About Me

Hailing from one of the most politically engaged areas of India, Eastern UP and after the completion of UG & PG from Gorakhpur University, I have shifted my academic orientation to Area Studies (International Relations). Written dissertation on India's Border Management and accomplished doctorate from SIS, JNU making comparative analysis between two different borders of India with Pakistan and Nepal.

Currently, I am heading the Department of Political Science, Galgotias University and majorly dealing with subjects of theoretical and diplomatic concerns global politics.

I, frequently share my humble opinions and perspectives through popular newspaper, digital mediums, journals and blogs in English as well as in Hindi.




Tuesday, December 12, 2017

पोलिटिकल पाठशाला: आइडियोलॉजी

*यह कोई अकादमिक आलेख नहीं है !
#जेनरेशन नेक्स्ट के लिए


जिससे जान नहीं छुड़ा सकते, उसे जान लेने में ही भलाई है।

अपने देश में पॉलिटिक्स स्टडी की चीज मानी नहीं जाती, बस चतुर करते हैं और बकिया मौज लेते हैं। लाइफ रिपीट नहीं करती खुद को पर इसके चैलेंजेस से निपटने की प्रिपरेशन हो तो इजी हो जाता है और कई बार बेहतरी की गारंटी भी मिल जाती है। इन्हीं तैयारियों को पढ़ाई कहते हैं। ज़िंदगी का एक-एक रेशा वेस्ट न हो, इसलिए होश सम्हालते ही कोशिश होती है कि स्कूल शुरू करवा दिया जाए। पढ़ाई को बैगेज बना दिया गया है और इसे केवल ब्रेड-बटर से जोड़ दिया गया है तो अब यह रियलिटी से दूर होती जा रही और अक्सर लोग इसे बुकिश कह कट लेते हैं। उनका दोष नहीं है। पढ़ाने वाले भी और पढ़ने वाले भी उसी सोशल प्रेशर में हैं, जिसमें बस जल्द से जल्द बंगला, गाड़ी, झुमके, कंगना और शोहरत हासिल कर लेना होता है।

मेरा अपना मानना है कि अगर पढ़ी हुई चीज जीवन में दिखाई न पड़ने लगे, उसे हम रियलिटी से रिलेट न कर पा रहे हों और वह स्टडी रोजमर्रा के प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने में हेल्प न करती हो, तो वह टीचिंग भी बेकार और वह स्टडी भी बेकार है। राजनीति एक प्रैक्टिकल चीज भी है और आर्ट सब्जेक्ट भी। इसकी स्पेसियालिटी यह है कि यह वेट नहीं करती कि इसे आप चूज़ करेंगे या लाइक करेंगे; यह आपके लाइफ में लोचा करने ही लगती है । जिससे जान नहीं छुड़ा सकते, उसे जान लेने में ही भलाई है। इसे जान लेने से इसका लाइफ में कलेक्टिव इस्तेमाल किया जा सकता है वर्ना कोई क्लेवर हमारा यूज़ भी करेगा जब-तब, इधर-उधर और हम करेंगे-क्लैप, लिखेंगे-नाइस और कहेंगे-वाओ ! इसी थिंकिंग से यह सीरीज शुरू की जा रही है कि इसमें अक्सर यूज़ किये जाने वाले पोलिटिकल वर्ड्स के रीयल मीनिंग्स पर बात होगी, क्योंकि राजनीतिक शब्दों के मीनिंग्स का छेड़छाड़ डेंजरस है और फेसबुक-व्हाट्सअप की दुनिया में अकुरेट मीनिंग तक पहुंचना और भी टफ है । कोशिश है कि बात डेली लैंग्वेज में हो और बिना किसी ऐकडेमिक टेंशन के कही जाए !

विचारधारा (Ideology)
केवल शब्द से पकड़ें, माने लिटरली; विचारधारा को आइडियाज का एक स्ट्रीम होना चाहिए पर मामला इतना आसान नहीं है। अब यह वर्ड, टर्म (टर्मिनोलॉजी) बन गया है और एक स्पेशल मीनिंग में यूज़ होता है। विचारधारा; एक खास विचारों का पुलिंदा है जिसके आधार पर किसी भी घटना (फिनॉमिना) को देखा, परखा, समझा और कहा जाता है।उन खास विचारों की बुनावट लॉजिकल होगी ताकि किसी भी रेशनल माइंड को अपील करे। उन खास आइडियाज से एक नजरिया (पर्स्पेक्टिव) बनाने में मदद मिलती है। समझना जरूरी यह है कि किसी आइडियोलॉजी से जब हम किसी फिनॉमिना को देखने-समझने की कोशिश करते हैं तो वह अंडरस्टैंडिंग और वह कन्क्लूजन फाइनल नहीं होता। उसी घटना को किसी दूसरे आइडियोलॉजी से किसी दुसरी तरह देखा-समझा जा सकता है।

अब जब ऐसा है कि एक आइडियोलॉजी से टोटल ट्रुथ तक पहुँचा नहीं जा सकता तो फिर आइडियोलॉजी की इम्पोर्टेंस ही क्या है ? है, हुज़ूर ! बहुत जरूरी है समझना !
हम अगड़म बगड़म माने स्पोरेडिकली या ज़िगज़ैग में सोचते हैं नॉर्मली। और यही प्रॉब्लम की जड़ है। हम फुटबाल से सोचना शुरू करते हैं, फुटबाल से रोनाल्डो तक और फिर पुर्तगाल पहुँच जाते हैं और फिर कब वास्को डी गामा के बारे में सोचते हुए गोवा के वास्को डी गामा पहुँच जाते हैं। ऐसे सोचते हैं हम, हमेशा ! इस थिंकिंग से डेफिनिट और अक्सेप्टबल कन्क्लूजन आने की पॉसिबिलिटी है बंधू बहुत लिटिल। इसलिए डिसिप्लिंड वे में थिंकिंग करना जरूरी हो जाता है। विचारधारा यानी आइडियोलॉजी उन्हीं खास आइडियाज को मिलकर कंस्ट्रक्ट किये जाते हैं जो डिसिप्लिंड थॉट प्रॉसेस से लॉजिकली अर्रेंज किये जाते हैं और इसलिए ही वे एक रेशनल माइंड को अपील भी करते हैं।

चूँकि हर आदमी अलग अलग जगह होता है और अलग अलग जगह से किसी घटना को देखते हुए ज़िगज़ैग ही सही एक कन्क्लूजन पर पहुँचता तो है ही, अक्सर उसी कन्क्लूजन को फाइनल मानने की टेंडेंसी रहती है, अक्सर इसी को लोग कहते हैं-भैया, हम ग्राउंड पे थे, हमसे जानों रियल्टी ! कोई फिनॉमिना होती एक जगह है पर उसे अलग-अलग लोग अलग-अलग जगह से अलग-अलग तरीके से परसीव करते हैं और फिर उस रियल्टी के रीयल वर्जन भी उतने ही हो जाते हैं, जितने लोग उसके बारे में ग्राउंड रिपोर्ट करते हैं। एक बात और भी है, दो आँखें हैं अपने पास, पर मिलकर भी देखती वही है जहाँ माइंड का अटेंशन होता है। जब माइंड डिसाइड करता है कि किसी सीन में ‘क्या’ देखना है तो अक्सर अपनी पुरानी ट्रेनिंग के हिसाब से वह यह भी डिसाइड करता है कि उस ‘क्या’ को ‘कैसे’ देखना है ! फिर क्या- सब अपनी-अपनी ज़िद पे रहते हैं कि-भइया, हमरी सुनो, हम ग्राउंड पे थे ! सच ये है कि जितना पास होकर देखा जाता है, उतना ही खतरा होता है। इसलिए ही रिपोर्टर को एनालिस्ट की जरुरत होती है। जिस घटना के हम विटनेस होते हैं या जिस घटना के हम खुद ही पार्ट होते हैं, वह घटना हम पर ही जाने कितना इम्पैक्ट कर रही होती है। और यह जो इम्पैक्ट होता है वह माइंड को गाइड करता है कि उस फिनॉमिना को एक खास इम्पैक्ट में ही ज़ियादा परसीव किया जाय। फ्रंट के एक सिपाही को इसीलिये डिसीजन मेकिंग के लिए दूर खड़े जनरल या हेडक़्वार्टर का आर्डर लेना होता है।

रियल्टी के इसलिए ही कई एंगेल होते हैं। सच झुकता नहीं है, परेशान हो सकता है, साहब लेकिन सच का सच यह है कि इसे टोटैलिटी में परसीव करना एक टफ चीज है। इसलिए विचारधारा और सिद्धांतों की शुरुआत हुई। आइडियोलॉजी का जो ऑब्जेक्ट है वह एनिमेट डायनामिक रियलिटी है। ह्यूमन बींग पर कोई एक प्रिंसिपल काम कर ही नहीं सकता, इसलिए ही ह्यूमन बिहैवियर से जुड़े सब्जेक्ट्स में प्रिंसिपल से अधिक पर्स्पेक्टिव इम्पोर्टेन्ट होता है और यहीं चूक होती है उनसे, जिन्होंने पिछले कई सालों से महज साइंस के ऐकजैक्टनेस (exactness) की ट्रेनिंग से अपने माइंड को ट्रेन किया हुआ है। इसमें उनकी कोई फॉल्ट भी नहीं। अपने कंट्री में साइंस, मैनेजमेंट, मेडिकल के स्वैग का पूछो मत। जहाँ, पैसा नहीं; वहां नॉलेज नहीं, मान लिया जाता है, इसे कहते हैं सोशल सायकॉलॉजी ! आर्ट्स में जब इस प्रॉब्लम को महसूस किया गया कि रियलिटी के परसीव करने के प्रोसेस में पर्सनल बायसेस (biases) आ सकते हैं तो विचारधाराओं का चलन तेजी से हुआ।

एक आइडियोलॉजी, अपने तरह की खास विचारों से बने डिसिप्लिंड थॉट प्रोसेस को ऑफर करती है। यहाँ बायसनेस की गुंजायश तो पूरी है, पर आइडियोलॉजी यूज़ करने वाला शुरू से ही अवेयर है। इसी अवेयरनेस की गुंजायश ने आइडियोलॉजी का मान बढ़ाया। अब जब हम किसी फिनॉमिना को मार्क्सिज्म की आइडियोलॉजी से देखते हैं तो अवेयर रहते हैं कि थॉट प्रोसेस का बेस क्या है। इसप्रकार फिनॉमिना को समझ भी लेते हैं और थॉट प्रोसेस पर कंट्रोल भी बना रहता है, ज़िगज़ैग नहीं होने पाता। बस एक गलती हो जाती है अक्सर। इसी गलती की वजह से आइडियोलॉजी बदनाम बहुत हैं। लेकिन इसमें गलती आइडियोलॉजी से नहीं, बंदे से होती है। यही कि, उस पार्टिकुलर आइडियोलॉजी के यूज़ से मिले कन्क्लूजन को ही फाइनल समझना। भाई, दुनिया में बहुत विचारधाराएँ हैं, क्यूंकि दुनिया बहुत बड़ी है और लोग वैरायटी में हैं, तो किसी घटना के अनगिनत ऐंगल संभव हैं तो एक आइडियोलॉजी से कुछ ऐंगल्स पकड़ में आते हैं, ज्यादातर रह ही जाते हैं। ये समझना चाहिए। तभी तो किसी एक घटना को समझने के लिए कई आइडियोलॉजीज का इस्तेमाल होता है, ताकि ज्यादातर ऐंगल्स पकड़ में आएं। एनालिसिस इसलिए ही यों की जाती है कि उसमें ग्राउंड रिपोर्ट वाला भी हो और दूर से देख रहा एनालिस्ट भी हो ! ज़िंदा डायनामिक ह्यूमन बींग जिस फिनॉमिना के पार्ट हों, उससे निकलती घटना के रियलिटी का ट्रुथ पकड़ना कभी आसान नहीं था, पर कोशिश की जाती है लगातार ताकि फ्यूचर आज से बेहतर हो। डिबेट, डिस्कशन, एनालिसिस सारे ही इसलिए ही जरूरी हैं ताकि अधिक से अधिक एंगेल पकड़ में आये। जरूरी नहीं कि हर डिस्कशन, डिबेट का कन्क्लूजन आये ही, क्योंकि यह स्टेबल ऑब्जेक्ट वाला साइंस नहीं है, यहाँ अगर डिस्कशन से अधिकांश पॉसिबल एंगेल ही खोज लिए गए तो धीरे धीरे कन्क्लूजन परसीव होते रहेंगे।

एक आइडियोलॉजी एक चश्में से अधिक कुछ नहीं होती। हमें समझना चाहिए कि लाल रंग के चश्में से सब कुछ लाल दिखेगा और हरे रंग का ग्लास होगा तो सबकुछ ग्रीन दिखेगा। मुश्किल तब होती है जब परवरिश या एजुकेशन से कोई एक ही तरह का चश्मा लगा ही रह जाता है और बंदा आँख और चश्में में फर्क ही नहीं कर पाता। कलर लैब में जैसे फोटो डेवलपिंग में हम समझते हैं कि कोई फ्रेम किस कलर में ज़ियादा निखरेगा उसी कलर का यूज़ करके बेहतरीन फोटो बनाने की कोशिश की जाती है, इसलिए ही अलग-अलग विचारधाराओं का चश्मा पहनकर घटनाएं देखने की कोशिश होती है। बस परेशानी यह है कि कइयों को दूसरा चश्मा कभी मिल ही नहीं पाता, जो मिलता भी है तो पिछला चश्मा उतारना नहीं आता। और मान लीजिये कि नंगी आँख से सब दिखेगा तो जरूर पर माइंड का घालमेल बना रहेगा।

सबसे बेहतर तो यही है कि हमारी एडुकेशन हमें पढाई के दिनों में ही ढेरों चश्मों से मिलवा दे ताकि हम किसी एक चश्मे को आँख न मानने लगें और जब चाहें वैसा चश्मा यूज़ कर रियलिटी के अधिकांश ऐंगल पकड़ सकें। मोटीमोटा जान लीजिये कि किसी भी वर्ड के बाद जो इज्म लगा होता है तो ज्यादातर वह आइडियोलॉजी होता है, ज्यादातर ! जैसे मार्क्सिज्म, लिबरलिज्म, कैपिटलिज्म, फेमिनिज्म, एट्सेटरा. यूरोप में नेशनलिज्म की आइडियोलॉजी ने वो कहर बरपाया कि दो-दो वर्ल्ड वार्स हो गए। हुआ यही कि अपने अपने नेशन का चश्मा उन्होंने उतारा ही नहीं। सो, आइडियोलॉजी समझनी पड़ेगी देर-सबेर, नहीं तो डेंजर रहगी कि कोई क्लेवर कुछ बोलकर कोई चश्मा पहनाकर टोपी न पहना दे !



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