ये उधेड़बुन बनी रहती है कि सपने संजोये जाएँ भी कि नहीं। कुछ कहते हैं कि अपनी सीमा समझते हुए जमीन पर पाँव जमाये रखना चाहिए। लक्ष्य रीयलिस्टिक होने चाहियें। जिंदगी के खूबसूरत एहसास से परे डरे सहमे लोगों की सख्त नसीहतें अधिक मिल जाएंगी। ये जिंदगी को बस एक रेस बना छोड़ देते हैं जिसके अंत में चाहे जीत हो या हार हो, इंसान हांफने ही लगता है।
इस दुनिया का सबसे उम्रदराज शख्स भी नहीं जानता कि अगले पल क्या होना है। इसलिए सपने संजोने का प्यारा जोखिम लिया जाना चाहिए। अगर आप चाहते हैं कि आपकी ज़िंदगी महज जेरोक्स बनकर न रह जाए, तो सपने संजोने चाहिए अपने। इसके फायदे अधिक हैं, नुकसान गिनती के हैं। सपनों वाला आदमी एक तरह के उत्साह में रहता है। पॉजिटिव मन के आदमी को ये दुनिया और भी प्यारी लगती है।
अपने सपनों का पीछा करते हुए धीरे धीरे हमारा व्यक्तित्व निखर जाता है और यह निखार कई बार उन सपनों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए सपनों की यात्रा में गिरना-उठना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि चलते रहना।
घबराने की जरुरत नहीं है, हिम्मत से सपने संजोते हुए धीरे-धीरे लगातार सीखते हुए मुस्कुराते हुए यारियां निभाते हुए चलने की जरुरत है। आप लोगों में उत्साह भर सकते हैं। लोग घबराये हुए हैं, डरे हुए हैं; ऐसे में आपकी मुस्कान राहत तो देगी ही उन्हें, आपको एक बेहतर सामजिक सम्बल भी मिलेगा। सभी दौड़ में हैं तो इंतज़ार मत करिये कि कोई आपको पुचकरेगा, हौसला बढ़ाएगा या आपके सपनों की ईज्जत करेगा। सपने आपने देखे हैं, सबसे अधिक भरोसा आपको ही उनपर करना होगा।
No comments:
Post a Comment