ) नहीं है. सभी, सब कुछ कभी नहीं सीख सकते सो expertise की जरुरत बनी रहेगी. राजनीति एक प्रक्रिया (function) के तौर पर कितनी समझ आती है और मूल्य एवं पद्धति (System) के तौर पर कितनी समझ आती है यह अलग अलग प्रतीति (realisation) है. एक्टर से भी प्रश्न होते हैं और किसी फिल्म के दर्शक भी बहुत कुछ बताते हैं पर उस फिल्म के निर्देशक, लेखक अथवा समीक्षक के जवाब का स्तर यकीनन अलग होगा , उनकी expertise को कम कर के आंकना बहुत बड़ी भूल होगी . इंटरनेट ने विषय की उपादेयता (utility) और विषयविज्ञानी (subject expert) की उपादेयता ज़रा भी कम नहीं की है. शोध के कई स्रोतों में से एक स्रोत है, यह भी एक्सक्लूसिव नहीं.

कला विषय कितने उपयोगी हैं यह समझने के लिए बाजार ने अवकाश ही कितना छोड़ा है . बिके मूल्य आदर्श कब समझने लगे . यह मूल्यहीन स्थिति भ्रष्ट सत्ता को सतत बनाने में योग देती है इसलिए वे चाहते हैं कि यह ज्ञानशून्यता बनी रहे . सभी विकसित राष्ट्रों में मानविकी विषयों में प्रवेश अधिक है और सभी विकासशील देशों में विज्ञान विषयों में भीड़ मची है . अकुशल ज्ञानशून्य नागरिक समाज (Unskilled Unaware Civil Society) को कुछ भी नहीं खलता जब वह देखता है कि विकास के नाम पर मनमोहन और मोदी दोनों ही नए IITs, AIIMS' और IIMs खोलने की बात तो करते है पर यह विकास की संकल्पना जिस मानविकी से आयी है उसके लिए DU, JNU, Jamia, या ऐसी ही उच्चस्तरीय संस्थाएं नहीं खोलना चाहते.
मित्र वो चाहते हैं कि विभाजन बने रहें, कहीं ज्ञान यह विभ्रम (Illusion made out from hegemony) तोड़ देगा फिर तो सच में नागरिकों के लिए कार्य करना पड़ेगा . फिर राजनीति का करियर सेवक का हो जायेगा, जैसा कि प्लेटो की Philosopher King की अवधारणा कहती थी .
मोटर बाइक एक मैकेनिक भी बना लेता है पर इंजीनियर ही जानता है कि वह पूरी प्रक्रिया क्या है। मेरा इतना ही निवेदन है कि किसी खास समय में यदि विद्वान अथवा व्यक्ति सुसंगत (appropriate) न कर रहे हों तो उसमें विषय उपागम का दोष कहां आ जाता है। सन 96 में ही मैं देख पा रहा था कि मेरे जनपद से चुनाव में कौन जीतेगा और क्यों पर आज विश्लेषण करने के मेरे टूल्स और अप्रोच में निश्चित ही गुणात्मक सुधार आया है। कला विषय उतनी गति से अद्यतन नहीं हो रहे जितनी तीव्रता से विज्ञान विषय। हममें से ज्यादा लोगों की प्रारम्भिक ट्रेनिंग भी विज्ञान की है जो स्वभाविक तौर पर तथ्यपरक है। तथ्यों से लगाव स्वाभाविक है। चुनाव एक राजनीतिक परिघटना है जिसमें ढेरों प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। उसे केवल सीटों की संख्या से देखना मायोपिक होना है। तो यदि कोई सामान्य जन सीटों की सटीक भविष्यवाणी कर दे और वह विशेषज्ञ की संख्या से मेल करे तो इसका अर्थ यह नहीं कि विषय विज्ञानी की उपादेयता संकट में है. किसी चुनाव के परिणाम पर राजनीतिक विश्लेषक की व्याख्या का स्तर यकीनन किसी सामान्य जन से बेहतर होगा। आप पूछेंगे कि उपादेयता का यह स्तर कोई इतना भी आकर्षक नहीं. भाई, उस चुनाव के बाद तुरत चुनाव यदि हो जाएं तो पुनः संभवतः परिणाम बदले या मतप्रतिशत अथवा जीत-हार का अंतर बदले, इस परिघटना की व्याख्या सामान्य व्यक्ति कभी नहीं कर सकेगा किन्तु एक विश्लेषक आसानी से कर लेंगे। पत्रकार जो किसी निश्चित घटना विशेष पर उपलब्ध होते हैं और उनमें से कईयों को लंबा अनुभव भी होता है फिर भी परिचर्चा में कम से कम एक विषय विश्लेषक अवश्य होता है. हाँ, यह अवश्य हो सकता है कि वह विश्लेषक एक्सप्लेन कर पा रहा हो किन्तु interpret ना कर पा रहा हो और वह बोझिल लगे. पर यह उस विश्लेषक की सीमा है, उस विषय की नहीं.
निराशा यह है कि विभिन्न सामाजिक परिवर्तनों में यह विश्लेषक क्या योग करते हैं ? संभवतः कुछ नहीं, क्या ?

दरअसल सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन बहुत धीमे धीमे होते हैं। और देखिए ज्ञान का एक सिस्टमेटिक अवदान होता है और एक फंक्शनल अवदान होता है। लॉक ने गौरवपूर्ण क्रांति का नेतृत्व नहीं किया था पर लॉक को उस क्रांति का दार्शनिक कहते हैं. भूमिकाओं को गड्ड मड्ड करके देखने का समय है । रेडियो का आविष्कार मार्कोनी ने किया अब उसका प्रयोग कैसे करना है समय सापेक्ष समाज उपजाता है। समाजविज्ञानी और समाजसुधारक में फर्क होता है। कभीकभार सुसंयोग से समाजसुधारक समाजविज्ञानी भी होता है तो यह एक अनिवार्य स्थिति तो नहीं हो गई, ना। हम भी टीवी पर क्रिकेट देखते हुए बोलते तो हैं कि खिलाड़ी को यह शॉट यों लेना चाहिए पर खिलाड़ी और खेल विशेषज्ञ ही समझते हैं कि अन्य प्रभावी कारक कौन से हैं। यही अन्य प्रभावी कारक जो जनसामान्य के लिए छिपे होते हैं, विशेषज्ञ उन्हें उजागर करते हैं। संभव यह भी है कि हमारा या किसी विद्यार्थी विशेष का अभी बोध उस स्तर का ना हो कि वह जनसामान्य से अधिक विशेष रीति से ना सोच पा रहा हो इसका अर्थ यह नहीं कि विषय विशेषज्ञ की उपयोगिया अथवा विषय विशेष की उपगोगिता खतरे में है।

विषय विज्ञता (Knowledge of Subject) केवल व्याख्याओं तक सीमित भी नहीं. सिद्धांत के तीन उपयोग होते हैं जिसमें व्याख्या केवल एक उपयोग है। Explanation, Interpretation and Restructuring . एक सुसंगत राजनीतिक सिद्धांत किसी राजनीतिक परिघटना (Phenomena) को पहले अपने टर्मिनोलॉजी में समझेगा। जैसे डाक्टर्स आपस में चर्चा करते हैं किसी रोगी की। फिर अगले चरण में उस व्याख्या का सरलीकरण व्यापकीकरण (generalise, universalise) किया जाता है ताकि सभी उसे समझें। इसी चरण पर विशेषज्ञ को वह भाषा मिलती है जिससे वह रोगी को रोग के बारे में समझा पाता है। अंतिम चरण में व्याख्या को नित नवीन बदल रही चुनौतियों के अनुरूप अपने आधारों को फिर फिर नवीन करने में मदद मिलती है ताकि वह सिद्धांत प्रासंगिक (relevant) बना रहे। तो विषय विज्ञता महज व्याख्या तक सीमित नहीं।

समकालीन समस्याएं अपने युग अनुरूप हमेशा ही जटिल होती हैं और किसने कहा कि समाजविज्ञानी असफल हैं । यह भी क्यों सोचें कि वह परिघटना जिसमें यह नैराश्य (disappointment) उपजा है कि विषय विशेषज्ञता किस काम की, उस परिघटना का पटाक्षेप हो गया है, अभी देखते जाएं। यह तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। जब अंग्रेजों ने कहा कि संविधान की तमीज नहीं है तो हमने वह राजनीतिक व्यवस्था दी जिसमें सार्वजनिक मताधिकार (Universal Adult Suffrage) का आत्मविश्वास था। इंदिरा गांधी आपातकाल लाती हैं तो वैकल्पिक राजनीति ने वह शून्य भरा और न्यायपालिका और भी सशक्त हुई। हाँ, इन प्रक्रियाओं के बीचोबीच पड़ा नागरिक जरूर सशंकित हुआ होगा कि स्वतंत्रता के मूल्य तो व्यर्थ गए या अब तो देश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं अवसरों पर विषय विशेषज्ञ आशावान रहेगा क्योंकि उसे वह अन्य प्रभावी कारक दिखेंगे तो जन सामान्य को नहीं दिखेंगे। यहीं पर उपयोगिता अधिक है डॉक्टर की जब मेडिकल स्टोर वाला निराश हो चुकेगा।

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