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Sunday, August 30, 2020

अहा जिंदगी आमुख आलेख: ऑनलाइन गुरु कितने कामयाब



डॉ. श्रीश पाठक*

कोरोना महामारी के बीच जहाँ अब लोग घरों से निकल जीवन के जद्दोजहद में एक बार फिर से जुट गए हैं, वहीं विधार्थियों की पीढ़ी को अभी भी भौतिक दूरीकरण निभाते हुए विद्यालयों, विश्वविद्यालयों से यथासंभव दूर ही रखने का प्रयास किया जा रहा। शिक्षा के आदान-प्रदान की प्रक्रिया में पारस्परिक अंतःक्रिया का महत्त्व प्रारंभ से ही पूरी दुनिया में स्थापित है l भौतिक दूरीकरण की विवशता ने शिक्षातंत्र के समक्ष यह भारी चुनौती पेश कर दी कि आखिर पारस्परिकता से लबालब कक्षाएँ अब कैसे हो सकेंगी l शिक्षातंत्र के ठिठकने का अर्थ होता, एक पूरी पीढ़ी के भविष्य की तैयारियों का ठिठकना और यह राष्ट्र के भविष्य पर भी प्रतिगामी असर छोड़ता। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनिओ गुतरेस ने कहा कि- विद्यालयों के बंद होने की वजह से दुनिया पीढ़ीगत त्रासदी से जूझ रही है l तकनीक ने यह चुनौती स्वीकार की और शिक्षा जगत ऑनलाइन कक्षाओं की ओर मुड़ गया l चूँकि चुनौती सहसा आयी थी तो जाहिर है इसकी तैयारी कोई मुकम्मल तो थी नहीं। इससे पहले ऑनलाइन कक्षाओं को अनुपूरक माध्यम की तरह ही सराहा गया था और दुनिया भर के शिक्षाविद इसे एक मजबूत वैकल्पिक माध्यम नहीं मानने को लेकर एकमत रहे हैं l कोविडकाल में ऑनलाइन कक्षाएँ एकमात्र माध्यम बनकर समक्ष आयीं और कोशिश जारी है कि यह एक मजबूत माध्यम बन सके। सहसा आयी इस आपदा ने अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के ही समक्ष नवीन चुनौतियों का अंबार लगा दिया। तकनीक अभिशाप या वरदान के शीर्षक वाले निबंधों में नए तर्क सम्मिलित हुए। तकनीकी असमानता, ऑनलाइन कक्षाओं की एकरूपता, गुणवत्ता का प्रश्न, स्क्रीन समय में बढ़ोत्तरी व स्वास्थ्य संबंधी दुश्वारियाँ, अंतर्वैयक्तिक अनुभव का अभाव, आदि कुछ ऐसी चुनौतियाँ विद्यार्थियों के समक्ष सहसा उभर आयीं, जिनसे तुरत उबरना आसान नहीं l इसी तरह, विधार्थियों के जिज्ञासु टकटकी और फिर उनके संतुष्ट आँखों का आदी अध्यापक भी सहसा कई चुनौतियों मसलन - ऑनलाइन तकनीकी माध्यम की सीमाएँ, इंटरनेट पर पूर्ण निर्भरता, उसी पाठ्यक्रम के साथ ऑनलाइन कक्षाओं में ऑफलाइन कक्षाओं के अनुभव को उतारने का दबाव, सीमित देहभाषा प्रयोग, आदि से घिर गए l 


शैक्षणिक सत्र बचाने के समान दबाव के बीच विद्यार्थी एवं अध्यापक उन चुनौतियों से जूझे जा रहे हैं। डिजिटल डिवाइड की खाई को देखते हुए सोलापुर, महाराष्ट्र के नीलमनगर के अध्यापकों ने पाठ पढ़ाने का एक प्रभावी एवं प्रेरक तरीका ढूँढ निकाला है l पाठ्यपुस्तकों के सरल पाठ आसपास के घरों की तक़रीबन 300 से अधिक बाहरी दीवारों पर रुचिपूर्ण एवं कलात्मक रीति से उकेर दिया है l लगभग सभी भारतीय राज्यों ने अपने अध्यापकों की सहायता से ऑनलाइन कक्षाएँ, रिकार्डेड व्याख्यान, मोबाईल ऐप, टेलीविजन आदि के माध्यम से पठन-पाठन को निर्बाध करने की कोशिश की है l तकनीकी ने यकीनन अपनी भूमिका निभायी है लेकिन जैसा  कि माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स कहते हैं कि तकनीकी तो केवल एक यंत्र है, असली महत्ता तो अध्यापकों की है l लगभग सभी स्तरों पर अध्यापकों ने अपनी नयी भूमिका के अनुरूप ढालना शुरू किया है और एक हद तक ही सही संभावित शैक्षणिक निर्वात को ख़ारिज कर दिया है। 


इन सब के बीच इस भीषण समय में एक समानांतर वाद-विमर्श भी सर उठाए है। कुछ लोगों को लगता है कि कोविडकाल के बाद संभवतः अध्यापकों की मूल महत्ता पर ही प्रश्न उठने शुरू हो जाएँ। अब जबकि बहुतेरी पाठ्यसामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध है, विद्यार्थी पहले ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, तो क्या अध्यापकों की पारंपरिक भूमिका शेष रह गयी है? मशहूर भारतीय कंप्यूटर वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद सुगाता मित्रा ने वर्ष 1999 में द होल इन द वॉल प्रयोग शुरू किया था, जहाँ उन्होंने भारत के विभिन्न स्थलों पर कंप्यूटर सिस्टम को एक दीवाल में अस्थायी रूप से कुछ समय के लिए लगाकर छोड़ दिया। उन्होने पाया कि बच्चे स्वयं ही काफी चीजें धीरे-धीरे सीख गए, इसमें भाषा और वर्ग का अवरोध भी आड़े नहीं आया। उन्हें किसी निर्देशित वातावरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। लेकिन उन्होंने भी माना कि यह सीखना एक सीमा तक ही संभव है और इसमें कहीं से भी अध्यापक की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। दुनिया भर के शिक्षाविद इस प्रश्न के उत्तर में अध्यापन-प्रविधि के अद्यतन करने की बात तो स्वीकार करते हैं लेकिन कोई भी अध्यापक एवं अध्यापन के विकल्प का तर्क नहीं मानते। यह सही भी है क्योंकि अध्यापन महज सूचनाओं का सम्प्रेषण मात्र नहीं है, यह सूचना, ज्ञान, बोध और विद्यार्थियों के समक्ष सम्यक चुनौतियों को वाजिब अनुपात में परोसने की कला है। फिर, सीखने की प्रक्रिया सतत प्रेरणा एवं रचनात्मक हस्तक्षेप की माँग करती है l फ्रेंच कवि, पत्रकार एवं उपन्यासकार अनातोली फ्रांस मानते हैं कि- शिक्षा का दस में से नौवां हिस्सा प्रोत्साहन है l अध्यापकों के जीवंत प्रोत्साहन का विकल्प मॉनिटर पर उभरे एकरस प्रोत्साहन-प्रतीक नहीं कर सकते l फिर सभी विद्यार्थी एक जैसे नहीं हैं, न ही वे एक पृष्ठभूमि के होते हैं और न ही उनकी समझ और रूचि की विमाएँ एक सी होती हैं। इस भिन्नता को विविधता में साधने का कार्य केवल अध्यापकीय कौशल से संभव है। शिक्षा मनोवैज्ञानिक विलियम जी. स्पेडी कहते हैं कि- सभी विद्यार्थी सीख सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं लेकिन एक ही समय और एक ही रीति से नहीं l इंटरनेट पर अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो सकती है, लेकिन दिशा-निर्देशन माउस के क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। एकांत के स्वाध्याय से निपुणता उन्हीं विषय-सामग्री पर पायी जा सकती है जहाँ अध्यापक ने विषय-प्रवेश करा रूचि जाग्रत कर दी है l वर्ष 2012 के आसपास यह समझा गया था कि इंटरनेट पर उपलब्ध मैसिव ऑनलाइन ओपन कोर्सेज (मूक) शिक्षा में क्रांति रच देंगे और धीरे-धीरे अध्यापकों की परंपरागत भूमिका को समाप्त कर देंगे, लेकिन अनुभव बताते हैं कि उनमें विद्यार्थियों ने उतनी रूचि नहीं ली क्योंकि वहाँ व्यक्तिगत-मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाईश कम रही और विधार्थी-विशेष की आवश्यकताओं पर ध्यान देना वहाँ संभव न रहा। अनुपूरक रूप से सभी अध्यापन प्रविधियों एवं माध्यमों की महत्ता निश्चित ही है लेकिन इनमें से किसी भी माध्यम में अकेले अथवा संयुक्त रूप से मानवीय भूमिका को स्थानांतरित करने की क्षमता नहीं है l यह अभीष्ट भी नहीं है, क्योंकि मानव एक सजग प्राणी है, उसे जीवंत बोध की दरकार रहती है, सूखी सूचनाएँ उसके लिए पर्याप्त नहीं है। जापान की एक लोकप्रिय कहावत कहती है कि - हजार दिनों के अध्ययन-परिश्रम से अधिक बेहतर सच्चे अध्यापक के एक दिन का साथ है और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शब्दों में ऐसा इसलिए है क्योंकि सच्चे अध्यापक हमें हमारे बारे में सोचना सिखाते हैं।  


*लेखक एमिटी यूनिवर्सिटी, नोयडा में विश्व-राजनीति विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं।  


Saturday, April 25, 2020

जिंदगी के स्वप्न फिर फिर आँख में पलने लगे हैं…!

जिंदगी के स्वप्न फिर फिर आँख में पलने लगे हैं…!

डॉ. श्रीश पाठक* 


वही लाल सूरज जो कल शाम डूबा था, अल सुबह उगने को है l ये नवजात लाल सूरज ताजे चौबीस घंटों की नयी सौगात बेदम हिम्मतों को देने को आतुर है l उम्मीदों की सुतली को इतनी चिंगारी काफी है कि सुबह होगी, लाल सूरज फिर खिलेगा l डटे रहने के लिए, इतना आसमान काफी है कि मौसम बदलेगा l चमकते तारों के दीदार को रात के काले अँधेरे की दरकार होती है l अपने-अपने घरों में डटे हम लोग आजकल जिंदगी को जरा ज्यादा करीब से महसूस कर पा रहे हैं, अब इस मज़बूरी की अंधियारी रात में साथ के चमकते तारों को तो ढूँढना होगा l ये वही लोग हैं, जिनके साथ सुख सुकून शांति से रहने के लिए हम सहूलियतें जुटाते हुए दरबदर बाहर भटकते रहे हैं l कहीं पहुँचने के लिए दौड़ना तेज था, अब तेजी के लिए रोज दौड़े जा रहे हैं, लगी इस लत को समझने के लिए जिस ठहराव की जरुरत थी, उस ठहराव में हैं हम l यह ठहराव हमें अवसर दे रहा पुनरावलोकन का l 


Dainik Bhaskar (Aha Zindgi)


स्मृति तो हर जीव में न्यूनाधिक होती है लेकिन मनुष्य, कल्पना का वरदान लिए जन्मता है l स्मृति के सहयोग से कल्पना, मनुष्य में भविष्य का उमंग भरती जाती है और इस उत्ताल उमंग से वर्तमान का दुर्घर्ष सहनीय और सुगम्य होता जाता है l स्वप्नदर्शी होना, प्रत्येक मनुष्य को गतिशील बनाता है l स्वप्न हैं अपने-अपने, स्वप्नों के अपने-अपने परिक्रमण पथ पर सभी अग्रशील होते हैं l ये स्वप्न सभी को अनूठा व्यक्तित्व और अनुपम संयोजन देते हैं l यह अनूठापन ही जगत-व्यापार में अलग-अलग भूमिकाएँ पाने में मदद करता है l जीवन के सतरंगी सागर में इसप्रकार अनगिन अलबेली नौकाएँ तिरती-फिरती रहती हैं l यूँ तो जगत का हर जीव अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता है, हारता है, उठता है, जीतता है फिर लड़ता है, लेकिन मानव ने बहुधा स्वयं को दाँव पर लगाकर मानवता की रक्षा की है l चौदहवीं सदी के ब्युबोनिक प्लेग जिसने दुनिया के एक-तिहाई लोगों को अपना निशाना बना लिया था, से लेकर आज तक महामारियों का इतिहास सुझाता है कि जानकारी और सावधानी का अभाव ही बीमारियों को त्रासदी में तब्दील करते हैं l मानवता का ज्ञात इतिहास दर्जन भर से अधिक महामारियों की त्रासदियों से अटा पड़ा है l इतिहास के उन पन्नों से गुजरते हुए अनिश्चितता, असुरक्षा, भय के वही भाव उसी शिद्दत से उभरते हैं, जिनमें कमोबेश आज फिर मानवता है l त्रासदियों के इतिहास का हर अध्याय बताता है कि उसके तुरंत बाद मानवता के सुनहरे पन्ने लिखे गए l इन सुनहरे पन्नों के लेखकों की नींव उन्हीं ने बनायीं थी जो उन भयंकर त्रासदियों से गुज़रे थे l दुनिया सामंतवाद के बेलगाम शोषण से मुक्त होने में और अधिक सदियाँ लेती जो महामारी ने मानवता को मजबूर न किया होता l फिर शेष लोगों ने विपत्ति को बेहद जरूरी सामाजिक सुधार के लिए एक बड़े अवसर में तब्दील कर दिया l आधुनिकता की नींव जिस  पुनर्जागरण आन्दोलन पर टिकी है वह मानवता की सबसे भीषण त्रासदी ब्युबोनिक प्लेग के बाद उपजी थी जिसने यूरोप की आधी आबादी को इस कदर लील लिया था कि उस जनसंख्या के फिर उसी संख्या में पहुँचने में अगले २०० साल लग गए थे l काले प्लेग की त्रासदी के बाद मानव अनोटोमी पर जो शोध हुए उनपर ही आज आधुनिक मेडिकल साइंस की ईमारत खड़ी है l प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका ने स्त्री सुधारों का रास्ता खोला तो स्पेनिश फ्लू के बाद सार्वजनिक चिकित्सा कल्याण कार्यक्रमों ने मानव की औसत जीवन प्रत्याशा की दर अभूतपूर्व रूप से किसी भी गुज़री सदी से बेहतर कर दी l एक समय जिस विजेता नेपोलियन से समूचा यूरोप दहला हुआ था, उसी नेपोलियन ने कैरीबियाई देश हैती को विजित करने के लिए एक बड़ा जहाजी बेड़ा भेजा, ताकि गुलामों का बाजार बना रहे l नेपोलियन की सेना हारी, हैती को उसकी स्वतंत्रता मिली क्योंकि हैतीवासी उन बीमारियों के खिलाफ अपने शरीर में प्रतिरक्षा विकसित कर चुके थे जो यूरोप में फैलती थीं l उनका ग़ुलाम के रूप में यूरोप में काम करना किसी भयंकर त्रासदी से कम नहीं था लेकिन उसी त्रासदी ने उन्हें प्रतिरक्षा भी दी थी l पिछली गुजरी कितनी ही त्रासदियों में तो हमारे पास इन्टरनेट नहीं था, विज्ञान इतना उन्नत नहीं था, बीमारी के कारक ही पता नहीं होते थे, फिर भी मानवता न केवल उनसे पार पा सकी बल्कि प्रत्येक त्रासदी से अपने लिए पारितोषिक भी अर्जित किया l आज विज्ञान उन्नत है, हफ़्तों में महामारी की पहचान हो जाती है, महीनों में उसके टीके, इलाज या उनसे निबटने के तरीकों का ईजाद हो जाता है l गुजरी कितनी ही महामारियों-त्रासदियों में जो लोग शेष रहे, उनके समक्ष भी अनिश्चितता, असुरक्षा और भय का वही बड़वानल था लेकिन उनके पास था एक अदम्य विश्वास जो अनिश्चितता पर भारी पड़ा, वे लबालब थे एक अटूट उम्मीद से जो भय पर भारी पड़ी, और वे ओतप्रोत सजग थे मानवता से जो उस असुरक्षा के माहौल से उन्हें बाहर खींच लायी l 


नाउम्मीदी से बड़ी बीमारी अब तक मानव ने कोई दूसरी नहीं बनाई है और त्रासदियों में सबसे विकराल चुनौती इसी नाउम्मीदी की बीमारी को महामारी में बदलने से रोकने की होती है l व्यक्ति के स्तर पर ऐसे समय में इससे बड़ी मदद कोई और नहीं हो सकती कि आप उम्मीदों की मशाल को पूरी मजबूती से थामे रहें, जिसे देख दूसरों को भी संबल मिले, यह आसान नहीं है l यह जर्मनी के राज्य वित्त मंत्री थॉमस शेफर से नहीं हो सका यह, उन्होंने आत्महत्या कर ली l मौजूदा महामारी के संकट के बीच उन्हें लगा कि उनका राज्य हेसी कभी आर्थिक संकट से मुक्त न हो सकेगा l उम्मीद की एक लौ बुझती है तो बाकि बत्तियां भी ठिठकती हैं l लौ ही सही, बुझना नहीं है, उम्मीद की बाती को हिम्मत के तेल से तर रखना है ताकि मानवता की आंच आती रहे l धीरे-धीरे पूरा आँगन रौशन होगा और हम देखेंगे कि हम केवल इस पार ही नहीं आये हैं, बल्कि गुणात्मक रूप से रूपांतरित भी हुए हैं l यह समय यकीनन सामाजिक दुरीकरण का है लेकिन इसे सामाजिक विरागीकरण में परिवर्तित नहीं होने देना है l रिश्तों की खोज-खबर लेकर, उन्हें संजोकर हमें संबंधों का पूल बनाना है, ज्ञान-विज्ञान के बोध साझा कर अनुभव का पूल बनाना है और एक-दुसरे के आशयों के लिए आवश्यक संवेदनशीलता विकसित करनी है ताकि मानवता अपनी अस्तित्व अपनी पूरी महत्ता में बचा सके l  


हमारी सभ्यता, हमारी परम्पराएँ और हमारे जीवन मूल्य, त्रासदियों से जूझने के दौरान अर्जित किये गए पाठों के अनुशीलन से बने हैं l ‘एपिडेमिक्स एंड सोसाइटी: फ्रॉम द ब्लैक डेथ टू द प्रेजेंट’ के लेखक प्रोफ़ेसर फ्रैंक एम. स्नोडेन कहते हैं कि ‘त्रासदियाँ, मानवता के लिए दर्पण का काम करती हैं l हमें इनसे पता चलता है कि एक व्यक्ति के तौर पर हमारा हमारे वातावरण से कैसा रिश्ता है और समाज के तौर पर हम एक-दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं, कहीं वैश्विक अंतर्सम्बद्धता का सूत्र हमसे छूट तो नहीं गया है l’ त्रासदियाँ आती हैं, जाती हैं पर हमें वह शेष बनना है जो अपने भीतर उम्मीद की लौ को बुझने नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं कि समय यह भी कुछ देकर जाएगा l इन्हीं शेष में से फिर मानवता का अशेष उपजता है जो जीवन की सततता को शक्ति देते हैं l जब चहुंओर अनिश्चितता, भय, अवसाद की ख़बरें आती हों, जब लोग एक-दूसरे पर ही संदेह करने लगे हों, जब समुदाय एक-दूसरे का साथ देने को प्रेरित कर पाने में अक्षम हो रहे हों, एक व्यक्ति के तौर पर इस महामारी में केवल हाथों को साफ़ रखना काफी नहीं होगा। हमारी आँखों को भी खुले रहना होगा उन सभी कोनों की ओर जहाँ से उम्मीद की, विश्वास की, सकारात्मकता की कहानियाँ दिखती हों, क्योंकि ये कहानियाँ ही हमारी जिजीविषा की जरूरी ईंधन हैं जिनपर वृहत्तम शेष अपने अशेष की बुनियाद रखेंगे। 


*लेखक एमिटी यूनिवर्सिटी में विश्व राजनीति के शिक्षक हैं. 


Sunday, February 24, 2019

फेक न्यूज फिनोमेना

ज़्यादातर लोग 14 फरवरी को वैलेंटाइन दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन 14 फरवरी, 1931 की सुबह लाहौर में शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई थी। 
'शिक्षा से मै अंग्रेज़ हूँ, संस्कृति से मुस्लिम और दुर्घटनावश हिन्दू हूँ' -जवाहर लाल नेहरू
मैचूपो विषाणु, पैरासीटामोल टेबलेट में पाया जा सकता है। 
राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस्तीफा दिया।
भारत में लगाई गई विश्व की सबसे लंबी ऊँची मूर्ति स्टेचू ऑफ यूनिटी में अभी से दिखने लगे हैं  दरार।    

ऊपर की ये पाँचों खबरें पूरी तरह से गलत हैं। 
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी 23 मार्च 1931 को दी गई थी। जवाहरलाल नेहरू ने ऐसा वक्तव्य कभी नहीं दिया। पैरासीटामोल दवा पूरी तरह से सुरक्षित है और मैचूपो विषाणु के भारत में पाये जाने की फिलहाल कोई सूचना नहीं हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपना इस्तीफा नहीं दिया है। खबरों के लिबास में यह चारों सूचनाएँ दरअसल भ्रामक, जाली खबरें, फर्जी खबरें या फेक न्यूज हैं। बहुत मुमकिन है कि आपने भी इन खबरों को कहीं पढ़ रखा हो। अपने प्रस्तुतीकरण में ये बिलकुल असली खबरों की तरह ही होती हैं, किन्तु ये फर्जी खबरें, असल खबरों के मुक़ाबले कहीं तेजी से फैलती हैं और अपना असर छोड़ जाती हैं। एमआईटी के एक शोध के मुताबिक सही खबर के मुक़ाबले जाली खबरें सत्तर प्रतिशत अधिक रीट्वीट की जाती हैं। इसके प्रभाव व प्रयोग को देखते हुए कॉलिन्स शब्दकोश ने 2017 में 'फेक न्यूज' को अपने 'साल के शब्दों' में जगह दी है। माइक्रोसॉफ्ट की तरफ से कराये गए एक वैश्विक सर्वे के निष्कर्ष बताते हैं कि फेक न्यूज के मामले में भारत पहले स्थान पर है। इसका अर्थ यह है कि अपने इर्द-गिर्द जिन खबरों की चर्चा हम पाते हैं, उनके फेक न्यूज होने की संभावना सर्वाधिक है। फेक न्यूज से पनपे अफवाहों की वजह से भारत में भीड़ ने अलग-अलग स्थानों पर तकरीबन 25 लोगों की जानें ली हैं। बीबीसी द्वारा कराये गए एक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि तकरीबन 72 प्रतिशत भारतीय सही खबर और जाली खबरों का अंतर समझ नहीं पाते।  


यहाँ, यह समझ लेना आवश्यक है कि फेक न्यूज (जाली खबर) और फाल्स न्यूज (गलत खबर) में अंतर है। खबरों का 'गलत' हो जाना एक मानवीय या तकनीकी चूक हो सकती है, फाल्स न्यूज संभव है कि स्रोत, माध्यम या अभिकर्ता के किसी स्तर पर हुई त्रुटि के परिणामस्वरूप प्रसार में आई हो, पर फेक न्यूज जानबूझकर एक सोचे-समझे एजेंडे के तहत प्रसार प्रक्रिया में स्थापित किए जाते हैं। फेक न्यूज का एक स्पष्ट मकसद होता है, एक लक्षित समूह होता है और चुनिंदा माध्यम पर सवार होकर यह अपने दुष्प्रभाव दिखलाती है। फेक न्यूज, पूरी तरह से भ्रामक, जाली सूचनाएँ, फोटो या वीडियो होते हैं जो जनता को भ्रमित करने के लिए, सार्वजनिक रूप से भय का माहौल बनाने के लिए, हिंसा भड़काने के लिए और एक बड़े स्तर पर जनता का ध्यान आकृष्ट करने के लिए जानबूझकर गढ़े व फैलाये जाते हैं। मीडिया साक्षरता विशेषज्ञ मार्टिना चैपमैन के अनुसार फेक न्यूज में आधारभूत तीन तत्व होते हैं: मिसट्रस्ट (विश्वासहीनता), मिसइन्फोर्मेशन (गलत सूचना) और मैनीपूलेशन (तोड़-मरोड़)। तीन देशों- भारत, नाइजीरिया और कीनिया में सात दिनों तक 80 लोगों के द्वारा खबरों को प्रयोग करने की वृत्ति को बीबीसी समूह द्वारा अध्ययन किया गया, देखा गया कि वह फेसबुक व व्हाट्सअप माध्यम का प्रयोग सूचनाओं को साझा करने के लिए कैसे और कितना करते हैं। यह पाया गया कि तीनों ही देशों में सूचनाओं के स्रोत के बारे में जानने के प्रयास न के बराबर किए गए। दरअसल, एक बढ़िया खबर के लिए उसका स्रोत, उसका माध्यम, उसकी स्पष्टता, उसकी शुद्धता और उसके अभिकर्ता/प्रसारक, ये पाँच कारक बेहद मायने रखते हैं। इन्हीं पाँच कारकों पर समझौता कर फेक न्यूज बनाए व फैलाये जाते हैं। चूंकि वे खबरों की लिबास में होते हैं तो उन्हें तुरत ही एक प्रसारसंख्या मिल जाती है, चौंकाउ व सनसनीखेज होते हैं, तो तवज्जो मिल जाती है और चूँकि इंटरनेट व सोशल साइट्स के युग में उपभोक्ता भी प्रसारकर्ता होते हैं तो फेक न्यूज को एक खतरनाक संवेग भी मिल जाता है जो कभी-कभी जानलेवा भी हो जाता है। हाल ही में कन्नूर जिले के लगभग दो लाख चालीस हजार बच्चों के माता-पिता ने जानलेवा खसरा, मम्प्स, रूबेला आदि बीमारियों के टीके लगवाने से इंकार कर दिया, क्योंकि किसी फेक न्यूज से बनी अफवाह पर उन्हें अधिक भरोसा था। टीकाकरण की प्रक्रिया पूरे दो महीने बाधित रही।      

निश्चित ही फेक न्यूज फिनोमेना ने पिछले कुछ वर्षों में बेहद खतरनाक ढंग से अपनी जड़ें जमाई हैं और इंटरनेट, मोबाइल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के सूचना क्रांति युग में यह लगभग असंभव सा ही है कि पूरी तरह इनपर नियंत्रण किया जा सके, लेकिन यह भी सच है कि इतिहास के पन्नों में बहुत पहले ही फेक न्यूज की प्रवृत्ति दिखलाई पड़ती है। समय के हर पड़ाव पर कुछ नए प्लेटफॉर्म जुडते गए हैं पर फेक न्यूज की आवक कम-अधिक बनी ही रही है। ईसा के लगभग 44 वर्ष पूर्व आक्टेवियन ने मार्क एन्टोनी के खिलाफ भ्रामक खबरों के माध्यम से छवि धूमिल करने की कोशिश की थी। न्यूयार्क के प्रतिष्ठित अखबार 'द सन' ने 1835 में बाकायदा छह आलेखों की शृंखला प्रकाशित की थी जिसमें यह दावा किया गया था कि चंद्रमा पर न केवल जीवन की उपस्थिति है अपितु एक सभ्यता ही विकसित है। 1899-1902 के बीच चले बोअर युद्धों में भी भ्रामक खबरें खूब गढ़ी गईं और प्रसारित की गईं। प्रथम विश्व युद्ध फेक न्यूज से अछूता नहीं रहा और न ही द्वितीय विश्व युद्ध इनकी छाया से बच सका। हिटलर के शासन में तो बाकायदा 'रायस मिनिस्टरी ऑफ पब्लिक एनलाईटेनमेंट एंड प्रोपेगेंडा' बनाई गई थी जो सिलसिलेवार ढंग से भामक खबरें गढ़ती थी और उन्हें संचार के प्रत्येक उपलब्ध माध्यमों पर प्रसारित कर मनचाहा सार्वजनिक प्रभाव पैदा करती थी। शीत युद्द (1947-1991) के समय फेक न्यूज इंटेरनेशनल ब्रॉडकास्टिंग के जरिये प्रसारित किए गए। द न्यूयार्क टाइम्स ने 2004 में सार्वजनिक माफीनामा जारी किया जिसमें उसने स्वीकार किया कि इराक में वेपन्स ऑफ मास डिसट्रक्सन (जनसंहारक हथियार) की खबर फेक थी। अभी हाल ही में फेक न्यूज के प्रभाव में आकर पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल को परमाणु आक्रमण की धमकी दे डाली। फेक न्यूज की ऐतिहासिकता व इसके खतरनाक असर को इन संदर्भों से समझा जा सकता है।      

फेक न्यूज को गढ़ने और फैलाने के पीछे की मंशा को टटोलें तो कुछ स्पष्ट कारण समझ आते हैं। बहुधा वे किसी प्रोपेगेंडा के तहत योजनाबद्ध रूप से गढ़े और प्रसारित किए जाते हैं ताकि एक खास ध्रुवीय समर्थन को साधा जा सके और विपरीत मत को खंडित किया जा सके। यह किसी दूसरे पक्ष को मिल रहे समर्थन को कमजोर करने के लिए भी किया जा सकता है। एक नए गैरज़रूरी मुद्दे को चर्चा में लाकर किसी पुराने जरूरी मुद्दे पर से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी फेक न्यूज का सहारा लिया जाता है। विधि, प्रशासन, व्यवस्था में गड़बड़ी कर जनता में एक भय स्थापित करने की मंशा भी हो सकती है, इसे वैश्विक-आतंकवाद के दौर में एक जटिल गैर-पारंपरिक सुरक्षा-भय के रूप में भी देखा जा सकता है। एक बेहद मजबूत कारण फेक न्यूज के पीछे आर्थिक लाभ की लालसा है। इंटरनेट पर विभिन्न साइट्स पर उपलब्ध सामग्रियों को प्रयोग करने से साइट्स पर हिट आती हैं और साइट्स को इससे आर्थिक लाभ होता है। अधिक से अधिक पेजव्यूज और हिट्स पाने के लिए अक्सर भ्रामक शीर्षकों के साथ फेक न्यूज परोसी जाती है। इसप्रकार फेक न्यूज़ का एक बिजनेस मॉडल ही है, जो बेहद योजनबद्ध तरीके से फेक न्यूज डिजाइन करता है, परोसता है और फैलाता है। 

फेक न्यूज के व्यापक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक असर को देखते हुए एक व्यापक मीडिया साक्षरता एवं डिजिटल साक्षरता अभियान की अतीव आवश्यकता है। यों तो सरकार ने अपने ढंग से मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सअप आदि जैसे कई माध्यमों को निर्देश दिया है कि वे ऐसे फिल्टर अपने सिस्टम में निर्मित करें जिससे फेक न्यूज के प्रसार पर रोकथाम लगे परंतु यह तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक उपभोक्ता/प्रयोक्ता किसी न्यूज का प्रसारकर्ता बनने से पहले स्वयं सजग होकर सामान्य पड़ताल करने की जहमत नहीं उठता। फेक न्यूज बनाने वाले, हमारी तुरत-फुरत की फॉरवर्ड और शेयर करने की प्रवृति का ही लाभ उठाते हैं और अपना मंसूबा साधते हैं। यह बेहद अहम है कि किसी भी खबर पर यकीन और उसे साझा करने से पहले हम उस खबर के स्रोत के बारे में पड़ताल करें कि क्या यह सामग्री एक विश्वसनीय स्रोत से आई है! एक खबर को कम से कम तीन स्रोतों से जाँचें। केवल शीर्षक पढ़कर राय न बनाएँ, खबर पूरी पढ़ें और तह तक जाएँ, अक्सर ही फेक न्यूज के शीर्षकों में विस्मयादि बोधक चिन्हों की भरमार होती है। खबरों की टाइमिंग से खिलवाड़ कर भी संदर्भ बदल दिये जाते हैं, ध्यान दें कि क्या यह खबर नई है या कोई पुरानी खबर ही फिर से परोसी गई है। आप चाहे किसी भी व्यवसाय में हो एक सामान्य अध्ययन की प्रक्रिया सतत चलने दें, इससे स्वयं के पक्षपात को पहचानने और उसे ठीक करने का अवसर मिलता है और आप आसानी से किसी फेक न्यूज के शिकार नहीं बनते हैं। कई बार कुछ खबरें व्यंग के लिए लिखी जाती हैं और उसे गंभीरता से साझा कर दिया जाता है, सो सचेत रहें। इससे पहले कि यह फेक न्यूज फिनोमेना कोई बड़ी त्रासदी लेकर आए, हम सभी नागरिकों को भी इसके लिए सजग और प्रयत्नशील रहना होगा।  



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