About Me

Hailing from one of the most politically engaged areas of India, Eastern UP and after the completion of UG & PG from Gorakhpur University, I have shifted my academic orientation to Area Studies (International Relations). Written dissertation on India's Border Management and accomplished doctorate from SIS, JNU making comparative analysis between two different borders of India with Pakistan and Nepal.

Currently, I am heading the Department of Political Science, Galgotias University and majorly dealing with subjects of theoretical and diplomatic concerns global politics.

I, frequently share my humble opinions and perspectives through popular newspaper, digital mediums, journals and blogs in English as well as in Hindi.




Tuesday, April 12, 2016

माहौलिया तंत्र औ लाईन में लगा लोक

For: newscaptured.com

डॉ. श्रीश पाठक
कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। सरकारें जनता के लिए काम करती लगती हैं। लोगों को लगते रहना चाहिए कि यह उनकी सरकार है। कभी इंडिया शाईन कर रहा था, लोगों को लगा नहीं शायद। भारत-निर्माण भी हो रहा था, लोगों को लगा नहीं शायद। ‘लोग’ से ज्यादा ‘लगना’ महत्वपूर्ण है। माहौल सब कुछ है । इंडिया चमकाने में मेहनत है, इसकी जरुरत नहीं है; भारत निर्माण करने में मेहनत है, इसकी भी जरुरत नहीं है-माहौल पुरजोर बनना चाहिए कि इंडिया चमक रहा है और हो रहा भारत निर्माण, आगे बढ़ रहा उत्तम प्रदेश, बदल रहा बिहार.....! ये सब टी.वी. पर हो रहा है। रेडिओ पर हो रहा है। लाइक हो रहा है, कमेंट हो रहा है, शेयर हो रहा है। गजब माहौल है। स्वागत है, यह एक माहौलिया लोकतंत्र है। लोग सोच रहे-हो तो रहा है। एक दिन में थोड़ी होता है, विकास। इतना कुछ इकठ्ठा है, टाईम लगता है।
ऊपर जो हो-हल्ला मचता है, नीचे तक रिसता है। ऊपर कहा गया-भ्रष्टाचार है, नीचे माना गया –हाँ, अब और नहीं करना है बर्दाश्त...! ऊपर कहा गया-अपना धन विदेशों में जमा है,-नीचे माना गया-उसे लाना पड़ेगा। ऊपर कहा गया-काला धन आस-पास ही है, नीचे माना गया- लग लेंगे कतार में। ऊपर का रायता पसरता-पैंठता जरुर है पेंदी तक। पहले कुछ गगनभेदी लोग होते थे काडर में। हर जनसभा में जरुरी होते थे। उनसे माहौल बनता था, खूब झमाझम नारे गिरते थे। लोग आते थे, सुनते थे, झूमते थे। साक्षरता आ गयी राष्ट्रीय मिशन बनकर। पढ़े-लिखे-नए वोटबैंक बनने से इंकार करने लगे। पारम्परिक वोटबैंक को भी वे झूला झुलाने लगे। गगनभेदी चूकने लगे। फिर आया इन्टरनेट। इन नए पढ़े-लिखे लोगों का जुगाड़। सब कुछ एक क्लिक पर हाज़िर। रोटी भी कपड़ा भी मकान और ज्ञान भी। सब इन्टरनेट पे। अब तो वैलेट भी।
चुनाव का यज्ञ तो वोटबैंक की आहुति मांगता है। फिर व्यवस्था की गयी, नेटभेदियों की। नेटभेदी जानते हैं, इन्टरनेट का गणित। नेटभेदी माहौल गढ़ने लगे, लगातार, अनथक। वोटबैंक संवारने लगे। रेडीमेड ज्ञान के कैप्सूल दनादन दागे जाने लगे, लाइब्रेरी तो वैसे ही दूर थी..और नाइंटी वन के बाद तो फुर्सत भी कहाँ थी। तो तंत्र बनाया गया, बन गया। यज्ञ संपन्न हुआ। नेटभेदी को भी विश्राम करना था। पर यह क्या...ये तो लगे पड़े हैं, अब भी। सबके नेटभेदी काम पर लगे हुए हैं। चुनाव तक चलता है, सब। आयोग भी प्रचार की अनुमति देता है। लेकिन सरकार एक बार बन जाने के बाद वह सबकी हो जाती है।
पांच साल बारीकी से देखना होता है, ताड़ना होता है सरकार को। क्योंकि अपनी साझी संपत्ति पर बिठाते हैं हम सरकार को। इन्हें किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है, संसद कोई ओलम्पिक नहीं हैं। पुचकार की जरुरत नहीं हैं इन्हें। ये स्वयं खड़े होते हैं चुनाव में, वायदा करते हैं विकास का। इनकी आलोचना आवश्यक है। इन्हें ये नहीं लगना चाहिए कि सरकार बन गयी तो खुली छूट है। चुनाव कोई खेल नहीं है और ना ही सत्ता कोई मैडल। विकास को पैरवी नहीं करनी पड़ती, वह महसूस होता है, दिखता है। पांच-दस सालों में सबकुछ स्पष्ट हो जाता है। पर ये पूर्णकालिक सैलरीसेवक नेटभेदी चुनाव बाद भी माहौल बनाए रखते हैं। सरकार की पैरवी करते हैं। उसे प्रोत्साहित करते हैं, मानो सरकार कहीं फंस गयी है, उसे धक्के की जरुरत है। उसे पुचकारते हैं, अतीत का उलाहना दे सरकार का वर्तमान का दामन धुलते रहते हैं। यकीनन मेहनत का काम है। करते हैं ये मेहनत चौबीस घंटे इन्टरनेट पर।
चैनल को भी चलना है चौबीस घंटे, ऐसा बाजार ने कहा है। इतना कच्चा माल कहाँ से आएगा..फिर..वो भी जल्दी...सबसे तेज सबसे पहले..! चौबीस घंटे ब्रेकिंग होगा, यकीनन कहीं कुछ तार-तार होगा। न्यूज-व्यूज पैदा करना पड़ेगा। बाजार कहता है कि कारखाना बंद नहीं होगा। ग्राहक खोजो और नईं जरूरतें पैदा करो...कि कारखाना बंद नहीं होगा। तो इतना कच्चा माल इन्टरनेट से आएगा...इधर से उधर, उधर से इधर। नेटभेदिये तरह तरह के हैं...तो वे तरह तरह से काम आते हैं। नेट का माहौल टी.वी. ओढ़ लेता है। एक इम्पोर्टेड माहौल। देखिये, बना हुआ है, माहौल। आप फिर एक बार आलोचना नहीं कर सकते। सरकार की आलोचना देश की आलोचना है। नेटभेदियों का फास्टफूड रेडीमेड ज्ञान..!
ऐसा नहीं है सरकार अच्छा काम नहीं करती। ऐसा भी नहीं हैं कि विकास के लिए प्रयत्नशील नहीं है, पर उसकी आलोचना में क्या दिक्कत है..! ईमानदारी सौ सवालों की रामबाण दवाई है। सवाल होते रहना एक जागरूक लोकतंत्र की निशानी है। बेसिरपैर के भी सवाल, सवाल होते हैं। बस सवाल पूंछने के लिए ही पूंछे जाने वाले सवाल भी सवाल ही होते हैं, सरकार जवाब देकर उन्हें बेसिरपैर का या गैरजरूरी या मामूली साबित कर सकती है। पर सवाल तो लेना होगा। हम डॉक्टर से क्लिनिक में और इंजिनियर से साईट पे बेसिरपैर के सवाल करते तो हैं ...वो सरल कर चीजों को समझाता है। इन्टरनेट पे टैग करना आसान है। इसलिए ही शायद आजकल टैग टाँके जा रहे। किसी को भी परम देशभक्त का टैग देना आसान है, किसी को ईमानदारी का टैग तो किसी को भी देशद्रोही का टैग दे देना आसान है।
नकली नोट और काला धन दो समस्याएं हैं। इन दोनों से ही अर्थव्यवस्था को चोट लगती है। यकीनन नोटबंदी का फैसला गलत नहीं है, ठीक उसी तरह इस कारण हो रही समस्याओं को उठाना भी गलत नहीं है। सबसे अधिक जिम्मेदारी उसकी होती है जो सत्ता में होता है। सरकार सर्वाधिक जवाबदेह है। गोपनीयता का विकलांग बहाना बनाकर सरकार ये नहीं कह सकती कि इसलिए ही कुछ तैयारियां पूरी नहीं हो पायीं। सबको पता है, नए बर्तन खरीदने के बाद ही पुराने फेंके या बेचे जाते हैं। सवाल जायज है या नाजायज है, ये मुख्य नहीं है; जवाब आ रहा है या नहीं यह मुख्य है, पारदर्शिता मुख्य है। आज ‘लोक’ लाईन में खड़ा है। नेटभेदिये उन्हें बॉर्डर सा महसूस करा रहे हैं; ये टैगिंग ‘आम’ की भी बेईज्जती है और सीमा के सैनिक की भी। लोकतंत्र अगर लाईन में खड़ा हो तो शांत रहकर सामान्य की प्रतीक्षा करनी चाहिए ना कि जो है उसे ठीक साबित करने में ऊर्जा लगानी चाहिए। परिवर्तन असहजता तो लाता ही है, पर सवालों से असहजता अपारदर्शिता को सूचित करता है। सरकार को कदम तो उठाने ही होते हैं और कोई कदम शतप्रतिशत सही नहीं हो सकता तो यह तो स्वाभाविक है कि स्क्रूटिनी तो होगी।

पूंछने दीजिये ‘लोक’ को, ‘तंत्र’ बचा रहेगा।   

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