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Monday, December 25, 2017

विश्व पटल पर उभरता भारत

डॉ. श्रीश पाठक*



भारत के मित्र समझे जाने वाले खूबसूरत देश मालदीव से अभी चीन ने मुक्त व्यापार संधि संपन्न की, पर फिर भी कहना होगा कि वैश्विक पटल पर और खासकर एशियाई क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। दरअसल, चीन के बढ़ते प्रभावों के उत्तर में अमेरिका के पास भारत के अलावा कोई दूसरा ऐसा विकल्प नहीं है, जिसकी भू-राजनीतिक स्थिति कमाल की हो, बाजार के लिए अवसर प्रचुर हों और वैश्विक लोकतान्त्रिक साख भी विश्वसनीय हो।

अपने कार्यकाल के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यनीति में ट्रम्प सरकार ने जहाँ पाकिस्तान के लिए सख्त रवैया अपनाया वहीं एक ‘विश्वशक्ति’ के तौर पर भारत का ज़िक्र आठ बार किया और भारत के साथ सामरिक-आर्थिक हितों के और बेहतर विकास की वकालत की । हाल ही में हुए आठवें वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन के आयोजन के लिए भी अमेरिका के स्टेट विभाग ने भारत को चुना, जो कि दक्षिण एशिया का पहला ऐसा आयोजन था। ट्रम्प की पुत्री इवांका, ट्रम्प परिवार की एक प्रभावशाली व्यक्तित्व मानी जाती हैं और अपने यहूदी पति जेरेड कुशनर की तरह ही जिनकी मंत्रणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए उनके चुनाव अभियानों के समय से ही मायने रखती है। इस वैश्विक उद्यमिता शीर्ष सम्मलेन में इवांका की फैशन कूटनीति की भी चर्चा हुई।

वाशिंगटन की अपनी प्रेसवार्ता में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी हाल ही में हुई दक्षिण-पूर्व एशियाई यात्रा को 'जबर्दस्त सफल' करार दिया था । उन्होंने पत्रकारों से बिना कोई सवाल लिए एक लम्बा उद्बोधन दिया और कहा कि एक वैश्विक नेता के तौर पर अपनी भूमिका में अमेरिका वापस आ गया है और उनके प्रयासों ने  उन्मादी उत्तर कोरिया के खिलाफ विश्व को एकजुट कर दिया है। उत्तर कोरिया ने अभी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण किया जिसमें उसका दावा है कि अब अमेरिका का पूरा भू-भाग उनके आक्रमण-क्षेत्र में आ गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने एक ट्वीट में इस पर चिंता जताते हुए अपनी सरकार और सेना के लिए और अधिक वित्त की आवश्यकता पर बल दिया। इसी दिन के एक ट्वीट में डोनाल्ड ट्रम्प ने इवांका की भारत यात्रा के उनकी सक्रियता की प्रशंसा भी की।   ट्रम्प की एशिया-प्रशांत यात्रा एक ऐसे क्षेत्र में हुई जहाँ तेजी से चीन की दखलंदाज़ी बढ़ी है और एक ऐसे समय में हुई जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के उन्नीसवें अधिवेशन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने तीन घंटे तेईस मिनट के लम्बे भाषण में चीन की वैश्विक और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पुनः दोहराया है।

माना जा रहा है कि इवांका की मंत्रणा से ही ट्रम्प की इस यात्रा में चीन का समावेशन अमेरिका के आर्थिक हितों के सुचारू संचलन के लिए किया गया था।  समझा जा सकता है कि इस यात्रा के अन्य पड़ावों के रूप में में बाकी देशों जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और वियतनाम का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि वे सभी चीन के संतुलन में अलग-अलग दृष्टिकोण से अमेरिका के मजबूत स्तम्भ हैं। जापान जहाँ सामरिक और आर्थिक रूप से अमेरिकी कूटनीति में प्रतिभाग कर रहा, वहीं दक्षिण कोरिया दरअसल उत्तर कोरिया के संतुलन में है। वियतनाम और फिलीपींस की भू-राजनैतिक स्थिति दक्षिण-चीन सागर के लिहाज से अहम है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में एपेक और आसियान सहयोग के मद्देनज़र भी दोनों देश अमेरिकी हितों को आकर्षित करते हैं। चीन पर इस अमेरिकी घेराव को और धार मिल जाती है जब ट्रम्प द्वारा इस क्षेत्र को ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र कहा जाता है।  चर्चित जापान-भारत-अमेरिका-आस्ट्रेलिया चतुष्क (क्वाड) के साथ ही यहाँ बहरहाल पाकिस्तान-चीन-रूस-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।  

गौरतलब है कि अपने आप को पहला पैसिफिक प्रेसिडेंट कहने वाले अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति ओबामा ने अपनी महत्वाकांक्षी पिवट पॉलिसी का प्रतिपादन किया था जिसमें अमेरिकी संबंधों का झुकाव मध्य-पूर्व एशिया से हटाकर एशिया-पैसिफिक की तरफ करने की बात की गयी थी। अमेरिका की कोशिश थी कि देश की विदेश नीति में मध्य-पूर्व एशिया की जटिल राजनीति की भूमिका कम करके एशिया-पैसिफिक के व्यापारिक-वाणिज्यिक एवं सामरिक महत्त्व को प्रमुखता दी जाए। किन्तु ओबामा प्रशासन में इस ओर ठोस कदम नहीं उठाये जा सके। न ही अमेरिका की सक्रियता वहाँ कुछ कम की जा सकी और न ही एशिया-पैसिफिक में अमेरिकी इरादों को अमली जामा पहनाया जा सका। इससे अलग ट्रम्प मध्य-पूर्व एशिया में अमेरिकी सक्रियता कम किये जाने के पक्ष में तो नहीं हैं किन्तु एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में भी अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की फिराक में हैं। इसे कुछ विशेषज्ञ ट्रम्प की 'पोस्ट पिवट पॉलिसी' कह रहे हैं जिसमें ट्रम्प का दबाव इसपर ज्यादा है कि क्षेत्रीय संतुलन की जिम्मेदारी में सभी सहयोगी देशों को साझीदारी करनी होगी।

ट्रम्प व्यवसायी हैं और अमेरिका का चुनाव अमेरिकी हितों की प्राथमिकताओं को वरीयता देने के वादे से जीत कर आये हैं। क्षेत्र में चीन के साथ उनके देश की सर्वाधिक व्यापारिक हित जुड़े हैं, जिसे उन्होंने इस बार की यात्रा में भी महत्ता दी है ट्रम्प ने 'आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है' का नारा देकर अपना मंतव्य भी स्पष्ट कर दिया।  इसके साथ ही हिंद महासागर से प्रशांत महासागर के व्यापारिक समुद्री मार्गों की मुक्तता एवं सुरक्षा के लिए वे भारत की महत्ता को रेखांकित करने से नहीं चुके हैं। उन्हें अमेरिका का दबदबा कम तो नहीं होने देना है किन्तु ट्रम्प चाहते हैं कि जिन देशों को अमेरिकी वैश्विक संलग्नता से फायदा है, वे इसे मिलकर वहन करें। आर्थिक दृष्टिकोण से हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर के बीच की समुद्री मार्ग को ट्रम्प सुगम व व्यवधानरहित बनाना चाहते हैं।  चतुष्क के तीनों देशों ने दरअसल अमेरिकी इशारों के अनुरूप जवाब देना शुरू भी कर दिया है। डोकलाम विवाद में भारत ने जताया कि अब वह कूटनीतिक चुप्पी से कहीं अधिक की भूमिका में आने को तत्पर है और वहीं एक्ट ईस्ट पॉलिसी का इज़हार करते हुए दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में भी भारत ने अपनी बढ़ती सक्रियता के सुबूत दिए हैं। ग़ौरतलब है कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में म्यांमार एक मजबूत स्तम्भ है और हालिया रोहिंग्या विवाद में भारत ने म्यांमार के खिलाफ निष्क्रिय रहना ही उचित समझा। इस प्रकार भारत की एक्ट एशिया पॉलिसी ट्रम्प की पोस्ट पॉलिसी के साथ सुसंगति में है। जापान ने जहाँ द्वितीय युद्ध के बाद की अपनी पैसिफिस्ट पॉलिसी (शांतिप्रिय नीति) में बदलाव के संकेत दिए हैं वहीं आस्ट्रेलिया ने भी अपनी अमेरिकी संलग्नता दुहराई है। पोस्ट पिवट पॉलसी की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें अमेरिका की ओबामाकालीन 'बहुपक्षीय (मल्टीलैटरलिज़्म) 'संबंधों के स्थान पर 'द्विपक्षीय (बाईलैटरलिज़्म )'संबंधों को वरीयता दी जा रही है। ट्रम्प प्रत्येक सहयोगी देशों से एक कुशल व्यापारी की तरह अलग-अलग सुनिश्चित प्रतिबद्धता चाहते हैं।

एशिया की बदलती परिस्थितियों में भारत के लिए जैसी अनुकूल परिस्थिति निर्मित हुई है; इसका लाभ लेना एक अवसर तो है पर यह मौजूदा सरकार के लिए एक चुनौती भी है। भारत इसका लाभ कुछ यों ही सुनिश्चित कर सकता है, जब वह विश्व में और क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियों के राष्ट्रहित को समझते हुए स्वयं के राष्ट्रहित की गुंजायश खंगाल सके।  यह इतना सरल नहीं हैं, क्योंकि वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में कोई एक स्वयंभू केंद्र नहीं है, यहाँ राष्ट्र-राज्यों को स्वयं ही अपने हित सुरक्षित रखने होते हैं ।ऐसे में तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही सन्दर्भ में अधिकाधिक राष्ट्र-राज्यों से संबंधों की ऐसी बुनावट करनी होती है, जिससे अधिकतम राष्ट्रहित सधे ।अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि मौजूदा सरकार इन परिस्थितियों का कितना लाभ देश को पहुंचाने में सफल हो सकी।  


*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं.



Friday, December 22, 2017

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपने बर्फ बार बार रंगें हैं...!

एशिया के बाद दो भाग में देखें विश्व राजनीति में यूरोप !



चौबीस घंटे की एक क्लॉक से अगर अपनी पृथ्वी की अभी तक की जिंदगानी को दिखाने की कोशिश हो तो हम इंसानों  की औकात महज इतनी है कि 00:00 से शुरू हुई घड़ी में हम तकरीबन 11:58 पर अवतरित हुए। पर लगता यों है कि हिस्ट्री हमीं से है, इस जहान की । उसमें भी पिछले दो-तीन सौ साल से यूरोप का चैप्टर चल रहा और लगता यही है कि जैसे दुनिया का सारा ‘फर्स्ट’ यहीं से बिलोंग करता है। सत्ता जिसकी होती है, उसी का रहन-सहन होता है, उसी का भौकाल होता है, उसी की भाषा होती है और उसी की परिभाषा होती है। सुबूत ये है हुजूर कि, इवेन इस आर्टिकल में भी अगर अंगरेजी के वर्ड्स निकाल प्योर हिंदी के डाल दें, तो इसे बोझिल लगना चाहिए । इतिहास का पिता हेरोडोटस को मानना होता है जो यूरोप के एक देश ग्रीस का निवासी था। हम पढ़ते हैं कि अमेरिका की खोज कन्फ्यूज्ड क्रिस्टोफर कोलम्बस ने की जो इंडिया ढूंढते-ढूंढते कैरिबियाई द्वीपों से जा टकराया। अमेरिका पहले भी वहीं था, पर यूरोप के देश इटली के नाविक को पहली बार मिला तो अमेरिका की खोज हुई। यों ही आखिरकार भारत की भी खोज हुई, क्यूंकि पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा को ये देश पहली बार मिला। इंडिया का भौकाल समझिये, कि 20 मई 1498 को केरल के कप्पडु क्षेत्र में उतरने के करीब 8000 किमी दूर ही अफ्रीका के जिस द्वीप से कोलम्बस इंडिया को पहली बार देख पाया, खुशी में उस द्वीप का नाम ही केप ऑफ़ गुड होप रख दिया। सिक्का यूरोप का होगा तो टकसाल भी यूरोपियन होगी और करेंसी (चलन ) में वही होगा जो यूरोप का होगा।



कनाडा से महज दो प्रतिशत बड़ा है, पर महाद्वीप तगड़ा है यूरोप। दुनिया का दूसरा सबसे छोटा महाद्वीप यूरोप है पर इसमें दुनिया का सबसे बड़ा देश रूस है और दुनिया का सबसे छोटा देश वेटिकन सिटी भी है। आस्ट्रेलिया से थोड़े ही बड़े इस महाद्वीप में पचास देश हैं, बोली जाने वाली ढाई सौ से अधिक भाषाएँ हैं और एक सौ साठ से अधिक कल्चरल आइडेंटिटिज हैं। दुनिया में सबसे धनी है यूरोप और आज के ख्वाबों भरी ज़िंदगी की हकीकत है यूरोप। दुनिया के सर्वाधिक विकसित देश यहीं हैं और मान लीजिये कि यहाँ के गरीबों का कूड़ा अगर दुनिया के कुछ देशों में पहुंचा दिया जाय तो वे अपने देश के अमीरों में होंगे।दुनिया का हर भाग्यशाली बारहवां आदमी यूरोप में रहता है। क्रिस्टोफर मार्लोवी के शब्दों में - कि जैसे, इनफाइनाइट दौलत एक रूम में बंद हो। पेरिस यहीं, लन्दन यहीं, बर्लिन यहीं, रोम यहीं, यश चोपड़ा के शिफॉन साड़ियों वाला स्विट्जरलैंड यहीं, हॉलीवुड यहीं, डिज्नीलैंड यहीं और अपने अनुष्का वाले कैप्टन विराट ने भी यूरोप का वह देश चुना अपने शादी और हनीमून के लिए जहाँ से यूरोप के दूसरे सबसे पुराने एम्पायर, रोमन एम्पायर की शुरुआत हुई, यानी इटली।धरती के महज दो प्रतिशत धरातल वाले यूरोप में दुनिया में देशों के न्याय सुनाने वाला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, हेग भी यही हैं।  

दुनिया को साइंस का मॉडर्न लेसन देने वाले यूरोप के नाम की कहानी तक वेरी कन्फ्यूजिंग है। इसे ग्रीक मिथोलॉजी में यूरोपा नाम की राजकुमारी और ज्यूस की एक रानी के नाम से लिया गया। ग्रीक शब्द से चलें तो इसका मतलब वाइड, ब्रॉड माने विस्तृत होगा, पर सीरियन वार्ड एरेब से इसकी उत्पत्ति मानें तो इसका मतलब सनसेट होगा। शुरू में जब यह शब्द किसी प्लेस के लिए इस्तेमाल में आया तो इस यूरोप से मतलब उत्तरी अफ्रीका से था फिर धीरे धीरे यूरोप का आधुनिक अर्थ बना। अगर दुनिया भगवान ने बनाई तो यकीन करना मुश्किल है कि कभी यूरोप को इतना बुलंद करने की सोची हो उसने । क्योंकि सोचिये न, चारो तरफ से दुनिया के बाकी हिस्सों से कटा हुआ है यूरोप।  बर्फीला आर्कटिक इसे सर्द बनाये रखता है। विशाल अटलांटिक इसे पश्चिम के प्राकृतिक स्रोतों भरपूर अमेरिका महाद्वीप से वंचित रखता है तो मेडीटीरियन सी से यह मिनरल्स वाले अफ्रीका से कट जाता है। यूराल पहाड़ इसे पूरब के एशिया से अलग करके रखता है। जब यह ही न पता हो कि पृथ्वी गोल है या चपटी, और सूरज घूमता है कि पृथ्वी चक्क्र काटती है सूरज के, तो फिर ये सोचना कि एक दिन यूरोप के देश ऐसे शिप बनाएंगे कि वे पृथ्वी के एक-तिहाई लैंड से निकलकर दो-तिहाई वाटर को तैरते हुए  पृथ्वी के चक्कर पे चक्कर लगाएंगे; यह किसी किसी ऊँघती दुपहरी में देखे जाने वाले अटपटे बेतरतीब सपने से कहीं अधिक न था। पर, जनाब ! ये हुआ और इसलिए ही आज यूरोप ड्रीमलैंड है। सब बस अच्छा ही है, यूरोप में, ऐसा नहीं है, पर बाकी दुनिया के महाद्वीपों के मुकाबले यकीनन यूरोप की स्थिति यकीनन बेहतर है।

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपने बर्फ बार बार रंगें हैं। और एक ज़माने में से ही यूरोप में रहने वाली जातियों को बारबेरिक माना जाता रहा और आज भी यूरोप ने वह बारबेरिज्म खोया नहीं है बस मॉडर्न सिविलाईजेशन के अधखुले कपडे से इसे ढँक रखा है। उस कहानी को आइये फिर दुहराते हैं जो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इकोनॉमिक-कल्चरल सिक्का अभी भी यूरोप का ही करेंसी में है। जीसस के करीब 1200 साल पहले फेमस ट्रॉय-स्पार्टा वार हुआ। जीसस के जनम के साढ़े आठ सौ साल पहले होमर हुआ जिसने आधुनिक दुनिया का पहला महाकाव्य इलियड और ओडिसी लिखा। फिर 776 बीसीई में ओलम्पिक खेल शुरू हुए और समझिये कि यूरोप की काशी रोम बसी ईसा से तकरीबन 750 साल पहले। ग्रीक एम्पायर पर पर्सिया ने आक्रमण किया ईसा के धरती पर आने के भी ठीक 500 साल पहले और यह लड़ाई अगले दो सौ और साल चलने वाली थी। बहरहाल, यूरोप महाद्वीप ने महान ग्रीक एम्पायर देखा और फिर महान रोमन एम्पायर देखा।

जीसस के इस दुनिया से विदा होने के बाद उनके कहे शांति संदेशों पर चर्च कुंडली मारकर बैठ गया और पॉलिटिक्स की कमान रिलिजन के सम्हालते ही यूरोप इतिहास के अपने मध्ययुग में आ पहुंचा। आज की पॉलिटिक्स अभी जितना क्रूर होने के लिए सोचेगी, रीलिजन ने वे हदें शताब्दियों पहले से ही तोड़नी शुरू कर दी थीं। ईसा मसीह की मृत्यु के 632 साल बाद एक नए रीलिजन इस्लाम के मसीहा मुहम्मद साहब की मृत्यु हुई और इस्लाम आज यूरोप का ही दूसरा प्रमुख रीलिजन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का दूसरा बड़ा रिलिजन है। मध्य युग के यूरोप की कमान चर्च के पास थी। यूरोप से निकलकर चर्च ने रिलिजन के नाम पर क्रूसेड करने शुरू किये, जिसमें बेरहमी से काफिरों को मिटाया गया। तब तक मध्य एशिया से सिल्क रुट बनाता हुआ मंगोल शासक चंगिज खान बारबेरिज्म की दूसरा स्टैंडर्ड सेट करता हुआ आ पहुंचा और उसके बाद के शासकों ने सर्द यूरोप को और भी सर्द अपने हाथों से छु लिया। मध्य युग का यूरोप अंधयुग माने ब्लाइंड ऐज कहलाता है। ब्लाइंड इसलिए क्यूंकि चर्च का आदमी टिकटें बेचता स्वर्ग की और लोग टूट पड़ते खरीदने को। आज भी लोग चाँद और मंगल पर जमीन खरीद ही रहे इंटरनेट पर। उस ब्लाइंड ऐज में सारी कसौटियां चर्च सेट करता और ‘राइट’ वही माना जाता जो पोप को ‘राइट’ लगता। ठीक ऐसे ही जैसे आज मुस्लिम फ़ण्डामेंटलिस्ट को किसी सिरफिरे मौलवी की बात ‘राइट’ लगती है, किसी क्रिस्चियन फंडामेंटलिस्ट को दहशती प्रीस्ट की बात ‘राइट’ लगती है और किसी भटके हिन्दू नौजवान को किसी ढोंगी गुरु की ही बात ‘राइट’ लगती है। यों तो इस ब्लाइंड ऐज के बाद फिर रेनेसॉ और एनलाइटेन्मेंट एरा भी आया 17वीं शती तक, जिसमें एक बार फिर अंधश्रद्धा के स्थान पर रीजन और लॉजिक को महत्त्व दिया गया पर रीलीजन अभी भी इतना प्रभावशाली था कि उसने समूचे यूरोप को 1618 से 1648 तक के तीस साल के युद्धों में झोंक दिया।




भारत ने क्यों किया वोट खिलाफ अमेरिका के ?



आप इतना समझें कि वर्ल्ड पॉलिटिक्स में अमूमन नैतिकता महज इतनी होती कि वह किया जाय जिससे राष्ट्रहित को फायदा पहुंचे। जिसे हम आप डिप्लोमेसी कहते हैं, कूटनीति कहते हैं, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में इसके मायने बस इतना है कि कैसे अपना राष्ट्रहित बचाते हुए जहाँ कहीं मौका मिले वहाँ इसे बढ़ाया जाय। वर्ल्ड पॉलिटिक्स की एक खास बात और समझ लें तो भारत की हालिया अमेरिका के खिलाफ की गयी वोटिंग समझ आ जाएगी।  वर्ल्ड पॉलिटिक्स anarchic है, माने यहाँ कोई एक नियामक शक्ति नहीं है जैसे कि देशों के भीतर सरकारें होती हैं। इसलिए अपने हितों की सुरक्षा स्वयं करनी होती है। हितों की सुरक्षा सभी अन्य देशों से किसी न किसी रीति से जुड़ने में अधिकतम होती है। दुनिया के सभी देश घोषित तौर पर कुछ भी प्रवचन दें, किन्तु सभी देशों से किसी न किसी रीति से जुड़ने की सम्भावना को टटोलते रहते हैं। इसीलिये कहते हैं कि, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में कोई स्थाई शत्रु नहीं होता और न होता है कोई स्थाई मित्र ही। 

लोकतंत्र में चुनाव जीतना बेहद कठिन होता है। बहुमत के मत संजोने होते हैं। अमेरिकी चुनाव में यहूदी  मत और हथियारों की लॉबी में उनका निर्णायक प्रभाव महत्वपूर्ण है। येरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने का मतलब है, इजरायल की स्थापना को अंतिम रूप से मुहर लगा देना और फलस्तीन को एक दूसरे पक्ष के रूप में लगभग ख़ारिज कर देना। चुनाव में ट्रम्प की जीत हुई और अमेरिकी प्रेसिडेन्ट अब अमूमन दो कार्यकाल लेते हैं, तो अमेरिका को यह स्टंट तो करना था। स्टंट इसलिए क्यूंकि यह एक ऐसा मुद्दा जिसपर बेहद बुरी तरह से बंटा मध्य एशिया एकजुट हो जाता है। विश्व व्यवस्था के लोकतान्त्रिक मॉडल में द्विपक्षीय मुद्दे द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाए जाने चाहिए। इस रीति से भी अमेरिका की निर्णायक उपस्थिति तभी संभव है जब दोनों पक्ष चाहें। तो अमेरिकी प्रसाशन को पहले दिन से यह पता है कि एकतरफा उनकी घोषणा से जमीन पर कुछ बदलने वाला नहीं है। चूँकि वर्ल्ड सिस्टम anarchic है तो UNO उतना ही प्रभावी है जितना सदस्य राष्ट्र इसे होने देते हैं।  और फिर अमेरिका एक वीटो पावर वाला देश है। तो इससे अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ता फ़िलहाल कि UNO में क्या हो रहा और यकीन मानिये सदस्य राष्ट्रों को भी चूँकि पता है कि UNO से कुछ निर्णायक नहीं होने वाला कम से कम अभी।  

दुनिया के सभी देश यह जरूर चाहते हैं कि उनकी विदेश नीति स्वतंत्र दिखे और एक सततता (Continuity ) में दिखे। इजरायल-फलस्तीन मुद्दा चूँकि अभी सुलझा नहीं है, फिर येरुशलम को राजधानी स्वीकार कर लेना एकतरफा निर्णय ले लेना है जो कि किसी भी रीति से उचित नहीं है। ऐसे में यदि अमेरिका के खिलाफ वोटिंग करके जमीन पर पारस्परिक संबंधों पर कोई फर्क न पड़ता हो और अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता भी प्रदर्शित होती है तो एक समझदार स्मार्ट राष्ट्र अवश्य ही अमेरिका के खिलाफ वोटिंग करेगा। और देखिये अमेरिका के किसी भी अधिकारी ने किसी भी स्तर पर कहीं भी इस मुद्दे पर भारत की आलोचना नहीं की है। 


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