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Friday, November 24, 2017

आखिर एशिया में हुआ क्या है...!


लल्लनटॉप पर 

दुनिया में सबसे जियादा लोग यहीं बसते हैं। बाकी सभी महाद्वीपों के सभी लोगों को जोड़ भी लें तो कम है। दुनिया कारोबारी हो गयी है और एशिया उन्हें बाजार दिखता है। अमीर देशों के कारोबारी और ज़ियादा मुनाफे की हवस में एशिया आते हैं ताकि उन्हें सस्ते में स्किल वाले मजदूर मिलें। इस चक्कर में विकसित देशों ने एशिया में पैसा लगाया, फैक्टरियाँ लगाईं और जिन एशियाई देशों ने वक्त की नब्ज पकड़ी उन्होंने और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करके इस मौके का फायदा उठाया। एशिया में पुराने बाबा तो हैं ही, यूरोप से सटा रूस है, मालदार जापान है और अब उभरता भारत है और चकल्लस चीन है। विश्व -राजनीति में शक्ति वही नहीं होती जो हथियार और सेना से उपजती है, जोसेफ नाई के अनुसार हार्ड पावर के साथ सॉफ्ट पावर भी होता है जो कल्चरल चीजों से हर जगह, जगह बना लेता है। डांस, गाना, त्यौहार, खाना, भेष, साहित्य, फिल्म, आदि से पकड़ और मजबूत हो जाती है, इसके साथ ही अगर सेना भी मजबूत हो, हथियार नए-नवेले हों तो फिर तो धाक जम ही जाती है। सिंगापूर, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड जैसे देशों ने ग्लोबलाईजेशन का फायदा उठाया, चीन और भारत ने अपने कल्चरल माल का इस्तेमाल तो किया ही, न्यूक्लियर, सेना, हथियार और उत्पादन पर भी अच्छी प्रगति की। रूस को 1991 में अपनी सोवियत रूस की पहचान गंवानी तो पड़ी पर अपने प्राकृतिक खजानों और काबिल नेतृत्व के बल पर एक बार फिर विश्वराजनीति में हलचल पैदा करने लायक स्थिति में पहुँच गया है। दूसरे विश्वयुद्ध में परमाणु बम से नेस्तनाबूत होने के बाद जापान ने शांति और समृद्धि की राह चुनी और देखते देखते ही यह दुनिया का दूसरा मालदार देश बन बैठा है। मध्य-पूर्व एशिया में तेल की खोज हो जाने से वहाँ लूटमार शुरू हुई पर कुछ देशों जैसे युएई, सऊदी अरब, क़तर, ईरान आदि ने अपनी धाकड़ जगह जमा ली।  

कुल मिलाकर अभी एशिया में सबसे अधिक उपजाऊ जमीन है, स्किल वाले लोग हैं, बड़ा बाजार है, कल्चर है और ताकत भी।ये समय पैसा वाला है और पूरी दुनिया ही खरीदने से अधिक बेंचने के जुगाड़ में है। बेंचने के लिए जमीन का रास्ता ठीक तो है पर पूरी दुनिया जमीन का एक टुकड़ा तो है नहीं और फिर जमीन पे रिस्क कुछ कम नहीं। दुनिया भर के देश से रिश्ता बनाओ, तब माल आगे ले जाओ। रिश्ता जो बन भी जाये तो भी समुद्र का दामन पकड़ना ही होता हैसात महाद्वीप पांच महासागर में तैरते जो हैं। एशिया दो महासागर हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर की गोदी में है। यूरोप को एशिया से जोड़ने के लिए अदन की खाड़ी से होते हुए हिन्द महासागर के अरब सागर का सहारा चाहिए और एशिया को अमेरिका से जोड़ने के लिए दक्षिण चीन सागर के रास्ते प्रशांत महासागर में गोता लगाना होगा। दुनिया के सब व्यापारी लोगों का काम बिना इन दो महासागरों के समुद्री राहों के न हो सकेगा। व्यापारी सरकार बनवाता है तो सरकार सारा कूटनीति इन राहों की सलामती के लिए करती है।जब यूरोप के लोग डार्क एज से निकले तो साइंस का हाथ पकड़के जरुरत के हिसाब से नहीं मुनाफे के पैमाने पर उत्पादन करना शुरू किया और हथियार, सेना व चालाकी से दुनिया के उन देशों को गुलाम बना लिया जहाँ अभी भी लोग मशीनों के गुलाम नहीं बने थे। आज एशिया के देश आजाद हैं और अपने हक़ के लिए जागरूक भी। ये अपने जमीन और जल के लिए बारगेन करना जानते हैं।

विश्वराजनीति में आधुनिक समय में खिलाड़ी जरूरी नहीं है कि कोई देश ही होगा, बिना देश वाला कुछ लोगों का संगठन भी हलचल मचा सकता है। बढ़िया सेन्स में मल्टीनेशनल कम्पनीज हैं जिनके पास किसी एक देश की तरह हुकूमत तो नहीं है पर ये अपने माल और रसूख से किसी भी देश में मनचाहा फर्क डाल सकते हैं। घटिया सेन्स में आतंकवादी संगठन हैं जो किसी एक देश के नहीं हैं पर देशों पर असर डाल सकते हैं। एशिया को मल्टीनेशनल कम्पनीज एक बाजार और सस्ते मजदूर की लालच में देखती हैं तो आतंकवादी संगठन भी एशिया को एक आसान चारागाह और भटके स्किल/बिना स्किल वाले मजदूरों का खान समझते हैं। ऐसे में ऐसे में एशिया के समुद्री राहों को इनसे भी बचाना है और एशिया के किसी देश की दादागिरी से भी। पर यहीं तो ट्विस्ट है। पश्चिम के पुराने बाबा एशिया का बाजार चलाना चाहते हैं और एशिया के उभरते शेर अपना हिस्सा मांग रहे या फिर राहों पर अपनी चलाना चाहते हैं। अब आज का जापान सेना और हथियार पे इन्वेस्ट कर रहा है। चीन व्यापार का कारखाना बन गया है और सॉफ्ट पावर के साथ ही साथ हार्ड भी हो गया है। भारत ने भी अब अपने आपको बटोर लिया है और मैप पे अपनी जगह का फायदा उठाने को तैयार बैठा है। रूस को अब फिर से सोवियत वाला रसूख चाहिए और इतना डेस्पेरेट हैं पुतिन कि अपने जिगरी दोस्त भारत के पक्के दुश्मन पाकिस्तान को हथियार बेच रहे हैं। चीन को एशिया और दुनिया का बाबा बनना है तो बगल में भारत को दबाते रहना है। 1962 में  ड्रैगन ने शेर को खाली इसलिए घायल कर दिया कि शेर की साख दुनिया के लेवल पर बढ़े जा रहा था। भारत को घेरने के लिए पापी चीन भारत के सब पड़ोसी को पुचकारता है और हिन्द महासागर में बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान के लिए बंदरगाह बनाता है। कश्मीर का एक हिस्सा 1947 से ही पाकिस्तान के पास है और एक दूसरा हिस्सा 1962 में चीन ने हड़प लिया; यहीं से चीन ने पाकिस्तान को दोस्ती की टॉफियाँ खिला रहा है और भारत ऊर्जा के भंडार मध्य एशिया के देशों से भी कट गया। कोरिया का एक हिस्सा तानाशाही परिवार के हाथ में है और वह पाकिस्तान, चीन आदि की कृपा से नुक्लियर बम की धमकी से पूरी दुनिया को थर्रा रहा है। मानेंगे नहीं पर पूरी दुनिया को पता है कि रूस और चीन, उत्तर कोरिया को शह दे रहे हैं और उसे अपने लिए एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहे।

जापान में शिंजो अबे फिर चुनकर आये हैं, मजबूत इरादों के साथ नया जापान गढ़ने को तैयार हैं। चीन में शी जिनपिंग की सत्ता में पकड़ मजबूत हुई है और वे भी चाइनीज ड्रीम देख रहे हैं। पुतिन गाहे-बगाहे कभी राष्ट्रपति बनकर तो कभी प्रधानमंत्री बनकर सत्ता में बने हुए हैं और लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है। पाकिस्तान में चलती अभी भी सेना की ही है और भारत में भी एक मजबूत नेता की सरकार है। कहने का मतलब ये है कि अभी के निर्णायक एशियाई देश निर्णय लेने को अधिक सशक्त हैं। ऐसे में एशिया अभी सबकी नज़र में है। कोई कमाना चाहता है, कोई आतंकवाद से परेशान है।  कोई बेचना चाहता है तो कोई रस्तों के कब्जाने से परेशान है। आईएस भी यहीं है और अलक़ायदा भी। आसियान भी यहीं है और एपेक भी यहीं है। जंगल, पहाड़, समुद्र का का बायोडायवर्सिटी भी यहाँ प्रचुर है। इस सबकी वजह से अपना एशिया हिट है और हिटलिस्ट में भी है। कुछ विद्वान् कहते हैं कि तृतीय विश्व युद्ध के पहले की सारी परिस्थितियाँ मौजूद हैं, यहाँ। अपना दिमाग है कि, विश्व युद्ध तो नहीं ही होगा पर एशिया अब इग्नोर होने के मूड में नहीं है।  
डॉश्रीश पाठक 
shreesh.prakhar@gmail.com

Thursday, November 23, 2017

हेग विजय और संयुक्त राष्ट्र संघ सुधार

डॉ.श्रीश पाठक

भारत की ब्रिटेन से आजादी के ही साल जन्मे जस्टिस दलवीर भंडारी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (आईसीजे ), हेग की पंद्रह सदस्यीय पैनल में लगातार दुसरी बार अगले नौ साल के लिए चुन गए जब उनके खिलाफ रहे ब्रिटेन के क्रिस्टोफ़र ग्रीनवुड ने आखिरी समय में अपनी दावेदारी वापस ले ली। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश रहे दलवीर भंडारी जोधपुर के हैं और उनका परिवार विधिज्ञों की विरासत वाला है। दलवीर भंडारी से आठ साल छोटे क्रिस्टोफर ग्रीनवुड भी आईसीजे में अपना नौ साल का समय पूरा कर लेने के बाद अगले नौ साल की नियुक्ति के लिए ब्रिटेन की तरफ से मैदान में थे। सर क्रिस्टोफर जॉन ग्रीनवुड लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में विधि के प्रोफ़ेसर हैं और इनकी आलोचना इनके उन विधिक तर्कों के लिए पुरे विश्व में की जाती है जिसके सहारे ब्रिटेन ने  २००२ में इराक पर अपने सैनिक बल प्रयोग को उचित ठहराया गया था। ब्रिटेन ने यह कहते हुए अपनी दावेदारी वापस ले ली कि जबकि उनका देश यह चुनाव नहीं जीत सकता, उन्हें खुशी है कि उनके नज़दीकी मित्र भारत ने यह दावेदारी जीत ली है और वे संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक पटल पर भारत का सहयोग करते रहेंगे। हालाँकि ब्रिटिश और अमरीकी मीडिया ने ब्रिटेन की इस हार को शर्मनाक बताया है क्योंकि संस्थापक सदस्य ब्रिटेन पिछले ७१ साल में पहली बार इस पंद्रह सदस्यीय जजों के पैनल से बाहर होगा और चीन के बाद यह दूसरा मौका होगा जब कोई वीटो शक्तियुक्त  देश इस पैनल में अपना स्थान बनाने से चूक गया है।   

आईसीजे संयुक्त राष्ट्र संघ का विधिक अधिकरण है जो सदस्य राष्ट्रों के मध्य उपजे विवादों पर अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार निर्णयन करती है। हाल ही में आईसीजे ने भूतपूर्व भारतीय नेवी ऑफिसर कुलदीप जाधव, जो अपहृत होने के पूर्व ईरान में व्यवसाय कर रहे थे; पाकिस्तान की सैनिक न्यायालय के द्वारा सुनायी गयी फाँसी की सजा पर रोक लगा दी थी जो उन्हें तथाकथित जासूसी के आरोप में सुनायी गयी थी। ईरान के शामिल हो जाने के कारण यह मामला द्विपक्षीय न होकर त्रिपक्षीय हो गया था और इसी कारण भारत ने इस अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में अर्जी लगाई थी। आईसीजे के मुख्य न्यायाधीश रॉनी अब्राहम द्वारा सुनाये गए और पंद्रह सदस्यीय न्यायाधीशों के समूह द्वारा तैयार किये गए  इस फैसले में दलवीर भंडारी भी शामिल थे।



दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति दरअसल भारतीय कूटनीति की स्पष्ट विजय का द्योतक है। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने  अपने दूसरे भारतीय अधिकारी सहयोगियों के साथ नयी दिल्ली के निर्देशन में एक बेहतर लामबंदी की और नतीजा भारत के पक्ष में कर दिया। यह जीत वाकई कठिन थी क्योंकि नियुक्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् और महासभा दोनों में ही बहुमत की आवश्यकता होती है। वीटो शक्तियुक्त पाँच स्थाई सदस्यों (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और चीन ) और वीटो शक्तिरहित दस अस्थायी देश (बोलीविया, मिस्र, इथोपिया, इटली, जापान, कजाखस्तान, सेनेगल, स्वीडन, यूक्रेन और उरुग्वे ) से बनी सुरक्षा परिषद् में भारत को कुल पंद्रह में से महज पाँच मतों का समर्थन था किन्तु महासभा जो कि सभी सदस्य राष्ट्रों से निर्मित सभा है, उसमें ब्रिटेन के मुकाबले भारत ने ग्यारह चरणों में हमेशा ही दो-तिहाई से अधिक मतों का समर्थन हासिल किया है। यह प्रतिस्पर्धा ऊपरी तौर पर दलवीर भंडारी और क्रिस्टोफर ग्रीनवुड के मध्य थी, पर हकीकत में यह प्रतिस्पर्धा सुरक्षा परिषद् और महासभा की मंशाओं एवं संयुक्त राष्ट्र में सुधारों के खिलाफ और सुधारों के पक्षकारों के मध्य थी। एक लम्बे समय से भारत सुरक्षा परिषद में सुधारों का हिमायती है और जापान, जर्मनी व ब्राज़ील की साथ मिलकर लामबंदी भी करता रहा है। सुरक्षा परिषद् के पाँच स्थाई सदस्यों में जहाँ केवल फ्रांस ही वीटोयुक्त भारतीय सदस्यता को समर्थन देता है, वहीं चीन के मुताबिक सुधारों का यह उचित समय नहीं है और अमेरिका सहित बाकी देश सुरक्षा परिषद का विस्तार वीटोशक्तिविहीन सदस्यता के तौर पर दबे स्वर में स्वीकार करते हैं।  

प्रथम विश्व युद्ध की दारुण विभीषिका के बाद राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी ताकि ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति ना हो, किन्तु बाईस सालों के भीतर ही द्वितीय विश्वयुद्ध की भेरी बज गयी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध जापान के न्यूक्लियर नेस्तनाबूत हो जाने के साथ ही संपन्न हुआ और एक बार फिर विश्व शांति की गरज से संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन १९४५ में किया गया। सभी सदस्य राष्ट्र जहाँ महासभा के सदस्य बने, वहीं द्वितीय विश्व-युद्धों के विजेता देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के भीतर ही सर्वाधिक निर्णायक सुरक्षा परिषद का गठन किया। सुरक्षा परिषद के निर्णयों के लिए पूर्ण सहमति एक अनिवार्य शर्त है और इसकी क्रियान्वयन के लिए ही वीटो शक्ति का प्रावधान किया गया जिसमें चार के मुकाबले एक सदस्य भी किसी निर्णय में यदि असहमति दर्ज करता है तो कोई प्रस्ताव पास नहीं होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कमोबेश वैश्विक आर्थिक व्यवस्था इन्हीं पश्चिमी देशों के हितों के अनुरूप चलती रही बस, ब्रिटेन की जगह अमेरिका ने ले ली। अब जबकि विश्वराजनीति वैश्वीकरण के दौर से गुज़र रही है और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों की धुरी यूरोप से खिसककर एशिया में आ गयी है, संयुक्त राष्ट्र संघ की वर्षों पुरानी उत्तर-युद्ध संरचना में सुधार अनिवार्य हैं बशर्ते ये निर्णायक राष्ट्र तैयार हों।

केवल इसलिए नहीं कि ये पाँच निर्णायक राष्ट्र विश्व-व्यवस्था में मनमाना रवैया रखते हैं बल्कि इनके नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र संघ न ही आज की बहुपक्षीय आर्थिक-राजनीतिक विश्वप्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है और ना ही यह बहुधा वैश्विक विवादों का समाधान ही दे पा रही है। दारफूर संकट, जंजावीड उन्माद, स्रेबेनिका सामूहिक हत्या, इजराइल-अरब संघर्ष, कुवैत संकट और रवांडा संकट के समाधान पर पक्षपात आदि मसलों में संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलता इसकी सुधारों के प्रति उदासीनता को पुष्ट करती है। पांचों वीटोयुक्त देश स्वयं ही आणविक शक्तियों से लैस हैं और भारी शस्त्रों का भण्डारण भी किये हुए हैं।  जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ लगभग पचहत्तर प्रतिशत राहत कार्य अफ्रीका पर केंद्रित है, अफ्रीका महाद्वीप का कोई देश सुरक्षा परिषद् में नहीं है। विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था, सबसे बड़ा लोकतंत्र, संयुक्त राष्ट्र की शांतिरक्षक टुकड़ियों में सर्वाधिक योगदानकर्त्ता देशों में से एक और बेहतरीन राजनीतिक साख वाला देश भारत सुरक्षा परिषद् की सदस्यता से वंचित है।  भारत ने साफ़ कर दिया है कि वह वीटोशक्तिरहित सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।  

आईसीजे में दलवीर भंडारी की नियुक्ति के मसले से पूर्व भी जून २०१७ में संयुक्त राष्ट्र संघ के भीतर महासभा और सुरक्षा परिषद की मंशाओं के मध्य विभाजन तब स्पष्ट हो गया था जब लगभग एक स्वर से महासभा ने मॉरीशस के आईसीजे में जाने के उस प्रस्ताव को समर्थन दिया था चागोस द्वीपसमूह पर अपनी संप्रभुता का दावा ब्रिटेन के विरुद्ध पेश किया था। उस वक्त भी संयुक्त राष्ट्र संघ के सुधारों की चर्चा जोरशोर से भारत ने उठाई थी इसने  इस प्रस्ताव पर मॉरीशस के पक्ष में अपना मत दिया था। यहाँ भारत के लिए कूटनीतिक चुनौतियाँ बेहद ही जटिल हैं, पर मानना होगा कि भारत ने निर्णय लिए हैं। यूरोपीय संघ ने इस मतदान में भाग नहीं लिया किंतु बाकी सभी पारंपरिक शक्तियों ने ब्रिटेन का साथ दिया। हिन्द महासागर में चीन की भारतीय उपमहाद्वीप को घेरने की ओबोर और पर्ल ऑफ़ स्ट्रिंग पॉलिसी के खिलाफ मॉरीशस के इसी चागोस द्वीपसमूह के एक द्वीप डियागो गार्सिआ पर स्थित भारतीय-अमेरिकी सैन्य अड्डे से सुरक्षा मिलती है। डियागो गार्सिआ ब्रिटिश संप्रभुता में आता रहा है जिसे रक्षा सहमतियों में अमेरिका और भारत से साझा किया गया है। बल्कि ब्रिटेन ने भारत से इस मामले में अपना प्रभाव का प्रयोग कर मॉरीशस से वार्ता का आग्रह भी किया है। उधर मॉरीशस ने ताईवान मुद्दे पर हमेशा ही चीन का साथ दिया है और सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य होने के नाते चीन से यह अपेक्षा रखता है की वह चागोस संप्रभुता मसले पर मॉरीशस का ही साथ देगा। इस प्रकार भारत के लिए जटिलताएँ बेहद पैनी हैं, पर दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति ने यह आश्वस्ति दी है कि वैश्विक पटल पर भारतीय कूटनीति अपने राष्ट्रहित को बेहतर रीति से सुरक्षित कर पा रही है।  

Friday, November 17, 2017

पाकिस्तान में मुशर्रफ का महागठबंधन

डॉ. श्रीश पाठक
दुबई में राजनीतिक रूप से स्वनिर्वासित जीवन जी रहे पाकिस्तान के भूतपूर्व सैनिक तानाशाह और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने गत शुक्रवार (१०.११.१७) को विडिओ टेलीकांफ्रेंसिंग के जरिये हुई एक प्रेसवार्ता में एक बार फिर पाकिस्तान लौटकर सक्रिय राजनीति में परिभाग की अपनी मंशा जताई है. उनका कहना है कि वे सत्तारुढ़ ‘पाकिस्तान मुस्लिम लींग (नवाज़)’ और पिछली बार सरकार बनाने वाली ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ को देश को बर्बाद नहीं करने देंगे. बेनजीर भुट्टो हत्या मामले में न्यायालय ने मुशर्रफ को राजद्रोह का दोषी और भगौड़ा करार दिया था. न्यायालय और नागरिक सरकार से काफी  जद्दोजहद के बाद आखिरकार चिकित्सा का कारण बताने पर उन्हें मार्च २०१६ में दुबई जाने की इजाज़त मिली. तब से मुशर्रफ ने कई बार देश लौटकर राजनीति से देश सेवा करने की बात दोहराई है पर कभी सुरक्षा कारणों से अथवा कभी किसी वजह से यह टलता रहा है.  इस बार की उनकी मंशा में पुरी तैयारी भी दिख रही है. उन्होंने कुल तेईस अन्य दलों के साथ मिलकर अपने नेतृत्व में एक महागठबंधन बनाने की भी घोषणा की है, जिसका नाम ‘पाकिस्तान अवामी एतेहाद’ रखा है और जिसका मुख्यालय इस्लामाबाद में होगा. हालांकि महागठबंधन के ये दल, देश के कोई बड़े प्रभाव वाले दल नहीं हैं, किन्तु मुशर्रफ के अपने दल ‘आल पाकिस्तान मुस्लिम लींग’ सरीखे ही यत्र-तत्र प्रभाव अवश्य ही रखते हैं. नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ शरीफ ने मुशर्रफ़ की इस घोषणा पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया में उन्हें निशान-- इबरत (कलंक) की संज्ञा दे डाली है.
दिल्ली की पैदाइश और लखनऊ के नौनिहाल मुशर्रफ पाकिस्तानी राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं और इस वक्त पाकिस्तान के किसी भी प्रभावी राजनीतिक हस्ती से केवल उम्र में ही नहीं बल्कि अनुभव में भी बीस पड़ते हैं. उनकी हालिया तैयारी एक ऐसे समय में है जब पनामा पेपर्स विवाद ने नवाज़ शरीफ को उनके पद से हटा दिया है और शरीफ परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप में न्यायलय का डंडा अभी और चलने को है. इस बीच नवाज़ शरीफ के बाद दल में दूसरा प्रमुख चेहरा समझी जाने वाली उनकी बड़बोली बेटी मरियम नवाज़ शरीफ ने परिवार के भीतर ही राजनीतिक उत्तराधिकार की बहस को बेवक्त ही सतह पर ला दिया है. नवाज़ शरीफ के ही चुने हुए सेना प्रमुख मुशर्रफ ने १९९९ में सैनिक तख्तापलट करते हुए शरीफ सरकार को अपदस्थ कर दिया था और फिर आपातकाल के बाद फिर चुनाव कराकर स्वयं ही देश के राष्ट्रपति बन बैठे थे. मुशर्रफ का कार्यकाल यों तो बेहद ही विवादों से भरा रहा है पर कारगिल के इस मास्टरमाइंड ने अपने देश पाकिस्तान को ९/११ की घटना के बाद अमेरिकी गुस्से से न केवल बचाया था बल्कि पाकिस्तानी पारम्परिक शक्ति- प्रतिष्ठान (एस्टाब्लिशमेंट) की पुरानी नीति में सहसा बदलाव लाते हुए पाकिस्तानी सेना को अफ़गानिस्तान में तालिबान के विरुद्ध झोंककर अमेरिकी सौगात भी बटोरी थी. पाकिस्तान में यों तो लोकतंत्र है पर १९४७ में अपने अस्तित्व में आने बाद से ही औपनिवेशिक विरासत में मिले मजबूत सांगठनिक नौकरशाही और सेना, धार्मिक कट्टरता का ही नीति निर्णयन और क्रियान्यवन में हाथ रहा है. बार-बार उपजते राजनीतिक संकट और वैश्विक पटल पर शीत युद्ध की आवक ने इसमें अमेरिकी दखलंदाजी भी जुड़ गयी. यह सब मिलकर ही पाकिस्तान का शक्तिशाली शक्ति-प्रतिष्ठान निर्मित करते हैं. अपनी तानाशाही में मुशर्रफ ने पाकिस्तान को वैश्विक पटल पर तो सुरक्षित रखा परन्तु लोकतंत्र की कमर ही तोड़ दी. वैश्विक परिदृश्य बदला, पाकिस्तानी नागरिक समाज ने एकजुट होकर न्यायपालिका के साथ मिलकर मुशर्रफ को लोकतान्त्रिक दिखावा करने को मजबूर कर दिया. २००७ में निर्वासन से नवाज़ शरीफ भी आये और बेनजीर भुट्टो भी वापस लौटीं. पाकिस्तान में चुनावों की घोषणा हुई और बेनजीर भुट्टो की निर्मम हत्या के पश्चात उनके दल ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ ने २००८ में सरकार बनाई. पांच साल के बाद पाकिस्तान ने अपने इतिहास का पहला शांतिपूर्ण लोकतान्त्रिक सत्ता-परिवर्तन देखा और नवाज़ शरीफ के दल ने जून, २०१३ में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. कतिपय अपवादों को छोड़ दें तो इन दस सालों में मुशर्रफ पाकिस्तानी राजनीति में अप्रासंगिक रहे.

लेकिन पिछली ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ की सरकार ने जहाँ पाकिस्तानी पारम्परिक शक्ति-प्रतिष्ठान के समक्ष समझौते करती रही, वहीं ‘पाकिस्तान मुस्लिम लींग (नवाज़)’ की मौजूदा सरकार ने जब तब नागरिक सरकार की ताकत का एहसास सेना प्रशासन को कराया है. पाकिस्तानी पारम्परिक शक्ति-प्रतिष्ठान जहाँ एक कमजोर नागरिक सरकार के साथ लोकतांत्रिक छवि बनाते हुए मनमाना करते रहना चाहते हैं, वहीं पाकिस्तान के पारम्परिक मित्र अमेरिका के लिए भी वांछित स्थिति यही रही है कि एक ऐसा शक्ति प्रतिष्ठान पाकिस्तान में शक्तिशाली रहे जो दक्षिण एशियाई मामलों में अमेरिकी हितों के अनुरूप त्वरित निर्णय ले सके. किसी भी तानाशाह की सत्ता का अंत पाकिस्तान में सुखद नहीं रहा, पर यह मुशर्रफ की राजनीतिक कुशलता ही है कि वह अब भी राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें यकीनन उनकी पाकिस्तानी सेना और शक्ति-प्रतिष्ठान में पकड़ का अंदाजा लगता है. संभव है कि शक्ति-प्रतिष्ठान उनमें एक राजनीतिक विकल्प ढूंढ रही हो. गौरतलब है कि मुशर्रफ ने अपने इस टेलीकांफ्रेंसिंग प्रेसवार्ता में यह भी कहा कि यदि चुनाव पाकिस्तान की समस्याओं का हल नहीं देते हैं तो देश को वापस उसकी रह पर लाने के लिए दुसरे उपाय किये जाने चाहिए. महागठबंधन बनाकर उन्होंने वरीयता में चुनाव को ही रखा है किन्तु राजनीतिक सौदेबाजी के जादूगर मुशर्रफ के इरादे भांपना आसान नहीं है.
पाकिस्तान में अगले आम चुनाव २०१८ में होने हैं. पिछले दस साल में सत्ता दो ही बड़े दल ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ और ‘पाकिस्तान अवामी लींग (नवाज़)’ के पास रही है. दक्षिण-पारम्परिक विचारधारा वाला नवाज़ के दल का गढ़-राज्य देश का सबसे धनी राज्य पंजाब है वहीं देश का दूसरा महत्वपूर्ण राज्य सिंध लोकतान्त्रिक समाजवादी विचारधारा वाला दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रभावों का राज्य है. सिंध के पड़ोस में बलूचिस्तान राज्य है जो आतंकग्रस्त है. अफ़ग़ानिस्तान सीमा से लगा फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राईबल एरियाज ), खैबर पख्तुनखवा और गिलगित-बाल्टीस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी अशांत क्षेत्र हैं; यहाँ कोई एक दल प्रभाव की स्थिति में नहीं है. ऐसे में मुशर्रफ के महागठबंधन को हलके में लेना भूल हो सकती है. मौजूदा कौमी असेम्बली (निम्न सदन) में पाकिस्तानी क्रिकेटर का दल ‘पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई)’  दुसरे नंबर का दल है और खैबर पख्तुनखवा राज्य में इसी दल की सरकार है. मुशर्रफ गाहे-बगाहे इमरान खान की प्रशंसा करते रहते हैं और उन्होंने अपने प्रेसवार्ता में उनके दल से अपील की है कि उनके महागठबंधन को समर्थन दें. नवाज़ के दल से अलग हुई ‘पाकिस्तान मुस्लिम लींग (क्यू)’ ने पहले ही महागठबंधन को अपना समर्थन दे दिया है. सिंध राज्य का कराची, पाकिस्तान का वाणिज्यिक शहर है और यह मुहाजिर राजनीति का अखाड़ा भी है. विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान आये मुस्लिम मुहाजिर कहलाये जो अमूमन उर्दू बोलते हैं और जिन्हें पाकिस्तान में अपने लिए खासा जद्दोजहद करनी पड़ी. मुशर्रफ स्वयं मुहाजिर हैं और मुहाजिरों का सबसे बड़ा दल जो छात्र राजनीति से निकलकर आया वह ‘मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम)’ है जिसे फ़िलहाल लन्दन में रह रहे अल्ताफ हुसैन ने खड़ा किया था. पाकिस्तान में एमक्यूएम को फारुक सत्तार ने सम्हाला था, जो अगस्त २०१६ में सत्तार के ही नेतृत्व में ‘मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (पाकिस्तान)’ के नाम से एक नया दल बन गया. अल्ताफ हुसैन के ही दल से कराची के मेयर रहे तेज-तर्रार सैयद मुस्तफा कमाल ने भी मार्च २०१६ में अलग होकर एक नया दल ‘पाक सरज़मीन पार्टी’ बना ली और अल्ताफ हुसैन सिंधी राजनीति में फिलहाल अलग-थलग पड़ गए हैं. पिछले दिनों पाकिस्तानी शक्ति-प्रतिष्ठान के प्रभाव में फारुक सत्तार और सैयद मुस्तफा कमाल के दल ने एक गठबंधन बनाने की घोषणा की. मुशर्रफ ने इसे अप्राकृतिक गठबंधन कहा पर मुहाजिरी एकता पर संतोष भी व्यक्त किया. फ़िलहाल यह गठबंधन बन नहीं सका है और काफी नाटकीय ढंग से सहयोग की गुंजायश बनी हुई है.
मुशर्रफ ने बोल टीवी पर अपने साप्ताहिक साक्षात्कार कार्यक्रम से और अपने बयानों से पूरे साल पाकिस्तान में सुर्खियाँ बटोरी हैं और आगामी आम चुनाव के मद्देनज़र उन्होंने अपनी कमर कस ली है. आने वाले समय में यदि मुशर्रफ पाकिस्तान लौटते हैं तो निश्चित ही वह एक प्रभावी कोण बनकर उभरेंगे. मुशर्रफ को पाकिस्तानी न्यायालयों पर सहसा विश्वास हो आया है और वे देश वापस आकर अपने खिलाफ सभी मामलों का सामना करने को तैयार हैं. मुशर्रफ के मुताबिक पहले न्यायालय नवाज़ के इशारे पर चल रही थीं, पर अब तो नवाज़ को ही न्यायलय ने सबक दे दिया है. पाकिस्तान की राजनीति में यदि मुशर्रफ फिर उभरते हैं तो इससे पाकिस्तान के भारत और अमेरिका से संबंधों पर तो असर होगा ही, क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों में भी सुगबुगाहट कुछ कम न रहेगी.




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