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Tuesday, April 12, 2016

माहौलिया तंत्र औ लाईन में लगा लोक

For: newscaptured.com

डॉ. श्रीश पाठक
कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। सरकारें जनता के लिए काम करती लगती हैं। लोगों को लगते रहना चाहिए कि यह उनकी सरकार है। कभी इंडिया शाईन कर रहा था, लोगों को लगा नहीं शायद। भारत-निर्माण भी हो रहा था, लोगों को लगा नहीं शायद। ‘लोग’ से ज्यादा ‘लगना’ महत्वपूर्ण है। माहौल सब कुछ है । इंडिया चमकाने में मेहनत है, इसकी जरुरत नहीं है; भारत निर्माण करने में मेहनत है, इसकी भी जरुरत नहीं है-माहौल पुरजोर बनना चाहिए कि इंडिया चमक रहा है और हो रहा भारत निर्माण, आगे बढ़ रहा उत्तम प्रदेश, बदल रहा बिहार.....! ये सब टी.वी. पर हो रहा है। रेडिओ पर हो रहा है। लाइक हो रहा है, कमेंट हो रहा है, शेयर हो रहा है। गजब माहौल है। स्वागत है, यह एक माहौलिया लोकतंत्र है। लोग सोच रहे-हो तो रहा है। एक दिन में थोड़ी होता है, विकास। इतना कुछ इकठ्ठा है, टाईम लगता है।
ऊपर जो हो-हल्ला मचता है, नीचे तक रिसता है। ऊपर कहा गया-भ्रष्टाचार है, नीचे माना गया –हाँ, अब और नहीं करना है बर्दाश्त...! ऊपर कहा गया-अपना धन विदेशों में जमा है,-नीचे माना गया-उसे लाना पड़ेगा। ऊपर कहा गया-काला धन आस-पास ही है, नीचे माना गया- लग लेंगे कतार में। ऊपर का रायता पसरता-पैंठता जरुर है पेंदी तक। पहले कुछ गगनभेदी लोग होते थे काडर में। हर जनसभा में जरुरी होते थे। उनसे माहौल बनता था, खूब झमाझम नारे गिरते थे। लोग आते थे, सुनते थे, झूमते थे। साक्षरता आ गयी राष्ट्रीय मिशन बनकर। पढ़े-लिखे-नए वोटबैंक बनने से इंकार करने लगे। पारम्परिक वोटबैंक को भी वे झूला झुलाने लगे। गगनभेदी चूकने लगे। फिर आया इन्टरनेट। इन नए पढ़े-लिखे लोगों का जुगाड़। सब कुछ एक क्लिक पर हाज़िर। रोटी भी कपड़ा भी मकान और ज्ञान भी। सब इन्टरनेट पे। अब तो वैलेट भी।
चुनाव का यज्ञ तो वोटबैंक की आहुति मांगता है। फिर व्यवस्था की गयी, नेटभेदियों की। नेटभेदी जानते हैं, इन्टरनेट का गणित। नेटभेदी माहौल गढ़ने लगे, लगातार, अनथक। वोटबैंक संवारने लगे। रेडीमेड ज्ञान के कैप्सूल दनादन दागे जाने लगे, लाइब्रेरी तो वैसे ही दूर थी..और नाइंटी वन के बाद तो फुर्सत भी कहाँ थी। तो तंत्र बनाया गया, बन गया। यज्ञ संपन्न हुआ। नेटभेदी को भी विश्राम करना था। पर यह क्या...ये तो लगे पड़े हैं, अब भी। सबके नेटभेदी काम पर लगे हुए हैं। चुनाव तक चलता है, सब। आयोग भी प्रचार की अनुमति देता है। लेकिन सरकार एक बार बन जाने के बाद वह सबकी हो जाती है।
पांच साल बारीकी से देखना होता है, ताड़ना होता है सरकार को। क्योंकि अपनी साझी संपत्ति पर बिठाते हैं हम सरकार को। इन्हें किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है, संसद कोई ओलम्पिक नहीं हैं। पुचकार की जरुरत नहीं हैं इन्हें। ये स्वयं खड़े होते हैं चुनाव में, वायदा करते हैं विकास का। इनकी आलोचना आवश्यक है। इन्हें ये नहीं लगना चाहिए कि सरकार बन गयी तो खुली छूट है। चुनाव कोई खेल नहीं है और ना ही सत्ता कोई मैडल। विकास को पैरवी नहीं करनी पड़ती, वह महसूस होता है, दिखता है। पांच-दस सालों में सबकुछ स्पष्ट हो जाता है। पर ये पूर्णकालिक सैलरीसेवक नेटभेदी चुनाव बाद भी माहौल बनाए रखते हैं। सरकार की पैरवी करते हैं। उसे प्रोत्साहित करते हैं, मानो सरकार कहीं फंस गयी है, उसे धक्के की जरुरत है। उसे पुचकारते हैं, अतीत का उलाहना दे सरकार का वर्तमान का दामन धुलते रहते हैं। यकीनन मेहनत का काम है। करते हैं ये मेहनत चौबीस घंटे इन्टरनेट पर।
चैनल को भी चलना है चौबीस घंटे, ऐसा बाजार ने कहा है। इतना कच्चा माल कहाँ से आएगा..फिर..वो भी जल्दी...सबसे तेज सबसे पहले..! चौबीस घंटे ब्रेकिंग होगा, यकीनन कहीं कुछ तार-तार होगा। न्यूज-व्यूज पैदा करना पड़ेगा। बाजार कहता है कि कारखाना बंद नहीं होगा। ग्राहक खोजो और नईं जरूरतें पैदा करो...कि कारखाना बंद नहीं होगा। तो इतना कच्चा माल इन्टरनेट से आएगा...इधर से उधर, उधर से इधर। नेटभेदिये तरह तरह के हैं...तो वे तरह तरह से काम आते हैं। नेट का माहौल टी.वी. ओढ़ लेता है। एक इम्पोर्टेड माहौल। देखिये, बना हुआ है, माहौल। आप फिर एक बार आलोचना नहीं कर सकते। सरकार की आलोचना देश की आलोचना है। नेटभेदियों का फास्टफूड रेडीमेड ज्ञान..!
ऐसा नहीं है सरकार अच्छा काम नहीं करती। ऐसा भी नहीं हैं कि विकास के लिए प्रयत्नशील नहीं है, पर उसकी आलोचना में क्या दिक्कत है..! ईमानदारी सौ सवालों की रामबाण दवाई है। सवाल होते रहना एक जागरूक लोकतंत्र की निशानी है। बेसिरपैर के भी सवाल, सवाल होते हैं। बस सवाल पूंछने के लिए ही पूंछे जाने वाले सवाल भी सवाल ही होते हैं, सरकार जवाब देकर उन्हें बेसिरपैर का या गैरजरूरी या मामूली साबित कर सकती है। पर सवाल तो लेना होगा। हम डॉक्टर से क्लिनिक में और इंजिनियर से साईट पे बेसिरपैर के सवाल करते तो हैं ...वो सरल कर चीजों को समझाता है। इन्टरनेट पे टैग करना आसान है। इसलिए ही शायद आजकल टैग टाँके जा रहे। किसी को भी परम देशभक्त का टैग देना आसान है, किसी को ईमानदारी का टैग तो किसी को भी देशद्रोही का टैग दे देना आसान है।
नकली नोट और काला धन दो समस्याएं हैं। इन दोनों से ही अर्थव्यवस्था को चोट लगती है। यकीनन नोटबंदी का फैसला गलत नहीं है, ठीक उसी तरह इस कारण हो रही समस्याओं को उठाना भी गलत नहीं है। सबसे अधिक जिम्मेदारी उसकी होती है जो सत्ता में होता है। सरकार सर्वाधिक जवाबदेह है। गोपनीयता का विकलांग बहाना बनाकर सरकार ये नहीं कह सकती कि इसलिए ही कुछ तैयारियां पूरी नहीं हो पायीं। सबको पता है, नए बर्तन खरीदने के बाद ही पुराने फेंके या बेचे जाते हैं। सवाल जायज है या नाजायज है, ये मुख्य नहीं है; जवाब आ रहा है या नहीं यह मुख्य है, पारदर्शिता मुख्य है। आज ‘लोक’ लाईन में खड़ा है। नेटभेदिये उन्हें बॉर्डर सा महसूस करा रहे हैं; ये टैगिंग ‘आम’ की भी बेईज्जती है और सीमा के सैनिक की भी। लोकतंत्र अगर लाईन में खड़ा हो तो शांत रहकर सामान्य की प्रतीक्षा करनी चाहिए ना कि जो है उसे ठीक साबित करने में ऊर्जा लगानी चाहिए। परिवर्तन असहजता तो लाता ही है, पर सवालों से असहजता अपारदर्शिता को सूचित करता है। सरकार को कदम तो उठाने ही होते हैं और कोई कदम शतप्रतिशत सही नहीं हो सकता तो यह तो स्वाभाविक है कि स्क्रूटिनी तो होगी।

पूंछने दीजिये ‘लोक’ को, ‘तंत्र’ बचा रहेगा।   

Wednesday, February 10, 2016

जेएनयू विवाद और राष्ट्रवाद की राजनीति

सच एक नहीं होता, एक वह हो ही नहीं सकता क्यूंकि सब एक साथ एक जगह खड़े नहीं होते l सबका अपना अपना सच हो सकता है, किसी का सच छोटा या बड़ा नहीं हो सकता l एक समय में किसी विषय पर सूचनाओं की उपस्थिति सम्पूर्ण नहीं हो सकती, इसलिए सच, समय समय का भी हो सकता है l कोई निष्कर्ष अंतिम नहीं हो सकता l कोई अर्थ, कोई परिभाषा अंतिम नहीं हो सकती l अभिव्यक्ति के सभी साधनों की सीमायें हैं l प्रायःयह मान लिया जाता है कि इन सीमाओं का बोध उन्हें अवश्य ही होगा जो इन साधनों के उपभोक्ता हैं, प्रयोक्ता हैं एवं नियोक्ता हैं l यकीनन किसी तथ्य के कई पहलू होते हैं l तथ्यों का अधिकाधिक संभव बोध प्रकाश हो, इसलिए परिप्रेक्ष्यों, अवधारणाओं, व्याख्याओं, दृष्टिकोणों एवं अलग अलग स्रोतों की सूचनाओं का आह्वाहन व समावेशन किया जाता है l
अभिव्यक्ति की चुनौतियाँ भी गंभीर हैं l मान लिया जाता है कि इसका बोध भी उन्हें है जो अभिव्यक्ति के साधनों के उपभोक्ता हैं, प्रयोक्ता हैं एवं नियोक्ता हैं l शब्दों के सबके अपने अपने संस्कार हैं l प्रति एक शब्दों के साथ प्रत्येक व्यक्ति के अपने अपने बिम्ब हैं l वक्ता के शब्द संस्कार और श्रोता के शब्द संस्कार अलग अलग हो सकते हैं, तालमेल एक चुनौती है l विषय-अनुशासनों में यह समस्या सुलझाने की कोशिश की गयी शब्दावलियाँ (Terminologies) गढ़कर, ताकि कम से कम एक विषय-अनुशासन में शब्दों के एक जैसे अर्थ लिए जाएँ l भाषाएँ तरल और सरल होती जाती हैं अपने विकास के क्रम में, और इसी क्रम में जनसामान्य के हस्तक्षेप से शब्दों के अर्थों में नयी विमायें जुडती जाती हैं l कई बार तो किसी शब्द का अर्थ अपने मूल अर्थ से इतना भिन्न हो जाता है कि सहसा विश्वास नहीं होता l अब भारत जैसे देश में जहाँ विविध भाषाएँ हों, उन भाषाओँ की कई बोलियाँ हों और भारत का इतिहास और भूगोल अपनी विविधताओं से समृद्ध हो, अभिव्यक्ति की चुनौती और गहरी हो जाती है l अलग अलग आइडेंटिटी के लोग, अलग अलग पेशे के लोग, अलग अलग शैक्षणिक स्तर के लोग, अलग अलग आर्थिक स्तर के लोग हैं हमारे महान देश में, - तो यह चिंता हमेशा है कि शब्दों के वही अर्थ संप्रेषित-गृहित हुए जो अभीष्ट थे अथवा नहीं l फिर अपनी अपनी तटस्थता और अपना अपना बॉयसनेस (biasness) भी है और अपने अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव व चुनौतियाँ भी हैं l यह मान लिया जाता है कि इन चुनौतियों एवं अभिव्यक्ति के साधनों/माध्यमों की सीमाओं को समझते हुए लोग अभिव्यक्ति कर रहे हैं l
अभिव्यक्ति एक सरल प्रक्रिया है किन्तु ज्यों ज्यों इसका कैनवास बढ़ता जाता है यह एक जटिल प्रक्रिया बन जाती है l बड़े माध्यमों को बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह करना होता है क्योंकि उन्हें एक डायनॉमिक समुदाय को संबोधित करना होता है l मीडिया किसी एक संस्थान या किसी एक ईकाई का नाम नहीं है l अब तो इसमें गैर-परम्परागत माध्यमों का भी गहरा हस्तक्षेप है l मेले में अब एक लाउडस्पीकर नहीं है l भांति-भांति के हित हैं, भांति भांति की आवाजें हैं l किसी एक लाउडस्पीकर पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि इसपर हमेशा अच्छे गाने ही बजेंगे l किसी लाउडस्पीकर की साउंड क्वालिटी बेमिसाल है तो ये नहीं कहा जा सकता कि इस पर बस शानदार गाने ही बजेंगे l किसी लाउडस्पीकर को देख कर यह नहीं कहा जा सकता कि इसपर केवल गाने ही बजेंगे l मेरे कहने का मतलब सीधा है, जागरूक रहना होगा l ध्यान देना होगा l राय बनाने की उनकी जल्दी समझ आती है, हम-आप इतनी जल्दीबाजी में क्यूं हैं ? किसी एक प्रोफेशन में यह दावा नहीं किया जा सकता कि उनके यहाँ केवल काबिल लोग हैं, केवल सच्चे लोग हैं l यह संभव ही नहीं है l हमें जानना-समझना होगा कि सूचनाओं का एक स्रोत खतरनाक हो सकता है l
सभी निकायों का महत्त्व अलग अलग है, इसे रेखांकित करना होगा l पत्रकार और प्रोफ़ेसर की अपनी अपनी सीमायें और भूमिका है l टीवी चैनल और लाइब्रेरी की अलग अलग महत्ता है l विश्वविद्यालय और स्कूल का फर्क समझना होगा l प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का फर्क समझना होगा l लोकसभा और राज्यसभा का फर्क समझना होगा l सेना और पुलिस का फर्क समझना होगा l सत्ता-शासन और नागरिक समाज का फर्क समझना होगा l कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका का फर्क; संघ और राज्य का फर्क समझना होगा l इसके अलावे सभी terminologies का फर्क और उनका आपसी सम्बन्ध समझना होगा, राजनीति शास्त्र और राजनीति का अंतर व सम्बन्ध, धर्म और सम्प्रदाय का फर्क व रिश्ता, राष्ट्र और राष्ट्रवाद का रिश्ता और फर्क, Nation, State, Nation-State का अंतर और सम्बन्ध, Indian Nationalism और Western Nationalism का अंतर और सम्बन्ध, समाजवाद, मार्क्सवाद, कम्युनिज्म, लेनिनवाद का रिश्ता और उनका अलगाव समझना होगा l माओवाद और कल्चरल रिवोल्यूशन की कहानी समझनी होगी l राष्ट्र-निर्माण प्रक्रिया एवं राज्य निर्माण की प्रक्रिया का अंतर और उनका आपसी सम्बन्ध समझना होगा l उदारवाद, बाजार, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और उनका लोकतंत्र से सम्बन्ध समझना होगा l कहना होगा, समझने को बहुत कुछ है, समझने-समझाने की हमेशा ही गुंजायश है l पर सभी और कोई एक सब कुछ नहीं समझ सकते क्योंकि सबको और किसी एक को सबकुछ समझने का मौका नहीं मिलता, इसलिए ही हमें विशेषज्ञों की जरुरत होती है l इसलिए कह रहा हूँ कि सभी निकायों की महत्ता अलग अलग है और सभी व्यक्ति-विशेष की भूमिका अलग अलग है l हमें समझना होगा कि लोकतंत्र में सबकी जवाबदेही है और यह जवाबदेही अलग अलग लोगों की अलग-अलग लोगों के प्रति है और अंततः जनता के प्रति है l लोग समझते नहीं हैं सारे फर्क, सारे निहितार्थ, सारे आशय; यह मेरा आशय नहीं है, मै तो बस अभिव्यक्ति कितनी जटिल है यह समझने-समझाने की विनम्र कोशिश कर कर रहा हूँ l
ऐसे में जब कोई घटना होती है, कोई आरोप लगता है तो निष्कर्ष से अधिक महत्त्व सच के अधिकाधिक परिप्रेक्ष्यों को समझने का है ताकि न्याय निर्णयन हो सके, ताकि एक सुन्दर संतुलन सधा रहे l
आइये JNU विवाद पर चर्चा करते हैं l मेरी इस विषय पर कुछ क्षमताएं हैं और कुछ सीमायें हैं l विद्यार्थी-शोधार्थी रहा हूँ JNU का l JNU का मेरा समय मेरी बालिग उम्र का समय है l राजनीति शास्त्र का ही विद्यार्थी हूँ और रक्षाशास्त्र के विषय-विशेष पर शोध है l भारत-पाकिस्तान और भारत नेपाल की सीमाओं पर मेरा अध्ययन है l अलग अलग अपने अवकाश में JNU की अन्यान्य गतिविधियों में परिभाग किया है l कभी सक्रिय कभी निष्क्रिय रहा हूँ l यह मेरी क्षमताएं हैं l इस विषय पर मेरी सीमायें यह हैं कि मुझे JNU से लगाव है l वहां के माहौल से लगाव है l परिसर की राजनीतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से लगाव है l सेमिनार, कांफ्रेंस, कक्षाओं की नियमितताओं से लगाव है l तो इन लगावों की वज़ह से मुझमे भी एक biasness की गुंजायश तो अवश्य ही है l मै इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूँ l इन सबके बावजूद मेरी अभिव्यक्ति की अनदेखी नहीं की जा सकती l
विश्वविद्यालय और विद्यालय की संकल्पना का फर्क समझते हुए कहना होगा कि JNU अपने स्थापना के समय से ही Cosmopolitan रहा है l यह विश्वविद्यालय अपने शोध के लिए जाना जाता है l यहाँ पीएचडी का कोर्स पहले आया, फिर जरुरत समझते हुए एम.ए., एम. फिल. और फिर भाषाओँ के स्नातक के कोर्स आये l तो शुरू से ही एक परिपक्व छात्रों का समुदाय यहाँ पहले आया l विश्वविद्यालय प्रशासन का इसीलिये आपको वह स्वरुप यहाँ नहीं मिलेगा, जो भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों में मिलता है l विश्वविद्यालय एक स्वायत्त निकाय होता ही है तो JNU में यह संभव हो सका कि यहाँ सही मायने में लोकतंत्र की भावना का विकास हो l विश्वविद्यालय की अधिकांश गतिविधियाँ छात्र करते हैं, परम्परागत रूप से जोकि अधिकांश विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय -प्रशासन करता है l यहाँ की प्रवेश प्रक्रिया, छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया तक में छात्रों की औपचारिक-अनौपचारिक भूमिका रहती है l यहाँ छात्र, शिक्षक, कर्मचारी और मजदूरों का जो सम्बन्ध आपको देखने को मिलेगा वो आपको सुकून पहुचायेगा l पूरे साल भर छात्रवासों में कार्यक्रम होते हैं l शिक्षकगणों के आवास एक साथ और छात्रों से अलग नहीं है -किसी अलग थलग टापू की तरह; बल्कि छात्रावासों के साथ साथ उनके आवास हैं, और शिक्षकों को सुबह-शाम छात्रों से बात करते, उनके साथ खेलते-हँसते-खाते-पीते, साथ अख़बार पढ़ते देखा जा सकता है l ओउम सहना भवतु, सहनौ भुनक्तु की अवधारणा यहाँ पुष्पित पल्लवित होती है l जैसे हम यह कहते हुए गर्व का अनुभव करते हैं ना कि हमारे महान भारत में वे धर्म भी शान से रहते हैं जो धर्म अपने उत्पत्ति के स्थानों से मिट गए, ठीक वैसे ही JNU में वे आवाजें, वे विचार, वे दृष्टिकोण भी स्थान पाते हैं, जो देश में मेनस्ट्रीम में नहीं हैं l हाथ से बने पोस्टर यहाँ सबके मिल जायेंगे, उनके भी जिनके कहीं और मिलने मुश्किल हैं; पर केवल उन्ही के मिलते हैं यहाँ पोस्टर, यह कहना JNU के साथ ज्यादती होगी l हाँ, नज़र जरुर उनपर ठहर जायेगी क्योंकि वे कही और मुश्किल से मिलते हैं l अब टी.आर.पी. के दबाव तले दबे 24 x 7 टी.वी. चैनलों के मासूमों को जल्दी से कुछ नया और अलग चाहिए तो JNU एक मुफीद जगह है l एक विजिट या दो विजिट्स में आप किसी विश्वविद्यालय की आत्मा को नहीं समझ सकते हैं l संभव है, किसी विभाग में उन प्रोफेसरों की संख्या अधिक हो सकती है जो अपने सार्वजानिक अभिव्यक्ति में मार्क्सवादी हों (आज का सच ये भी नहीं है; वहां हर तरह के प्रोफ़ेसर बहुतायत में मिलेंगे अब ), लेकिन मुझे तो अपनी किसी कक्षा या सेमिनार में याद नहीं आता कि किसी ने यह स्थापित करने की कोशिश की हो कि मार्क्सवाद ही अंतिम विचारधारा है या उदारवाद एक अछूत विचारधारा है. हाँ क्रोनिक कैपिटलिज्म की मैंने बार बार आलोचना सुनी है पर इसीतरह लेनिनवाद और माओवाद की भी आलोचना सुनी है l कोई एक विश्वविद्यालय एक विचारधारा का कैसे हो सकता है, क्या यहाँ का हर दो-तीन साल पे बदलता सिलेबस ऐसा है-करीब से देख लीजिये; क्या यहाँ की लाइब्रेरी में मार्क्सवाद की किताबें ही सर्वाधिक हैं-आकर देख लीजिये: काफी दोस्ताना माहौल मिलेगा लाइब्रेरी में भी, भले आप यहाँ के छात्र ना भी हों l
छात्रसंघ चुनावों के जो परिणाम हैं उनसे अगर आप यह निष्कर्ष निकालने की उतावली में हैं कि सम्पूर्ण परिसर लाल है तो तनिक ठहरिये l ये सच है कि यहाँ के छात्रसंघ चुनाव में जो बहसें होती हैं उनमे वैश्विक और राष्ट्रीय मुद्दे छाये होते हैं पर यहाँ के सभी छात्र एक कठिन प्रवेश प्रक्रिया के पश्चात् आये हुए जागरूक छात्र हैं वे वोट उन्हीं को देते हैं जो साल भर उनकी समस्याएं सुनता है, परिसर में सक्रिय होता है l आप मान लीजिये कि कम से कम इस परिसर में वामपंथी दल अपने सांगठनिक ढांचे और कार्यशैली में दक्षिणपंथी दलों से भारी पड़ जाते हैं l अधिकांश छात्रों से पूछिये कि स्नातक के जो छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय में ABVP या NSUI को वोट देते हैं वे JNU में आकर MA, MPhil-PhD में इन वामपंथी दलों को वोट कैसे दे देते हैं, पहले से तो वो और अधिक परिपक्व ही होते हैं l ऐसे बहुत छात्र मिल जायेंगे जो कि एक चुनाव में ही अलग अलग पदों के लिए अलग अलग विचारधारा वाले दलों को वोट करते हैं l सभी बस, विचारधारा देखकर वोट नहीं करते l जब कभी ABVP, NSUI या किसी दक्षिणपंथी दल का कोई प्रत्याशी सक्रिय होता है वो अलग अलग पदों पर अलग अलग समय में जीतता रहा है l लगभग हर चुनाव में एक करीबी मुकाबला होता जरुर है, एक जैसा या एक पैटर्न का चुनाव नहीं होता यहाँ भी ठीक अपने देश की तरह l मेस में रोजाना आने वाले पम्प्फ्लेट्स देख लीजिये , किसी दल के हों वो एक-दूसरे से कमजोर नहीं लगेंगे l जीतने वाले प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि देख लीजिये वे केवल उन राज्यों से नहीं आते जहाँ वामपंथियों का बोलबाला है या उनकी सरकारे हैं l इन प्रत्याशियों में आपको उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश के लोग भी प्रमुखता से मिलेंगे l इस कैम्पस में वामपंथी दल सबसे अच्छे दल नहीं हैं बस दक्षिणपंथी दल उनसे अच्छा काम नहीं कर पा रहे l एक महत्वपूर्ण कारण और है वामपंथियों की जीत का, और वो ये है कि उन्हें विमर्शों में ABVP और NSUI की तरह सरकार की करतूतों का उस अनुपात में जवाब नहीं देना पड़ता l परिसर में दक्षिणपंथी दल जो काम करते भी हैं उनपर उनकी सरकारों की कमियां भारी पड़ जाती हैं अक्सर l तो मुकाबला बिलकुल बराबरी का नहीं है l खैर l
निश्चित ही JNU प्रशासन हर बार देशविरोधी कार्यक्रमों या नारों (जो हुई हों, होने का आरोप हो, या जिस तरह से भी जितनी भी हुई हों) यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि इस परिसर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है l JNU प्रशासन की भी जवाबदेही है l विश्वविद्यालय में कोई पैदा नहीं होता, उसी समाज से आते हैं सभी और फिर चले जाते हैं l देश-विदेश के कोने कोने से आने वाले, अलग अलग उम्र के लोग अपनी multiple identities की समस्याओं के साथ आते हैं विश्वविद्यालय में l लचर शिक्षा व्यवस्था, धर्म, जाति, संप्रदाय, नस्ल, लिंग के अनगिन विभाजनों एवं विद्रूप दलगत राजनीति वाले समाज से आने वाले छात्रों के बीच, उचित-उन्नत शिक्षा-शोध, समानता, लोकतंत्र के आदर्शों को साधना यकीनन आसान तो नहीं पर फिर भी जवाबदेही और जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन की बनेगी जरुर और शिक्षक और छात्र भी उस जवाबदेही में आयेंगे जरुर l भले ही यह आसान ना हो, विश्वविद्यालय को एक मैकेनिज्म ईजाद करना होगा जिससे परिसर में स्वतंत्रता भी हो और अपेक्षित आदर्शों की भी अनदेखी ना हो l यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की अनदेखी करते हुए प्रथम ही पुलिस का हस्तक्षेप करवा दिया l पहले विश्वविद्यालय प्रशासन को अपना काम करने देना था l गृहमंत्री के इस सम्बन्ध में बयान अजीब और अविश्वसनीय हैं l मीडिया की भी जवाबदेही हो l लोकतंत्र में जब सभी निकायों की भूमिका निर्धारित है तो उनकी जनता के प्रति जिम्मेदारी बनती है l अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर जैसे युक्तियुक्त बंधन छात्रों पर हैं ठीक वैसे ही मीडिया पर भी हैं l वही अनुच्छेद हैं, वही संविधान है l वही संविधान पुलिस के लिए है, वकीलों के लिए है और चीखते चिल्लाते पत्रकारों के लिए भी वही है l
जनता से अपील करना चाहता हूँ :
१. सरकार को आप चुनते हैं, वे आपको नहीं चुनते l आप भी अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से नहीं बच सकते
२. किसी भी तरह से अगर वे आपको अपना वोट बैंक बार बार बना लेंगे तो याद रखिये वे मेनीफेस्टो हर बार इग्नोर करेंगे l आपसे सरकार है, आप सरकार से नहीं है l कानून का पालन करिए पर सरकार के गुलाम मत बनिए, सरकार से सवाल करने का अधिकार, आपने शहीदों की अनगिन कुर्बानियों के बाद कमाया है, इसे यूँ ना गंवाइये l
३. देश के प्रति वफादार रहिये, किसी दल के प्रति नहीं; और राजनीति में किसी व्यक्ति के प्रति तो कभी नहीं l
४. मुद्दे आप खोजिये और बनाइये, विचार करिए उन पर, यह महान अधिकार किसी भी हालत में आप नेताओं और पत्रकारों को मत सुपुर्द करिए l
५. पहले तो वोट देने जाया करिए, और आँख, नाक, कान खुले रखकर सही व्यक्ति को वोट दीजिये l माहौल और भौकाल देखकर वोट करेंगे तो चुनाव लड़ना खर्चीला होगा और आम आदमी कभी चुनाव नहीं लड़ सकेगा l
६. वोट कभी भी किसी भी विचारधारा को देखकर मत दीजिये, व्यक्ति की योग्यता पर दीजिये. विचारधाराएँ इतनी महान होतीं तो हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में ही कोई एक विचारधारा चुन ली होती चीन की तरह l
७. वोट देकर, समर्थन कर सरकार बनाइये, स्थायित्व विकास के लिए यह आवश्यक है, पर एक बार सरकार बन जाने पर एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका सरकार पर नज़र रखनी हो जाती है ना कि अंधसमर्थन करना, यह शिद्दत से समझिये l
८. सरकार से आप सवाल नहीं करेंगे तो कौन करेगा? कोई सैलरी वाला सवाल करेगा तो उसकी मजबूरियां भी तो होंगी ही ना...! आपने उन्हें सत्ता दी है, सरकार को ये एहसास दिलाते रहिये l ये ब्रिटिश सरकार नहीं है, ये आपकी अपनी सरकार है l
९. शिक्षा पर काम करिए, राज्य के भरोसे ही मत रहिये, आप स्वयं प्रयास करें, देश के विकास के लिए सरकारें इंतज़ार कर सकती हैं, हम नहीं l ध्यान रहे विकास हमारे लिए लक्ष्य है, दलों के लिए यह झुनझुना या जुमला या नारा पहले है, लक्ष्य बाद में कहीं l
किसी भी सरकार/दलों से अपील करना चाहता हूँ:
१. जिन वादों पर आप सत्ता में आये हैं उन्हें पूरा करिए, अब पुराने दिन गए, लोग पहले से ज्यादा शिक्षित और जागरूक हैं, अचानक ही उखाड़ फेकेंगे l
२. देशहित के कुछ मुद्दों को संकीर्ण दलगत राजनीति का विषय ना बनायें, चेहरे जनता बेनकाब कर देगी l
३. प्रशासन को पारदर्शी बनाइये l दफ्तरों में आग लग जाने के दिन अब लदे l
४. जवाब दीजिये l सवाल का जवाब यूँ ना दीजिये-कि उसने भी तो ऐसा किया था...., सत्ता में हैं आप, जिम्मेदारी आपकी ज्यादा है l
५. योग्य व्यक्तियों को पद दीजिये, जनमत का मजाक उड़ाना अब बंद करें l
६. लोकतंत्र के सभी स्तंभों को सांस लेने दीजिये l देश नहीं बचेगा तो आप भी नहीं बचेंगे l
७. जानता हूँ, चुनाव लड़ना हंसी खेल नहीं, पैसा लगता है l जिनसे लिया है पैसा उन्ही को चुकाने के चक्कर में देशहित से खिलवाड़ करना बंद करिए l देश नहीं होगा तो काला धन उन्हें भी बचा नहीं पायेगा l देश में भूख से मरने वाले अभी भी हैं, बीमार को तो छोड़ ही दीजिये l बैंक वोट नहीं देते, उसका कर्जा माफ़ कर देते हो, किसान तो वोट भी देता है ना...!
८. इतिहास से डरिये, शोध के नए विभाग खोलिए, इसे तोड़िए मरोड़िए मत, इसमें अपना स्थान बनाइए l
८. विश्वविद्यालय में लगने वाले पोस्टर या नारे दरअसल अपने देश के ही किसी कोने में लगने वाले नारे हैं l संवाद करिए, उन समस्याओं को दबाइए नहीं, उनसे भागिए नहीं, उनका रंग भी मत बदलिए, उनका सामना करिए, उनकी परतों को समझिये l उन्हें लोकतान्त्रिक रीति से सुलझाइए l उनपर आगे नहीं बढ़ पा रहे तो कम से कम कुछ ऐसा ना करिए कि पीछे आ जाइये l देश बचेगा तो फिर फिर फिर सत्ता मिलेगी पार्टनर l
परम्परागत मीडिया से अपील करना चाहता हूँ:
१. आप तो पहले यही जानिये कि आपका मुख्य काम क्या है l
२. आपसे पूरी सहानुभूति है कि आप किन हालातों में काम करते हैं, पर फिर भी आपको अपने पेशे की चुनौतियाँ स्वीकार करनी पड़ेंगी l
३. इतना पूछते रहते हैं, थोडा पढ़ते भी रहा करिए l हाँ, पढने का सबसे अच्छा स्रोत आज भी इन्टरनेट नहीं है, किताबें ही है, यह जानिये l
४. आप मत थोपा करिए मुद्दे जनता को l जनता जानती है उसे क्या चाहिए l नए नए मुद्दे थोप देते हैं आप, जनता पुराने मुद्दे पर हिसाब ही नहीं ले पाती l
५. रोज रोज सौ खबर दिखाना जरुरी नहीं है l
६. हर घंटे खबर ब्रेक मत किया करिए, जनता का विश्वास जिस दिन ब्रेक हो जायेगा ना, फिर बोलने को कुछ बचेगा नहीं l
७. मेहनती, स्टूडियो से इतर जो पत्रकार हैं, जमीन पर उन्हें जरा सैलरी टाईम पर और ढंग की दे दिया करिए, उनकी इन्ही हालातों की वज़ह से स्टूडियो पत्रकार को समझ ही नहीं आता, कि उनसे गलतियाँ, कब, कहाँ और कितनी हो रही हैं l
८. लगातार बोलने वाले को माफी भी मांगने की आदत डालनी चाहिए. गलतियाँ सबसे होती है l इससे आपकी एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और संवेदनशील छवि बनेगी और ऐसे पत्रकारों की सच में देश को बड़ी जरुरत है l
शिक्षकों से कहना चाहता हूँ:
१. केवल करीकलम के चक्कर मत रहिये l ज़रा अखबार के हर पन्ने को समझने की तमीज दीजिये विद्यार्थी को l
२. विज्ञान, तकनीकी और कला के विभाजन मत पालिए मन में और ना ही उन्हें जमने दीजिये l अगर आप अपने विषय से इतर जानने की कोशिश नहीं कर रहे हैं तो आप अपना, छात्र का, विद्यालय-विश्वविद्यालय का, देश का और उस विषय का भी नुकसान कर रहे हैं l
३. छात्र के प्रति संवेदनशील बनिये l हर कक्षा में चार मेधावी मत पालिए l हर छात्र को उसकी खासियत एहसास करवा दीजिये l
४. एक पक्षीय संवाद ना करिए कक्षा में l सवाल करने के लिए उकसाइए; देश आपका ऋणी रहेगा l
५. राजनीति से ना उदासीन रहिये ना रहने दीजिये l
६. शिक्षक बनने के बाद अगर कुछ और बनने की लालसा के ऊपर आपने विजय पा ली है तो ज़रा कक्षा से इतर जो आपकी जिम्मेदारी है उनसे मुंह ना मोड़िये l आसान शब्दों में लेख लिखकर, बोलकर और अन्य संभावित माध्यमों का प्रयोग कर जनता को जागरूक बनाइये l
७. जटिल से सरल की ज्ञानयात्रा करवाना आपका काम है l जानता हूँ ज्यादातर शिक्षक इसका उल्टा करते हैं l
छात्रों से :
१. किसी रंग में मत ढलिए, हर रंग समझिये l
२. ज्ञान के सभी स्रोत खंगालिए l
३. इंटरनेट की क्षमता और सीमा समझिये l
४. विषय तक सीमित मत रहिये l
५. सबको सुनिए, सबसे सीखिए l
६. Agree to disagree का मूलमंत्र समझ लीजिये l
७. स्वस्थ रहिये l

डॉ. श्रीश

Tuesday, December 16, 2014

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति : परिभाषा, प्रकृति एवं एक स्वतंत्र विषय-अनुशासन के रूप में विकास



ईकाई -01
लेखक : डॉ. श्रीश पाठक 


अंतर्राष्ट्रीय राजनीति : परिभाषा, प्रकृति एवं एक स्वतंत्र विषय-अनुशासन के रूप में विकास


इकाई की रूपरेखा
1.1 उद्देश्य
1.2 प्रस्तावना
1.3 अर्थ
1.4 परिभाषा
1.5 प्रकृति
1.6 एक स्वतंत्र विषय के रूप में विकास
1.7 सारांश
1.8 शब्दावली
1.9 निबंधात्मक प्रश्न
1.10 संदर्भ ग्रंथ
1.11 सहायक सामग्री


    1. उद्देश्य
एक विषय के रूप में इसके विकास का अध्ययन हमें इसकी महत्ता, उपयोगिता एवं प्रासंगिकता से परिचय करवाएगी। इस इकाई के अध्ययन से हम अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक विषय-अनुशासन के रूप में हुए क्रमशः विकास के विभिन्न आयामों को जानेंगे एवं उन्हें विश्लेषित करेंगे। वर्तमान में कोई राष्ट्र-राज्य किस प्रकार अन्य राज्यों से संबंध स्थापित करता है एवं इन सम्बन्धों के निर्वहन से उसके किन किन हितों की पूर्ति होती है, यह जानने का प्रयास करेंगे। विषय-विकास के विभिन्न पड़ावों, आयामों एवं उनका पृथक-पृथक महत्व जानेंगे। इस विकास यात्रा के अध्ययन का वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में क्या भूमिका हो सकती है, इसे भी जानने का यत्न करेंगे।
    1. प्रस्तावना
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति एक विषय-अनुशासन के रूप में वर्तमान में बहु-विश्लेषित अनुशासनों में से है। इसकी विषय-सीमा में लगभग सम्पूर्ण विश्व की राजनीतिक एवं आर्थिक गतिविधियां हैं। विश्व के विविध भागों में अपनी विभिन्नताओं के साथ बसे विपुल जन-समुदाय भिन्न-भिन्न राष्ट्रीय अस्मिता वाली सीमा-रेखाओं के भीतर स्थित होते हैं। व्यक्ति; चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष, बच्चा हो या युवा, प्रौढ़ हो या वृद्ध; सभी किसी न किसी राजनीतिक सीमा से अवश्य ही बंधे होते हैं। यह उनकी एक सशक्त पहचान होती है। आज तकरीबन दो सौ से अधिक राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में हैं, जो अपनी-अपनी स्वतंत्र सीमाओं के भीतर एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान के साथ समग्र विकास हेतु प्रयत्नशील हैं। आधुनिक राज्य, संप्रभुता के आधुनिक मानदंडों के अनुरूप अपने विषय में निर्णयन के लिए परम स्वतंत्र होते हैं; साथ ही वह अन्य राज्यों की संप्रभुता का भी आदर करते हुए उनसे भी यही अपेक्षा रखते हैं। निश्चित ही सभी राज्य अपने विकास की दिशा एवं राष्ट्रीय लक्ष्य स्वयं ही तय करते हैं एवं तदनुरूप प्रयासों के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं। इसमें अन्य हस्तक्षेप स्वीकार योग्य नहीं होते और ना ही कोई राज्य किसी अन्य राज्य से किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की अपेक्षा ही रखता है; क्योंकि यह उसकी संप्रभुता को क्षीण करता है।


    1. अर्थ
यथार्थ में यह संभव नहीं है कि कोई राज्य, अन्य राज्यों के प्रति उदासीन रह सके। अन्य राज्यों की अन्यान्य गतिविधियां निश्चित ही उस राज्य को भी प्रभावित करती हैं। ये प्रभाव सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। प्रत्येक राज्य प्रभावों के सकारात्मक होने पर उनसे लाभान्वित होना चाहता है एवं इसके विपरीत प्रभावों के नकारात्मक रहने पर उनसे स्वयं की सुरक्षा चाहता है। इस उद्देश्य की पूर्ति, उदासीन अथवा अलग-थलग रहकर नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त प्रत्येक राज्य, संसाधनों की सुरक्षा, उनके उचित अनुप्रयोग एवं उनकी अनुवृद्धि के लिए अन्य राज्यों से संबंध की अपेक्षा करता ही है। व्यापार एवं सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए भी परस्पर सम्बन्धों की निरंतर आवश्यकता होती है। इस प्रकार, प्रत्येक राज्य एक-दूसरे से सम्बन्धों में रुचि रखते हैं। यह संबंध बहुत ही जटिल एवं बहुआयामी होते हैं। इन सम्बन्धों का अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय संबंध कहलाता है। राज्यों का एक दूसरे से सम्बन्धों का निर्वाह केवल द्विपक्षीय कारकों पर ही निर्भर नहीं करता अपितु कई अन्य वाह्य कारक भी कार्यरत होते हैं और कई बार वह ही निर्णायक होते हैं। उन समस्त कारकों का राजनीतिक अध्ययन ही अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों एवं सम्बन्धों का सम्यक विश्लेषण कर सकता है। अतः यह अध्ययन, अंतर्राष्ट्रीय संबंध के अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, विश्व राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय राजनय आदि नामों से भी जाना जाता है। अलग-अलग नाम वस्तुतः अध्ययन के मुख्य लक्ष्य को व्यक्त करते हैं, यथार्थ में इन सभी नाम-पदावलियों में विषयवस्तु की समानता है। किन्हीं अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को अवश्य ही लक्षित करेगी, इसी प्रकार, अंतर्राष्ट्रीय राजनय का कोई गंभीर अध्ययन अपने विश्लेषण में अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों एवं राजनीति की उपेक्षा नहीं कर सकता। इसलिए यह स्पष्ट है कि एक विषय-अनुशासन के रूप में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का लक्ष्य, राज्यों के मध्य होने वाली राजनीति, परस्पर संबंध व कूटनीति एवं विविध कारकों का जटिलताओं का समग्रता में अध्ययन करना है। विभिन्न विद्वानों के द्वारा दी गई परिभाषाओं मे भी विषयवस्तु की यह साम्यता दृष्टिगोचर होती है।
    1. परिभाषा
विभिन्न विद्वानों द्वारा की गई अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की भिन्न-भिन्न परिभाषाओं में वस्तुतः विषय के विषयवस्तु की ही व्याख्या करने की कोशिश की गई है। यों तो परिभाषा का अर्थ ही है, न्यूनतम मानक शब्दों में विषयवस्तु का सम्यक अर्थान्यावन। किन्तु सत्य यह भी है कि किसी भी विषय-विशेष का समूचा परिचय किसी भी परिभाषा में परिमित नहीं किया जा सकता। फिर भी परिभाषाओं से यह अवश्य पता चल जाता है कि किसी विषय का गुरुतर झुकाव किस और है और कुछ होने से अधिक यह क्या नहीं है।  


अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की परिभाषाओं का मूल स्वर, जटिल एवं बहुआयामी अन्तः क्रियाओं, परस्पर सम्बन्धों, शक्ति-संघर्ष एवं राज्य की वाहय नीतियों से सम्बद्ध है। ट्रेवर टेलर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को एक ऐसा विषय-अनुशासन कहते हैं, जो राज्य की सीमाओं के आर-पार की राजनीतिक गतिविधियों की व्याख्या करने की कोशिश करता है। हार्टमैन के अनुसार, अध्ययन के एक क्षेत्र के रूप में यह उन प्रक्रियाओं पर केन्द्रित है, जिनसे राज्य अन्य राज्यों के सापेक्ष अपने राष्ट्रहित गढ़ते हैं। ये परिभाषाएँ मुख्यतः राष्ट्रों के मध्य होने वाली अन्तः क्रियाओं पर आधारित हैं। इन अन्तः क्रियाओं में शक्ति की भूमिका को रेखांकित करते हुए पैडलफोर्ड एवं लिंकन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की परिभाषा शक्ति-सम्बन्धों के सतत परिवर्तित हो रहे विन्यासों के भीतर राज्य की नीतियों की अन्तः क्रियाओं के रूप में करते हैं।


व्यवस्थावादियों ने भी अपने तकनीकी पदावलियों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को परिभाषित किया है। वे समस्त विश्व को एक व्यवस्था के रूप में देखते हैं। विश्व-व्यवस्था की सदस्य राज्य-व्यवस्थाएं होती हैं। पामर व पार्किंस के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय राजनीति वस्तुतः राज्य-व्यवस्था से संबन्धित है। व्यवस्था में अन्तः क्रियाओं के महत्व को समझते हुए जोसेफ ओला अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की परिभाषा करते हुए लिखते हैं कि यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में स्थित समस्त स्वतंत्र निकायों अथवा राज्यों के मध्य संभव समस्त प्रकार के अन्तः क्रियाओं का अध्ययन है।


अंतर्राष्ट्रीय राजनीति निश्चित ही राज्यों के परस्पर सम्बन्धों में परिलक्षित होती है। परस्पर सम्बन्धों की जटिलताओं से प्रेरित परिभाषाएँ भी ख़ासी महत्वपूर्ण हैं। क्विंसी राइट इसीलिए इसे इतिहास के किसी खास समय में विश्व के महत्वपूर्ण समूहों के सम्बन्धों का अध्ययन घोषित करते हैं। शक्ति-संघर्षो का तत्व ही परस्पर संबंधो की जटिलताओं का मूल कारण है। प्रख्यात यथार्थवादी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति चिंतक हंस मोर्गेंथाउ ने इसी कारण इसे राष्ट्रों के मध्य सम्बन्धों एवं उनके शांति की समस्याओं के विश्लेषण के रूप में देखा है। शक्ति-संघर्ष को मोर्गेंथाउ, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व समझते हैं। अतः वह इसकी परिभाषा करते हुए लिखते हैं कि यह दरअसल शक्ति एवं उसके प्रयोग के लिए राष्ट्रों के मध्य होने वाला संघर्ष ही है। कुछ विद्वान राष्ट्रों की विदेशों के प्रति अपनी नीतियों के अध्ययन को ही अंतर्राष्ट्रीय राजनीति कहते हैं। स्टैनली होफमैन के अनुसार यह विषय-अनुशासन, उन कारकों व गतिविधियों से संबन्धित है जो विश्व को बांटने वाली आधारभूत इकाईयों की वाह्य नीतियों तथा उनकी शक्ति को प्रभावित करते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को भले ही विभिन्न विद्वानों ने कई रीति से पुकारा हो अथवा कई आधारों से परिभाषा की हो, इस विषय-अनुशासन मे राष्ट्र-राज्य, अन्तः क्रियाएँ, परस्पर संबंध, व्यवस्था के रूप में राज्य, शक्ति-संघर्ष एवं वाह्य नीतियों का सम्यक विश्लेषण का लक्ष्य अभीष्ट होता है।
    1. प्रकृति
किसी भी विषय-अनुशासन की प्रकृति से तात्पर्य उसकी अनुसंधान प्रवृत्ति से है। प्रकृति-विश्लेषण से विषय की रुचि के क्षेत्र-सीमा की विमाओं का ज्ञान होता है। विषय की प्रकृति का ज्ञान होते ही, हमें उस विषय-विशेष की आधारभूत विषयवस्तु की जानकारी हो जाती है। विषयवस्तु का स्पष्ट ज्ञान, अध्ययन की गुणवत्ता व उसकी उपादेयता के लिए आवश्यक है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विषयवस्तु को लेकर भी विद्वानों में कम विवाद नहीं है। प्रमुख प्रश्न यही है कि- विषय के अध्ययन का प्रमुख लक्ष्य क्या होना चाहिए ? इस प्रमुख प्रश्न का उत्तर भिन्न-भिन्न लोगों ने विभिन्न प्रकार से किया है। प्रत्येक व्यक्ति की किसी विषय-विशेष से अपनी अपेक्षा हो सकती है। उस विषय की तकनीकों एवं तथ्यों से वह अपेक्षा पूरी हो सकती है। इससे तो बस उस विषय की उपादेयता का पता लगता है। किसी विषय-विशेष से की जाने वाली प्राथमिक अपेक्षा ही विषय की प्रकृति को निर्धारित कर सकती है। इस प्राथमिक अपेक्षा की पहचान करना सरल न था। विद्वानों ने अपने अपने दृष्टिकोण से इस विषय के अध्ययन का प्रमुख लक्ष्य तय किया है। इन उत्तरों का सम्यक विश्लेषण हमें इस विषय से हमारी प्राथमिक अपेक्षा समझने में मदद करेगा।


प्रारम्भ से ही विद्वान इस विषय की विषयवस्तु में प्रमुखतया राज्यों के परस्पर संबंधों की जटिलताओं के अध्ययन को शामिल करने पर ज़ोर देते रहे हैं। राज्यों के परस्पर संबंध निश्चित ही अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, इन पारस्परिक संबंधों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। संबंधों की जटिलताएँ ही अन्यान्य वैश्विक परिघटनाओं को जन्म देती हैं। सभी विद्वान एक स्वर से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राज्यों के परस्पर संबंधों के अध्ययन की महत्ता को स्वीकार करते हैं। परस्पर संबंधों को निर्धारित करने वाले तत्वों में रुचि ही विद्वानों को राज्यों की विदेश/वाह्य नीतियों के अध्ययन को प्रेरित करती है। कई विद्वान तो राज्यों के विदेश नीतियों के अध्ययन को ही इस विषय का प्रमुख उद्देश्य बतलाते हैं।


किन्हीं दो देशों के मध्य कई अन्य संबंधों की अपेक्षा आर्थिक संबंध बहुत ही अहम होते हैं, क्योंकि इसमें दोनों अर्थव्यवस्थाओं की आवश्यकताएँ संतुष्ट होती हैं। विश्व के सभी देश, अपनी अपनी आर्थिक प्रगति के लिए सभी राष्ट्रों से आर्थिक संबंध अवश्य बनाना चाहते हैं। इन आर्थिक संबंधों की राह में आने वाले अन्य राजनीतिक, कूटनीतिक अथवा अन्य किसी अवरोध को वे न्यूनतम या समय-विशेष के लिए परे रख आगे बढ़ना चाहते हैं। आधुनिक विश्व में निस्संदेह आर्थिक गतिविधियां प्रमुख रूप से प्रभावी है। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ के उदारवादियों ने इस आर्थिक परिघटना को महसूस करते हुए अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन की प्रमुख विषयवस्तु उन बढ़ती हुई आर्थिक गतिविधियों एवं मैत्रियों को बनाने पर बल दिया जो राष्ट्रों की सीमाओं की मर्यादाओं में सीमित नहीं रह सकती। चूंकि आर्थिक संबंधों की प्रगाढ़ता, अन्य प्रकार के संबंधों को भी प्रोत्साहित करती है एवं प्रत्येक राष्ट्र के इच्छित विकास के लिए मजबूत अर्थव्यवस्था की आवश्यकता भी है; इसलिए निश्चित ही राष्ट्रों के परस्पर आर्थिक संबंध अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की विषयवस्तु हो सकते ही हैं। आर्थिक-संबंधों के निर्वाह में स्वयमेव राजनीतिक-कूटनीतिक एवं ऐतिहासिक तत्व प्रायः प्रभावी होते हैं।


बीसवीं शताब्दी में सत्तर के दशक के विद्वानों ने राष्ट्रों के मध्य बढ़ रही परस्परिक अन्तःनिर्भरता की ओर ध्यान केन्द्रित किया। प्रत्येक राष्ट्र को अपने विकास के लिए अधिकाधिक संसाधनों एवं पूंजी-लाभ की आवश्यकता उन्हें परस्पर अन्तःनिर्भरता के लिए बाध्य करती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए राष्ट्र अपने अन्य मतभेद परे रख आगे बढ्ने की कोशिश करते हैं। इस परिघटना से प्रभावित विद्वान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की विषयवस्तु में राष्ट्रों के मध्य बढ़ रही परस्परिक अन्तःनिर्भरता को महत्वपूर्ण स्थान देना चाहते हैं।


लगभग इसी समय मार्क्सवादी विचारकों ने, राष्ट्रों के मध्य गहराते आर्थिक संबंधों एवं बढ़ते परस्परिक अन्तःनिर्भरता के बीच एक और प्रवृत्ति पर ध्यान आकृष्ट किया। बढ़ रही विविध आर्थिक संक्रियाओं में मजबूत राष्ट्रों के प्रभावी होते प्रभुत्व एवं उनपर कमजोर राष्ट्रों की लगातार बढ़ रही एकतरफा निर्भरता उनकी प्रमुख चिंता है। यह एक सुपरिचित तथ्य है कि कुछ देशों की विश्व अर्थव्यवस्था में पकड़ बढ़ती चली जा रही है और कुछ देश महज बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर बन कर रह गए हैं। यह एकतरफा होता आर्थिक शक्ति संतुलन अन्य समानान्तर संतुलनों को भी प्रभावित करता है। इसलिए मार्क्सवादी विचारक चाहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की विषयवस्तु यही विश्लेषण हो।


कुछ विद्वान, वैश्वीकरण की समस्त प्रक्रियाओं के द्वारा उद्भूत चारों तरफ हो रहे परिवर्तनों को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की विषयवस्तु बनाने पर बल देते हैं। समकालीन विद्वान भी इसकी महती अनिवार्यता पर एकमत हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की विषयवस्तु पर कुछ चर्चायेँ व प्रश्न और भी हैं, जो समीचीन हैं। जैसे कुछ विद्वान कहते हैं कि- क्या अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिघटनाओं का अध्ययन प्रयोगाश्रित-अनुभवसिद्ध तथ्यों-तकनीकों (Empirical Tools) का इस्तेमाल, 'अंतर्राष्ट्रीय राजनीति' के सम्यक विधियों एवं विन्यासों की खोज के लिए किया जाना चाहिए ! द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात व्यवहारवादी विचारों के प्रचलन से इस धारणा को और भी बल मिला। प्रयोगाश्रित तथ्य, विश्लेषण के लिए एक आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकार किए जाने लगे हैं। प्रसिद्ध विचारक बुल की राय में ऐतिहासिक तथ्यों के प्रयोग से यह जाना जा सकता है कि वर्तमान की किसी परिघटना में क्या और कितना अपूर्व एवं विशिष्ट है। महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विचारक वाईट उन वैचारिक परम्पराओं की खोज करने पर बल देते हैं जो शताब्दियों से विश्व-राजनीति में प्रासंगिक हैं। इसलिए निश्चित ही मार्क्स के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन संभव है, जिसमें उत्पादन, वर्ग एवं भौतिक असमानताओं को कसौटी बनाया जा सकता है।


बाजार की शक्तिशाली उपस्थिति से प्रभावित हो, वाल्ज़  कहते हैं कि- बाजारों के व्यवहार-अनुक्रमों का अध्ययन संभवतः उन संगत आर्थिक शक्तियों की कार्यप्रणाली को समझाने में सक्षम हो, जिनके प्रभाव में लगभग सभी राज्य लगभग एक ही तरह व्यवहार करने लग जाते हैं। इसप्रकार यह भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की विषयवस्तु हो सकती है।


वैश्विक नीतिशास्त्र के अनुगामी, राज्यों के उन लक्ष्यों की प्रकृति में रुचि रखते हैं जिन पर राष्ट्र अपनी मौजूदा कार्यप्रणाली व रणनीति निर्धारित करते हैं। बीज जैसे विचारक जानना चाहते हैं कि राज्यों के विविध लक्ष्यों का अध्ययन क्या उनकी वैश्विक-न्याय स्थापित करने की क्षमता को आंक सकने में सक्षम है? इसीतरह पोज यह जानना चाहते हैं कि लक्ष्यों का अध्ययन वैश्विक गरीबी के समर्पित प्रयासों को माप सकती है। इन समीचीन प्रश्नो के मध्य एक स्वाभाविक किन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या विभिन्न विद्वान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विषयवस्तु के अंतर्गत विभिन्न विश्लेषणों में व्याख्याएँ निरपेक्ष कर सकेंगे?
उपरोक्त विमर्श से यदि हम अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति एवं इसकी विषय-सीमा समझना चाहें तो इतना स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति बेहद ही गतिशील, समसामयिक एवं प्रासंगिक है। इसके विषयवस्तु के अंतर्गत वे समस्त प्रश्न व विश्लेषण समाहित हैं जो राज्यों के परस्पर अन्यान्य सम्बन्धों व उनकी राजनीति को निर्धारित करते हैं। समस्त प्रकार के शक्ति-संतुलनों का विश्लेषण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की गहरी रुचि का क्षेत्र है एवं एक विषय-अनुशासन के रूप में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक मूल्यों की स्थापना के प्रयासों को रेखांकित भी करती है।


    1. स्वतंत्र विषय-अनुशासन के रूप में विकास
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तो अलग अलग कालखंडों में कई देशों से प्राप्त होते हैं, किन्तु संगठित व वैज्ञानिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही संभव हो सका। प्राचीन काल से ही राज्यों के अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को महत्ता दी जाती रही है एवं तदनुरूप अध्ययन किए जाते रहे हैं। इसप्रकार अध्ययन की दृष्टि से विषय की महत्ता प्राचीन काल से ही स्वयंसिद्ध है।


दो-दो विश्व युद्धों की महान विभीषिकाओं ने विद्वानों के मानस को आंदोलित कर दिया। स्पष्ट था कि- राज्य की सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के प्रति उदासीन नहीं रहा जा सकता। एक सुविकसित राष्ट्र को भी अपनी सततता के लिए अपने अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का ध्यान रखना ही होता है। अब प्रत्येक राज्य के लिए अंतर्राष्ट्रीय राजनीति महत्वपूर्ण हो गई और अब इससे निरपेक्ष नहीं रहा जा सकता था। लगभग  इसी समय दो महान ग्रंथ लिखे गए, जिनसे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सुविचारित अध्ययन की औपचारिक शुरुआत मानी जा सकती है। 1939 में ई॰ एच॰ कार ने ‘द ट्वेंटी इयर्स क्राइसिस’ एवं हंस मोर्गेंथाउ ने 1948 में ‘पॉलिटिक्स एमंग नेशन्स’ लिखी। इन दोनों रचनाओं के सारगर्भित विश्लेषण ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक नए अध्ययन-क्षेत्र के रूप सैद्धांतिक रूप से सूत्रपात कर दिया।


दो-दो विश्वयुद्धों ने मानवता के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया था। विश्व के विद्वत समाज ने इन महायुद्धों को मानव की प्रगति-उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न की तरह देखा। समस्त ज्ञान-विज्ञान की प्रगति यदि अंततः विश्वयुद्धों को जन्म देती है तो निश्चित ही यह समय ठहरकर पुनरावलोकन-विश्लेषण का आवश्यक बिन्दु था। आखिर ज्ञान-विज्ञान की यह अतुलनीय प्रगति विश्व युद्धों को रोक कैसे नहीं पायी? समस्त विश्व के समस्त विद्वत समाज ने इसपर मंथन प्रारम्भ किया कि विषय-अनुशासनों में वे कौन से परिवर्तन आवश्यक हैं जिनसे उन्हें अप्रासंगिक होने से बचाया जा सके। भविष्य के लिए उन्हें कैसे उपयोगी बनाया जाये, यह उनकी प्रमुख चिंता थी। इस महान वैचारिक मंथन ने अंतर-अनुशासनिक उपागम एवं दृष्टिकोण की नवीन परंपरा को जन्म दिया।  


अब लगभग सभी विषय-अनुशासनों ने एक-दूसरे के उपयोगी तत्वों व तकनीकों को ग्रहण करना प्रारम्भ किया। इसी क्रम में विश्व के विभिन्न भागों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को एक विषय के रूप में अध्ययन करना प्रारम्भ हुआ। वेल्स विश्वविद्यालय ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को समर्पित एक विभाग की स्थापना की। अमेरिका व ब्रिटेन मे विभिन्न विश्वविद्यालयों में विभाग खोले गए। पर अब भी विषय-अनुशासन के रूप में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की स्वतंत्र पहचान न थी। इसके विषयवस्तु का बड़ा भाग दरअसल पुराने विषय-अनुशासनों जैसे- कानून, दर्शन, अर्थशास्त्र, राजनीति, कूटनीति आदि विषयों से ही आयातित था।


विश्वयुद्धों से जो क्षति हुई थी उससे स्पष्ट था कि-पुरानी मान्यतायें, सिद्धान्त, धारणायें; जो शक्ति-राजनीति को परिभाषित करती आ रही थीं, वे निश्चित ही अप्रासंगिक हो चुकी थीं और उसी के फलस्वरूप विश्वयुद्ध की विभीषिका झेलनी पड़ी। सर अल्फ्रेड जीमर्न व फिलिप नोएल बेकर ने इस दिशा में प्रमुखतया से अपने विचार प्रतिपादित किए। मूख्यतः उन्होने बल दिया कि- शांति की स्थापना तभी संभव है, जब पुराने ‘शक्ति-संतुलनों’ को ‘सामूहिक सुरक्षा’ की नवीन व्यवस्था से पुनरास्थापित कर दिया जाये। उनका अभिमत था कि-आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति व तर्क-विश्लेषण की तकनीक से इसकी सैद्धांतिक आधारशिला रखी जा सकती है। यही धारणा आगे चलकर उदारवादी अंतर-राष्ट्रवादियों के द्वारा और अधिक प्रचारित की गई। इनका मानना था कि अंतर्राष्ट्रीय-गतिरोध को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही विचार-विनिमय एवं तार्किकता से समाप्त कर अंतर्राष्ट्रीय शांति की स्थापना संभव है। आलोचको; जिनमे मार्क्सवादी प्रमुख थे, ने यूटोपियंस व आदर्शवादी कहकर इनकी आलोचना की।


निश्चित ही, दो-दो महायुद्धों ने उन लोगों का आत्मविश्वास डिगा दिया था जो पारंपरिक राजनय में अटूट विश्वास रखते थे और जो शक्ति के प्रयोग को आवश्यकतानुसार जायज मानते थे, ताकि इससे शक्ति-संतुलन अप्रभावित रहे। किन्तु अब विकसित राष्ट्रों में यह शिद्दत से महसूस किया गया कि- इस विषय का एक स्वतंत्र विषय-अनुशासन के रूप अध्ययन आवश्यक है। अंतर-गतिरोधों को समझना, उनकी सम्मत व्याख्या करना एवं उनसे निपटने की कला का ज्ञान आवश्यक समझा जाने लगा।


नवीन विषय-अनुशासन की आधारशिला निम्नांकित मुख्य प्रश्नों पर रखी जाये, इस पर विद्वान एकमत दिखे:
  1. विश्वयुद्ध के प्रमुख कारणों का मूल क्या था, क्या प्राचीन अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक क्रम/व्यवस्था इसके लिए उत्तरदायी थी, क्योंकि वह अप्रासंगिक हो चुकी थी...?
  2. विश्वयुद्धों से प्रमुखतया क्या सीखा जा सकता है, जो भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति को रोक सके?
  3. नवीन विश्वक्रम/व्यवस्था का आधार क्या हो? नवीन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं किस प्रकार राष्ट्रों को उनके निर्धारित सीमाओं में मर्यादित कर सकेंगी?
इन प्रश्नों के उत्तर के लिए विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति संबंधी विश्लेषण हुए। पहला व्यवस्थित जवाब यह था कि- अंशतः विश्वयुद्ध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त ‘अराजकता’ के फलस्वरूप उपजा था और अंशतः यह तत्कालीन राजनयिकों एवं राजनीतिज्ञों की लापरवाही, त्रुटिपूर्ण विश्लेषण व निर्णयन एवं नासमझी की दें थी। आदर्शवादियों का मानना था कि निश्चित ही एक शांतिपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की स्थापना की जा सकती है, यदि विदेशनीति के नीति-निर्धारकों को ‘आमराय’ के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके। यह अपेक्षा, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के लोकतांत्रीकरण की मांग स्वाभाविक रूप से करती है।


इन विश्लेषणों की आलोचना भी सामने आई। द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक पहले ई॰ एच॰ कार ने इन्हें ‘आदर्शवादी’ कहा। अमेरिका में मोर्गेंथाउ ने इनकी आलोचना की और ‘यथार्थ’ की कठोर राजनीति पर बल दिया।  ई॰ एच॰ कार ने तो आदर्शवादियों एवं यथार्थवादियों दोनों ही की आलोचना की। आदर्शवाद को इन्होने ‘स्वप्नदर्शी’ व ‘सीधा-सादा’ बतलाया तथा यथार्थवादियो की ‘जरूरत से ज्यादा आश्वस्ति’ की भी आलोचना की।


अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के प्रारम्भिक वर्षों इसका लक्ष्य विश्व-राजनीति को बदलना व महायुद्धों से बचाना था। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में यथार्थवादी विश्लेषण की प्रमुखता दोनों विश्वयुद्धों व शीत युद्ध के वर्षों तक सतत बनी रही। इसके पश्चात विश्लेषण में नई धाराएँ आयीं और उन्होने अपने अपने तरीकों से योगदान दिया। इन विभिन्न धाराओं ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु कालांतर में विभिन्न प्रकार के उपागमों को जन्म दिया।
    1. सारांश
प्रस्तुत इकाई के अंतर्गत आप लोगों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ, प्रकृति एवं एक विषय-अनुशासन के रूप में इसके विकास का अध्ययन किया। प्रस्तावना से आपने जाना कि यह विषय किस प्रकार प्रत्येक राष्ट्र-राज्य से संबन्धित है और सम्पूर्ण अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों से एवं को प्रभावित करता है तथा प्रभावित होता है। अर्थ शीर्षक से यह स्पष्टतया आपने जाना, कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विषय से हम मूलतः हम क्या समझते हैं। विभिन्न विद्वानो द्वारा दी गई अलग अलग परिभाषाएँ विषय की वास्तविक सीमाओं एवं उनका विस्तार को समझने में हमारी मदद करती हैं। परिभाषाओं से हमें विषय का मानद परिचय एवं उसका स्वीकृत स्वरूप समझने में सहायता मिलती है। प्रकृति शीर्षक के अंतर्गत हमने इस विषय की मुख्य उद्देश्य की चर्चा की। हमने जाना कि इस विषय-विशेष से विद्वानो की प्रमुख अपेक्षा क्या है तथा इस विषय-विशेष के अध्ययन के पश्चात हमारे लिए यह किसप्रकार उपयोगी हो सकता है। विषय-विकास के विभिन्न पड़ावो का अध्ययन हमने किया। हमने देखा कि किस प्रकार एक स्वतंत्र विषय के रूप में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का विकास हुआ। इस विषय-विशेष से प्रारम्भ में विद्वानो की जो अपेक्षा थी और जो अब अपेक्षा है कैसे वे आपस में संबन्धित हैं, इसके महत्व की चर्चा हमने भली भांति देखी।
    1. शब्दावली
विषय-अनुशासन अध्ययन का एक स्वतंत्र विषय
राष्ट्र-राज्य एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य, जिसकी राष्ट्रीय अस्मिता अक्षुण्ण हो
अन्यान्य  विभिन्न प्रकार के
अनुवृद्धि गुणात्मक वृद्धि
अनुप्रयोग जीवनोपयोगी विभिन्न प्रयोग
राजनय कूटनीति, विदेश नीति से संबन्धित तत्व


    1. निबंधात्मक प्रश्न
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी परिभाषा करिए।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति विश्लेषित कीजिये एवं इसकी महत्ता स्थापित कीजिये।
एक विषय अनुशासन के रूप में रेखांकित कीजिये कि किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अन्य पारंपरिक विषय-अनुशासनों से स्पष्टतया स्वतंत्र विषय-अनुशासन है।  
    1. संदर्भ ग्रंथ
बेलिस, जॉन, स्टीव स्मिथ, एवं पैट्रीसिया ओवेंस, द ग्लोबलाइज़ेशन ऑफ वर्ल्ड पॉलिटिक्स: एन इंट्रोडक्सन टु इंटरनेशनल रिलेशंस (2011)
मिङ्ग्स्त, करें ए, एवं इवान एम अरेगुइन टोफ्ट,  एसेंशियल्स ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस (2010)
कर्ल्सनेस, वाल्टर आदि, (सं॰), हैंडबुक ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन्स, सेज पब्लिकेशन।
रेयूस स्मिट क्रिश्चियन एवं डंकन स्नाइडल (सं॰), द ऑक्सफोर्ड हैंड बुक ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन्स (2010)  


    1. सहायक सामग्री
हेडली बुल, अनर्किकल सोसाइटी (न्यूयॉर्क: कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस, 1977)
केनेथ वाल्ज़, मैन, द स्टेट एंड वार
केनेथ वाल्ज़, थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स (1979)
माइकल वाल्जर, जस्ट एंड अनजस्ट वार्स (1977)
अलेक्जेंडर वेंट, सोशल थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स (1999)


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