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Monday, December 25, 2017

विश्व पटल पर उभरता भारत

डॉ. श्रीश पाठक*



भारत के मित्र समझे जाने वाले खूबसूरत देश मालदीव से अभी चीन ने मुक्त व्यापार संधि संपन्न की, पर फिर भी कहना होगा कि वैश्विक पटल पर और खासकर एशियाई क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। दरअसल, चीन के बढ़ते प्रभावों के उत्तर में अमेरिका के पास भारत के अलावा कोई दूसरा ऐसा विकल्प नहीं है, जिसकी भू-राजनीतिक स्थिति कमाल की हो, बाजार के लिए अवसर प्रचुर हों और वैश्विक लोकतान्त्रिक साख भी विश्वसनीय हो।

अपने कार्यकाल के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यनीति में ट्रम्प सरकार ने जहाँ पाकिस्तान के लिए सख्त रवैया अपनाया वहीं एक ‘विश्वशक्ति’ के तौर पर भारत का ज़िक्र आठ बार किया और भारत के साथ सामरिक-आर्थिक हितों के और बेहतर विकास की वकालत की । हाल ही में हुए आठवें वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन के आयोजन के लिए भी अमेरिका के स्टेट विभाग ने भारत को चुना, जो कि दक्षिण एशिया का पहला ऐसा आयोजन था। ट्रम्प की पुत्री इवांका, ट्रम्प परिवार की एक प्रभावशाली व्यक्तित्व मानी जाती हैं और अपने यहूदी पति जेरेड कुशनर की तरह ही जिनकी मंत्रणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए उनके चुनाव अभियानों के समय से ही मायने रखती है। इस वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन में इवांका की फैशन कूटनीति की भी चर्चा हुई।

वाशिंगटन की अपनी प्रेसवार्ता में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी हाल ही में हुई दक्षिण-पूर्व एशियाई यात्रा को 'जबर्दस्त सफल' करार दिया था । उन्होंने पत्रकारों से बिना कोई सवाल लिए एक लम्बा उद्बोधन दिया और कहा कि एक वैश्विक नेता के तौर पर अपनी भूमिका में अमेरिका वापस आ गया है और उनके प्रयासों ने  उन्मादी उत्तर कोरिया के खिलाफ विश्व को एकजुट कर दिया है। उत्तर कोरिया ने अभी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण किया जिसमें उसका दावा है कि अब अमेरिका का पूरा भू-भाग उनके आक्रमण-क्षेत्र में आ गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने एक ट्वीट में इस पर चिंता जताते हुए अपनी सरकार और सेना के लिए और अधिक वित्त की आवश्यकता पर बल दिया। इसी दिन के एक ट्वीट में डोनाल्ड ट्रम्प ने इवांका की भारत यात्रा के उनकी सक्रियता की प्रशंसा भी की।   ट्रम्प की एशिया-प्रशांत यात्रा एक ऐसे क्षेत्र में हुई जहाँ तेजी से चीन की दखलंदाज़ी बढ़ी है और एक ऐसे समय में हुई जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के उन्नीसवें अधिवेशन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने तीन घंटे तेईस मिनट के लम्बे भाषण में चीन की वैश्विक और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पुनः दोहराया है।

माना जा रहा है कि इवांका की मंत्रणा से ही ट्रम्प की इस यात्रा में चीन का समावेशन अमेरिका के आर्थिक हितों के सुचारू संचलन के लिए किया गया था।  समझा जा सकता है कि इस यात्रा के अन्य पड़ावों के रूप में में बाकी देशों जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और वियतनाम का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि वे सभी चीन के संतुलन में अलग-अलग दृष्टिकोण से अमेरिका के मजबूत स्तम्भ हैं। जापान जहाँ सामरिक और आर्थिक रूप से अमेरिकी कूटनीति में प्रतिभाग कर रहा, वहीं दक्षिण कोरिया दरअसल उत्तर कोरिया के संतुलन में है। वियतनाम और फिलीपींस की भू-राजनैतिक स्थिति दक्षिण-चीन सागर के लिहाज से अहम है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में एपेक और आसियान सहयोग के मद्देनज़र भी दोनों देश अमेरिकी हितों को आकर्षित करते हैं। चीन पर इस अमेरिकी घेराव को और धार मिल जाती है जब ट्रम्प द्वारा इस क्षेत्र को ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र कहा जाता है।  चर्चित जापान-भारत-अमेरिका-आस्ट्रेलिया चतुष्क (क्वाड) के साथ ही यहाँ बहरहाल पाकिस्तान-चीन-रूस-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।  

गौरतलब है कि अपने आप को पहला पैसिफिक प्रेसिडेंट कहने वाले अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति ओबामा ने अपनी महत्वाकांक्षी पिवट पॉलिसी का प्रतिपादन किया था जिसमें अमेरिकी संबंधों का झुकाव मध्य-पूर्व एशिया से हटाकर एशिया-पैसिफिक की तरफ करने की बात की गयी थी। अमेरिका की कोशिश थी कि देश की विदेश नीति में मध्य-पूर्व एशिया की जटिल राजनीति की भूमिका कम करके एशिया-पैसिफिक के व्यापारिक-वाणिज्यिक एवं सामरिक महत्त्व को प्रमुखता दी जाए। किन्तु ओबामा प्रशासन में इस ओर ठोस कदम नहीं उठाये जा सके। न ही अमेरिका की सक्रियता वहाँ कुछ कम की जा सकी और न ही एशिया-पैसिफिक में अमेरिकी इरादों को अमली जामा पहनाया जा सका। इससे अलग ट्रम्प मध्य-पूर्व एशिया में अमेरिकी सक्रियता कम किये जाने के पक्ष में तो नहीं हैं किन्तु एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में भी अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की फिराक में हैं। इसे कुछ विशेषज्ञ ट्रम्प की 'पोस्ट पिवट पॉलिसी' कह रहे हैं जिसमें ट्रम्प का दबाव इसपर ज्यादा है कि क्षेत्रीय संतुलन की जिम्मेदारी में सभी सहयोगी देशों को साझीदारी करनी होगी।

ट्रम्प व्यवसायी हैं और अमेरिका का चुनाव अमेरिकी हितों की प्राथमिकताओं को वरीयता देने के वादे से जीत कर आये हैं। क्षेत्र में चीन के साथ उनके देश की सर्वाधिक व्यापारिक हित जुड़े हैं, जिसे उन्होंने इस बार की यात्रा में भी महत्ता दी है ट्रम्प ने 'आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है' का नारा देकर अपना मंतव्य भी स्पष्ट कर दिया।  इसके साथ ही हिंद महासागर से प्रशांत महासागर के व्यापारिक समुद्री मार्गों की मुक्तता एवं सुरक्षा के लिए वे भारत की महत्ता को रेखांकित करने से नहीं चुके हैं। उन्हें अमेरिका का दबदबा कम तो नहीं होने देना है किन्तु ट्रम्प चाहते हैं कि जिन देशों को अमेरिकी वैश्विक संलग्नता से फायदा है, वे इसे मिलकर वहन करें। आर्थिक दृष्टिकोण से हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर के बीच की समुद्री मार्ग को ट्रम्प सुगम व व्यवधानरहित बनाना चाहते हैं।  चतुष्क के तीनों देशों ने दरअसल अमेरिकी इशारों के अनुरूप जवाब देना शुरू भी कर दिया है। डोकलाम विवाद में भारत ने जताया कि अब वह कूटनीतिक चुप्पी से कहीं अधिक की भूमिका में आने को तत्पर है और वहीं एक्ट ईस्ट पॉलिसी का इज़हार करते हुए दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में भी भारत ने अपनी बढ़ती सक्रियता के सुबूत दिए हैं। ग़ौरतलब है कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में म्यांमार एक मजबूत स्तम्भ है और हालिया रोहिंग्या विवाद में भारत ने म्यांमार के खिलाफ निष्क्रिय रहना ही उचित समझा। इस प्रकार भारत की एक्ट एशिया पॉलिसी ट्रम्प की पोस्ट पॉलिसी के साथ सुसंगति में है। जापान ने जहाँ द्वितीय युद्ध के बाद की अपनी पैसिफिस्ट पॉलिसी (शांतिप्रिय नीति) में बदलाव के संकेत दिए हैं वहीं आस्ट्रेलिया ने भी अपनी अमेरिकी संलग्नता दुहराई है। पोस्ट पिवट पॉलसी की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें अमेरिका की ओबामाकालीन 'बहुपक्षीय (मल्टीलैटरलिज़्म) 'संबंधों के स्थान पर 'द्विपक्षीय (बाईलैटरलिज़्म )'संबंधों को वरीयता दी जा रही है। ट्रम्प प्रत्येक सहयोगी देशों से एक कुशल व्यापारी की तरह अलग-अलग सुनिश्चित प्रतिबद्धता चाहते हैं।

एशिया की बदलती परिस्थितियों में भारत के लिए जैसी अनुकूल परिस्थिति निर्मित हुई है; इसका लाभ लेना एक अवसर तो है पर यह मौजूदा सरकार के लिए एक चुनौती भी है। भारत इसका लाभ कुछ यों ही सुनिश्चित कर सकता है, जब वह विश्व में और क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियों के राष्ट्रहित को समझते हुए स्वयं के राष्ट्रहित की गुंजायश खंगाल सके।  यह इतना सरल नहीं हैं, क्योंकि वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में कोई एक स्वयंभू केंद्र नहीं है, यहाँ राष्ट्र-राज्यों को स्वयं ही अपने हित सुरक्षित रखने होते हैं ।ऐसे में तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही सन्दर्भ में अधिकाधिक राष्ट्र-राज्यों से संबंधों की ऐसी बुनावट करनी होती है, जिससे अधिकतम राष्ट्रहित सधे ।अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि मौजूदा सरकार इन परिस्थितियों का कितना लाभ देश को पहुंचाने में सफल हो सकी।  


*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं.



Friday, December 22, 2017

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपने बर्फ बार बार रंगें हैं...!

एशिया के बाद दो भाग में देखें विश्व राजनीति में यूरोप !



चौबीस घंटे की एक क्लॉक से अगर अपनी पृथ्वी की अभी तक की जिंदगानी को दिखाने की कोशिश हो तो हम इंसानों  की औकात महज इतनी है कि 00:00 से शुरू हुई घड़ी में हम तकरीबन 11:58 पर अवतरित हुए। पर लगता यों है कि हिस्ट्री हमीं से है, इस जहान की । उसमें भी पिछले दो-तीन सौ साल से यूरोप का चैप्टर चल रहा और लगता यही है कि जैसे दुनिया का सारा ‘फर्स्ट’ यहीं से बिलोंग करता है। सत्ता जिसकी होती है, उसी का रहन-सहन होता है, उसी का भौकाल होता है, उसी की भाषा होती है और उसी की परिभाषा होती है। सुबूत ये है हुजूर कि, इवेन इस आर्टिकल में भी अगर अंगरेजी के वर्ड्स निकाल प्योर हिंदी के डाल दें, तो इसे बोझिल लगना चाहिए । इतिहास का पिता हेरोडोटस को मानना होता है जो यूरोप के एक देश ग्रीस का निवासी था। हम पढ़ते हैं कि अमेरिका की खोज कन्फ्यूज्ड क्रिस्टोफर कोलम्बस ने की जो इंडिया ढूंढते-ढूंढते कैरिबियाई द्वीपों से जा टकराया। अमेरिका पहले भी वहीं था, पर यूरोप के देश इटली के नाविक को पहली बार मिला तो अमेरिका की खोज हुई। यों ही आखिरकार भारत की भी खोज हुई, क्यूंकि पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा को ये देश पहली बार मिला। इंडिया का भौकाल समझिये, कि 20 मई 1498 को केरल के कप्पडु क्षेत्र में उतरने के करीब 8000 किमी दूर ही अफ्रीका के जिस द्वीप से कोलम्बस इंडिया को पहली बार देख पाया, खुशी में उस द्वीप का नाम ही केप ऑफ़ गुड होप रख दिया। सिक्का यूरोप का होगा तो टकसाल भी यूरोपियन होगी और करेंसी (चलन ) में वही होगा जो यूरोप का होगा।



कनाडा से महज दो प्रतिशत बड़ा है, पर महाद्वीप तगड़ा है यूरोप। दुनिया का दूसरा सबसे छोटा महाद्वीप यूरोप है पर इसमें दुनिया का सबसे बड़ा देश रूस है और दुनिया का सबसे छोटा देश वेटिकन सिटी भी है। आस्ट्रेलिया से थोड़े ही बड़े इस महाद्वीप में पचास देश हैं, बोली जाने वाली ढाई सौ से अधिक भाषाएँ हैं और एक सौ साठ से अधिक कल्चरल आइडेंटिटिज हैं। दुनिया में सबसे धनी है यूरोप और आज के ख्वाबों भरी ज़िंदगी की हकीकत है यूरोप। दुनिया के सर्वाधिक विकसित देश यहीं हैं और मान लीजिये कि यहाँ के गरीबों का कूड़ा अगर दुनिया के कुछ देशों में पहुंचा दिया जाय तो वे अपने देश के अमीरों में होंगे।दुनिया का हर भाग्यशाली बारहवां आदमी यूरोप में रहता है। क्रिस्टोफर मार्लोवी के शब्दों में - कि जैसे, इनफाइनाइट दौलत एक रूम में बंद हो। पेरिस यहीं, लन्दन यहीं, बर्लिन यहीं, रोम यहीं, यश चोपड़ा के शिफॉन साड़ियों वाला स्विट्जरलैंड यहीं, हॉलीवुड यहीं, डिज्नीलैंड यहीं और अपने अनुष्का वाले कैप्टन विराट ने भी यूरोप का वह देश चुना अपने शादी और हनीमून के लिए जहाँ से यूरोप के दूसरे सबसे पुराने एम्पायर, रोमन एम्पायर की शुरुआत हुई, यानी इटली।धरती के महज दो प्रतिशत धरातल वाले यूरोप में दुनिया में देशों के न्याय सुनाने वाला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, हेग भी यही हैं।  

दुनिया को साइंस का मॉडर्न लेसन देने वाले यूरोप के नाम की कहानी तक वेरी कन्फ्यूजिंग है। इसे ग्रीक मिथोलॉजी में यूरोपा नाम की राजकुमारी और ज्यूस की एक रानी के नाम से लिया गया। ग्रीक शब्द से चलें तो इसका मतलब वाइड, ब्रॉड माने विस्तृत होगा, पर सीरियन वार्ड एरेब से इसकी उत्पत्ति मानें तो इसका मतलब सनसेट होगा। शुरू में जब यह शब्द किसी प्लेस के लिए इस्तेमाल में आया तो इस यूरोप से मतलब उत्तरी अफ्रीका से था फिर धीरे धीरे यूरोप का आधुनिक अर्थ बना। अगर दुनिया भगवान ने बनाई तो यकीन करना मुश्किल है कि कभी यूरोप को इतना बुलंद करने की सोची हो उसने । क्योंकि सोचिये न, चारो तरफ से दुनिया के बाकी हिस्सों से कटा हुआ है यूरोप।  बर्फीला आर्कटिक इसे सर्द बनाये रखता है। विशाल अटलांटिक इसे पश्चिम के प्राकृतिक स्रोतों भरपूर अमेरिका महाद्वीप से वंचित रखता है तो मेडीटीरियन सी से यह मिनरल्स वाले अफ्रीका से कट जाता है। यूराल पहाड़ इसे पूरब के एशिया से अलग करके रखता है। जब यह ही न पता हो कि पृथ्वी गोल है या चपटी, और सूरज घूमता है कि पृथ्वी चक्क्र काटती है सूरज के, तो फिर ये सोचना कि एक दिन यूरोप के देश ऐसे शिप बनाएंगे कि वे पृथ्वी के एक-तिहाई लैंड से निकलकर दो-तिहाई वाटर को तैरते हुए  पृथ्वी के चक्कर पे चक्कर लगाएंगे; यह किसी किसी ऊँघती दुपहरी में देखे जाने वाले अटपटे बेतरतीब सपने से कहीं अधिक न था। पर, जनाब ! ये हुआ और इसलिए ही आज यूरोप ड्रीमलैंड है। सब बस अच्छा ही है, यूरोप में, ऐसा नहीं है, पर बाकी दुनिया के महाद्वीपों के मुकाबले यकीनन यूरोप की स्थिति यकीनन बेहतर है।

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपने बर्फ बार बार रंगें हैं। और एक ज़माने में से ही यूरोप में रहने वाली जातियों को बारबेरिक माना जाता रहा और आज भी यूरोप ने वह बारबेरिज्म खोया नहीं है बस मॉडर्न सिविलाईजेशन के अधखुले कपडे से इसे ढँक रखा है। उस कहानी को आइये फिर दुहराते हैं जो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इकोनॉमिक-कल्चरल सिक्का अभी भी यूरोप का ही करेंसी में है। जीसस के करीब 1200 साल पहले फेमस ट्रॉय-स्पार्टा वार हुआ। जीसस के जनम के साढ़े आठ सौ साल पहले होमर हुआ जिसने आधुनिक दुनिया का पहला महाकाव्य इलियड और ओडिसी लिखा। फिर 776 बीसीई में ओलम्पिक खेल शुरू हुए और समझिये कि यूरोप की काशी रोम बसी ईसा से तकरीबन 750 साल पहले। ग्रीक एम्पायर पर पर्सिया ने आक्रमण किया ईसा के धरती पर आने के भी ठीक 500 साल पहले और यह लड़ाई अगले दो सौ और साल चलने वाली थी। बहरहाल, यूरोप महाद्वीप ने महान ग्रीक एम्पायर देखा और फिर महान रोमन एम्पायर देखा।

जीसस के इस दुनिया से विदा होने के बाद उनके कहे शांति संदेशों पर चर्च कुंडली मारकर बैठ गया और पॉलिटिक्स की कमान रिलिजन के सम्हालते ही यूरोप इतिहास के अपने मध्ययुग में आ पहुंचा। आज की पॉलिटिक्स अभी जितना क्रूर होने के लिए सोचेगी, रीलिजन ने वे हदें शताब्दियों पहले से ही तोड़नी शुरू कर दी थीं। ईसा मसीह की मृत्यु के 632 साल बाद एक नए रीलिजन इस्लाम के मसीहा मुहम्मद साहब की मृत्यु हुई और इस्लाम आज यूरोप का ही दूसरा प्रमुख रीलिजन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का दूसरा बड़ा रिलिजन है। मध्य युग के यूरोप की कमान चर्च के पास थी। यूरोप से निकलकर चर्च ने रिलिजन के नाम पर क्रूसेड करने शुरू किये, जिसमें बेरहमी से काफिरों को मिटाया गया। तब तक मध्य एशिया से सिल्क रुट बनाता हुआ मंगोल शासक चंगिज खान बारबेरिज्म की दूसरा स्टैंडर्ड सेट करता हुआ आ पहुंचा और उसके बाद के शासकों ने सर्द यूरोप को और भी सर्द अपने हाथों से छु लिया। मध्य युग का यूरोप अंधयुग माने ब्लाइंड ऐज कहलाता है। ब्लाइंड इसलिए क्यूंकि चर्च का आदमी टिकटें बेचता स्वर्ग की और लोग टूट पड़ते खरीदने को। आज भी लोग चाँद और मंगल पर जमीन खरीद ही रहे इंटरनेट पर। उस ब्लाइंड ऐज में सारी कसौटियां चर्च सेट करता और ‘राइट’ वही माना जाता जो पोप को ‘राइट’ लगता। ठीक ऐसे ही जैसे आज मुस्लिम फ़ण्डामेंटलिस्ट को किसी सिरफिरे मौलवी की बात ‘राइट’ लगती है, किसी क्रिस्चियन फंडामेंटलिस्ट को दहशती प्रीस्ट की बात ‘राइट’ लगती है और किसी भटके हिन्दू नौजवान को किसी ढोंगी गुरु की ही बात ‘राइट’ लगती है। यों तो इस ब्लाइंड ऐज के बाद फिर रेनेसॉ और एनलाइटेन्मेंट एरा भी आया 17वीं शती तक, जिसमें एक बार फिर अंधश्रद्धा के स्थान पर रीजन और लॉजिक को महत्त्व दिया गया पर रीलीजन अभी भी इतना प्रभावशाली था कि उसने समूचे यूरोप को 1618 से 1648 तक के तीस साल के युद्धों में झोंक दिया।




भारत ने क्यों किया वोट खिलाफ अमेरिका के ?



आप इतना समझें कि वर्ल्ड पॉलिटिक्स में अमूमन नैतिकता महज इतनी होती कि वह किया जाय जिससे राष्ट्रहित को फायदा पहुंचे। जिसे हम आप डिप्लोमेसी कहते हैं, कूटनीति कहते हैं, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में इसके मायने बस इतना है कि कैसे अपना राष्ट्रहित बचाते हुए जहाँ कहीं मौका मिले वहाँ इसे बढ़ाया जाय। वर्ल्ड पॉलिटिक्स की एक खास बात और समझ लें तो भारत की हालिया अमेरिका के खिलाफ की गयी वोटिंग समझ आ जाएगी।  वर्ल्ड पॉलिटिक्स anarchic है, माने यहाँ कोई एक नियामक शक्ति नहीं है जैसे कि देशों के भीतर सरकारें होती हैं। इसलिए अपने हितों की सुरक्षा स्वयं करनी होती है। हितों की सुरक्षा सभी अन्य देशों से किसी न किसी रीति से जुड़ने में अधिकतम होती है। दुनिया के सभी देश घोषित तौर पर कुछ भी प्रवचन दें, किन्तु सभी देशों से किसी न किसी रीति से जुड़ने की सम्भावना को टटोलते रहते हैं। इसीलिये कहते हैं कि, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में कोई स्थाई शत्रु नहीं होता और न होता है कोई स्थाई मित्र ही। 

लोकतंत्र में चुनाव जीतना बेहद कठिन होता है। बहुमत के मत संजोने होते हैं। अमेरिकी चुनाव में यहूदी  मत और हथियारों की लॉबी में उनका निर्णायक प्रभाव महत्वपूर्ण है। येरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने का मतलब है, इजरायल की स्थापना को अंतिम रूप से मुहर लगा देना और फलस्तीन को एक दूसरे पक्ष के रूप में लगभग ख़ारिज कर देना। चुनाव में ट्रम्प की जीत हुई और अमेरिकी प्रेसिडेन्ट अब अमूमन दो कार्यकाल लेते हैं, तो अमेरिका को यह स्टंट तो करना था। स्टंट इसलिए क्यूंकि यह एक ऐसा मुद्दा जिसपर बेहद बुरी तरह से बंटा मध्य एशिया एकजुट हो जाता है। विश्व व्यवस्था के लोकतान्त्रिक मॉडल में द्विपक्षीय मुद्दे द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाए जाने चाहिए। इस रीति से भी अमेरिका की निर्णायक उपस्थिति तभी संभव है जब दोनों पक्ष चाहें। तो अमेरिकी प्रसाशन को पहले दिन से यह पता है कि एकतरफा उनकी घोषणा से जमीन पर कुछ बदलने वाला नहीं है। चूँकि वर्ल्ड सिस्टम anarchic है तो UNO उतना ही प्रभावी है जितना सदस्य राष्ट्र इसे होने देते हैं।  और फिर अमेरिका एक वीटो पावर वाला देश है। तो इससे अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ता फ़िलहाल कि UNO में क्या हो रहा और यकीन मानिये सदस्य राष्ट्रों को भी चूँकि पता है कि UNO से कुछ निर्णायक नहीं होने वाला कम से कम अभी।  

दुनिया के सभी देश यह जरूर चाहते हैं कि उनकी विदेश नीति स्वतंत्र दिखे और एक सततता (Continuity ) में दिखे। इजरायल-फलस्तीन मुद्दा चूँकि अभी सुलझा नहीं है, फिर येरुशलम को राजधानी स्वीकार कर लेना एकतरफा निर्णय ले लेना है जो कि किसी भी रीति से उचित नहीं है। ऐसे में यदि अमेरिका के खिलाफ वोटिंग करके जमीन पर पारस्परिक संबंधों पर कोई फर्क न पड़ता हो और अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता भी प्रदर्शित होती है तो एक समझदार स्मार्ट राष्ट्र अवश्य ही अमेरिका के खिलाफ वोटिंग करेगा। और देखिये अमेरिका के किसी भी अधिकारी ने किसी भी स्तर पर कहीं भी इस मुद्दे पर भारत की आलोचना नहीं की है। 


Tuesday, December 19, 2017

Looking Nepal through Chinese Prism



Dawn in New Nepal
Dr. Shreesh Pathak



It's almost clear that the first elected democratic government is going to be formed in the leadership of left coalition parties in Nepal. A country which waited so long for its first full-fledged democratic republic federal constitution on the name of proper representation of three major identities i.e. Himal, Pahad and Terai; its first elected government would be a stable governemnt which would last for next five years and enjoys favorable coordination from its state governments because many of them would be led by again the left coalition parties. It can be better hoped that Nepal would follow its natural course of development which is badly affected for almost last thirty years and the country now deserves to have a peaceful and stable governance experience. As Nepal has adopted a federal structure, this certainly would help to address the several identity concerns of the people. A strong government at the centre would be decisive to take essential steps which eventually would strengthen the integrity of the country.


New government in Nepal would have many challenges waiting to address sooner or later. Elections are contested mainly on the issue of development and undoubtedly, this should be the foremost agenda of the government. Development requires investments, resources and prowesses. In order to have all these things Nepal needs to maintain relations with the actors of world system in general and with India and China in particular. As a landlocked country Nepal is bordered with India from three sides and with China from one side. Nepal also does not have any direct access with sea routes for trade exchanges. India whereas enjoys a traditional relationship with the country, China has tried  more ambitiously and cautiously to build a sturdy connectedness through its vast investment programme under its OBOR policy. Situated in the lap of Himalayas, Nepal would be promising source of hydro-power and it can develop itself as a central point for trade interactions connecting India, China, Bhutan and Bangladesh.


As a most important neighbour, India is keenly watching the progresses of Nepal as democratic country. In the long run of democracy, nobody can refuse the role of India in Nepal and the kind of rapport the both country enjoy and it cannot be compared with anybody. But, India should not come in any complacency and keeping in view the Chinese policy of pearls of strings and BRI, India needs to be more engaged with Nepal than ever before. India must understand the need of a new nation which aspires to adopt ambitious developmental path and has to be ready with generous offers at times which Nepal could not refuse keeping China at its back. India needs to correct its traditional diplomatic approach towards Nepal and does not need to react in haste over any China-Nepal cooperation. Nepal with a new constitution and a new elected government needs India and China both as per economics and geography suggest. Obviously as a sovereign state, Nepal would try to utilise its geopolitical location in order to beat the constraints of its geography. India cannot approach Nepal any longer as mere a buffer state but should see as a credible neighbour which is willing to go forward hand in hand. Definitely; a left government at the centre makes India a little bit uncomfortable dealing Nepal especially when already China is investing huge in the country, but India should go forward on its traditional legacy of interconnections, its outstanding democratic credibility and the mutual reverence arising from people to people connect.

Monday, December 18, 2017

पॉलिटिक्स पढ़ने पढ़ाने का फायदा क्या

Hobbes को यही लगा था तो राजनीति को उसने फिजिक्स के तर्ज पर ढालकर विषय का पुनरोद्धार कर पॉलिटिक्स का गैलिलिओ बनने की ख्वाहिश पाली थी . एकबारगी डेविड ईस्टन को भी यही लगा था. अंततः यह समझा गया कि मानविकी विषय में तथ्य (fact) और मूल्य (Values) का सुन्दर समावेशन (inclusion) हो . Exactness जहाँ विज्ञान का गुणधर्म है वहीँ dynamism मानविकी का. प्रचलित विज्ञान निर्जीव (inanimate) का अध्ययन अधिक करते हैं, जहाँ कहीं सजीव (animate ) का अध्ययन करते भी हैं तो उनके स्थिर सार्वत्रिक गुणधर्मों (universal properties) तक सीमित होते हैं . मानविकी जीवित मन का अध्ययन करती है . इसमें exactness ना होना इसकी खूबसूरती और खासियत है . यह अधिक सूक्ष्म और व्यापक (universal) है . इसमें केवल तथ्यों से काम नहीं चलता .
ध्यान दें, इकोनोमिक्स और ज्योग्रोफ़ी क्रमशः objectification की ओर बढ़ रहे हैं, एक तरफ पृथ्वी ऑब्जेक्ट है और दुसरी तरफ अर्थ (Money). ऐसा नहीं है कि विज्ञान बिना मूल्यों के निर्वहन कर सकता है अथवा उसमें केवल exactness ही है. एक समय उसमें यह कल्पना की गयी कि नाभिक में इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रोन ठीक वैसे होंगे जैसे तरबूज में बीज. भूगोल को ध्यान से देखिये, उसकी शाखाएं देखिये, अधिकांश इतिहास, राजनीति और समाज से उधार ली हुई हैं और अर्थशास्त्र का जन्म ही राजनीति से है, तब उसे पोलिटिकल इकॉनमी कहा जाता था.
जाने कितने उपागमों (disciplines )के पिता अरस्तु ने यों ही नहीं राजनीति को मास्टर साइंस कहा है. प्लेटो की एकेडमी में गणित और विज्ञान की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जी दर्शन और राजनीति की शिक्षा दी जाती थी . आधुनिक अर्थव्यवस्था को ध्यान से देखें, उन्मुक्त बाजार जब जब वैश्विक मंदी लाता है, राजनीति का राज्य उसे अपने बाहों में लेकर बचाता है .
हाँ, रोजगारपरक (Employment Oriented ) होना एक पृथक बात है . यहाँ राजनीतिविज्ञों की ये गलती है कि वे सिलेबस पर काम नहीं कर रहे और शिक्षाविदों और प्रशासन की यह गलती है कि वे विषय का महत्त्व नहीं समझ रहे . पर क्या दोष दें किसी को . विभाजन इतने गहरे हैं कि अभी भी विज्ञान को महज एक विषय माना जाता है जबकि कब का यह एक पद्धति बन चुका है जो सभी उपागमों में प्रयोग में लाई जाती है .
कला विषय कितने उपयोगी हैं यह समझने के लिए बाजार ने अवकाश ही कितना छोड़ा है . बिके मूल्य आदर्श कब समझने लगे . यह मूल्यहीन स्थिति भ्रष्ट सत्ता को सतत बनाने में योग देती है इसलिए वे चाहते हैं कि यह ज्ञानशून्यता बनी रहे . सभी विकसित राष्ट्रों में मानविकी विषयों में प्रवेश अधिक है और सभी विकासशील देशों में विज्ञान विषयों में भीड़ मची है . अकुशल ज्ञानशून्य नागरिक समाज (Unskilled Unaware Civil Society) को कुछ भी नहीं खलता जब वह देखता है कि विकास के नाम पर मनमोहन और मोदी दोनों ही नए IITs, AIIMS' और IIMs खोलने की बात तो करते है पर यह विकास की संकल्पना जिस मानविकी से आयी है उसके लिए DU, JNU, Jamia, या ऐसी ही उच्चस्तरीय संस्थाएं नहीं खोलना चाहते. शायद वो चाहते हैं कि विभाजन बने रहें, कहीं ज्ञान यह विभ्रम (Illusion made out from hegemony) तोड़ देगा फिर तो सच में नागरिकों के लिए कार्य करना पड़ेगा . फिर राजनीति का करियर सेवक का हो जायेगा, जैसा कि प्लेटो की Philosopher King की अवधारणा कहती थी .
राजनीति में आज भी अपने टूल्स और अप्रोच हैं जो इस विज्ञान को प्रामाणिक (authentic) बनाते हैं. टूल्स और कार्यप्रणाली (systematic functions) की उत्तर व्यवहारवाद (Post Behaviouralism) के बाद बहुत अधिक मांग है, दोष देश की शिक्षा व्यवस्था का है कि वे विषयवस्तु (Content) अद्यतन (updated) नहीं कर रहे. इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री शोधित (well researched ) नहीं है. सभी, सब कुछ कभी नहीं सीख सकते सो expertise की जरुरत बनी रहेगी. राजनीति एक प्रक्रिया (function) के तौर पर कितनी समझ आती है और मूल्य एवं पद्धति (System) के तौर पर कितनी समझ आती है यह अलग अलग प्रतीति (realisation) है. एक्टर से भी प्रश्न होते हैं और किसी फिल्म के दर्शक भी बहुत कुछ बताते हैं पर उस फिल्म के निर्देशक, लेखक अथवा समीक्षक के जवाब का स्तर यकीनन अलग होगा , उनकी expertise को कम कर के आंकना बहुत बड़ी भूल होगी . इंटरनेट ने विषय की उपादेयता (utility) और विषयविज्ञानी (subject expert) की उपादेयता ज़रा भी कम नहीं की है. शोध के कई स्रोतों में से एक स्रोत है, यह भी एक्सक्लूसिव नहीं.
मोटर बाइक एक मैकेनिक भी बना लेता है पर इंजीनियर ही जानता है कि वह पूरी प्रक्रिया क्या है। मेरा इतना ही निवेदन है कि किसी खास समय में यदि विद्वान अथवा व्यक्ति सुसंगत (appropriate) न कर रहे हों तो उसमें विषय उपागम का दोष कहां आ जाता है। सन 96 में ही मैं देख पा रहा था कि मेरे जनपद से चुनाव में कौन जीतेगा और क्यों पर आज विश्लेषण करने के मेरे टूल्स और अप्रोच में निश्चित ही गुणात्मक सुधार आया है। कला विषय उतनी गति से अद्यतन नहीं हो रहे जितनी तीव्रता से विज्ञान विषय। हममें से ज्यादा लोगों की प्रारम्भिक ट्रेनिंग भी विज्ञान की है जो स्वभाविक तौर पर तथ्यपरक है। तथ्यों से लगाव स्वाभाविक है। चुनाव एक राजनीतिक परिघटना है जिसमें ढेरों प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। उसे केवल सीटों की संख्या से देखना अल्‍पदृष्टि का (मायोपिक) होना है। तो यदि कोई सामान्य जन सीटों की सटीक भविष्यवाणी कर दे और वह विशेषज्ञ की संख्या से मेल करे तो इसका अर्थ यह नहीं कि विषय विज्ञानी की उपादेयता संकट में है.
किसी चुनाव के परिणाम पर राजनीतिक विश्लेषक की व्याख्या का स्तर यकीनन किसी सामान्य जन से बेहतर होगा। आप पूछेंगे कि उपादेयता का यह स्तर कोई इतना भी आकर्षक नहीं. भाई, उस चुनाव के बाद तुरत चुनाव यदि हो जाएं तो पुनः संभवतः परिणाम बदले या मतप्रतिशत अथवा जीत-हार का अंतर बदले, इस परिघटना की व्याख्या सामान्य व्यक्ति कभी नहीं कर सकेगा किन्तु एक विश्लेषक आसानी से कर लेंगे। पत्रकार जो किसी निश्चित घटना विशेष पर उपलब्ध होते हैं और उनमें से कईयों को लंबा अनुभव भी होता है फिर भी परिचर्चा में कम से कम एक विषय विश्लेषक अवश्य होता है. हाँ, यह अवश्य हो सकता है कि वह विश्लेषक एक्सप्लेन कर पा रहा हो किन्तु interpret ना कर पा रहा हो और वह बोझिल लगे. पर यह उस विश्लेषक की सीमा है, उस विषय की नहीं.
निराशा यह है कि विभिन्न सामाजिक परिवर्तनों में यह विश्लेषक क्या योग करते हैं ? संभवतः कुछ नहीं, क्या ? दरअसल सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन बहुत धीमे धीमे होते हैं। और देखिए ज्ञान का एक सिस्टमेटिक अवदान होता है और एक फंक्शनल अवदान होता है। लॉक ने गौरवपूर्ण क्रांति का नेतृत्व नहीं किया था पर लॉक को उस क्रांति का दार्शनिक कहते हैं. भूमिकाओं को गड्ड मड्ड करके देखने का समय है । रेडियो का आविष्कार मार्कोनी ने किया अब उसका प्रयोग कैसे करना है समय सापेक्ष समाज उपजाता है। समाजविज्ञानी और समाजसुधारक में फर्क होता है। कभीकभार सुसंयोग से समाजसुधारक समाजविज्ञानी भी होता है तो यह एक अनिवार्य स्थिति तो नहीं हो गई, ना। हम भी टीवी पर क्रिकेट देखते हुए बोलते तो हैं कि खिलाड़ी को यह शॉट यों लेना चाहिए पर खिलाड़ी और खेल विशेषज्ञ ही समझते हैं कि अन्य प्रभावी कारक कौन से हैं। यही अन्य प्रभावी कारक जो जनसामान्य के लिए छिपे होते हैं, विशेषज्ञ उन्हें उजागर करते हैं। संभव यह भी है कि हमारा या किसी विद्यार्थी विशेष का अभी बोध उस स्तर का ना हो कि वह जनसामान्य से अधिक विशेष रीति से ना सोच पा रहा हो इसका अर्थ यह नहीं कि विषय विशेषज्ञ की उपयोगिया अथवा विषय विशेष की उपगोगिता खतरे में है।
विषय विज्ञता (Knowledge of Subject) केवल व्याख्याओं तक सीमित भी नहीं. सिद्धांत के तीन उपयोग होते हैं जिसमें व्याख्या केवल एक उपयोग है। Explanation, Interpretation and Restructuring . एक सुसंगत राजनीतिक सिद्धांत किसी राजनीतिक परिघटना (Phenomena) को पहले अपने टर्मिनोलॉजी में समझेगा। जैसे डाक्टर्स आपस में चर्चा करते हैं किसी रोगी की। फिर अगले चरण में उस व्याख्या का सरलीकरण व्यापकीकरण (generalise, universalise) किया जाता है ताकि सभी उसे समझें। इसी चरण पर विशेषज्ञ को वह भाषा मिलती है जिससे वह रोगी को रोग के बारे में समझा पाता है। अंतिम चरण में व्याख्या को नित नवीन बदल रही चुनौतियों के अनुरूप अपने आधारों को फिर फिर नवीन करने में मदद मिलती है ताकि वह सिद्धांत प्रासंगिक (relevant) बना रहे। तो विषय विज्ञता महज व्याख्या तक सीमित नहीं।
समकालीन समस्याएं अपने युग अनुरूप हमेशा ही जटिल होती हैं और किसने कहा कि समाजविज्ञानी असफल हैं । यह भी क्यों सोचें कि वह परिघटना जिसमें यह नैराश्य (disappointment) उपजा है कि विषय विशेषज्ञता किस काम की, उस परिघटना का पटाक्षेप हो गया है, अभी देखते जाएं। यह तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। जब अंग्रेजों ने कहा कि संविधान की तमीज नहीं है तो हमने वह राजनीतिक व्यवस्था दी जिसमें सार्वजनिक मताधिकार (Universal Adult Suffrage) का आत्मविश्वास था। इंदिरा गांधी आपातकाल लाती हैं तो वैकल्पिक राजनीति ने वह शून्य भरा और न्यायपालिका और भी सशक्त हुई। हाँ, इन प्रक्रियाओं के बीचोबीच पड़ा नागरिक जरूर सशंकित हुआ होगा कि स्वतंत्रता के मूल्य तो व्यर्थ गए या अब तो देश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं अवसरों पर विषय विशेषज्ञ आशावान रहेगा क्योंकि उसे वह अन्य प्रभावी कारक दिखेंगे तो जन सामान्य को नहीं दिखेंगे। यहीं पर उपयोगिता अधिक है डॉक्टर की जब मेडिकल स्टोर वाला निराश हो चुकेगा।

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