About Me

Hailing from one of the most politically engaged areas of India, Eastern UP and after the completion of UG & PG from Gorakhpur University, I have shifted my academic orientation to Area Studies (International Relations). Written dissertation on India's Border Management and accomplished doctorate from SIS, JNU making comparative analysis between two different borders of India with Pakistan and Nepal.

Currently, I am heading the Department of Political Science, Galgotias University and majorly dealing with subjects of theoretical and diplomatic concerns global politics.

I, frequently share my humble opinions and perspectives through popular newspaper, digital mediums, journals and blogs in English as well as in Hindi.




Monday, December 11, 2017

नेपाली लोकतंत्र का प्रभात


डॉ. श्रीश पाठक




नेपाल की सांस्कृतिक-भौगोलिक वैविध्यता में पलने वाले उसके निवासियों को तीन मुख्य विभाजन में समझा जाता है; हिमाल, पहाड़ और तराई। तिब्बत से सटे ऊँचाई पर बसे हिमाल कहलाते है, पहाड़ के लोग मध्य नेपाल के निवासी हैं और भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार से जुड़े सीमाई लोग मधेशी अस्मिता वाले तराई के कहलाते हैं। यह विभाजन इतना सरल नहीं है पर नेपाली राजनीति में इनकी जटिलतायें महत्वपूर्ण हैं और इसलिए ही नेपाल की संविधान निर्माण की यात्रा इतनी दुरूह रही है। यह समय, नेपाल के लिए लोकतान्त्रिक सूर्योदय का है। एक साथ नयी सरकार केंद्र में भी आएगी और राज्यों में भी। एशिया के दो शक्तिशाली पड़ोसी देश भारत और चीन ध्यानपूर्वक नेपाल की राजनीतिक प्रगति को निहार रहे हैं क्योंकि सितम्बर 2015 के नए संविधान के मुताबिक वह सरकार लोकतान्त्रिक सरकार होगी, जो एक स्वतंत्र गणराज्य का नेतृत्व करेगी और सम्भावना अधिक इसी की है कि आगामी सरकार वामपंथी गठबंधन की होगी और अपना पाँच साल का कार्यकाल पूर्ण करेगी। आश्चर्यजनक रूप से इतनी मतभिन्नता एवं संघर्षों के इतिहास के बावजूद छोटे-बड़े कई दलों के देश नेपाल में दो बड़े गठबंधन उभरे और वामपंथी और दक्षिणपंथी गठबंधनों ने यह चुनाव कमोबेश सुप्रतिनिधित्व एवं विकास के मुद्दे पर लड़ा है। एक स्थाई, मजबूत, लोकतान्त्रिक सरकार किसी भी प्रकार के द्विपक्षीय समझौतों एवं संबंधों के लिए माकूल मानी जाती है, नए नेपाल के लिए यह शुभ है।   


राजनीतिक मूल्य परिवर्तित होते रहते हैं किन्तु भौगोलिक और सांस्कृतिक मूल्य अपनी निरंतरता बनाये रखते हैं। भौगोलिक दृष्टि से नेपाल एक स्थलबद्ध देश है, जो तीन तरफ से भारत के राज्यों से घिरा हुआ है और एक तरफ से चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से। भूटान और बांग्लादेश इसकी सीमा में क्रमशः पूर्व और दक्षिण में जुड़ते हैं। हिमालय क्षेत्र में बसे नेपाल में विश्व की सर्वाधिक दस ऊंची पर्वत-चोटियों में से एवरेस्ट सहित आठ चोटियाँ स्थित हैं और तीन बड़ी नदियाँ कोसी, गण्डकी और करनाली भी प्रवाहित होती हैं जिनसे महान गंगा नदी प्रणाली निर्मित होती है। नेपाल का सांस्कृतिक स्वरुप मुख्यतः देश के हिन्दू और बौद्ध धार्मिक परम्पराओं से निर्मित होता है, जिसमें इंडो-आर्यन एवं तिब्बती-मंगोलियन धारा का समावेशन प्रमुखतया से है। राजनीतिक रूप से इस समय नेपाल में दो वैचारिक धाराएँ दक्षिणपंथी और वामपंथी प्रवाह में हैं जो तीस साल के सियासी भूकंप व हालिया प्राकृतिक भूकंप से उबर विकास के पथ पर बढ़ जाने को संकल्पित हैं और आंतरिक राजनीति में तीन समानांतर अस्मिताएँ हिमाल, पहाड़ और तराई अपने अपने सम्यक प्रतिनिधित्व और नए नेपाल के आशावान भविष्य में अपनी अपनी भागेदारी सुनिश्चित करने को आतुर हैं।


हाल के वर्षों में वामपंथ के उभार के साथ ही नेपाल में चीन की प्रभावी उपस्थिति महसूस की जा रही है। चीन ने ओबोर नीति के अंतर्गत ही अपने पड़ोसी देशों से भौतिक-आर्थिक सम्बद्धता पर बेहद महत्वाकांक्षी रीति से कार्य किया है। वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों के मध्य ‘रेलवे कूटनीति’ के नाम से मशहूर चीन की इस नीति को नेपाल के सन्दर्भ में भी परखा जा सकता है। हाल ही में चीन ने नेपाली मुख्यभूमि को तिब्बत से जोड़ दिया है। चीन ने नेपाल में भारी निवेश किया है और जिसमें  अधिकांश  नेपाल की अवसरंचना विकास के लिए प्रयुक्त हो रहा है। भूकंप के बाद का नेपाल यों भी विकास की चाह शिद्दत से लिए है और चीन ने 1968 से अस्तित्व में आयी नेपाल-चीन फ्रेंडशिप हाईवे को और भी सुरक्षित और इसे व्यापार व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए उपयुक्त बनाने में रत है। चीन के सम्बन्ध नेपाल से पारंपरिक रूप से कोई प्रगाढ़ नहीं रहे हैं क्योंकि सीमावर्ती तिब्बती संस्कृति से उनका जुड़ाव भी चीनी संस्कृति से स्पष्टतया नहीं जोड़ता पर अब जबकि तिब्बत एक स्वायत्त क्षेत्र के रूप में चीन का भाग है, चीन के पारम्परिक सम्बन्ध नेपाल से प्रमुखता से उल्लेखित किये जा रहे हैं।  



भारत के नेपाल से अन्यान्य संबंधों की मिसाल इतिहास के प्रत्येक कालखंड में देखी जा सकती है। भारत-नेपाल मुक्त सीमा प्रणाली से इन संबंधों को दैनंदिन संपर्क के रूप में स्थापित किया गया। चूँकि नेपाल की पहुँच किसी समुद्र से नहीं है तो सहज ही नेपाल अपने द्विपक्षीय और वैश्विक व्यापारों के लिए भारत पर निर्भर रहा है। सांस्कृतिक-भौगोलिक संबंधों की परम्परा से राजनैतिक सम्बन्ध भी संचालित होते रहे और दुनिया तेजी से बदलती रही। भारत ने नेपाल की बदलती राजनीतिक जमीन को यथासंभव सहारा भी दिया और उनके लोकतान्त्रिक अनुभव की यात्रा में साथ भी दिया।  हालिया भूकंप में भी भारत ने यथासंभव मदद तो की पर इससे संबंधों में कोई नयी ऊष्मा नहीं आ सकी । हाल ही में रक्सौल-बीरगंज पॉइंट पर स्थानीय मधेशियों द्वारा की गयी पाँच महीने की  नाकाबंदी, जिससे कि  दैनंदिन आवश्यक चीजों की पूर्ति भी बाधित हुई; को नेपाल का आम जनमानस यह मानकर चल रहा है  कि यह भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी है और भारत ने इसकी समाप्ति के लिए कोई ठोस कदम भी नहीं उठाया । भारत ने बार-बार दुहराया कि यह नाकाबंदी नेपाल की आंतरिक तनावों की देन है पर हालिया चुनावों में इस प्रकरण का वामपंथी दलों ने भरपूर लाभ उठाया।  


दरअसल वामपंथ के मुख्यधारा में आने के कारण नेपाल में आम विमर्शों की तर्क आयोजना ही बदल गयी है, किन्तु भारत का कूटनीतिक कुटुंब अभी भी नेपाल को उसी पारम्परिक दृष्टि से देखे जा रहा है, जहाँ नेपाल अपनी सुरक्षा और आर्थिक जीवन के लिए अधिकांशतया भारत पर निर्भर रहता था। आज का नेपाल अपनी भू-राजनीतिक स्थिति की सीमायें और महत्ता समझता है। नया नेपाल जो कि अब स्वतंत्र संप्रभु लोकतंत्रिक गणराज्य है, वह संबंधों की वही परिभाषा स्वीकार करेगा जो उसकी राष्ट्रहित की अधिकतम व्याख्या की ओर उद्यत होगा। अब जबकि नेपाल अपने राजनीतिक जीवन के नए मुहाने पर खड़ा है, भारत को नेपाल के प्रति अपनी विदेश नीति चीन को केंद्र में रखते हुए ही गढ़नी चाहिए। भारत को भी समझना होगा कि नेपाल अपने राष्ट्रहित के अनुरूप ही सौदेबाजी (बार्गेन )के लिए स्वतंत्र है और हमारे प्रयास व व्यवहार ऐसे विन्यास को गढ़ने की दिशा में होने चाहिए जिसमें नेपाल को अपना सर्वाधिक हित सधता प्रतीत हो और वह सहजता में इसका निर्वहन कर सके। नेपाल के पास एक सशक्त विकल्प के तौर पर महत्वाकांक्षी चीन उपलब्ध है, इसका ध्यान रखना होगा।  


नेपाल का चीन से किये गए किसी नए करार अथवा समझ पर भारत को किसी प्रकार की असुरक्षा प्रदर्शित न करते हुए सावधानी से प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है। भारत को दूसरे अन्य विमाओं में सहयोग की सम्भावना खंगालनी होगी और परस्पर विश्वास व सम्मान को बढ़ाना होगा। नेपाल में नई सरकार से दूरगामी संबंधों की नई नींव सततता और पारस्परिकता के आलोक में ही बनेगी और फिर तब ही ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ बनेंगे। मौजूदा भारतीय सरकार ने भारतीय हितों को वैश्विक पटल पर जितनी बेहतरीन ढंग से तराशा है, कहना होगा कि अपने पड़ोसी देशों के साथ हमारे सम्बन्ध ठिठके हुए हैं। यों तो विश्व-राजनीति में संबंधों की आवश्यकता प्रति एक राष्ट्र को है पर चीन की भारत को घेरने की नीति के आलोक में हमें अपने पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का एकतरफा प्रयास भी करते रहना होगा और इसमें नेपाल के साथ सम्बन्ध बढ़ाना अहम ही नहीं अनिवार्य भी है। नेपाल को भी यह ज्ञात है कि एक भरोसेमंद साथी के तौर पर भारत का रिकॉर्ड  चीन के मुकाबले कहीं बेहतर है परन्तु भारत भी सौदेबाजी के उनके संप्रभु अधिकारों की अवहेलना नहीं कर सकता क्योंकि विश्व-राजनीति में किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रहित ही स्थाई होते हैं।


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