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Wednesday, June 27, 2018

राजनीतिक दल से उम्मीदों की प्रश्नावली



देर-सबेर सभी राजनीतिक दल यह एहसास करा ही देते हैं कि उनका मकसद सत्ता भोगना ही है। एक समर्पित कार्यकर्त्ता को फिर दुसरे दलों के पुराने करतूतों का कच्चा-चिट्ठा रखने के अलावा और कुछ सूझता नहीं है। कई बार कार्यकर्ता व्यक्तिगत दुश्वारियाँ और दुश्मनी पाल लेते हैं और अक्सर चुनाव के बाद जब उनके राजनीतिक आका आपस में गलबहियाँ कर लेते हैं तो उस वक्त दिल में कहीं नश्तर सा लगता है और दुनिया के बड़े ज़ालिम होने का एहसास होता है। राजनीतिक दल अपनी परिभाषा में ही सत्ता के लिए संघर्षशील होते हैं, तो सत्ता के लिए संघर्ष करने में कोई बुराई नहीं है। किन्तु राजनीतिक दल, महज सत्ताप्राप्ति के ही निमित्त नहीं होते हैं। हाँ, यह अवश्य ही है कि सत्ताप्राप्ति ही उनका एकमात्र ध्येय बनकर रह गया है। 

संविधान सभा की मंशा यह नहीं थी कि नागरिक, किसी दल विशेष के होकर रह जाएँ। देश के भीतर अनगिनत मुद्दे होते हैं और वे मुद्दे अपनी बदलती प्राथमिकता और प्रासंगिकता में परिदृश्य पर उभरते हैं। किसी मुद्दे के सार्थक निस्तारण हेतु सम्यक नीति और कार्ययोजना की आवश्यकता होती है जिससे अधिकतम नागरिकों का वृहत्तम हित सधे। एक राजनीतिक दल में भाँति-भाँति के लोग मिलकर देश के सभी आवश्यक मुद्दे पर अपने दल के लिए एक एकीकृत नीति और कार्ययोजना गढ़ते हैं। नीतियों में अन्तर्निहित विरोधाभास न हो इसलिए राजनीतिक दल अपना एक वृहद् उद्देश्ययोजना तैयार करते हैं। इससे ही उस राजनीतिक दल की प्रकृति और चरित्र का निर्धारण होता है। किसी भी मुद्दे का कोई एक अंतिम निस्तारणनीति और कार्ययोजना नहीं हो सकता। इसलिए ही किसी देश में एक से अधिक राजनीतिक दलों की गुंजायश बनाई जाती है। भारत में विविधता अन्याय स्तरों पर है तो यहाँ बहुदलीय दल अनिवार्य ही हैं जिससे सभी विविधताओं को स्वर मिले और वे एक सिम्फनी में राष्ट्र के लिए कार्य कर सकें। एक नागरिक, किसी दल विशेष की वृहद् कार्ययोजना, उसकी नेतृत्व शक्ति एवं सांगठनिक क्षमता से प्रभावित होकर उसकी प्राथमिक सदस्यता लेकर अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकता है। यह उसका अधिकार है। लेकिन इससे उसके व्यक्तित्व पर कोई लेबल लगाना ठीक नहीं है। वह चाहे जब उस दल से अलग हो सकता है। वह सामान्य मतदाता बने रह सकता है अथवा वह किसी दूसरे दल की सदस्यता ले सकता है। 

प्रश्नों की एक चेकलिस्ट बनाई है मैंने, जिससे हम यह जान सकते हैं कि एक मतदाता और एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में हम तथा कोई राजनीतिक दल कितने खरे उतरते हैं। यह चेकलिस्ट अनंतिम है, पर उपयोगी है। इस बेहद आवश्यक कसौटी से हर नागरिक को जरूर गुजरना चाहिए: 


एक मतदाता के रूप में 

१. क्या अमुक राजनीतिक दल ने यदि राष्ट्रीय स्तर का है तो देश के लिए और यदि प्रांतीय स्तर पर है तो उस राज्य के लिए वृहद् उद्देश्ययोजना निर्मित की है? क्या आपने उसे कभी पढ़ा है?
२. क्या उसमें देश/प्रांत स्तर की सभी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं?
३. समस्याओं के वर्गीकरण में क्या सभी देश/प्रांत के सभी विभिन्नताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व है?
४. समस्याओं के निस्तारण नीति उपलब्ध है?
५. क्या आपने निस्तारण नीतियों की परख के लिए किसी चर्चा में परिभाग किया है?
६. निस्तारण नीतियों के कार्ययोजनाओं में क्या देश/प्रांत के सभी विभिन्नताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व है?
७. क्या राजनीतिक दल के सदस्य चुनाव के अलग समयों में आपसे मिलते हैं?
८. क्या आपने राजनीतिक दल के सदस्यों से अपनी समस्याएँ साझा की हैं? 
९. क्या आपको समस्याओं के हल की कोई योजना राजनीतिक दल के द्वारा सुझाई गयी या आश्वासन ही मिला?
 १०. क्या अमूमन यही होता है कि आपके क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे राजनीतिक दल निर्धारित करते हैं? अथवा उस क्षेत्र विशेष के मतदाता वहाँ के मुद्दे निर्धारित करते हैं और राजनीतिक दल उसे अपना मुद्दा बनाकर संघर्ष करते हैं?
११. राजनीतिक दल के सदस्यों, नेताओं का मतदाताओं से चुनाव से इतर व्यवहार कैसा है? क्या वे सुलभ हैं?
१२. किसी राजनीतिक-सामाजिक हल की प्रक्रिया में अमुक राजनीतिक दल की कार्ययोजना समावेशी है अथवा एकांतिक है ? एकांतिक समाधान सामाजिक विखंडन को न्यौता देते हैं।  
१३. राजनीतिक दल के सदस्य स्वयं लाभ को वरीयता देते हैं या क्षेत्रहित को वरीयता देते हैं?
१४. सांविधानिक तौर-तरीकों में उस दल-विशेष की कितनी आस्था है?
१५. सार्वजनिक संपत्ति के साथ उस राजनीतिक दलों के सदस्यों का कैसा बर्ताव है?
१६. क्या आप जांचते हैं कि क्षेत्र के किसी नेता और राजनीतिक दलों के सदस्यों की आपराधिक पृष्ठभूमि कैसी है?
१७. क्या आप किसी राजनीतिक दल के वादों की सम्यक समीक्षा करते हैं?
१८. क्या आपके पास दलों का मैनिफेस्टो होता है?
१९. मैनीफेस्टो की गुणवत्ता कैसी है?क्या उसमें आपके क्षेत्र, प्रांत, राष्ट्र की समस्याओं का उचित प्रतिनिधित्व एवं सम्यक निस्तारण रीति स्पष्ट है?
२०. प्रति चुनाव मैनीफेस्टो में क्या कोई गुणात्मक परिवर्तन है?

एक दल-विशेष के सदस्य के रूप में 

१. क्या आपका राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित रीति से पंजीकृत है?
२. क्या आपके पास उस राजनीतिक दल की सदस्यता का प्रामाणिक पत्र है?
३. क्या आपका राजनीतिक दल राष्ट्र की मूलभूत अवधारणा में यकीन रखता है?
४. क्या आपका राजनीतिक दल संविधान में और सांविधानिक प्रक्रियाओं में आस्था रखता है?
५. क्या आपका राजनीतिक दल लोकतंत्र में यकीन रखता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रायोगिक एवं दार्शनिक दोनों स्तरों पर मान्यता देता है?
६. क्या राजनीतिक दल के भीतर लोकतंत्र है?
७. क्या आपका राजनीतिक दल आपको स्पष्ट करता है कि वह क्यों सत्ता प्राप्त करना चाहता है?
८. क्या आपका राजनीतिक दल राष्ट्र/प्रांत/क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के निर्धारण में आपकी राय को महत्ता देता है?
९. क्या आपके राजनीतिक दल में जनता के मुद्दों को पहचानने एवं उसके हल की कार्ययोजना को लेकर कोई आयोजना है और क्या आप इससे परिचित हैं?
१०. आपके राजनीतिक दल में विभिन्न मुद्दों को लेकर आवश्यक शोध की व्यवस्था है?
११. क्या आपका राजनीतिक दल समावेशी है?
१२. क्या आपका राजनीतिक दल आपके असहमतियों को स्थान देता है और तदनुरूप अपनी कार्ययोजनाओं में तब्दीलियाँ करता है?
१३. क्या आपका राजनीतिक दल अनैतिक कृत्यों की संस्तुति सत्ता प्राप्ति के लिए करता है?
१४. क्या आपके दल के सदस्यों को लेकर लोकतांत्रिक समानता बरती जाती है?
१५. क्या आपके राजनीतिक दल के निर्णय सामान्य सभा लेती है अथवा यह किसी एक व्यक्ति में निहित है?
१६. क्या आपका राजनीतिक चंदों और बहीखातों को लेकर पारदर्शी है? क्या सभी जानकारियाँ पब्लिक डोमेन में हैं?
१७. क्या आपका राजनीतिक दल राजनीतिक शुचिता के लिए लोकतांत्रिक रीति से अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ बिना किसी भेदभाव के करता है?
१८. क्या आपके राजनीतिक दल में महत्वपूर्ण पदों और निर्णयों के लिए किसी खास वर्ग, समूह, जाति, समुदाय अथवा परिवार की ओर देखना होता है?
१९. क्या आपका राजनीतिक दल अपनी नीतियों और कार्ययोजनाओं को समकालीन चुनौतियों के अनुरूप अद्यतन करता है?
२०. क्या आपके राजनीतिक दल के सभी सदस्य अपने कृत्यों के लिए जनता और आपके लिए जवाबदेह हैं? 


यह कसौटी अपने विषयों में अंतिम नहीं है। किसी राष्ट्र की प्रगति का दारोमदार उस राष्ट्र की राजनीति पर होता है। राजनीति बड़े ही महत्त्व का विषय है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की होती है। नागरिक जितना ही मौन और उदासीन होता है, उसके राष्ट्र की राजनीति उतनी ही असह्यनीय, अश्लील और गैर-जिम्मेदार होती है। एक बार जरा मतदाता अथवा किसी राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में इन कसौटियों के समक्ष स्वयं को और अपने राजनीतिक दल को रखिये, लगभग तुरत ही स्पष्ट हो जायेगा कि हमारा प्यारा देश क्यों प्रगति के उस सोपान पर चढ़ने की बजाय राजनीतिक अवनति को प्राप्त हो रहा। जवाब इसका भी मिलेगा कि आखिर क्यों राजनीतिक दल सत्ता में आते ही जनता के नहीं उद्योगपतियों के हो जाते हैं और यह भी कि क्यों राजनीतिक दल नागरिकों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि वोटबैंक के रूप में देखते हैं। मुझे उम्मीद है कि इस प्रश्नावली से एक उत्तर और मिलेगा कि आखिर क्यों एक राजनीतिक दल सत्तासुख भोगने के बाद बिना कोई ठोस जनहित के काम किये बिना ही अगले चुनाव के सीटों का अश्लील लक्ष्य रखता है और उसे क्यों मतदाताओं से अधिक अपने चुनाव-मैनेजमेंट टीम पर यकीन होता है ?देखिये जरा, कहीं कोई हमें बस मैनेज तो नहीं कर रहा?   

Saturday, June 23, 2018

भारतीय विदेश नीति के बढ़ते आयाम



किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए विदेश नीति सर्वाधिक कठिन आयाम होती है। अनिश्चितता इसका निश्चित गुणधर्म है इसलिए इसमें सफलता और असफलता दूरगामी परिणाम तथा महत्त्व लेकर आती है। अपेक्षाकृत रूप से नरेंद्र मोदी सरकार को विश्व-राजनीति का एक कठिन समय नसीब हुआ है। पिछले दो दशकों में ऐसा नहीं था कि समस्याएं जटिल नहीं थीं लेकिन एक सर्वोच्च विश्व शक्ति के रूप में अमेरिका की स्थिति सर्वमान्य थी। रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन आदि सहित यूरोप के राष्ट्र अमेरिका की पंक्ति में ही स्वयं को अनुकूल कर विकास के पायदान पर चढ़ने के हिमायती बने रहे। संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व की दूसरे बड़े आर्थिक व सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कमोबेश अमेरिकी वित्त पर ही आधारित होते हुए कार्यरत रहे।  

स्थितियाँ एकदम से बदल नहीं गयी हैं, लेकिन पुतिन का रूस अब महत्वाकांक्षी राष्ट्र है, शी जिनपिंग का चीन ओबोर नीति से अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्ट रख रहा है, जापान अपनी शांतिपूर्ण विदेश नीति का मंतव्य छोड़कर सक्रिय विदेश नीति की ओर रुख कर चुका है। रूस, चीन, पाकिस्तान मिलकर एशिया में साझी रणनीति बना रहे। हिंदमहासागर और प्रशांत महासागर पर अमेरिका, रूस, चीन तीनों की बराबर नज़र है। जापान के सुझाव पर भारत को सम्मिलित करते हुए अमेरिका ने आस्ट्रलिया के साथ चतुष्क बनाने की कोशिश की और हाल ही में अपने बेहद खास पैसिफिक कमांड का नामकरण ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ कर दिया है। दक्षिण कोरिया ने अपने  कूटनीतिक करिश्मे का लोहा मनवाते हुए उत्कट उत्तर कोरिया के साथ सहयोग का नया आयाम विकसित करने में सफलता प्राप्त की और सिंगापुर में १२ जून को ‘डोनॉल्ड ट्रम्प-किम जोंग उन’ की बहुप्रतीक्षित भेंट होने की नींव तैयार की। रणनीतिक महत्त्व समझते हुए, रूस ने चीन द्वारा स्थापित दक्षिण-पूर्व क्षेत्र के प्रमुख आर्थिक सहयोग संगठन ‘शंघाई सहयोग संगठन’ का पाकिस्तान के साथ, भारत को भी  पूर्ण सदस्य बनवाने की सफल पैरवी की। 

मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति कई अवसरों पर जता चुकी है कि भारत न केवल अपनी वैश्विक भूमिका निभाने को तत्पर है अपितु अपनी एक ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का भी निर्वहन वह कर सकता है। अमेरिका के दबावों के बावजूद भारत रूस से एस-४०० मिसाइल तकनीक खरीद रहा है और  अमेरिका के द्वारा लगाए गए CAATSA प्रतिबंधों से भी अप्रभावित होकर रूस और ईरान से अपने व्यापारिक संबंध बनाये हुए है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के पूर्ण निर्माणकार्य के लिए भारतीय सहयोग अपनी सततता में है। हिंदमहासागर में जहाँ भारत अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस के सहयोग में है और आस्ट्रेलिया, जापान के साथ मालाबार अभ्यास से जुड़ा हुआ है वहीं मारीशस के पक्ष में चागोस मुद्दे पर भारत ने ब्रिटेन के हितों के विपक्ष में मत दिया। आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष मोदी के निमंत्रण को स्वीकार भारत की गणतंत्र परेड की शोभा बढ़ाते हैं वहीं मोदी म्यांमार और थाईलैंड के साथ मिलकर ‘एक्ट ईस्ट’ के नारे को अमली जामा पहनाने की कोशिश भी करते हैं। विरोधाभासों को साधते हुए मोदी हाल ही में संपन्न ‘शंघाई सहयोग संगठन’ के आयोजन में भारत को चीन के ओबोर अवधारणा के लिए चिंता व्यक्त करने वाले अकेले सदस्य देश के रूप में प्रदर्शित करते हैं तो कुछ समय पहले अमेरिका द्वारा एकतरफा जेरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर भारत का मत अमेरिका-इजरायल के विरुद्ध निर्धारित करते हैं। हाल ही में संपन्न हुई ट्रम्प और किम जोंग उन की उल्लेख्ननीय भेंट पर सधी प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे एक ‘सकारात्मक विकास’ कहा और ऐसी उम्मीद लगाई कि परमाणुमुक्त कोरियन क्षेत्र की मंसा के अनुरूप भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) तक फैले संपर्कप्रसार सूत्र को भी दृष्टि में रखा जायेगा। 

चतुष्क और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की अमेरिकी जुगलबंदी के बीच यह सच है कि भारत को रूस के साथ अपनी पारम्परिक मित्रता कुछ परे रखनी पड़ी। इसका कारण यह भी रहा कि पुतिन का रूस, वह पारम्परिक रूस रहा भी नहीं। वैश्विक स्तर पर मोदी अपने सतत विदेश यात्राओं से जहाँ भारत की वैश्विक उपस्थिति बनाये रखी वहीं दक्षिण एशिया क्षेत्र में रूस-चीन-पाकिस्तान मैत्री ने भारत के लिए नयी चुनौतियाँ गढ़नी शुरू कीं। मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल सहित भारत के पड़ोसी देश कहीं न कहीं चीन के ओबोर आर्थिक फंदे में फंसते चले गए। इधर जब ट्रम्प के अमेरिका ने खासा स्वार्थी रुख अपना लिया और जी-७ के अपने सहयोगियों, यूरोपीय देशों और रूस, ईरान आदि के हितों से अधिक अमेरिकी हितों की स्वकेन्द्रित व्याख्या की तो रूस और चीन ने भी अपने वादों को लेकर अमूमन निश्चित रहने वाले भारत के प्रति अपना सहयोगी रुख फिर अपनाया। इशारा मिलते ही मोदी २७ अप्रैल को चीन के शहर वुहान में एक अनौपचारिक भेंट के लिए शी जिनपिंग के पास सहसा पहुँचे। चीन और भारत की इस एजेंडारहित अनौपचारिक भेंट का हासिल खासा उत्साहित करने वाला रहा। भारत और चीन, अफगानिस्तान में साझा अवसरंचनात्मक सहयोग को राजी हुए। डोकलम जैसी किसी स्थिति से बचने के लिए अपने-अपने सुरक्षा बलों को सामरिक दिशानिर्देश देने का फैसला लिया गया। पारस्परिक व्यापार संतुलन के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी। मोदी ने इस अनौपचारिक भेंट के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए जिनपिंग को भारत आने का न्यौता दिया और दोनों नेताओं ने एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था बनाने में अपनी आस्था प्रकट की। अनौपचारिक भेंट को एक नया कूटनीतिक पहल बनाते हुए पुतिन के निमंत्रण पर मोदी २१ मई को रूस के शहर सोची पहुँचे। इस भेंट को दोनों नेताओं ने ‘बेहद उर्वर’ और ‘सर्वआयामी’ करार दिया। मोदी ने जहाँ ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की सदस्यता की पैरवी के लिए पुतिन को धन्यवाद दिया वहीं मिसाइल कण्ट्रोल रिजीम के एनएसजी और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारतीय पक्ष की पैरोकारी के लिए आभार भी व्यक्त किया। हाल ही में चीन ने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रयासों में अपनी भूमिका निभाने की मंशा जताई है, यह एक संतोषप्रद विकास है। 

पिछले दशकों की भाँति विश्व-व्यवस्था सरल ध्रुवीकृत नहीं है। वैश्वीकरण के आर्थिक स्वरूप ने विश्व के देशों को एक जटिल अंतर्निर्भर व्यवस्था में कार्य करने को विवश किया है जिसमें सभी राष्ट्र, अपने ‘राष्ट्र-हित’ की अधिकाधिक आपूर्ति की मंसा रखते हैं। अनिश्चित वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में कूटनीति के सभी कदम समान रूप से लाभकारी नहीं होते लेकिन यह अवश्य कहना होगा कि भारत सरकार ने जिसप्रकार विदेश नीति को अपनी वरीयता में रखा है और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया सऊदी अरब, इजरायल, अफगानिस्तान सहित रूस, उत्तर कोरिया, चीन, ईरान आदि देशों के साथ जिसप्रकार अपने हित संतुलित किये हैं, वह आसान नहीं है।


Friday, June 15, 2018

झटके में इतिहास बनाने वाली मुलाकात




दुनिया भर से आये तकरीबन ढाई हजार से अधिक पत्रकार सिंगापुर के खूबसूरत द्वीप सेंटोसा में इस दशक की बहुप्रतीक्षित भेंट ‘डोनॉल्ड ट्रम्प- किम जोंग-उन’ के साक्षी बने और इस भेंट के एक प्रमुख सूत्रधार दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए-इन ने अमेरिका और उत्तर कोरिया के इस ‘सेंटोसा एग्रीमेंट’ को आख़िरी बचे शीतकालीन अवशेष को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका वाला बताया। यकीनन, विश्व कूटनीति का यह एक शानदार पड़ाव था। कोरियाई द्वीप 1910 से 1945 ई. तक जापानी नियंत्रण में रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में जब अमेरिका-ब्रिटेन-सोवियत संघ के संयुक्त नेतृत्व में हिरोशिमा-नागासाकी की भीषण विभीषिका के बाद जापान ने पराजय स्वीकार कर ली तब कोरिया की सीमाओं से लगे सोवियत संघ और प्रमुख विश्व शक्ति अमेरिका ने कोरिया को विभाजित करने का निर्णय किया। 1950 में सोवियत संचालित उत्तर कोरिया के शासक किम इल-संग और अमेरिका द्वारा संचालित दक्षिण कोरिया के शासक सिंगमन री में समूचे कोरिया को हथियाने के लिए भयानक संघर्ष छिड़ पड़ा. अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री डीन एचेसन ने एक बार कहा था कि दुनिया के सबसे बेहतरीन विशेषज्ञों से यदि सबसे भयानक युद्ध स्थल के बारे में पूछा जाए तो एक स्वर में जवाब कोरियाई प्रायद्वीप होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमन और चीन के माओ जेदांग किसी कीमत पर यह संघर्ष जीतना चाहते थे। 1953 में आख़िरकार युद्धविराम घोषित किया गया जिसमें 38वें समानांतर अक्षांश के उत्तर में नयी सीमा खींची गयी और उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया के मध्य दो मील चौड़ा एक क्षेत्र छोड़ा गया जिसे ‘असैन्य क्षेत्र (DMZ)’ कहा गया। 

जबतक सोवियत संघ अस्तित्व में रहा उत्तर कोरिया बड़ी तेजी से दक्षिण कोरिया की ही तरह प्रगति करता रहा लेकिन सोवियत संघ के विघटित होते ही उत्तर कोरिया विकास की होड़ में दक्षिण कोरिया से बहुत पिछड़ता रहा। किम इल-संग के बाद किम जोंग-इल के समय में उत्तर कोरिया एक बैरकों में बंद देश बनता गया और देश की पिछड़ती अर्थव्यवस्था ने गरीबी और बेरोजगारी को सम्हालने से हाथ खड़े कर दिए। जोंग-इल ने दमन और मिलिटरी मजबूती का दामन पकड़ा जिसमें घोषित-अघोषित रूप से रूस और चीन का साथ मिलता रहा। जोंग-इल के उत्तराधिकारी किम जोंग-उन ने जब 27 वर्ष की उम्र में बागडोर सम्हाली तो उत्तर कोरिया में एक बदलाव देखा गया, लेकिन जोंग-उन अपने देश के भीतर ही मिसाइलों और परमाण्विक आयुध विकास पर काम करते रहे। इस वक्त तक पुतिन और शी जिनपिंग के निर्बाध नेतृत्व वाले रूस और चीन अपनी बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्टतया उजागर करने लगे। चीन, रूस और परमाणु आग्रही उत्तर कोरिया मिलकर एशिया में दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के द्वारा निर्मित शक्ति संतुलन को चुनौती देने लगे। अमेरिका के नेतृत्व में भारत, जापान, आस्ट्रेलिया को मिलाकर एक अनौपचारिक सामरिक समूह चतुष्क (क्वाड) गढ़ा गया जिससे समूचे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रूस-चीन-उ. कोरिया संगति को संतुलित किया जा सके। भड़काऊ बयानों, मिसाइल परीक्षणों और रूस-चीन-अमेरिका के परस्पर मतभेदों से कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव कुछ कदर बढ़ा कि आये दिन विश्लेषक इस संघर्ष में नवशीत युद्ध की झलक निरखने लगे। मार्च, 2017 में उत्तर कोरिया के जापान की ओर चार बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण के बाद, अमेरिकी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने कहा कि विश्व शांति के विरुद्ध उत्तर कोरिया का भय एक नवीन चरण में प्रवेश कर चुका है। मई 2017 में ट्रम्प ने जोंग-उन को परमाणु हथियारों वाला ‘मैडमैन’ कहा। जून 2017 में अमेरिका ने उ. कोरिया पर प्रतिबन्ध लगाए और जुलाई 2017 में उ. कोरिया ने मिसाइल परीक्षण किया जिसकी जद में संभवतः अमेरिका का अलास्का प्रान्त आता है। सितम्बर, 2017 में संयुक्त राष्ट्र संघ में ट्रम्प ने उ. कोरिया को पूरी तरह तहस-नहस करने की चेतावनी दी और संयुक्त राष्ट्र संघ ने उ. कोरिया पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाया। जवाब में किम जोंग-उन ने भी ट्रम्प को मासिक विक्षिप्त करार देते हुए कहा कि भयभीत स्वान भूँकता अधिक है। 

ट्रम्प अपनी विदेश नीति में जबसे खुलकर कारोबारी रुख अपना रहे हैं तब से उनके सहयोगी अपनी वैदेशिक नीतियों में खासा अनिश्चित हो रहे हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को अमेरिकी प्रभाव से लाभ है तो वैश्विक जिम्मेदारी मिलकर उठानी होगी। इससे पहले सहयोगी यह मानते रहे कि सुपरपॉवर शक्ति होने के नाते यह महज अमेरिका की जिम्मेदारी है। नवम्बर, 2017 में जब ट्रंप अपने बारह दिवसीय इंडो-पैसिफिक यात्रा में दक्षिण कोरिया पहुंचे तो उन्होने अपना यह रुख स्पष्ट कर दिया था। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जाए-इन, जो कोरियाई मैत्री के नारे से चुनकर सत्ता तक पहुंचे हैं, अपने देश की किसी वैश्विक कूटनीतिक भूमिका के लिए तैयार नहीं थे और उन्होने उ. कोरिया के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर काम करना शुरू कर दिया। नतीजा बेहद सकारात्मक रहा क्योंकि उ. कोरिया के नए तानाशाह शासक जोंग-उन अपने देश की चरमराती अर्थव्यवस्था से वाक़िफ़ हैं और दक्षिण कोरिया के मैत्री भाव से उत्तर कोरिया के अस्तित्व को लेकर जो उनकी असुरक्षा है, वह भी जाती रहेगी। मार्च, 2018 में अमेरिका और उ. कोरिया दोनों ने ट्रंप-किम भेंटवार्ता की संभावनाओं की घोषणा कर विश्व को चौंका दिया। 8 मई, 2018 को उ. कोरिया ने तीन अमेरिकी बंदियों को मुक्त किया तो ट्रंप ने मुलाकात की तारीख 12 जून तय कर दी। सहसा, उ. कोरिया ने 15 मई को दक्षिण कोरिया से चल रही अपनी वार्ता, प्रस्तावित अमेरिका-द. कोरिया मिलिट्री अभ्यास की चर्चा करके स्थगित कर दी। ट्रंप ने भी बेहद गुस्से और शत्रु भाव में एक चिट्ठी लिखकर 12 जून की प्रस्तावित भेंटवार्ता स्थगित कर दी। अंततः जब किम जोंग-उन ने पंगये-री के अपने न्यूक्लियर परीक्षण स्थल को खत्म करने की घोषणा की तो 1 जून को ट्रंप ने 12 जून की भेंटवार्ता को बहाल करने की घोषणा की। 

12 जून को ट्रंप और जोंग-उन ने जब सिंगापुर के सेंटोसा में 13 सेकेंड का अपना पहला हैंडशेक किया तो कोरियाई प्रायद्वीप, जापान सहित समूचे विश्व के लिए यह अभूतपूर्व क्षण था। इकहत्तर वर्षीय ट्रंप बेहद उत्साहित दिखे वहीं चौतीस वर्षीय जोंग-उन संयमित बने रहे। ट्रंप ने मुलाकात को बेहद सकारात्मक और उम्मीद से बढ़कर करार दिया वहीं जोंग-उन ने कहा कि यहाँ तक आने के लिए अतीत के फंदों से निकलकर आना पड़ा है। सेंटोसा समझौते में तीन महत्वपूर्ण विकास हुए। पहला, उ. कोरिया ने सतत व स्थायी शांति के लिए पूर्ण कोरियाई परमाण्विक निःशस्त्रीकरण पर अपनी प्रतिबद्धता जतायी। दूसरा, अमेरिका ने इसके बदले उ. कोरिया को सुरक्षा की गारंटी प्रदान की। तीसरा, दोनों पक्षों ने एक नये संबंध की नींव रखने की मंसा प्रकट की। उत्साहित ट्रंप ने जोंग-उन को दक्षिण कोरिया के साथ चलने वाले अमेरिकी मिलिट्री ड्रिल बंद करने का आश्वासन भी दिया, जिसपर द. कोरिया ने चिंता भी व्यक्त कर दी कि सहूलियत बड़ी शीघ्रता से दी जा रही। इस भेंटवार्ता को दोनों नेता अपनी-अपनी उपलब्धि मानकर चल रहे हैं। ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में उतरना है और अपने किसी पूर्ववर्ती से अलग उ. कोरिया को सुरक्षा बंदोबस्त देने की बात कहकर वे अपने लिए एक माइलेज तो बना ही रहे हैं, वहीं किम जोंग-उन कुछ वैसा कर गए हैं जैसा कि उनके किसी पूर्ववर्ती तो क्या कोई कोरियाई सपने में भी सोच सकता था। 

यह समझौता विश्व शांति की दृष्टि से यकीनन एक मील का पत्थर है परंतु कुछ आशंकाएं अवश्य ही हैं। समझौते में समयसीमा और शर्तों पर कोई स्पष्टता नहीं है। समझौते के तुरंत बाद जहाँ ईरान ने यह कहकर चुटकी ली कि जोंग-उन को होशियार रहना चाहिए, ट्रंप अमेरिका पहुंचते-पहुंचते समझौता खारिज कर सकते हैं वहीं भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में समझौते की मुबारकबाद देते हुए उ. कोरिया के परमाण्विक सूत्र पर दृष्टि रखने की नसीहत दी जो कि भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) में है। इस समझौता बैठक के बाद भी चीन और रूस की भूमिका एक मूक दर्शक की तो नहीं ही होगी। गौरतलब है कि किम जोंग-उन अपना पहला विदेशी दौरा मार्च, 2018 में चीन का ही किया था। मई, 2018 में एक बार फिर जोंग-उन, शी जिनपिंग से मिलने चीन गए। चीन और रूस इस समझौते से अमेरिकी खतरा क्षेत्र में कम होने से राहत की साँस ले रहे होंगे लेकिन क्षेत्र में अपनी भूमिका के स्थायित्व को लेकर अवश्य ही सजग होंगे। आने वाले समय में जबकि किम जोंग-उन ने अमेरिका आने का ट्रंप का न्यौता स्वीकार कर लिया है सेंटोसा से शांति का सबक तभी धुंधला नहीं पड़ेगा जब अमेरिका, दक्षिण कोरिया और उ. कोरिया सहयोग और शांति के अधिकाधिक आयाम विकसित करें और जापान, रूस के साथ-साथ चीन भी शांति में ही दूरगामी विकास की संभावना देखे। 

Wednesday, June 13, 2018

फिर वही दिल लाया हूँ...!

गंभीर समाचार 


निस्संदेह, भारतीय विदेश नीति के इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्याय रुचिकर रहेगा। नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में व्यक्तिगत रूचि है और विश्व नेताओं से एक व्यक्तिगत रिश्ता बनाने में यकीन रखते हैं। लेकिन विदेश यात्राओं के मामले में उनका रिकॉर्ड यदि बेहद उल्लेखनीय है तो इसका एक कारण मौजूदा वैश्विक परिघटनाओं का बेहद अनिश्चित होना भी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक सुपरपॉवर राष्ट्र जहाँ अपने लिए ध्रुवीकृत और स्पष्ट समर्थन चाहता है वहीं एक वर्ल्डपॉवर राष्ट्र सभी अन्य राष्ट्रों से संतुलित संबंध की आकांक्षा रखता है। अमेरिका का अपने सहयोगियों से निर्बाध समर्थन की अपेक्षा रखना ठीक वैसे ही उचित है जैसे भारत जैसे देशों का लगभग सभी महत्वपूर्ण राष्ट्रों से संबंधों की अपेक्षा रखना उचित है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के आर्थिक परिप्रेक्ष्य ने जहाँ सर्वोच्च शक्ति अमेरिका को यह सहिष्णुता दी है कि विश्व के राष्ट्र संबंधों के मनचाहे आयामों यथा- द्विपक्षीय, बहुपक्षीय आदि में अपने अंतरराष्ट्रीय संबंध बना सकते हैं वहीं भारत जैसे देश वैश्वीकरण से उपजी अपनी नयी शक्ति व स्वीकार्यता को ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ के प्रदर्शन के निमित्त मनचाहा ‘ठोस पक्ष’ अपना सकते हैं। 

बिखरे अफ़ग़ानिस्तान, अशांत पाकिस्तान, उत्कट चीन, विकट रूस और बेतरतीब हिंद महासागर के देशों से घिरे भारत को अमेरिका का सामरिक-रणनीतिक साथ चाहिए था। भारत-अमेरिकी संबंध की गहरी आयोजना जार्ज बुश, बराक ओबामा से होते हुए ट्रम्प तक आ पहुँची थी। युक्रेन विवाद के बाद रूस का चीन की तरफ झुकना, चीन का आक्रामक ओबोर नीति अपनाना, चीन का पाकिस्तान के साथ गलबहियां करना और फिर रूस का पाकिस्तान को पुचकारना, यह सभी परिस्थितियाँ भारत के लिए कठिन चुनौतियाँ पेश कर रहे थे। शक्ति-संतुलन के लिए भारत, अमेरिका की ओर झुकता गया और जापान, आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक अनौपचारिक सामरिक गठबंधन चतुष्क (QUAD) का भाग बन गया जिसकी पृष्ठभूमि मालाबार अभ्यास से बनी थी। अमेरिका ने इसलिए ही भारत को महत्वपूर्ण वैश्विक भूमिका निभाने को आश्वस्त किया और समूचे प्रशांत- हिंद क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक’ कहकर रणनीतियाँ बनानी शुरू की। डोकलाम विवाद से चीन ने भारत-अमेरिका की नयी बनती समझ की शक्ति जाननी चाही और भारत ने भी अपने रुख से जतला दिया कि वह तैयार है। इस बीच चीन और रूस के राष्ट्राध्यक्ष जहाँ अपने-अपने देशों में लगभग सबसे बड़े निर्णायक शक्तिकेंद्र बनकर उभरे वहीं भारत से उनके रिश्ते ठिठकने लगे थे। ऊर्जा जरूरतों ने जरूर भारत को मजबूर किया था कि वह मध्य एशिया के देशों से अपने संबंध प्रगाढ़ बनाये रखे और इसी क्रम में चीन-पाकिस्तान के द्वारा की गयी नाकेबंदी को तोड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के काम को द्रुत गति से संपन्न करने में मदद दी। 

पेशे से व्यापारी ट्रम्प ने जबसे अमेरिकी विदेश नीति में भी अपनी वणिक बुद्धि लगाई है, सभी देश, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समीकरण की नई व्युत्पत्ति (डेरिवेशन) खोजने में लगे हैं। घरेलू राजनीति के अपने ‘अमेरिका फर्स्ट’ नारे को महज जुमला न रखते हुए ट्रम्प अपने देश के हित में कुछ ऐसी संरक्षणवादी नीतियों का सहारा ले रहे हैं जिनसे फौरी तौर पर आर्थिक रूप से यदि अमेरिका को लाभ होगा भी तो दीर्घावधि में सामरिक रूप से काफी हानि उठानी पड़ सकती है। ट्रम्प, विदेश नीति में भी खासा कारोबारी (ट्रांजैक्शनल) रुख अख्तियार कर रहे हैं। वह बहुपक्षीय रिश्तों से अधिक द्विपक्षीय रिश्तों को तरजीह दे रहे हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी देश को अमेरिका का सहयोगी राष्ट्र बनने से किसी क्षेत्र विशेष में लाभ है तो उसका भार उठाने में वह देश भी स्पष्टतया आगे आये। इससे पहले एकलौते सुपरपॉवर अमेरिका की यह वरीय जिम्मेदारी होती थी। इसलिए ही भारत से जब-तब मांग की जाती है कि वह अफग़ानिस्तान में अपने सुरक्षा बल भी भेजे। ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ कहने के पीछे भी अमेरिका की यही मंसा है क्योंकि यदि चीन का उभार केवल अमेरिका के लिए ही नहीं एक चिंता का विषय है तो भारत को भी हिन्द महासागर क्षेत्र से प्रशांत क्षेत्र तक की जिम्मेदारी उठानी होगी। 

ट्रम्प, अमेरिका की विदेश नीति को खासा घरेलू बना रहे हैं और ओबामा प्रशासन के समय विकसित हुई सभी बड़े मसलों पर पनपी समझ से अपने कदम पीछे खींच रहे हैं। ट्रम्प का यह अनिश्चित व्यवहार, उनका अडवेंचरिज्म, अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को एक बेहद कठिन और अनिश्चित स्थिति में डालता है। ट्रम्प के हालिया CAATSA प्रावधान ने तो अति ही कर दी जिसके मुताबिक अमेरिका, ईरान, रूस और उत्तर कोरिया से पर प्रतिबंध लगाने की बात की है जिससे इन राष्ट्रों के साथ-साथ, इनसे जुड़े दूसरे राष्ट्रों के व्यापारिक हितों पर कुप्रभाव पड़ना तय है। तेल और रक्षा जरूरतों के लिए भारत सीधे क्रमशः ईरान और रूस से जुड़ा हुआ है। CAATSA के प्रावधानों की आलोचना जहाँ ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी सहित दूसरे यूरोपीय देशों ने एक-स्वर में की है वहीं उन्होंने अमेरिकी अनिश्चितत्ता के सापेक्ष दृढ़ रूस की प्रशंसा उसे यूरोप का पारम्परिक-अभिन्न अंग बताकर की है। 

वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति के इस बदलते टेम्पलेट में भारत, रूस और चीन से अपने रिश्तों को सम्हालने को मजबूर हो गया है। यों भी क्षेत्रीय राजनीति के तथ्यों को नजरअंदाज कर वैश्विक राजनीति नहीं की जा सकती। हिंद महासागर में बढ़ते चीन का प्रभाव और मध्य एशिया व मध्य-पूर्व एशिया में रूस की बढ़ती अहमियत ने भारत को विवश किया है कि वह अपना गियर बदले और रुख बीजिंग और मास्को की ओर मोड़े। इधर उत्तर कोरिया के दक्षिण कोरिया और अमेरिका से बढ़ते ताल्लुकातों के मद्देनज़र चीन और रूस के लिए भी जरूरी था कि ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान के साथ-साथ भारत को भी लुभाया जाय। रूस ने भारत की पैरवी कर चीन संचालित बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक संगठन शंघाई सहयोग संगठन की पूर्ण सदस्यता दिलवाई, भारत के लिए एन. एस. जी. और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् में सदस्यता की वकालत की। रूस ने भारत को यह इंगिति दे दी है कि बदलते वक्त में भारत का चीन की उपेक्षा करना समझदारी नहीं होगी जबकि अमेरिका काफी स्वार्थी रुख अपना रहा है। 

भारत ने संकेत लेते हुए अपना रुख लचीला किया और चीन और रूस से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू कीं। अप्रैल के आखिरी दिनों में मोदी सहसा चीन के शहर वुहान पहुँचे, जिसकी तैयारियाँ दोनों देशों के अधिकारी महीनों से कर रहे थे। दोनों देशों ने इसे एक ‘अनौपचारिक भेंट’ का नाम दिया जिसमें पहले से कोई भी एजेंडा नियत नहीं था। दो दिनों की अपनी इस यात्रा में मोदी और शी जिनपिंग लगभग दस घंटे के पारस्परिक वार्ता में रहे। बताया गया कि दोनों नेताओं ने लगभग सभी पारस्परिक मुद्दों पर प्रभावी बातचीत की।  भारत-चीन ने अफगानिस्तान में संयुक्त आर्थिक प्रक्रम पर सहमति जताई और सीमा पर तैनात अपने-अपने देश की सुरक्षा को नवीन सामरिक निर्देश देने की बात की। दोनों नेताओं ने भविष्य में सामरिक और रक्षा सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था पर भी सहमति जताई। चीन से बढ़ती नजदीकी का लाभ निश्चित ही भारत-पाकिस्तान संबंधों में भी एक सरलता लाएगा। आपसी व्यापारिक चिंताओं पर बात करते हुए मोदी और जिनपिंग ने बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपनी आस्था व्यक्त की। ‘वुहान अनौपचारिक भेंट’ की सफलता पर जहाँ चीनी अख़बार उल्लास व्यक्त कर रहे थे वहीं इस ‘अनौपचारिक भेंट’ की अगली कड़ी के रूप में मोदी का जिनपिंग को 2019 में भारत यात्रा का निमंत्रण भी छाया रहा। वुहान अनौपचारिक भेंट की ही तर्ज पर मोदी ने 21 मई को रूस के शहर सोची की यात्रा की जहाँ राष्ट्रपति पुतिन से उनकी गहन वार्ता हुई। दोनों देशों ने पारंपरिक संबंधों का हवाला दिया और लगभग सभी द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर विमर्श किया। राष्ट्रपति पुतिन स्वयं, मोदी को छोड़ने हवाई अड्डे पर आये और पश्चिमी मीडिया भारत के इस ‘अनौपचारिक भेंट कूटनीति’ पर टिप्पणी करता रहा। 

रूस और चीन के लिए ‘फिर वही दिल लाकर’ मोदी ने एक संतुलन साधने की कोशिश अवश्य की है लेकिन अमेरिका द्वारा पिछले 30 मई को अपने बेहद महत्वपूर्ण पैसिफिक कमांड का नामकरण ‘इंडो-पैसिफिक’ करना बताता है कि भारत दरअसल एशियाई राजनीति की ऐसी धुरी बन गया है जिसपर सभी विश्वशक्तियाँ झूलने को तैयार हैं। यह भारत को कूटनीतिक अवसर तो देता है पर चुनौतियों की नयी गंभीरता भी बनाता है।         

Thursday, May 31, 2018

मोदी डॉक्ट्रिन नहीं पर मोदी प्रभाव




भारतीय लोकतंत्र की विपुल संभावनाएं कुछ ऐसी हैं कि इसमें यह उम्मीद करना कि प्रधानमंत्री एक प्रशिक्षित सामरिक चिंतक हों, ठीक नहीं। इसलिए जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक की विदेश नीति, संस्थागत प्रयासों से अधिक व्यक्तिगत करिश्मे से अधिक संचालित की गयी। आज़ादी के बाद जन्मे नेताओं की पीढ़ी के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में भी यह करिश्मा है और उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल भी किया। विश्व-नेताओं को उनके पहले नाम से संबोधित करना हो या उन्हें गर्मजोशी से गले लगाना हो, मोदी हमेशा विदेश नीति में व्यक्तिगत सिरा खंगालते रहे। अमेरिका, फ़्रांस और जापान के द्विपक्षीय संबंधों में इसका असर भी महसूस किया गया। मोदी सरकार से विदेश नीति को लेकर की जा रही अपेक्षाओं के दो बड़े आधार थे। एक तो कांग्रेस से इतर पहली बार कोई दूसरा दल प्रचंड बहुमत से सत्ता को गले लगा रहा था दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जैसे नेता शपथ ग्रहण करने जा रहे थे जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने दिनों में न केवल कई विदेश यात्राएँ की थीं और व्यापारिक समूहों आदि से संबंध स्थापित किये थे बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के विश्वस्त के रूप में कूटनीतिक संदर्भ में मलेशिया और आस्ट्रेलिया भी भेजे जा चुके थे। नेहरू की तरह ही, प्रधानमंत्री बनने के पूर्व से ही नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में दिलचस्पी खासी व्यक्तिगत रही है। भारत की विदेश नीति को सामयिक, शक्तिशाली और दूरगामी बनाने के ऐतिहासिक अवसर का नरेंद्र मोदी को भान था और किसी तरह की कोई ऐतिहासिक हिचक उनके सामने नहीं थी। 

चुनाव के समय लिए गए अपने कठोर प्रतिक्रियावादी रुख से उभरी आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए शपथ ग्रहण समारोह में सभी पड़ोसी राष्ट्रों के प्रमुखों को आमंत्रित कर नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वयं से उम्मीदों के पर लगा दिए। इराक से सफलतापूर्वक बचाई गयीं 46 नर्सों ने आश्वस्त किया कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ टीम मोदी, सशक्त और अपने विज़न में स्पष्ट है। फिर शुरू हुई मोदी की सतत विदेश यात्रा। कुल लगभग 36 विदेश यात्राओं के साथ, प्रधानमंत्री मोदी कोई 56 देशों की ज़मीन पर पाँव रख चुके हैं। इनमें कई देश ऐसे रहे, जहाँ अरसे बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुँचा अथवा मोदी पहली बार पहुँचे। विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए भी यह एक ‘जुड़ाव’ का मौका था और इससे देश को सॉफ्ट पॉवर के रूप में भी स्थापित करने में मदद मिली है । बहुत सारे देशों में द्विपक्षीय वार्ताएं जो ठिठकी पडी थीं, वह पुनः शुरू हुई हैं। 

यह सही है कि अपनी आर्थिक क्षमता, सांस्कृतिक प्रभाव और पिछली सरकारों की वैश्विक सक्रियता से वैश्विक पटल पर भारत की एक अहमियत गढ़ी जा चुकी थी पर मोदी की एक्टिव फॉरेन पॉलिसी ने विश्व को अवश्य यह दिखलाया कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका समझता है। पिछले चार साल, वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद अनिश्चित रहे हैं, कोई खास पैटर्न अकेले इसकी व्याख्या नहीं कर सकता। दुनिया के महत्वपूर्ण देशों यथा- चीन, रूस, जापान, जर्मनी आदि देशों में शक्तिशाली नेतृत्व बना हुआ है और विश्व, द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के मध्य हिचकोले लेता रहा। रूस ने चीन, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया के साथ अपनी संगति बिठाई तो जापान की पहल पर अमेरिका ने भारत और आस्ट्रेलिया को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ज़िम्मेदारी दी। ट्रम्प का अमेरिका अपनी नीतियों में इतना मोलतोल वाला और चौंकाऊ रहा कि भारत सहित उसके साथी देश अपनी-अपनी विदेश नीति में कोई सुसंगतता स्थापित ही नहीं कर पाए। यूपीए सरकार की तरह ही बढ़ते गैर-पारंपरिक असुरक्षाओं के युग में भी पारंपरिक हथियारों की खरीददारी में मोदी सरकार अव्वल रही और ईयू, फ़्रांस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि से व्यापारिक-सामरिक समझौते भी संपन्न हुए। चाबहार प्रोजेक्ट, आईसीजे में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना, आसियान राष्ट्रप्रमुखों को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करना आदि यकीनन नरेंद्र मोदी सरकार की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। 

मोदी सबसे अधिक विफल अपने इर्द-गिर्द पड़ोस में हैं। एक भूटान को छोड़कर कहीं और भारत अपने संबंध संजो नहीं पाया है। आक्रामक चीन के सापेक्ष हमारी तैयारी बेहद शिथिल है। नौकरशाही पर नकेल कसने में असफल मोदी की विदेश नीति में न कोई रचनात्मक दृष्टि दिखी न ही तारतम्यता। तारतम्यता के अभाव ने ही मोदी-डॉक्ट्रिन जैसी कोई चीज स्थापित नहीं करने दिया है। सत्ता के आखिरी महीनों में मोदी कुछ उल्लेखनीय बटोरने की हड़बड़ी में दिखते हुए एक बार फिर चीन, रूस आदि से संपर्क साध रहे हैं पर नेहरू बनना उनके लिए कठिन हैँ और पटेल ने कोई नज़ीर छोड़ी नहीं है। 

*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार व सम्प्रति गलगोटियाज यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष हैं। 

‘आई हेट पॉलिटिक्स': एक पिछड़ा और गैर-जिम्मेदार जुमला





राजनीति' एक अद्भुत शब्द है। यह विषय भी है और व्यवहार भी, प्रक्रिया भी है और कला भी। इतनी घुली-मिली है कि जो इसमें रूचि नहीं लेता यह उसमें भी रूचि लेती है। राजनीति का केवल एक 'सार्वजानिक' पक्ष ही हमें दिखलाई पड़ता है और इस पक्ष के जो खिलाड़ी हैं उनके चरित्र से ही समूचे राजनीति का हम चरित्र-चित्रण कर देते हैं। राजनीति का यह 'सार्वजानिक पक्ष' भी हमें इतना प्रभावी रूप से दृष्टिगोचर इसलिए होता है क्योंकि हमनें 'लोकतांत्रिक' शासन प्रणाली अपनाई है और इसकी कई संक्रियाओं में हमें स्वयं को परिभाग करने का अवसर मिलता है। किन्तु 'राजनीति' को केवल उसके इस सार्वजानिक पक्ष से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उससे पहले यह इस सार्वजानिक पक्ष का दर्शन तैयार करती है, इस प्रश्न का उत्तर तैयार करती है कि आखिर हमें कोई व्यवस्था क्यों चाहिए और अंततः यह व्यवस्था हम कैसे आत्मसात करने जा रहे हैं! यह सभी महत्वपूर्ण बिंदु हैं।

विषय के रूप में 'राजनीति' पल-पल बदलते व्यक्ति के बहुमुखी विकास की चिंता करती है। व्यवहार के रूप में 'राजनीति' उन प्रक्रियाओं की तमीज देती है, जिनसे 'अधिकतम का वृहत्तम हित' सधे। कला के रूप में 'राजनीति' विरोधाभासी हितों में संतुलन की प्रेरणा देती है। चूँकि लोकतंत्र सभी को राजनीति में परिभाग करने की स्वतंत्रता देती है तो 'राजनीतिक अध्ययन' से अधिक 'राजनीतिक व्यवहार' की महत्ता दिखने लगती है। गाड़ी चलाने वाला हर ड्राइवर न ट्रैफिक नियम जानता है और न ही वह निश्चितरूप से ट्रैफिक की गलतियाँ ही करता है। प्राकृतिक विज्ञानों के अलावा ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में 'अनुभवजन्य बोध' भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने कि सैद्धांतिक बोध क्योंकि यहाँ ऑब्जेक्ट डायनामिक ह्यूमन बींग है। इसलिए अच्छा ड्राइवर होना और एक अच्छा मोटर इंजीनियर होने में फर्क है और ‘पोलिटिकल लिटरेसी’ समय की मांग है। 

राजनीति के लोकतांत्रिक हस्तक्षेप ने मिस्त्री लोगों को भी पर्याप्त अवसर दिया है और वे हर बार निराश ही नहीं कर रहे हैं। समझना होगा ये हम हैं कि अपने लोकतंत्र के लिए 'इंजीनियर' के ऊपर 'मिस्त्री' प्रेफर कर रहे हैं। अरस्तु ने राजनीति को 'विषयों का विषय' कहा है और प्लेटो ने राजनीति में सबके आवाजाही की मनाही की है। प्लेटो राजा भी दार्शनिक चाहते हैं। इसलिए ही अरस्तु ने 'लोकतंत्र' को भीड़तंत्र कहा है क्योंकि इसमें योग्यता से अधिक संख्या का महत्त्व हो जाता है।

लोकतंत्र फिर क्यों? क्योंकि औद्योगीकरण के पश्चात् ज्यों-ज्यों पूंजी की हवस बढ़ी, उपनिवेशवाद आया जिसने व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना शुरू किया। उपनिवेश ज्यों-ज्यों स्वतंत्र होते गए उन्होंने सबसे पहले अपने नागरिकों वह देना चाहा, जिससे वह वंचित थे, वह था व्यक्ति का व्यक्तित्व-स्वतंत्रता। केवल लोकतंत्र में ही समानता संभव है और उपनिवेशवाद ने समूचे उपनिवेश के प्रत्येक व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व छीना था इसलिए आधुनिक समय में 'लोकतंत्र' एक 'व्यवस्था' से अधिक एक उदात्त 'मूल्य' बनकर उभरा।

भारत का एक औपनिवेशिक अतीत है और इतिहास कहता है कि भारत की जनसँख्या में भांति-भांति के लोगों का सुंदर सम्मिश्रण है। आजाद भारत लोकतंत्र के अलावे कोई और व्यवस्था अपना ही नहीं सकता था क्योंकि यहाँ के लोगों में विभिन्नता है और केवल लोकतंत्र उनमें 'समानता' और 'स्वतंत्रता' का विश्वास उपजा सकता था। यह विश्वास उस सद्यजात राष्ट्र को आवश्यक भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता प्रदान करता है जिसने तुरंत ही विभाजन का दंश झेला हो और जिसकी 500 से अधिक रियासतों का एकीकरण किया जाना हो। भारत के लोकतंत्र में सभी आवाजों के लिए जगह होनी चाहिए, सो सभी चुनाव लड़ सकते हैं। निर्दलीय भी। 17% साक्षरता वाले राष्ट्र को आधुनिक राजनीतिक-समाजीकरण की प्रक्रिया से साक्षात्कार कराना जरूरी थी पर यह राज्य की तरफ से न हो नहीं तो निष्पक्ष नहीं होगा और इसके बिना व्यवस्था के ढहने का भी डर था। फिर जनता के विभिन्न मांगों को पूरा करने का कोई एक तरीका ही थोपना आगे चलकर खतरनाक हो सकता था। इसलिए राजनीतिक दलों की प्रणाली लाई गयी। भारत की महान विभिन्नता देखते हुए द्विदलीय व्यवस्था को नहीं स्वीकारा गया। बहुदलीय व्यवस्था में चेक एंड बैलेंस प्रणाली भी चल सकती है। बहुमत दल का नेता सरकार बनाये अथवा मिनिमम कॉमन प्रोग्राम के हिसाब से गठबंधन की सरकार बने और शेष सांसद उनपर पैनी नज़र रखें।

विपक्ष उतना ही जरूरी है जितना की सत्ता पक्ष। दलविहीन व्यवस्था अथवा सर्वदलीय व्यवस्था में विपक्ष अनुपस्थित होगा अथवा अंतर्निहित होगा तो कमजोर होगा, जो कि एक खतरनाक स्थिति होगी। पॉँच साल तक किसी भी तरह का सार्वजानिक नियंत्रण ही नहीं होगा। लोकतंत्र की चिंता येनकेनप्रकारेण केवल सरकार बनवा देना नहीं है, बल्कि राजनीतिक मूल्यों का संवहन करते हुए राजनीतिक विकास की गुंजायश टटोलना है। एक नया चुनाव हमेशा एक सस्ता विकल्प है बनिस्बत एक भ्रष्ट स्थिर सरकार के, जिनके घोटाले ही न पकडे जा सकें और जो पकड़ें जा सकें तो कभी उनका निपटारा ही न हो सके। गठबंधन की सरकार भारत की विभिन्नता देखते हुए स्वाभाविक है और उनकी खींचातान भी जायज है क्योंकि विरोधाभासी मांगों का संतुलन यों भी कठिन है। राजनीतिक व्यवस्था अपने संविधान के अनुरूप इतनी खूबसूरत है कि बहुमत के साथ वही दल सत्ता में आ सकता है जिसके प्रतिनिधियों में विभिन्नता से प्रतिनिधित्व बंटा हो। ऐसा नहीं होता तो गठबंधन से यह शर्त पूरी होती है।

ध्यान रहे, हमारे राष्ट्र के दो अमूर्त आधार हैं: १. एकता और २. विभिन्नता। इसलिए ही यहाँ राष्ट्रपति है तो प्रधानमंत्री भी है, मुख्यमंत्री भी है और राज्यपाल भी। किसी भी दूसरे विकसित राष्ट्र से अपने राष्ट्र की सीधी तूलना नहीं हो सकती। कांग्रेस जो कभी अपराजेय थी और भाजपा जो अभी अपराजेय लगती है, राज्यसभा में उन्हें अवश्य नियंत्रण में रहना पड़ता है। हमारा संविधान बेहद शानदार है। पर परेशानी यही हैं। हम, अपना संविधान जानते कितना हैं? 

सत्ता, ऐसी शिक्षा बनाती है जिससे पीढियाँ 'राजनीतिक अध्ययन' का महत्त्व विस्मृत कर जाती हैं। इससे राज करना आसान हो जाता है क्योंकि राजनीतिक रूप से जागरूक जनता तीखे सवाल करेगी और मीडिया का निष्पक्ष न रहना उसे तुरंत दिखेगा। सत्ता, राजनीतिक-अध्ययन से मिलने वाले रोजगार पर चोट करेगी जिससे राजनीति पढ़ने वाले साधनविहीन आदर्शवादी लगेंगे। ध्यान से देखिये, सरकार चाहेगी कि सारे महत्वपूर्ण पद जहाँ इलेक्शन नहीं सिलेक्शन की जरुरत होती है, उन्हें 'कमिटेड ब्यूरोक्रेसी' से भरा जाय, जिससे शासन आसान हो। यह माहौल बनेगा जब जनता 'कोउ नृप होय, हमें का हानि' की मानसिकता में आये और हम जनता-जनार्दन अपने-अपने घरों की जो नयी पीढ़ी है उसका सबसे बेहतर टैलेंट-पूल नौकर (ब्यूरोक्रेसी अथवा डॉक्टर, इंजीनियर ) बनाने में करते हैं और लोकतंत्र में जहाँ बॉस जनता होती है उसे अपने घर का हारा-थका, लापरवाह सेक्शन मायूसी से सौंपते हैं कि कुछ नहीं तो सरकारी ठेकेदार तो बनी जायेगा । वोट नहीं देने जाते, आसानी से वोटबैंक बन जाते हैं।

राज्य और नागरिक समाज साथ-साथ ही स्वास्थ्य के साथ पनपते हैं। इनमें से एक की अक्रियता दूसरे को रुग्ण बनाती है। नागरिक समाज, राज्य के सरकार नामक तत्व पर नियंत्रण रखती है। किन्तु भ्रष्ट सरकारें और दिशाहीन अक्रिय नागरिक-समाज 'राजनीतिक-शिक्षा (पोलिटिकल लिटरेसी) के प्रचार-प्रसार में उसी तरह चुप्पी साध लेती हैं जैसे भ्रष्ट दुकानदार दवा की एक्सपायरी डेट छुपाता है। हमें अपने-अपने स्तर पर अध्ययन-मनन और व्यवहार की पद्धति से राजनीतिक जागरूकता बढ़ानी होगी।

संविधान का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद बाबा आंबेडकर ने कहा था कि-वह नागरिक ही होते हैं, जो किसी देश के संविधान को सफल बनाते हैं। देखिये न, अमेरिका का संविधान कितना तो छोटा है और संसद की जननी ब्रिटेन में लिखित संविधान ही नहीं है। हमारे पास दुनिया के सबसे बड़े संविधानों में से एक संविधान है बस हम राजनीति में अपने-अपने रीति से योग ही नहीं कर रहे। जो चाहते हैं कि चुनाव के बाद आपको सचमुच फायदा हो तो आप प्रधानमंत्री नहीं, अपने-अपने क्षेत्र से सुयोग्य सांसद चुनिए. और हाँ, ये न कहिए कि विकल्‍प नहीं है. आपके क्षेत्र में जरूर एक संकल्पवान, ईमानदार प्रत्याशी खड़ा मिलेगा, पर शायद उसके साथ कोई खड़ा न मिले. आप अपना एक बहुमूल्य मत उसे दें, कम से कम बाकियों की तरह अपना मत व्यर्थ न होने दें. वह हारेगा भी तो संघर्ष करने का माद्दा मन में भरेगा और अगली बार फिर मैदान में होगा.

अपने-अपने क्षेत्र में आप विकल्‍प चुनिए, भारतीय राजनीति, राष्ट्रीय परिदृश्य में सहसा नए विकल्‍प उपस्थित कर देगी. यह नया विकल्‍प अपने साथ किसी उद्योगपति का बकाया नहीं लेकर आएगा, जात-पात, धरम और सेना का नाम लेकर नहीं आएगा तो खुलकर काम करेगा. आप अचानक राजनीति में परिवर्तन भर देंगे और आप तब केवल नागरिक कहलाने की सच्ची परिभाषा ही नहीं पूरी करेंगे बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान-निर्माताओं के सपनों का भारत बनाने की दिशा में काम करने वाले सच्चे देशभक्त बनेंगे. तब राजनीति आपके लिए कोई खेल या मनोरंजन अथवा गॉसिप की चीज नहीं होगी, बल्कि इसमें आप सीधा योग करेंगे. क्योंकि, फिर कहता हूँ कि भाजपा, कांग्रेस में कोई अंतर है नहीं. एक के मुकदमे की सुनवाई की अगली तारीख दूसरा ले लेता है.

मैंने जो कहा है वह आपको यूटोपियन लग सकता है, इसलिए नहीं कि मै गलत कह रहा, बल्कि इसलिए कि पहले तो आप मत देने जाएंगे ही नहीं और जो जाएंगे भी तो अपना मत किसी परिचित, जात वाले, धरम वाले को देकर आ जाएंगे. फिर जो आपको अपना वोटबैंक समझते हैं, उन्हें ही वोट देकर आप सोचेंगे कि मेरा वोट व्यर्थ नहीं गया, जबकि आपका मत केवल व्यर्थ ही नहीं होता इससे, बल्कि अगले पांच साल का भविष्य दाँव पर लग जाता है और अगली पीढ़ी भी आपकी तरह 'आई हेट पॉलिटिक्स' का पिछड़ा, गैर-जिम्मेदार जुमला कहने लग जाती है.



त्रेता में मोदी और कल में ओली

साभार: गंभीर समाचार 



जब हम पैदल होते हैं तो तेज रफ़्तार गाड़ियों पर कोफ़्त होती है और जब हम गाड़ी में होते हैं तो कई बार बीच में आ जाने वाले पैदल यात्रियों पर कोफ़्त होती है। यहाँ, नैतिकता से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न वरीयता का है। विश्व-राजनीति में कुछ इस तरह ही अपने राष्ट्र के हित ही वरीय होते हैं चाहे हमारा अतीत कुछ भी हो और वर्तमान जैसा भी हो। एक समझदार राष्ट्र और उसके कुशल कूटनीतिज्ञ यह समझते हैं कि अपने राष्ट्र के राष्ट्रहित किसी दूसरे राष्ट्र के सापेक्ष तभी और उसी सीमा तक साधे जा सकते हैं, जब और जिस सीमा तक हमारे हितों की आयोजना में उस राष्ट्र को अपना राष्ट्रहित भी दिखे। भारत-नेपाल संबंधों में भारतीय कूटनीति से यह त्रुटि हाल के वर्षों में हुई है। 

भारत अपने गहरे सांस्कृतिक संबंधों की थाती पर नेपाल और भूटान से आधुनिक संबंधों का निर्वहन करता रहा है। इसलिए ही भारत से लगी दोनों राष्ट्रों की सीमायें ‘ओपन बॉर्डर सिस्टम’ में हैं और दोनों राष्ट्रों के नागरिक भारतीय सीमा में आवाजाही कर सकते हैं। राष्ट्रहित कोई स्थिर मूल्य नहीं हैं। वैश्विक राजनीतिक हलचलों के अनुरूप उनमें गतिक सम्भावना बनती रहती है। पड़ोस में उभरते शक्तिशाली चीन के बीचो-बीच भूटान और नेपाल, भारत के लिए बफर-स्टेट हैं, इसलिए ही भारत के दोनो  राष्ट्रों से संबंध अहम हैं। भूटान और नेपाल के चीन के साथ संबंधों का कोई मजबूत पारंपरिक आधार नहीं रहा है और इसलिए भी भूटान और नेपाल, भारत के साथ अपनी नजदीकियाँ स्वाभाविक मानते रहे और चीन से उनकी कमोबेश दूरियाँ बनी रहीं। दोनों ही देश स्थलबद्ध (लैंडलॉक्ड) देश हैं और सामुद्रिक व्यापार के लिए भारत पर निर्भर हैं। बुद्ध की मंदस्मित से भूटान और राम की आदरणीय दृष्टि से नेपाल, भारत को देखता रहा। ‘मुक्त सीमाओं’, पर होने वाले पारस्परिक लाभों के अनुपात में भ्रष्ट भारतीय नौकरशाही से होने वाली हानियाँ नज़रअंदाज़ की जाती रहीं। 

संपूर्ण विश्व के लिए एक शानदार उदाहरण बनाते हुए भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने अपने देश में पहले लोकतांत्रिक संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक चुनाव कराया और 2007-2008 में यह देश राजशाही छोड़ एक लोकतांत्रिक सांविधानिक राजशाही वाला देश बन गया, जहाँ संसद के दो-तिहाई बहुमत से राजा पर महाभियोग भी आरोपित किया जा सकता है। इधर अपने तीन दशक के त्रासद राजनीतिक अस्थिरता से जूझते नेपाल ने भी राजशाही समाप्त कर और माओवादियों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाकर 2008 में संविधान-सभा गठित कर लोकतंत्र को अपनाने की प्रक्रिया शुरू की । नेपाल के तिब्बत से सटे ऊंचाई पर बसे इलाके हिमाल कहलाते हैं, पहाड़ के लोग मध्य नेपाल के निवासी हैं और भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार से जुड़े सीमाई लोग मधेसी अस्मिता वाले तराई के कहलाते हैं। यह विभाजन इतना सरल नहीं है, पर नेपाली राजनीति में इनकी जटिलताएं महत्त्वपूर्ण हैं और इसीलिए नेपाल की संविधान निर्माण की यात्रा इतनी दुरूह रही है। सितम्बर 2015 में  दूसरा नया लोकतांत्रिक संविधान स्वीकार किया गया। इस नए संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक नेपाल में नयी सरकार वामपंथी गठबंधन के खड्ग प्रसाद ओली के नेतृत्व में बन चुकी है और फ़िलहाल वामपंथी गठबंधन 17 मई 2018 को दो अध्यक्षों के साथ एक दल ‘नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी’ में परिणत हो गया।  

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की चुनी हुई सरकार किसी भी अन्य चीजों की बजाय अपना राष्ट्रहित ही प्रथम रखेगी। इसलिए ही डोकलम मुद्दे के बाद प्रधानमंत्री शेरिंग ताबगे का भूटान सचेष्ट हुआ है और ओली का नेपाल, भारत और चीन के मध्य बफर स्टेट की स्थिति के लाभों के दोहन को लेकर आतुर हुआ है। लगभग इसी दशक में शक्तिशाली चीन ने दक्षिण एशिया में भारत के पड़ोसियों से संपर्क घना करते हुए भारत को अपनी स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की नीति से घेरना शुरू किया है। चीन ने अपने शक्तिशाली नेता शी जिनपिंग को अब उनके पूरे जीवनकाल के लिए चुन लिया है। ग्लोब पर नेपाल तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है और ऊपर की और उत्तर में इसका मुहाना चीन की ओर खुलता है। भारत की नेपाल से 1950 में की गयी ‘फ्रेंडशिप ट्रीटी’ के ‘मुक्त-सीमा प्रबंधन’की तर्ज पर सजग चीन ने 1968 में अपनी सीमा भी ‘फ्रेंडशिप हाइवे’ के नाम से लगभग खोल ही दी। अब जबकि नए नेपाल में वामपंथी सरकार बनी है, चीन और नेपाल के संबंध निश्चित ही प्रगाढ़ होने वाले हैं। 

नेपाल विषय पर कहना होगा कि मोदी सरकार से बार-बार ग़लतियाँ हुई हैं। प्रधानमंत्री बनते ही नेपाल उन देशों में रहा जहाँ मोदी ने शुरू में ही यात्रा की। लेकिन राजनीति में परसेप्शन और प्रतीकों का महत्त्व जानने वाले समझते हैं कि अपनी पहली यात्रा और हालिया की गयी तीसरी यात्रा में मोदी ने वही ग़लतियाँ दोहराई हैं। संभवतः भारतीय कूटनीतिक कुटुंब अभी भी नेपाल को हिन्दू राजतंत्र की तरह ही देख रहा है। मोदी की पहली यात्रा अगस्त 2014 में एक ऐसे समय में हुई जब नेपाल में विभिन्न नागरिक-अस्मिताएँ आगामी संविधान में अपनी जगह बनाने को संघर्षरत थीं। राजशाही के बाद यह तय था कि आगामी लोकतांत्रिक संविधान में जो नया नेपाल गढ़ा जायेगा वह महज बहुसंख्यक हिन्दू अस्मिता को सर्वोपरि नहीं रखेगा। विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण और इंटरनेट के इस दौर में नेपाल की जनता सजग होकर कदम उठा रही थी कि नए नेपाल की राजनीतिक पहचान महज धार्मिक कत्तई न हो। ऐसे में मोदी की पहली यात्रा में जो उनकी छवि निर्मित हुई वह पशुपतिनाथ मंदिर में 2500 किग्रा चंदन चढ़ाने वाले और धर्मशाला के लिए 25 करोड़ रूपये देने वाले एक ऐसे भारतीय नेता की हुई जो अपनी धार्मिक पहचान को राष्ट्रप्रमुख रहते हुए भी व्यक्त करना चाहते हैं। 

इसके कुछ महीने बाद ही सार्क सम्मेलन (नवंबर 2014 ) में हिस्सा लेने गए मोदी चाहते थे कि वे नेपाल के धार्मिक स्थल जनकपुर, मुक्तिनाथ व लुंबिनी के दर्शन भी करें पर उन्हें अनुमति नहीं मिली थी। नेपाली राजनीति में राजशाही के दौर से ही हिमाल और पहाड़ के बाहुन और खेत्री/छेत्री समुदाय लगभग 29% जनसंख्या के साथ सर्वाधिक प्रभावी रहे हैं और तराई के मधेशी, 35% जनसंख्या के साथ भी राजनीति में सीमान्त ही रहे हैं। मधेसी समुदाय, भारतीय सीमा में घुला-मिला समुदाय है और भारत से इनके गहरे आर्थिक-सांस्कृतिक संबंध हैं। नेपाल के प्रोविंस नंबर-2 में मधेस सर्वाधिक तादात में हैं और जनकपुर इस प्रोविंस का हेडक्वार्टर भी है। सार्क-सम्मेलन के दौरान जबकि नेपाल में नए संविधान के पूरे होने की समय-सीमा में महज दो महीने शेष थे, संविधान सभा की कार्यकारी सरकार ने मोदी की जनकपुर यात्रा पर मुहर नहीं लगाई ताकि किसी किस्म की लामबंदी न हो। 

अप्रैल 2015 में आये विनाशक भूकंप में भारत और चीन ने नेपाल की मानवीय मदद की, किन्तु प्रधानमंत्री मोदी के उत्कट लोकसभा विजय-अभियान की ख़ुमारी में ही रहने वाले कुछ अतिवादी मीडिया टीवी चैनल की अतिवादी प्रस्तुति ने भारतीय कूटनीति के कमाए गुडविल फैक्टर को लील लिया। चीन ने मौके का फायदा उठाया और नेपाल की कई अवसरंचनात्मक प्रोजेक्ट्स में निवेश किया। नेपाल ने उसके महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड (एक मेखला एक मार्ग ) नीति से जुड़ने में भी दिलचस्पी दिखाई। पिछले तीन सालों से चीन के जिस प्रस्ताव की खूब चर्चा है और जिसपर मौजूदा ओली सरकार काफी गंभीर भी है उसमें चीन अपने केरोंग क्षेत्र से काठमांडू और काठमांडू से पोखरा और लुंबिनी तक रेलवे लाइन बिछाने पर काम करने को इच्छुक है। यकीनन इससे चीन की पहुँच भारतीय सीमा तक होगी। चीन और नेपाल, मुक्त व्यापार समझौते की तरफ भी बढ़ रहे हैं। 

2015 के सितम्बर महीने में ही रक्सौल-बीरगंज पॉइंट पर स्थानीय मधेसियों द्वारा की गई पांच महीने की नाकाबंदी, जिससे कि दैनंदिन आवश्यक चीजों की आपूर्ति बाधित हुई और नेपालीजन को काफी मुश्किलात का सामना करना पड़ा था, भारत सरकार इस घटना पर सावधानी नहीं बरत पाई तथा नेपाल का आम जनमानस आज भी मानकर चलता है कि यह भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी थी और भारत ने इसकी समाप्ति के लिए कोई ठोस कदम भी नहीं उठाया। हालाँकि, भारत ने बार-बार दुहराया था कि यह नाकाबंदी नेपाल के आंतरिक तनावों की देन है, पर हालिया चुनावों में इस प्रकरण का वामपंथी दलों ने भरपूर लाभ उठाया। दरअसल, वामपंथ के मुख्यधारा में आने के कारण नेपाल में आम विमर्शों की तर्क आयोजना ही बदल गई है, पर भारत का कूटनीतिक कुटुंब अब भी नेपाल को उसी पारंपरिक दृष्टि से देखे जा रहा है, जहां नेपाल अपनी सुरक्षा और आर्थिक जीवन के लिए अधिकांशतया भारत पर निर्भर रहता था। लगभग साढ़े तीन साल बाद की गयी मोदी की तीसरी नेपाल यात्रा (11-12 मई) में उस तथाकथित नाकाबंदी का प्रभाव देखा जा सकता है जब सोशल मीडिया में नेपाली नागरिकों ने फब्तियां कसीं। इसी साल अप्रैल के पहले हफ्ते में हुई नेपाली प्रधानमंत्री के पी ओली की भारत यात्रा के महज छत्तीस दिनों के भीतर ही भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की तीसरी नेपाल यात्रा हुई। अधिकांश महत्त्व के समझौतों जैसे- भारत व नेपाल के इनलैंड जलमार्ग, तेल पाइपलाइन, पंचेश्वर-तराई रोड, कृषि, आदि ओली की भारत-यात्रा के दौरान ही संपन्न हुए। 

नेपाल-यात्रा के दौरान नेपाल के नवगठित सरकार के मुखिया खड्ग प्रसाद ओली ने इसबार प्रधानमंत्री मोदी की जनकपुर और मुक्तिनाथ धाम जाने की मंसा पूरी कर दी। इसप्रकार अपनी पहली यात्रा की तरह ही एक बार फिर मोदी की इस यात्रा में भी मंदिर, पूजा, पुजारी छाये रहे और रामायण सर्किट की घोषणा के साथ ही जनकपुर से अयोध्या तक की बस आवागमन की सुविधा का उद्घाटन भी किया गया, जिसकी अगवानी स्वयं योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में की। 900 मेगावाट का अरुण हायडेल प्रोजेक्ट, रक्सौल-काठमांडू रेल लिंक के लिए सर्वे आदि घोषणाओं के साथ अंततः मोदी की धार्मिक अस्मिता ही अधिक उजागर हुई। उसी समय चल रहे कर्नाटक चुनाव से भी इसे जोड़ा तो गया ही बल्कि  नेपाल के भीतर भी प्रोविंस नंबर-4 के मुख्यमंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने मोदी के मंदिर विजुअल्स पर आपत्ति जताई। 

मोदी की इस नेपाल यात्रा की जैसी कवरेज भारतीय मीडिया ने की, उससे संभवतः भारतीय मतदाता पर एक खास प्रभाव पड़े, लेकिन मुकाबले में जहाँ चीन हो, भारत ऐसी विदेश नीति के साथ तो अपने द्विपक्षीय संबंधों में फिर ऊष्मा नहीं ला सकेगा। प्रधानमंत्री ओली का यह कहना कि वह भारत की चिंता समझते हैं तथा कभी भी नेपाल की ज़मीन का इस्तेमाल भारत विरोधी हितों में नहीं होने देंगे और फिर अपने संसद में जोर देकर जल्द ही चीन की यात्रा करने का आश्वासन देना; यह दिखलाता है कि नेपाल के प्रधानमंत्री ओली की नज़र जहाँ नेपाल के कूटनीतिक कल पर है वहीं 2019 के आम चुनाव को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की नज़र त्रेता के राम पर है। 




Tuesday, May 22, 2018

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क

मोदी सरकार के चार वर्ष: विदेश नीति समीक्षा




"लोग उतना झूठ कभी नहीं बोलते जितना कि शिकार के बाद, युद्ध के दरम्यान और चुनाव के पहले बोलते हैं। " - ऑटो वॉन बिस्मार्क
अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश नीति का आधार, झुकाव और कार्यशैली कमोबेश एक-सी रही। उसमें ‘परिवर्तन और सततता’ का गुण विद्यमान था। अवसर अनुकूल जोखिम लिए गए और मूलभूत मुद्दों पर दृढ़ता बनी रही। दोनों सरकारों ने अपने क्षेत्र के पड़ोसियों से संबंध बनाये रखने का महत्त्व समझा था और विश्व-राजनीति में एक स्पष्ट रुख रखते हुए जहाँ-तहाँ संबंधों को बनाने की दिशा में प्रयासरत रहे। विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव अमेरिका बना हुआ था और उसके सबप्राइम क्राइसिस से दुनिया उबरी ही थी। भारत के संबंध अमेरिका से क्रमशः प्रगाढ़ हो रहे थे और रूस से संबंध सततता में थे। पर्यावरण, खाद्य-सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारतीय रुख स्पष्ट था और लोकतांत्रिक समानता पर आधारित था। भारत के पड़ोस में परेशानियाँ थीं फिर भी दक्षेस की बैठकें जारी थीं।
भारत में जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बहुमत से चुनी गयी थी उस समय दुनिया में वैश्विक आतंकवाद का चेहरा दाएश (आईएस), पश्चिम एशिया में अपनी जड़ें जमा रहा था, रूस यूक्रेन मुद्दे से अपने को कोकून से निकाल रहा था, चीन, दक्षिणी चीन सागर पर अपनी धमक बनाने की कोशिश कर रहा था, यूरोपीय यूनियन ग्रीस संकट से निपट रहा था और अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर अपनी कमजोरियाँ दुरुस्त कर रहा था। अटल-मनमोहन से इतर मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला जो विदेश नीति संचलन दृष्टि से आदर्श स्थित्ति थी। मोदी सरकार ने विदेश मंत्री के पद पर अनुभवी, तेजतर्रार सुषमा स्वराज को, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर दृढ़ मिज़ाज अजीत डोवाल को और विदेश सचिव एस. जयशंकर को चुनकर अपने इरादे और प्राथमिकता स्पष्ट कर दी।
अब जबकि यह उपयुक्त समय है कि मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति का सम्यक आकलन किया जाय, यह उचित होगा कि इन चार सालों में विश्व-राजनीति में हुए बदलावों पर भी चर्चा हो क्योंकि विदेश नीति, विश्व-राजनीति के सापेक्ष ही गढ़ी जाती है। नब्बे के दशक से यों लगने लगा था कि अमेरिका ही विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव है किन्तु नयी सहस्राब्दि के पहले दशक के गुजरते-गुजरते विश्व-राजनीति बहुध्रुवीय प्रकृति की दिखने लगी। अमेरिका के अलावे, चीन, जापान, ईयू (जर्मनी, फ़्रांस, आदि ), रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, दक्षिण कोरिया, ईरान, सऊदी अरब, आसियान आदि दूसरे ध्रुव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उभरने लगे और विश्व द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के तौर-तरीकों से चलता दिखा। दुनिया के देश हार्ड पॉवर (सैन्य, अर्थ, गणनीय क्षमता) बनने के साथ-साथ सॉफ्ट पॉवर (सांस्कृतिक, अगणनीय क्षमता) बनने की दिशा में भी कार्यशील हुए। विश्व-राजनीति में एशिया का महत्त्व सर्वाधिक बढ़ा और विकसित सभी देश अपने एशियाई पार्टनरों को पुचकारने लगे। लेकिन वैश्विक आतंकवाद, आणविक विकास स्पर्धा और विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण ने एकबार फिर दुनिया को कुछ-कुछ शीतयुद्ध सदृश गुटबाज़ी में मशगूल कर दिया। पिछले चार सालों में विश्व में दो गुट फिर से दिखने लगे हैं जिसे चतुष्क और प्रतिचतुष्क कहा जा रहा है। चीन, रूस, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के रणनीतिक प्रतिचतुष्क के जवाब में अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत का चतुष्क कार्यरत हो गया। विश्व-राजनीति में ऐसे नेता उभर रहे हैं जो अपनी घरेलू राजनीति में लगभग अपराजेय रहते हुए अपने देश की अपराजेयता के स्वप्न पाल बैठे हैं। रूस के पुतिन, जापान के शिंजो अबे, चीन के शी जिनपिंग, जर्मनी की एंजेला मोर्केल, आदि सभी नेता आज की विश्व-राजनीति में बेहद निर्णायक हैं। इन दोनों गुटों में चीन सबसे आक्रामक दिखाई पड़ता है और गुटनिरपेक्ष राजनीति करने वाला भारत अमेरिका से बने नए द्विपक्षीय समझ के तहत एक गुट में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। रूस, कूटनीतिक इतिहास में पहली बार पाकिस्तान को हथियार भेज रहा है और पाकिस्तान, चीन के साथ एक गुट में है। हिन्द महासागर और प्रशांत में बढ़ती चीन की दखलंदाजी को देखते हुए अमेरिका ने भारत की भूमिका बढ़ाने की गरज से इस समूचे क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक रीज़न (हिन्द-प्रशांत क्षेत्र )’ कहना शुरू किया है।
मोदीयुगीन ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’
‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ इस शब्द-युग्म की बड़ी चर्चा थी जब उम्मीदों की मोदी सरकार ने शपथ लिया था। मोदी, व्यक्तिगत रूप से विदेश नीति में बेहद रूचि लेते रहे और उन्होंने विदेश यात्राओं की झड़ी लगा दी। इस लेख के लिखे जाने तक मोदी 36 विदेश यात्रायें कर चुके हैं जिसमें कुल 56 देशों की ज़मीन पर मोदी पांव रख चुके हैं। इनमें से कई ऐसे देश हैं जहाँ काफी समय से कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुँचा ही नहीं। विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए भी यह एक ‘जुड़ाव’ का मौका होता है और इस तरह की यात्रायें निश्चित तौर पर देश को सॉफ्ट पॉवर के रूप में भी स्थापित होने का मौका देती हैं। बहुत सारे देशों में द्विपक्षीय वार्ताएं जो ठिठकी पडी थीं, वह पुनः शुरू हुई हैं।
अफ्रीका महाद्वीप से संबंध हमारे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा की गारंटी देते हैं। मनमोहन सिंह के समय से शुरू हुई हर तीन साल पर होने वाली ‘इंडिया-अफ्रीका समिट’ को मोदी ने 2015 में बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया। जुलाई, 2016 में मोदी ने अपनी अफ्रीका यात्रा में मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंज़ानिया, केन्या आदि देशों की यात्रा की और जापान के साथ मिलकर ‘अफ्रीका विकास बैंक’ के संदर्भ में गुजरात के गांधी नगर में बैठक करते हुए ‘एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर’ पर काम शुरू किया। दक्षिण चीन सागर विवाद और आसियान, जापान, उभरते चीन, फिर से होड़ में आने को बेताब रूस आदि की वज़ह से पूर्व एशिया व प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती सामरिक महत्ता ने भारत को विवश किया कि वह हिलेरी क्लिंटन की सुझाई ‘ऐक्ट ईस्ट’ शब्दावली को अपनाये और इधर अपनी सक्रियता बढ़ाये। मोदी ने अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत म्यांमार और थाईलैंड को अपना स्तम्भ बनाया और इनसे द्विपक्षीय संबंधों पर श्रम किया। कनेक्टिविटी, कॉमर्स और कल्चर के नारे के साथ मोदी उस सामरिक हिचक से बाहर आये जिसमें भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के रणनीतिक जगहों का अवसरंचना विकास जानबूझकर नहीं किया जाता था ताकि कोई अन्य देश इसका फायदा न उठा ले। मई, 2017 में आसाम में मोदी ने एक सड़क पुल का उद्घाटन किया और ‘भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे परियोजना’ में निवेश किया। जापान और आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में भारत के विश्वसनीय साझेदार बनकर उभरे हैं। जापान ने जहाँ भारत से आणविक संधि संपन्न की वहीं उसने ‘बुलेट ट्रेन’ और ‘दिल्ली-मुंबई इन्डस्ट्रीअल कॉरिडोर’ परियोजना में निवेश किया है। मोदी ने, आस्ट्रेलिया, जापान, फ़ीजी, मंगोलिया समेत सभी आसियान देशों की यात्रा की और इस वर्ष 26 जनवरी की परेड में सभी आसियान देशों के प्रतिनिधि उनके निमंत्रण पर भारत भी आये। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की औचक अमेरिका-पैसिफिक हेडक़्वार्टर कैंप स्मिथ की यात्रा बताती है कि दक्षिणी चीन सागर की सुरक्षा को लेकर भारत, अमेरिका प्रतिबद्ध हैं।
2017 में मोदी ने यूरोपीय देशों यथा- जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन और रूस की यात्रा की और ईयू के सर्वाधिक प्रभावशाली देश जर्मनी से अपनी साझेदारी बेहतर की। भारत और फ़्रांस अपने सामरिक संबंधों को लेकर बेहद गंभीर हैं और नवनिर्मित सामरिक गुट चतुष्क में भी अपनी सहभागिता की मंशा जतलाई है। भारत में दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक समुदाय मुसलमानों का है, इसलिए भारत और मध्य-पूर्व दोनों ही पारस्परिक संबंधों का महत्त्व समझते हैं। भारत के व्यापारिक अन्तर्क्रियाओं के लिए अरब सागर की सुरक्षा और लाल सागर में प्रवेश की सुविधा भी अहम् मुद्दे हैं। मोदी ने अपनी संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इजरायल, फलस्तीन, ओमान, क़तर, जॉर्डन की यात्राओं से अपनी ‘लिंक वेस्ट पॉलिसी’ को ‘थिंक वेस्ट पॉलिसी’ में परिणत कर दिया और इज़रायल व फलस्तीन दोनों से संबंधों का संतुलन बनाने की कोशिश की। मोदी सरकार की तारीफ करनी होगी जब अमेरिका के येरूशलम राजधानी घोषणा करने पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अरब समुदाय के पक्ष में मत दिया और इराक, यमन आदि देशों में फँसे भारतीयों को निकालने में तत्परता दिखाई।
नेबरहुड फर्स्ट से नेबरहुड लॉस्ट
मध्य एशिया में जहाँ गैसीय ऊर्जा के भंडार क्षेत्र हैं, एक अरसे से वहाँ रूस का दबदबा है और रूस की सहायता से ही चीन की पकड़ बन रही है; मोदी ने काँग्रेसी पूर्व मंत्री ई. अहमद की शब्दावली उधार ली और अपनी सक्रियता ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी’ के नारे के साथ जुलाई 2015 में क्षेत्र के पांच देशों की यात्रा की। चीन-पाकिस्तान आर्थिक सहयोग गलियारा जो भारत का मध्य एशिया से संपर्क समाप्त कर देता है उसका जवाब मोदी सरकार ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर तुर्कमेनिस्तान और कजाखस्तान रेलवे परियोजना का लाभ लेते हुए पुनः संपर्क स्थापित करके दिया। प्रधानमंत्री बनते ही मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता दिया और वे सम्मिलित भी हुए। दक्षिण एशिया में भी मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ ‘लैंड बॉर्डर एग्रीमेंट’ कर ‘एन्क्लेव्स’ मुद्दे को समाप्त किया। नेपाल में भूकंप आने पर यथासंभव मदद दी। प्रधानमंत्री बनते ही पहली यात्रा के तौर पर भूटान को चुना डोकलाम मुद्दे पर डटे भी रहे। अलग-अलग समयों में मोदी की गयी अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको, ब्राज़ील की यात्रा बताती है कि उनके लक्ष्य में अमेरिकी महाद्वीप भी शामिल हैं। मोदी सरकार की अन्य उपलब्धियों में निश्चित ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस हेग में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना आदि अवश्य शामिल किये जाने चाहिए।

मोदी सरकार की शुरुआत तो बड़े जोरशोर से ‘नेबरहुड फर्स्ट’ के नारे से हुई थी पर मोदी सबसे अधिक विफल कहीं हैं तो अपने इर्द-गिर्द पड़ोस में हैं। विश्व-राजनीति का अध्ययन कहता है कि बिना अपने आस-पड़ोस को सम्हाले कोई राष्ट्र, विश्व-राजनीति में कहीं टिक ही नहीं सकता। इस ‘नेबरहुड लॉस्ट’ से मोदी की सारी ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ की कवायद यकीनन धरी की धरी रह जाएगी। अपने पड़ोस में चीन सहित दक्षिण एशियाई सभी पड़ोसी देशों से आर्थिक साझेदारी वहीँ धीमी गति से चल रहे हैं और कूटनीतिक संबंध खिंचे हुए हैं। चीन ने अपनी ‘ओबोर नीति’ के तहत भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशों से अवसंरचना विकास के नाम पर भारी निवेश किया है और हालिया डोकलम विवाद से भी एक दबाव बनाने की कोशिश की। पाकिस्तान से संबंध कभी सामान्य हुए ही नहीं और मोदी सरकार ने कोई रचनात्मक शुरुआत भी नहीं की। कुछ विश्लेषकों की राय में चीन का एक आर्थिक-सांस्कृतिक असर अवश्य भूटान पर भी पड़ने लगा है और 2018 के देश के तीसरे आम चुनाव में नेपाल के हालिया चुनाव की तरह ही यहाँ भी भारत-विरोधी भावनाओं का उभार दिख सकता है । हाल के रोहिंग्या संकट पर भारत का कमोबेश ठंडा रवैया बांग्लादेश को ठीक तो नहीं ही लगा है। नेपाल के नए संविधान की घोषणा के तुरंत बाद ही असंतुष्ट मधेसियों के द्वारा रक्सौल-बीरगंज पॉइंट नाकाबंदी पर भारत का शांत रह जाना जहाँ वाम दलों और आम नेपालियों को खला है और अब वामपंथियों के सत्ता में आने से और उनकी चीन की तरफ तथाकथित झुकाव से भी भारत-नेपाल संबंध नाजुक तो हुए ही हैं, यह नेपाली प्रधानमंत्री की यात्रा में भी महसूस किया गया । हाल-फ़िलहाल भारत के श्रीलंका से संबंध भी खास चर्चा में नहीं हैं और श्रीलंका ने अभी अपने एक प्रमुख बंदरगाह का स्वामित्व चीन को एक समयसीमा के लिए के लिए सौपा है। चीन ने दक्षिणी चीन सागर और हिन्द महासागर में अंडरवाटर सर्वेलियांस नेटवर्क्स बिछाकर यकीनन जहाँ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। मालदीव विवाद में भी भारत की अनदेखी की गयी और बिसात पर चालें चीन चलता रहा। एक चिंता की बात यह भी है कि इधर भारत के पड़ोस में अलग अलग कारणों से भारत विरोधी भावनाओं में इज़ाफा हुआ है। पाकिस्तान के बाद, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में यह देखा जा सकता है। कुछ कारण ऐतिहासिक हैं तो कुछ सम-सामयिक हैं। चीन इस स्थिति का अक्सर यह कहते हुए लाभ उठाता है कि उसका दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध बराबरी पर आधारित हैं।

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क
मोदी, सरदार वल्लभ भाई पटेल को आदर्श मानते हैं, जिनके लिए प्रशा के शक्तिशाली चांसलर बिस्मार्क का नाम प्रयुक्त होता है। शुरू में ऐसा लगा कि बिलकुल बिस्मार्क की तरह मोदी हर स्टीरियोटाइप तोड़ देंगे और भारत का राष्ट्रहित साधने के लिए कोई भी जोखिम लेंगे। मोदी का शपथग्रहण, सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान में जाकर सहसा बिरयानी खाना, इज़रायल की यात्रा, वेनेजुएला का गुटनिरपेक्ष सम्मेलन जानबूझकर छोड़ना, सार्क सम्मेलन में दिलचस्पी न लेना, फलस्तीन-जॉर्डन की यात्रा, भारत के संयुक्त राष्ट्र में किये गए मत आदि ढेरों अवसरों पर मोदी विश्लेषकों को चौंकाते रहे पर इतनी उछलकूद का जब हासिल खोजा जाए तो ठोस उपलब्धियाँ नदारद मिलती हैं। रूस की पारंपरिक दोस्ती मोदी को छोड़ कोई भी भारतीय सरकार नहीं गंवाना चाहेगी। सार्क को पुनर्जीवित करने की कोई कोशिश नहीं की गयी। मालदीव में जब अमेरिका सहित समूचा पश्चिम भारत की ओर देख रहा था, मोदी मौन रहे। ईरान ने चाबहार पर व्यापार करने के लिए पाकिस्तान को भी न्यौता दे दिया है। पास के ग्वादर बंदरगाह पर पहले ही चीन और पाकिस्तान काबिज हैं। भारत, येरुशलम मुद्दे पर मध्यस्थता कर सकने की पहल कर सकता था पर चीन पहले ही अरब-इजरायल संवाद का आयोजक है। मोदी उम्मीद तो बिस्मार्क की तरह जगाते रहे और उनके अधिकारी चीन की नाराजगी के भय से दलाई लामा का ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम तक स्थगित करा दिया।
मोदी की विदेश नीति में दरअसल एक विजन और तारतम्यता का अभाव दिखा। प्लान बी की झलक कहीं नहीं मिली। विदेश नीति के हलचलों को भी चुनावों में पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग के लिए पहली बार बेशर्मी से प्रयोग किया गया। इराक़ में चालीस मजदूरों की मौत महज इसलिए छिपाई गयी कि यह पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग बर्बाद न हो जाये। विदेश नीति के क्षेत्र की उपलब्धियाँ और नाक़ामियाँ दोनों ही दूरगामी प्रभावों वाली होती हैं। सफलता, दूसरी कई सफलताओं के रास्ते खोलती है वहीं असफलताएँ आसानी से रफू नहीं होतीं क्यूँकि विश्व-राजनीति के अधिकांश कारक बाहरी होते हैं। मोदी सामरिक चतुष्क के सदस्य बनकर भी न मालदीव, न अफ़ग़ानिस्तान और न प्रशांत क्षेत्र में कोई रचनात्मक हस्तक्षेप करते हैं और न ही चीन, रूस, पाकिस्तान से संबंध सुधारकर दक्षिण कोरिया-उत्तर कोरिया की तरह महाशक्तियों की क्षेत्र में दखलंदाजी रोकने की कवायद करते हैं। मोदी विदेश नीति को संचालित करने वाली उस स्थाई नौकरशाही में भी कोई संरचनात्मक सुधार नहीं करते जो अभी भी कितने ही पर्सेप्शन्स में उन्हीं पुराने तरीकों से काम करती है, जिससे किसी नवीन दृष्टिकोण की उम्मीद नहीं की जा सकती। मोदी, विश्व और अपने पड़ोस के लिए अमेरिका, चीन, रूस, जापान की तर्ज पर कोई आर्थिक सहायता मॉडल भी नहीं बनाते जिससे राष्ट्रों को आर्थिक सहयोग तंत्र से जोड़ा जा सके। यों तो मोदी कार्यकाल के लगभग दस महीने शेष हैं पर इसमें अधिक से अधिक अपनी नीतियों का फॉलो-अप ही यदि ले सकें तो भारतीय विदेश नीति को लाभ होगा। क्योंकि विश्व भर की यात्राओं का जितना हासिल है भी वह भी यह सरकार इसलिए खोती नज़र आ रही है क्योंकि फॉलो-अप उचित रीति से नहीं किये जा रहे । कहना होगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मोदी को स्पष्ट बहुमत, खुला अमेरिकी समर्थन और चतुष्क की सदस्यता का जो सुन्दर अवसर प्राप्त हुआ था, वह अवसर वह लगभग गँवा चुके हैं बल्कि आने वाली सरकारों को एक बार फिर से रूस सहित एशिया के बाकी देशों से संबंध दुरुस्त करने में नाको चने चबाने होंगे। भारत को निश्चित ही अपनी विदेश नीति के लिए एक बिस्मार्क सरीखा शक्तिशाली राजनीतिक नेतृत्व नसीब हुआ तो था पर वह अमूमन बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क साबित हुआ। वैसे बिस्मार्क ने यह भी कहा था :
“राजनीति अगले बेहतरीन को पाने की कला है !”



Friday, April 27, 2018

इसकी एकमात्र दवाई बेशर्मी है !



साभार: गंभीर समाचार 

एक ज़माने तक 'मैन इज मेजरमेंट ऑफ़ एवरीथिंग' का जुमला काफी चला। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ वह सभी कुछ तार्किक और उपयोगी समझा गया जो महज मनुष्य के काम आये। इस एकांगी दृष्टिकोण ने पशु, पादप, जलज और अंततः मनुष्य को बेहद करारी चोट पहुंचाई क्योंकि मनुष्य के अहम् को यह संज्ञान बहुत बाद में हुआ कि पर्यावरण के सभी घटक महत्वपूर्ण हैं और उनमें अंतरनिर्भरता है। वह एकांगी दृष्टिकोण तब तक सामाजिकता के सभी संस्तरों तक जा पहुँचा और फिर मानव, मानवीयता के सन्दर्भ टटोलने में ही हांफने लगा। व्यक्तिवादिता और स्वार्थ के कोष्ठकों में बंद व्यक्ति के लिए, अब 'बेनिफिट इज एवरीथिंग' ही परम लक्ष्य बन गया है। व्यक्ति जितना, समाज से इतर व्यक्तिवादिता को महत्त्व देगा उतना ही अंतरनिर्भरता (इंटरडेपेंडेन्स) से भागेगा। अपने प्राकृतिक सामाजिक स्वभाव को नकारते हुए व्यक्ति ‘निजी स्पेस’ तलाशेगा और बाजार इस विसंगति का शोषण कर ऐसी आपूर्ति करेगा कि व्यक्ति में ‘इंडिपेंडेंट’होने का छद्म भाव उपजेगा। ऐसा निर्मम बाजार अपने लिए केवल 'प्रॉफिट इज एवरीथिंग' का टैग टाँकेगा। सामाजिकता-सामूहिकता से हीन जनता के लोकतंत्र से सत्ता बनाना, बाजार को बखूबी आता है और इसलिए ही अपने महान देश भारत के राजनीतिक दलों के लिए 'विनिंग इलेक्शन इज एवरीथिंग' ही एकमात्र ध्येय शेष रह गया है।

शिक्षा जिसे वह दीप बनना था, शिक्षक जिन्हें वह प्रकाश बनना था, जो जन मन को सभी विभेदों और विभाजनों से मुक्त कर सके; महज थोथी भूमिकाओं के रस्मी निर्वहन की बेसुध परम्परा बनकर रह गए हैं । इस सारहीन शिक्षा व्यवस्था ने मानवीय मूल्यों को कुछ यों खोखला किया है कि बेशर्म हो पढ़ाने के लिए, बेशर्म हो पढ़कर और ज्यों का त्यों लिखकर टॉप करने के लिए मानवीय मूल्य बचे हैं हमारे समाज के; अन्यथा समाज में 'स्मार्ट शख़्स' वही है जो होते रेप की विडिओ यूट्यूब पर डालकर पैसे बना ले। बुद्धिमान का अर्थ चतुर और समझदार का अर्थ होशियार हो गया है। किसी दूसरे ग्रह का कोई रोबोट हमारी पृथ्वी के सारे धर्मग्रन्थ और टेक्सटबुक पढ़ ले तो निस्संदेह वह मानव के समक्ष नतमस्तक हो जायेगा किन्तु जैसे ही वह कुछ दिन इस पृथ्वी पर रहकर हमारी करतूतों को निरखेगा तो यदि उसके बस में होगा तो समस्त पुस्तकों की राख से केवल एक ही शब्द लिखेगा- पाखंडी !

बेसुध जनता की बेसुध सरकारें अस्सी के दशक में खोखली होती भारतीय अर्थव्यवस्था की कंपकंपी देख ही न सकीं और नब्बे के दशक ने ज़िद करके उदारीकरण का चोला पहन लिया । सीमायें, खोली गयीं तो भारत की उस कामकाजी पीढ़ी ने सहसा धन का वह रेला देखा जो अकल्पनीय था। रासायनिक उर्वरकों वाले हरित क्रांति ने मंडियों में अनाजों की वो आवक लगायी कि चुपके से समाज की सारी सीमायें तोड़ते बाजार पर किसी को शक़ ही नहीं हुआ। इस दशक के अभिभावक, विद्यार्थी में चरित्र नहीं अपनी पूंजी तलाश रहे थे। नब्बे के दशक में हुए मजबूरी के उदारीकरण ने एक पूरी पीढ़ी में ऐसा आर्थिक हवस भर दिया कि बच्चों को जब पढ़ने भेजा गया तो आई.ए. एस., डॉक्टर, इंजीनियर, एमबीए आदि का इन्वेस्टमेंट समझते हुए भेजा गया। एजुकेशन का मतलब केवल प्रोफेशनल कोर्सेज हो गया और नौकरियाँ नीलाम होने लगीं। दहेज़ से या तो रिटायरमेंट प्लान गढ़ा गया या परिवार के दूसरे सदस्यों को पूँजी उपलब्ध करवाई गयी। 

अंग्रेजों ने केवल भारत पर राज नहीं किया था उन्होंने हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की सभी महीन रेशमी धागों को झुलसा दिया था और जब गए तो भारत कई बंजर अस्मिताओं का एक उलझा गुत्थम-गुत्था बन बचा था। हमारे स्वतंत्रता-सेनानी नेताओं ने यह समझा था और धीरे-धीरे अपने सार्वजनिक जीवन के त्याग से, उदाहरण बनते हुए नए भारत के लिए नए राष्ट्रीय प्रतीक गढ़े थे; जिनके आधार पर एक सशक्त समावेशी विविधतापोषी राष्ट्र पनप सकता था। पर वे अपने दूसरी-तीसरी पीढ़ी के नेताओं के चयन में चूक गए और राजनीतिक विकास की शैशवावस्था वाले राष्ट्र में क्रमशः राजनीति पेशा बनती गयी जिसे बाजार में अपनी पूंजी संजोनी थी। कद्दावर नेता मसखरे बनते गए, जनता की राजनीति को टीवी ने नीलाम कर दिया और जनता ने राजनीति को महज मनोरंजन मान लिया। अपने व्यक्तिगत जीवन में परम सेकुलर और लिबरल नेतागण जनता को जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग में बांटकर राज करते रहे। व्यवसायोन्मुखी शिक्षा में पनपे इतिहासबोध और समाजबोध से शून्य उत्साही युवा पीढ़ी उन्माद में दंगे और बंद का आयोजन करती रही।

सामाजिकता की मर्यादा से धीरे-धीरे मुक्त हुई पीढ़ी जिसे गांव की दुपहरी से अधिक शहर की शॉपिंग भाने लगी, स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता समझने लगी और भारत के सभी वर्गों, धर्मों के विविध उत्सवों से जो एक स्वाभाविक मानसिक विरेचन (कैथार्सिस) होता था, वह थमने लगा। बाजार ने पहले हमारे सारे उत्सव, जमीन से उठाकर कार्ड्स पर उकेरे; फिर मोबाइल के ग्रुप एसएमएस ने सभी सामाजिक संबंधों को औपचारिक मंथली इएमआई बना दिया। इधर ज्यों-ज्यों हम आधुनिक सभ्य होते गए, सोशल एनिमल से तथाकथित इंडिपेंडेंट इंडिविजुअल बनते गए। बाजार ने इस इंडिपेंडेंट इंडिविजुअल को यह छद्म तोष दिया कि ‘सब-कुछ’ बिकाऊ है और ‘सब-कुछ’ खरीदा जा सकता है। जिस पीढ़ी को बचपन से ही पढ़-लिखकर इंडिपेंडेंट बनना सिखाया गया हो वह सामाजिकता का इंटरडिपेंडेंस क्यों कर समझने लगी भला ? 

सत्ता जब-जब अलोकतांत्रिक रीति से आती है वह कमजोरों का शोषण करती है। अलोकतांत्रिक सत्ता, शिक्षा को हमेशा पंगु बनाये रखना चाहती है ताकि जागरूकता अटकी रहे। शिक्षा अपना कंटेंट और मकसद बदलकर ही जिन्दा रह पाती है और धीरे-धीरे बाजार से इशारे लेने लग जाती है।  अशिक्षा नारी को हमेशा कमजोर कहती है। बाजार नारी को परोसने लग जाता है। स्वच्छंद पीढ़ी नारी को उपभोग की सामग्री समझ लार टपकाने लग जाती है। फिर गाँव-शहर हर जगह सेक्सुअल कुंठा को सांस्कृतिक कपड़ों से ढंका गया, हर दुसरी पीढ़ी अपनी रंगरेलियों के सापेक्ष अगली पीढ़ी पर असफल बंदिशें लगाती रही और हिप्पोक्रेट्स की आबादी बढ़ती रही। बच्चों को मॉडर्न कपड़े पहनाये गए और अकल पर नफरत, कुंठा, लैंगिक विभेद की स्वार्थी परतें क्रमशः जमाई गयीं।

इसी बीच आठ साल की इक प्यारी बेटी का निर्मम सामूहिक बलात्कार हुआ और भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश में उस बाप को थाने में हँसते हुए-गालियाँ देते हुए पीट-पीट कर मार डाला गया, जिसकी सत्रह साल की बेटी की अस्मत किसी के कुलदीपक ने सरेशाम लूटी थी। लोग आहत हुए, कवियों ने कवितायेँ लिखीं, लेखकों ने लेख और फिर आख़िरकार अशिक्षा से उपजे अपने-अपने मन के विभाजनों के मुताबिक लोग एक-दूसरे को कोसने लगे। कुत्सित राजनीति फिर जीवनदान पा गयी। लोग बलात्कार के बैनर पर धर्म, जाति, राजनीतिक दल के हिसाब से आक्रोश व्यक्त करते करते फिर उन्हीं कोष्ठकों में बंद होने लगे जहाँ से कुत्सित राजनीति और बाजार को खुला मैदान तैयार और खाली मिलता है। 

बलात्कार मरते-बुझते समाज का एक लक्षण भर है, इसका हल कानूनी काफी नहीं है। अशिक्षा, राजनीतिक भ्रष्टाचार और बाजार की दखलंदाजी ने बेलगाम बरबस बलात्कार की घटनाओं को समझने में कई और गुथे-मुथे कारण जोड़े हैं। स्वाध्याय की परम्परा का धर्म, मूल्य आधारित होता है जहाँ नारी शक्ति होती है और पुरुष शिव। किन्तु स्वाध्याय का अभाव धर्म को महज कर्मकांडी बनाता है और राजनीति को मूल्यहीन और फिर यह दोनों ही अपने अस्तित्व के लिए बाजार के तराजू का बाँट बन जाते हैं। स्त्री वस्तु बनती है तो पुरुष तो पुरुष,  स्वयं स्त्री को भनक नहीं लगती। सबकुछ भोग लेने की हवस का खामियाजा केवल स्त्री ही नहीं, संस्कृति, समाज और भाषा भी भुगतती है। राष्ट्र महज राष्ट्रवाद के नारों से चलने लगता है और शासन की नाकामी सीमायें लाल करके छिपाई जाने लगती हैं। कुछ देर के लिए जब स्तब्ध हम होते हैं इन घटनाओं से तो सहसा सोचते हैं - आखिर, हम कर ही क्या सकते हैं ? इसका जवाब भीतर इस व्यवस्था ने चस्पा ही नहीं किया है तो कुछ दिन तक आक्रोशित रहते हैं फिर दोषारोपण करने लगते हैं और अंततः बाजार के सीजनल डिस्काउंट में खो जाते हैं। 

शायद हमें ऐसे ही सोये रहना है। चुनाव के वक्त हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित बने रहना है। भारत माँ तो भोली है, 'नारों' से खुश हो जाती है। लोहिया-जेपी तो भोले हैं, बस 'बंद' से खुश हो जाते हैं। फूले, अम्बेडकर तो भोले हैं बस 'रैलियों' से खुश हो जाते हैं। धिक्कार है ऐसी मानवता को, ऐसी ओढ़ी हुई मैच्योरिटी को। अगर ऐसा नहीं है तो हमें देश, समाज और स्वयं की निष्ठुर स्क्रूटिनी करनी होगी। हमें समझना होगा कि शिक्षा, पीढ़ियों और लिंगभेद से ऊपर उठकर संवाद की कला नहीं दे सकी है, बुजुर्गों ने परिवर्तन पर व्यंग कर अपनी भूमिका की इतिश्री कर ली है और जवानों ने धैर्य को कमजोरों का आभूषण समझ लिया है। समझना होगा कि भारत की सामाजिक व्यवस्थाएँ सड़ चुकी हैं, इन्हें फिर से तराशना होगा। राजनीति में जमकर परिभाग करना होगा। धर्म की सतत समानांतर व्याख्याएँ समझनी होंगी, उनकी दार्शनिकता को अपनाना होगा और संकीर्णता को दफनाना होगा। विविध परम्पराओं से सामाजिकता निचोड़ एक बार फिर उत्सवधर्मिता का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना गढ़ना होगा जिसमें मानसिक विरेचन की गुंजायश बराबर हो और आदमीयत की नेकनीयती तंदुरुस्त बनी रहे।  ऐसा सजग समाज अपनी राजनीतिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाएगा और शिक्षा को मूल्यों की जननी मानेगा। इसप्रकार बाजार अपनी हदों में लौटेगा और मंडियां फिर मेलों में तब्दील होंगी और मेलों में संस्कृतियाँ नाचेंगी, मिलेंगी और समरसता के गीत गुनगुनाएंगी।  

देश, समाज, स्वयं की निष्ठुर स्क्रूटिनी आसान नहीं होगी। यह हमारी अहम को बौना करेगी, हमारे उपलब्ध विशेषाधिकारों को सीमित करेगी और एक पंक्ति में खड़े होने को मजबूर करेगी। इतना धैर्य नहीं है जो, इतनी नीयत नहीं है जो और जो नहीं है इतना नैतिक साहस तो बंद करिये यह पाखंडी प्रलाप और ओढ़ कर सो जाइये फिर बेशर्मी की चादर। बीच-बीच में नींद उचटेगी जो कहीं फिर कोई बलात्कार की घटना दर्ज होगी। बाजार से नींद की गोली ले लीजियेगा और सपनों में गाना गाइएगा- मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती…!   

मुझे उबकाई आ रही, जानता हूँ इसकी एकमात्र दवाई बेशर्मी है!

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