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Thursday, April 12, 2018

इराक़ में हुईं उम्मीदें राख-गंभीर समाचार



साभार: गंभीर समाचार 

यह सब कुछ अमेरिका के झूठ से शुरू हुआ। ९/११ से तिलमिलाए अमेरिका ने दुनिया को दो ही तरह से देखना शुरू किया: अमेरिका के साथ एकजुट देश और अमेरिका खिलाफ देश। अमेरिका ने इराक पर इल्जाम लगाया कि उसके पास जनविनाश के हथियार (डब्ल्यूएमडी) हैं। इराक़ में सद्दाम की मूर्ति भी नहीं बची पर इस्लामिक आतंकवाद की जड़ों को सींचने वाले लोग मिलते गए जो इस दुनिया में सुन्नी इस्लाम की सल्तनत कायम करने और क़यामत के बाद हसीं हूरों से भरे जन्नत के ख़्वाब देखने का जुनून रखते थे। इराक़ से उत्तर-पश्चिम सटे सीरिया में अल-क़ायदा के एक धड़े ने खुद को विश्व भर में इस्लामिक स्टेट बनाने का लक्ष्य दिया और इस्लामिक आतंकवादियों ने सीरिया के उत्तरी क्षेत्र के प्रमुख शहर रक़्क़ा पर मार्च, २०१३ में कब्ज़ा कर लिया। अल-फ़ुरत (यूफ्रैटीज) नदी के किनारे बसा रक़्क़ा शहर गृहयुद्ध में झुलसते सीरिया का प्रमुख सामरिक शहर है, जहाँ से दक्षिण-पूर्व में बसे पड़ोसी देश इराक़ के उत्तरी क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण सामरिक शहर मोसूल लगभग पांच सौ किमी की दूरी पर है। दाएश (आईएसआईएस/आईएसआईएल के अरबी नाम का संक्षिप्तीकरण) के दुर्दांत लड़ाके एक के बाद एक गाँव, क़स्बा, शहर पर फ़तह करते गए और सीरिया व इराक़ की सरकारी सेना पिछड़ती गयी। २०१४ जून की तारीख ४  में ये लड़ाके इराक़ के जिले मोसूल में दाखिल हुए और अगले दो हफ़्तों में दक्षिण दिशा की ओर चलते हुए इराक़ी राजधानी बग़दाद से १८६ किमी पहले शहर तिकरित पहुँच गए। दाएश के दहशतगर्दों के बीच में अचानक फंस गए थे बग़दाद से उत्तर ४०० किमी दूर मोसूल में ४० मज़दूर और तिकरित के सरकारी अस्पताल में ४६ भारतीय परिचारिकाएँ (नर्स), जिन्हें रोज़गार की तलाश ने इराक़ी रेगिस्तान में ला पहुँचाया था। 

भारत की चुनावी राजनीति धीरे-धीरे महज पॉजिटिव परसेप्शन-बिल्डिंग पर आधारित होती गयी है और मेनिफेस्टो, ज़िम्मेदारी, जवाबदेही आदि की जगह बेतरतीब नारों, चुनावी जुमलों ने ले लिया है। परसेप्शन-बिल्डिंग पर आधारित चुनावी राजनीति से चुनाव खर्चीले होते गए, जिनकी पूर्ति सत्ता में आने के बाद घोटालों और भ्रष्टाचार से की जाती रही है । मई २०१४, में भारी बहुमत से चुनी गयी सरकार का भव्य शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया और इसमें देश के सभी पड़ोसी राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया। राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति से नई सरकार जनता में यह परसेप्शन गढ़ने में सफल रही कि एक मजबूत और परिणामोन्मुखी विदेश नीति वाली सरकार पदासीन हुई है। विश्व के लिए यह कठिन समय था, क्योंकि वैश्विक आतंकवाद का सबसे दुर्दांत चेहरा आई.एस.आई.एल. (दाएश), भारत से लगभग ३५०० किमी दूर इराक के एक-एक शहरों पर अपना परचम गाड़े जा रहा था। इराक के भारतीय दूतावास के लिए यह चुनौतियों से भरा समय था, क्योंकि इराक के अलग-अलग शहरों में काम कर रहे भारतीयों ने स्वयं को अकेला और फंसा हुआ पाया, जैसे-जैसे दाएश के लड़ाके शहरों पर कब्ज़ा करते जा रहे थे और स्थानीय इराक़ी अपना शहर छोड़ भाग रहे थे। अमेरिका आदि समर्थित इराक़ी फ़ौज नाकाम हो रही थी और इराक से असहनीय ख़बरें आना आम हो गया था। सत्ता-परिवर्तन, नौकरशाही के बदलाव का भी वक्त होता है पर फिर भी भारतीय दूतावास ने उल्लेखनीय कार्य किया और अधिकांश भारतीयों को सफलतापूर्वक अपने वतन पहुँचाने में कामयाब रहा । भारतीयों के लिए जून, २०१४ में इराक से दो बड़ी ख़बरें बेहद परेशान करने वाली आ रही थीं । केरल की ४६ परिचारिकाओं को इराक के तिकरित जिले के उनके अस्पताल में दाएश द्वारा बंधक बनाया जाना और पंजाब, हिमाचल प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के ४० मज़दूरों का दाएश के द्वारा मोसूल जिले पर कब्ज़ा करने के बाद ग़ायब हो जाना। ११ जून, २०१४ को मोसूल में साथ-साथ काम कर रहे ५३ बांग्लादेशी और ४० भारतीय मज़दूर दाएश के द्वारा अगवा कर लिए गए। दाएश ने ४ ही दिन बाद तिकरित की ४६ भारतीय परिचारिकाओं को उनके अस्पताल में ही बंधक बना लिया। इराक के लिए यह एक त्रासद दौर था और इसलिए भारतीय दूतावास के अधिकारियों के लिए भी यह चुनौती से भरा समय था क्योंकि देश का प्रशासनिक ढाँचा ढह रहा था और संचार व यातायात के सभी माध्यम जवाब दे रहे थे। 

इराक़ में फंसीं भारतीय परिचारिकाओं का संपर्क मोबाइल फोन से उनके परिजनों और इराक़ी भारतीय दूतावास से बना रहा। इराक़ में भारतीय राजदूत अजय कुमार को लगातार इनके टेक्स्ट मैसेज मिल रहे थे। लेकिन १५ जून, २०१४ के बाद भारतीय मज़दूरों का कुछ पता नहीं चल रहा था। भारत में परिचारिकाओं और मज़दूरों दोनों के परिजनों को यह जानकारी हो गयी थी कि उनके लोग इराक़ में दाएश के चंगुल में हैं। दाएश के लोग परिचारिकाओं के साथ फ़िलहाल ठीक से पेश आ रहे थे और उन्होंने, उन्हें तिकरित से शहर मोसूल चलकर अपना काम जारी रखने का विकल्प दिया। लोन लेकर लाखों रुपये एजेंट्स को देकर आईं इन परिचारिकाओं में से कई दाएश नियंत्रण में भी काम करने को राजी थीं, पर कुछ बेहद डरी हुईं परिचारिकाएँ भारत वापस लौटना चाहती थीं। दाएश के लोगों ने भारत वापस जाने वालीं परिचारिकाओं को आश्वासन दिया कि वे उन्हें इरबिल की सीमा तक ले जायेंगे, जहाँ से वे अपने वतन लौट सकती हैं। भारतीय दूतावास के साथ परिचारिकाओं के हुए सम्पर्क में उन्हें स्पष्ट कह दिया गया कि सभी परिचारिकाएँ इरबिल जाने के लिए कहें, जो तिकरित से २१८ किमी उत्तर स्थित है। दिल्ली में विदेश विभाग के हवाले से १७ और १८ जून, २०१४ को इन दोनों घटनाओं के बारे में राष्ट्र को बताया गया। यह कहा गया कि भारतीय परिचारिकाओं से संपर्क बना हुआ है लेकिन मज़दूर भारतीयों से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। द वायर की वरिष्ठ पत्रकार देविरूपा मित्रा ने १८ जून , २०१४ की शाम में पत्रकारी संपर्कों से पड़ताल शुरू की और इराक़ की उस कंस्ट्रक्शन कंपनी के जरिये इराक़ से लौटे बांग्लादेश के एक मज़दूर जमाल खान से बात करने में सफल रहीं। जमाल खान ने बताया कि बांग्लादेशी और भारतीय मज़दूर साथ ही मोसूल में काम करते थे, जब उन्हें अगवा कर लिया गया था। बाद में भारतीय-बांग्लादेशी मज़दूरों को अलग-अलग कर दिया गया था। इरबिल चेक-पोस्ट पर फिर उन चालीस भारतीयों में से एक हरकित (हरजीत मसीह) मिला था जो बेहद डरा हुआ था। हरजीत बार-बार कह रहा था कि बाकी ३९ भारतीय १५ जून को मार दिए गए और हरजीत के पैर में गोली लगी, वह किसी तरह इरबिल तक पहुँचा है। इस बाबत जब विदेश विभाग से बात की गयी तो ऐसा लगा कि उन्हें इस बारे में पहले से ही पता है। हरजीत के चचेरे भाई रॉबिन मसीह ने भी बाद में बताया कि उसकी बात हरजीत से १५ जून, २०१४ को हुई थी और हरजीत ने बताया कि वह इरबिल से बोल रहा है और अगले हफ़्तों में भारत लौट आएगा। 

द हिन्दू की एक खबर के अनुसार राष्ट्रीय सलाहकार अजीत डोवाल, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आई.बी.)  के निर्देशक आसिफ इब्राहिम के साथ जून, २०१४ के आखिरी हफ्ते में बगदाद पहुंचे। भारतीय कूटनीतिक दल अपने प्रयासों से दाएश के साथ संपर्क साधने में सफल रहा और अंततः दाएश के लोगों ने ४ जुलाई, २०१४ को ४६ परिचारिकाओं को मोसूल सीमा पर भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया। भारतीय कूटनीतिक दल की इस सफलता पर पूरा भारत झूम उठा। ४६ परिचारिकाएँ सकुशल ५ जुलाई, २०१४ को भारत वापस आ चुकी थीं। सुषमा स्वराज, अजित डोवाल और नरेंद्र मोदी के कुशल संचलन की चहुँओर भूरी-भूरी प्रशंसा थी। मलयाली निर्देशक महेश नारायण ने मार्च, २०१७ में ‘टेक ऑफ’ नाम से एक संजीदा फिल्म बनाई और भारतीय कूटनीतिक दल की इस सफलता पर बॉलीवुड ने भी दिसंबर, २०१७ में एक मसाला फिल्म ‘टाइगर ज़िंदा है ’ बनाई। 

जब मोदी सरकार चहुँओर अपनी यह सफलता भुना रही थी, उसी समय पंजाब, हिमाचल, बिहार और पश्चिम बंगाल के ४० भारतीय मज़दूरों के परिवारजनों को सरकार ने उस वक़्त के हिसाब से सबसे बेशकीमती तोहफ़ा दिया था: उम्मीद ! सरकार बार-बार कह रही थी कि ४० भारतीयों को बंधक बना लिया गया है पर सभी ज़िंदा हैं और सुरक्षित हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज परिवार वालों से मिलती रहीं, पूरे आत्मविश्वास से समझाती रहीं कि उनके अपने इराक में सुरक्षित हैं और ज़िंदा हैं। जुलाई २४, २०१४ को सुषमा स्वराज ने सदन को एक फिर आश्वस्त किया कि अनेक स्रोतों के आधार पर यह बात कही जा सकती है कि इराक़ में ४० भारतीय सुरक्षित हैं, ज़िंदा हैं और उन्हें भोजन भी मिल रहा है। २८ जुलाई, २०१४ को सुषमा स्वराज ने फिर यह उम्मीद दोहराई। इस बार दो बेहद मजबूत स्रोतों सहित कुल आठ स्रोतों का हवाला दिया। २९ जुलाई २०१४, को हरजीत मसीह ने चचेरे भाई रोबिन मसीह को फोन किया और कहा कि उसे भारत लाया जा रहा है। सरकार ने अगस्त, २०१४ में भी दोहराया कि ४० भारतीय सुरक्षित हैं और ज़िंदा हैं, इधर हरजीत के परिवार वालों से हरजीत का संपर्क टूट चुका था और वे हरजीत का इंतज़ार कर रहे थे। 
सोर्स:DNA 

नवंबर, २०१४ में एबीपी न्यूज के पत्रकार जगविंदर पाटियाल, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के साथ इराक़ के शहर इरबिल पहुंचे, जहाँ जगविंदर दो बांग्लादेशी मज़दूर शफ़ी इस्लाम और हसन से मिल सके। उनका इंटरव्यू  २७ नवंबर, २०१४ को प्रसारित किया गया। बताया गया कि हरजीत के पाँव में गोली लगी थी, ४० भारतीयों में से केवल वही बच निकला था, बाकी सभी को दाएश के द्वारा मार दिया गया था और कहा गया कि भारत सरकार झूठ बोल रही है और झूठी उम्मीद दे रही है। इस इंटरव्यू के बाद सुषमा स्वराज को सदन में बयान देना पड़ा कि हरजीत दिल्ली में सरकार के ‘प्रोटेक्टिव कस्टडी’ में है और शेष ३९ भारतीय ज़िंदा हैं व सुरक्षित हैं। फरवरी, २०१५ में सुषमा स्वराज ने एकबार फिर उम्मीद बांधते हुए कहा कि कोई पुख्ता सुबूत नहीं हैं लेकिन सभी ३९ भारतीय ज़िंदा हैं और सुरक्षित हैं। १५ मई, २०१५ को मोहाली में आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान के साथ हरजीत मसीह प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और बताते हैं कि जुलाई २०१४ से उन्हें सरकार ने अपनी ‘कस्टडी’ में रखा था और पूछताछ कर रही थी। हरजीत मसीह ने इस प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि बाकी ३९ भारतीय १५ जून, २०१४ को ही दाएश के द्वारा मार दिए गए और वह किसी तरह बच निकला। इसके बाद सुषमा स्वराज का फिर बयान आया कि हरजीत झूठ बोल रहा है और उम्मीद जताई कि सभी ३९ भारतीय सुरक्षित और ज़िंदा हैं। १९ जून, २०१५ की अपनी वार्षिक प्रेस कांफ्रेंस में एक बार फिर सुषमा स्वराज ने कहा कि ३९ भारतीय ज़िंदा हैं। जनरल वी के सिंह ने २२ जुलाई, २०१५ को बयान दिया कि सभी ३९ भारतीय सुरक्षित हैं। सभी ३९ भारतीयों के परिजन दम साधे अपनों की राह देखते रहे और फरवरी, २०१६ में सरकार ने फिर कहा कि ३९ भारतीय ज़िंदा हैं और सुरक्षित हैं। हरजीत मसीह सहित सभी अनौपचारिक सूत्र जहाँ ३९ भारतीयों के त्रासद अंत के बारे में कमोबेश निश्चित थे, अकेली सुषमा स्वराज और उनकी सरकार कह रही थी कि वे ज़िंदा हैं और सुरक्षित हैं। 

इराकी फौजों ने दाएश के लड़ाकों से मोसूल को ९ जुलाई, २०१७ को आज़ाद करवा लिया। १० जुलाई को जनरल वी के सिंह इराक़ भेजे गए। १६ जुलाई २०१७ को सुषमा स्वराज ने कहा कि ३९ भारतीय मोसूल के बादूश जेल (मोसूल से २६ किमी उत्तर-पश्चिम) में बंद हो सकते हैं। १९ जुलाई २०१७ को इराक़ में एक पत्रकार के हवाले से खबर आयी कि बादूश जेल ढह चुकी है और वहाँ कोई भी बंदी नहीं है। भारत में इराक़ी राजदूत और जुलाई, २०१७ में ही भारत यात्रा पर आये इराक़ी विदेश मंत्री ने ३९ भारतीयों के बारे में किसी भी जानकारी के न होने की बात कही। मोसूल में जगह-जगह टीलों को देखा जा रहा था, जहाँ दाएश के लोगों ने स्थानीय लोगों सहित विभिन्न देश के लोगों को सामूहिक रूप से दफनाया था। उनकी जांच-पहचान का काम जोरों पर था। इस सिलसिले में भारत सरकार से भी आग्रह किया गया कि ३९ भारतीयों के नज़दीकी रिश्तेदारों से डीएनए सैंपल इकट्ठे कर उन्हें भेजे जाएँ। डीएनए सैंपल मंगवाए जाने लगे और सदन में सुषमा स्वराज कहती रहीं कि हरजीत झूठ बोल रहा है और बिना किसी सुबूत के किसी को मृत घोषित करना पाप होगा। हरजीत के हवाले से यह खबर आ रही थी कि उसे सरकार की तरफ से ऐसा  दबाव बनाया गया कि वह कहे कि उसे बाकी ३९ भारतीयों के बारे में कुछ नहीं पता है। ३९ भारतीयों में से एक के रिश्तेदार की शिकायत पर हरजीत पर ‘अवैधानिक प्रवसन’ का आरोप लगाया गया और तकरीबन हरजीत ६ महीने जेल में भी रहा। 

घटना के ३ साल १० महीने ३ दिन के बाद १८ मार्च, २०१८ को आखिरकार सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में कहा कि पुख्ता सुबूतों के आधार पर मै दो बातें कहना चाहती हूँ: पहला; हरजीत मसीह झूठ बोल रहा था और दूसरा ३९ भारतीय अब ज़िंदा नहीं रहे। डीएनए सैंपल, वे पुख्ता सुबूत बने जिनके आधार पर बादूश के एक टीले से पाए गए नरकंकालों की शिनाख़्त हो सकी। सुषमा स्वराज के वक्तव्य का पहला बिंदु हरजीत मसीह था और दूसरा बिंदु ३९ भारतीयों की मृत्यु से उन उम्मीदों का राख़ हो जाना था, जिन उम्मीदों को वे पिछले करीब चार सालों से ज़िंदा बताती आ रही थीं, जबकि पूरी दुनिया कुछ और कह रही थी। 

हरजीत ने फिर मीडिया को कहा कि मै क्यों झूठ बोलूँगा, हाँ अच्छा होता कि मै झूठा साबित होता और भाई लोग वापस आ जाते। जनरल वी के सिंह १ अप्रैल २०१८ को इराक लिए रवाना हो गए ताकि शवशेष लाये जा सकें और २ अप्रैल को विशेष विमान से शव अवशेष भारत लाये गए l परिजनों को जल्द से जल्द अंतिम क्रिया करने के निर्देश दिए गए और उन्हें ताबूत खोलने से मना किया गया l बहुत जिद पर कुछ ताबूत खोले गए l एक मृतक की बहन मलकीत कौर ने कहा कि उनका भाई सिख था, वह कभी कैप नहीं पहन सकता था l सोचने-समझने को काफी कुछ है पर मै स्तब्ध यह सोच रहा हूँ कि क्या किसी सरकार के लिए पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह सालों-सालों एक त्रासद सच कहने में हिचकती है; महज इसलिए कि कोई यह न कहे कि सरकार नाकाम रही। लोकतंत्र इतनी गैर-जवाबदेही बर्दाश्त कर भी ले तो इतनी असंवेदनशीलता, निष्ठुरता, निर्ममता कैसे सह सकेगा? 

Saturday, March 24, 2018

संघर्ष के एक मुहाने पर फिर श्रीलंका


जबसे हिंद महासागर की अंगड़ाई लेती लहरें चीन की नज़रों में चढ़ी है, क्षेत्र के द्वीपीय देशों को जैसे उसकी नज़र ही लग गयी है। मालदीव की सरकार के द्वारा देश में आपातकाल की सीमा बढ़ाये जाने के एक पखवाड़े बाद ही श्रीलंका के कुछ ऐसे हालात हो गए कि सरकार को आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी। वैसे यह दोनों आपातकाल किसी भी रीति से आपस में संबद्ध नहीं हैं; यह ज़रुर है कि दोनों देशों का औपनिवेशिक अतीत ही है जिससे वर्तमान में भी शांति और विकास आकाश कुसुम बने हुए हैं l मालदीव का आपातकाल सत्तालोलुपता में जहाँ लोकतंत्र के खिलाफ है वहीं श्रीलंका का आपातकाल सत्तासीन सरकार द्वारा सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों के खिलाफ लिया गया एक सख्त कदम है जो देश के लोकतंत्र को मजबूती देगा l भारत के नज़रिये से देखें तो दोनों ही देशों के आंतरिक मामलों में अलग-अलग समयों में भारत द्वारा हस्तक्षेप किया गया है l दोनों ही अवसरों पर भारत को आमंत्रित किया गया l श्रीलंका में 1987 में भारत उलझ गया था वहीं 1988 में मालदीव में शांति स्थापित करने में सफल रहा था l भारत अपनी ऐतिहासिक वैश्विक एवं क्षेत्रीय भूमिका को देखते हुए हिन्द महासागर की इन घटनाओं से निरपेक्ष नहीं रह सकता l 

ऐतिहासिक-सांस्कृतिक-प्राकृतिक रूप से श्रीलंका बेहद ही समृद्ध और वैविध्यशाली रहा है l तकरीबन ईसा के पांच सौ साल पहले भारत के उत्तर क्षेत्र से इंडो-आर्यन प्रवसन श्रीलंका में हुआ माना जाता है, जिसमें सिंहली प्रजाति ने पूरे द्वीप पर अपना प्रसार किया l इसके करीब दो सौ सालों बाद भारत के तमिल इस खूबसूरत द्वीप पर पहुंचे l सन 1505 ई. में पहली बार इस द्वीप पर जब पुर्तगाली बेड़ा पहुँचा तो श्रीलंका ने उपनिवेशवाद के चरण में प्रवेश किया l आखिरकार 1815 ई. में इस द्वीप के सबसे बड़े साम्राज्य कैंडी को ब्रिटिश शक्ति ने पराजित कर दिया और अपने चाय, क़ॉफ़ी, नारियल के वाणिज्यिक बागानों में काम कराने के लिए अपने सबसे बड़े उपनिवेश भारत के दक्षिणी क्षेत्र से तमिल लोगों को मंगवाया l श्रीलंका का अतीत में सिंहलद्वीप से सीलोन कहलाया जाना, इसकी ऐतिहासिक यात्रा को प्रदर्शित करता है l संस्कृत का ‘सिंहल’ शब्द ही पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आदि प्रभावों के क्रमशः योग से अंग्रेजी का सीलोन बन गया l इसप्रकार यह देश एक बहुप्रजातीय एवं बहुसांस्कृतिक इकाई बन गया l आधुनिक काल की राजनीतिक व्यवस्था में यदि लोकतंत्र की स्थापना अपने सरोकारों और परंपराओं के साथ क्रमशः नहीं हुई तो निश्चित ही अस्मिता-संघर्ष उपजता है।  ब्रिटिश दासता से 1948 ई.में मुक्त हुआ यह देश अपने औपनिवेशिक नाम सीलोन से 1972 ई. में तो मुक्त होकर श्रीलंका बन सका, किन्तु देश प्रजातिगत खूनी संघर्षों में सन 2009 ई. तक जकड़ा रहा l 1956 ई. की अपनी पहली आज़ाद सरकार के साथ ही श्रीलंका में ‘सिंहली राष्ट्रवाद’ अपनी कुंडली मारकर बैठ गया और आजतक डंस रहा है l श्रीलंका के प्रसिद्ध अख़बार डेली मिरर के नियमित स्तंभकार श्री डी. बी. एस. जेयराज के अनुसार- ‘आज़ादी की लड़ाई में सिंहली फिर भी डोमिनियन स्टेटस की मांग से संतुष्ट थे और कहीं न कहीं अपरोक्ष रूप से ब्रिटिश सत्ता का लाभ ले रहे थे किन्तु तमिल सहित अन्य समूह साम्राज्यवादी शक्ति के खिलाफ प्रखर संघर्ष कर रहे थे l ‘ 


किन्तु आज़ादी आयी भी तो बस बहुसंख्यकों के इशारों की जैसे ग़ुलाम बनकर रह गयी l प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक जे. एस. मिल ने लोकतंत्र की इसी प्रवृत्ति को ‘बहुसंख्यक की निरंकुशता’ कहा है जो लोकतंत्र की आत्मा को ही कुचल देती है l औपनिवेशिक अतीत के कमोबेश सभी देश इस कुप्रवृत्ति के शिकार हो जाते हैं l श्रीलंका में प्रजातिगत वितरण सिंहली, तमिल, मलय, मूर, बर्घर्स और वेददा आदि, क्रमशः 74.9%, 15.2%, 0.22%, 9.3%, 0.19% और 0.13% है और यह क्रमशः बौद्ध, हिन्दू, मुस्लिम (मलय और मूर), ईसाई, आदि धर्म विश्वास को मानते हैं l सिंहली राष्ट्रवाद, इसप्रकार बौद्ध राष्ट्रवाद भी रहा और अन्य मतावलंबी समूह व प्रजातियाँ अस्मिता-संघर्ष में संलिप्त हो गयीं l बहुसंख्यकों के सापेक्ष अल्पसंख्यकों में पनपी असुरक्षा को सत्ता ने कभी गंभीरता से नहीं लिया और लोकतांत्रिक रीति से एकात्मक शासन व्यवस्था के संघीय वितरण पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया l प्रजातिगत संघर्ष के साथ-साथ धार्मिक संघर्ष भी सतह पर जब-तब उभरते रहे l सिंहली बहुसंख्यक जहाँ बौद्ध मतावलंबी हैं वहीं तमिल और मलय-मूर प्रजातियाँ क्रमशः हिन्दू और इस्लाम मतावलंबी हैं l प्रारंभ में सिंहली बहुसंख्यकवाद के विरूद्ध हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही एक स्वर में विरोध कर रहे थे किन्तु समय-समय पर होते हिन्दू-बौद्ध-मुस्लिम दंगों और अंततः 1981 ई. में ‘श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस’ के हुए गठन ने यह स्पष्ट असुरक्षा गहरी कर दी कि जाफना जैसे क्षेत्रों के स्वतंत्र होने की स्थिति में भी मुस्लिम महज अल्पसंख्यक ही बनकर रह जायेंगे l सोलोमन भंडारनायके के नेतृत्व वाली देश की पहली स्वतंत्र सरकार 1956 ई. में सिंहली राष्ट्रवाद के लहर में चुनकर आयी और इस सरकार ने कई ऐसे कार्य किये जिससे अन्य अस्मिताएं स्वयं को केंद्र से इतर सीमा पर महसूस करने लगीं l बागानों के तमिल मज़दूरों सहित कइयों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया l सिंहली को अकेले ही राज्यभाषा घोषित कर दिया गया l 

हालाँकि, 1978 ई. के नए संविधान में सिंहली के साथ तमिल को भी राज्य की भाषा घोषित किया गया और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रियाओं में तेजी लाने के लिए अंग्रेजी को लिंक-लैंग्वेज के तौर पर मान्यता दी गयी, किन्तु इस संविधान के लागू होने के बाद भी व्यावहारिक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जीवन में  ‘सिंहल राष्ट्रवाद’ की विषबेलि फलती-फूलती रही l ‘बहुसंख्यक की इस निरंकुशता’ के जवाब में देश में श्रीलंका से अलग एक तमिल राष्ट्र बनाने का हिंसक आन्दोलन एक उग्र संगठन (एल.टी.टी.ई.: लिट्टे) के रूप में पैदा हुआ और इसने पूरे राष्ट्र को 2009 ई. तक गृहयुद्ध की भयंकर आग में झोंके रखा l यह आग इतनी भयानक थी कि इसमें कितने ही तमिल, कितने ही सिंहली व अन्य मारे गए और इसने भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की भी बलि ले ली l लिट्टे एक संगठन के तौर पर समाप्त हो गया है किन्तु अलगाववादी सोच अभी भी जिंदा ज़रुर है और साथ ही सिंहली राष्ट्रवाद की लपट भी एक बार फिर से सर उठा रही है l 

श्रीलंका की मौजूदा सरकार एक गठबंधन की सरकार है जिसमें श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के मैत्रीपाल सिरिसेना, राष्ट्रपति और युनाईटेड नेशनल पार्टी के रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री पद पर विराजमान हैं। यह एक उदारवादी सरकार ज़रूर है किन्तु कमजोर गठबंधन की सरकार है। लिट्टे-आतंक समाप्ति के नायक पूर्व राष्ट्रप्रमुख महिंद्रा राजपक्षे द्वारा समर्थित पार्टी एस. एल. पी. पी. ने स्थानीय चुनावों में ज़ोरदार जीत दर्ज की है, जिसमें सत्तारुढ़ दलों सहित अन्य सभी दलों का प्रदर्शन निष्प्रभावी रहा है और इसी से आम चुनावों की भी मांग तेज आकर दी गयी है। विश्लेषक कहते हैं कि राजपक्षे ‘सिंहल राष्ट्रवाद’ के पोषक हैं और बहुत संभव है कि सत्तालोभ में सांप्रदायिक तनावों को हवा दे दी गयी हो अन्यथा कुछ मुस्लिम युवकों द्वारा एक बौद्ध ड्राइवर की गयी हत्या इतना उग्र रूप न ले लेती। श्रीलंका से लगभग बाइस सौ किमी दूर म्यांमार में भी हाल ही में बौद्ध-मुस्लिम दंगे हुए और लाखों रोहिंग्या (मुस्लिम) शरणार्थी, बांग्लादेश में जाने को मजबूर हुए। धर्म और राजनीति का कुत्सित मिश्रण बेहद खतरनाक है नहीं तो समता पर आधारित इस्लाम, विविधता का सनातन धर्म और शांति का बौद्ध धर्म, हिंसा की इतनी भौंडी आग से न खेलते। 



राहत की बात फिलहाल यह रही कि सिरिसेना सरकार ने सांप्रदायिक तनावों को देखते हुए तुरंत कार्यवाही की और आपातकाल की घोषणा कर दी। सांप्रदायिक तनाव जैसी समस्याओं पर सामान्यतया किसी देश में आपातकाल जैसे बड़े कदम नहीं लिए जाते, किन्तु श्रीलंका का आधुनिक राजनीतिक-सामाजिक इतिहास यही कहता है कि एक आंतरिक वर्ग-संघर्ष से उबरे अभी जिस देश को एक दशक भी न हुए हों, किसी दूसरी इसप्रकार की संभावना को आपातकाल लगाकर समाप्त करना जरूरी हो जाता है। सिरिसेना का आपातकाल की घोषणा के महज तीन दिनों बाद ही ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भारत आना और फिर जापान की यात्रा पर निकलना यह इंगित करता है कि फ़िलहाल इस समस्या से पूरे आत्मविश्वास के साथ निपटा जा रहा है। मालदीव की आपातकाल की समस्या पर जहाँ क्षेत्रीय शक्तियों और भारत-चीन सहित अन्य महाशक्तियों की भौंहें टिका रखी हैं वहीं सिरिसेना सरकार ने गठबंधन की सरकार होने के बावजूद समस्या से अपने दम भिड़ने का दमखम दिखाया है और महाशक्तियों को फ़िलहाल देश की आंतरिक राजनीति से यथासंभव दूर ही रखा है। इस बौद्ध-मुस्लिम संघर्ष को हलके में नहीं लिया जाना चाहिये क्योंकि अभी भी देश में सिंहल राष्ट्रवाद अपनी उग्रता में है, बौद्ध उग्रवादी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों के संपर्क में हो सकते हैं और विश्व में इस्लामिक आतंकवाद की समस्या बनी हुई है। एक छोटी सी असावधानी इस संघर्ष को न केवल श्रीलंका का दूसरा बड़ा आंतरिक वर्ग-संघर्ष बना सकती है अपितु इसके वैश्विक आयाम और भी खतरनाक हो सकते हैं।    

Saturday, February 24, 2018

मालदीव में आवश्यक है हस्तक्षेप



साभार: गंभीर समाचार 

यूँ तो मालदीव बहुत ही छोटा सा देश है जिसमें पांच लाख से भी कम लोग रहते हैं, पर इस बेहद खूबसूरत देश की भू-राजनीतिक स्थिति उतनी ही कमाल की है। इसलिए ही मालदीव का राजनीतिक संकट महज एक आंतरिक संकट नहीं है अपितु इस संकट ने अमेरिका, यूरोपीय संघ, अरब देशों सहित समूचे विश्व की नज़रें क्षेत्र की दो बड़ी शक्तियों भारत और चीन पर केंद्रित कर दी हैं। हिन्द महासागर क्षेत्र पर प्रभाव विश्व-व्यापार के दैनंदिन यातायात के लिए अहम है। सुपरपॉवर अमेरिका इसलिए ही हिन्द महासागर में मालदीव के ठीक नीचे विषुवत रेखा के पार ब्रिटेन और भारत के साथ चागोस द्वीपसमूह के डियागो गार्सिआ पर अपनी सामरिक उपस्थिति बनाये हुए हैं। वर्ल्डपॉवर से सुपरपॉवर बनने की जद्दोजहद में लगा चीन विश्व के अधिकांश सामरिक क्षेत्रों सहित हिन्द महासागर क्षेत्र में भी अपनी प्रभावी उपस्थिति बना चुका है। शी जिनपिंग का चीन महत्वकांक्षी ‘एक मेखला-एक मार्ग’ योजना के तहत ‘समुद्री रेशम मार्ग’ पर भी काम कर रहा है। चीन मलक्का जलडमरूमध्य के कोकोज कीलिंग द्वीप के पास और अफ्रीकी तट पर जिबूती में जहाँ नौसेना बेस बनाने की कोशिश कर रहा है वहीं म्यांमार के क्याउक्फू, बांग्लादेश के चित्तागोंग, श्रीलंका के हम्बनटोटा और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाहों के निर्माण में भारी निवेश किया है। चीन की यह समूची कोशिश हिन्द महासागर में हिंदुस्तान को घेरने और क्षेत्र में अमेरिकी फुटप्रिंट को संतुलित करने की है। 

मालदीव की मौजूदा यामीन सरकार ने लोकतंत्र को गिरवी रखकर देश में 15 दिनों के आपातकाल को अगले 30 दिनों के लिए बढ़ा दिया है। यामीन सरकार की मंसा, मालदीव के चुनाव आयोग की उस घोषणा में दिखती है, जिसमें इस साल सितम्बर में ‘राष्ट्रपति-चुनाव’ कराने की घोषणा की गयी है। गौरतलब है सितम्बर में अभी छह महीने से अधिक का समय है, इससे यामीन को यथास्थिति बहाल करने का मौका मिलेगा और चुनाव परिणाम को अपने पक्ष में करने की मशीनरी पर भी मुकम्मल काम हो सकेगा। निवर्तमान-स्वनिर्वासित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों भारत और अमेरिका से आवश्यक हस्तक्षेप कर मालदीव में लोकतंत्र बचाने की गुहार की है। अमेरिका, यूरोपीय संघ सहित समूचा पश्चिमी जगत चाहता है कि भारत निर्णायक हस्तक्षेप करे और हिन्द क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव का उत्तर दे। किन्तु भारतीय विदेश नीति भले ही अंतरराष्ट्रीय फलक पर बेहतर करती दिख रही हो, सच यही है कि पड़ोस और हिन्द आँगन में चीन ने अपनी पकड़ उन देशों में भी भारत से अधिक बना ली है, जहाँ लोकतांत्रिक सरकारें हैं। पड़ोस में कूटनीतिक अकर्मण्यता ने भारत के पास कुछ अधिक विकल्प शेष ही नहीं रखा है । 

भारत एक पशोपेश में है। चीन की सामरिक क्षमता हिन्द महासागर क्षेत्र में अभी भारतीय उपस्थिति का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है किन्तु भारत यदि चीनी मंसा के विरुद्ध जाकर मालदीव में सैन्य हस्तक्षेप करके सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को अंतरिम राष्ट्रपति बनाकर शांतिपूर्ण चुनाव कराता है और मालदीव में लोकतांत्रिक रीति से अगला राष्ट्रपति नियुक्त करने में मदद करता है तो चीन के साथ विवाद में एक और दीर्घकालिक अध्याय जुड़ जायेगा। यह स्थिति चीन की क्षेत्र में मौजूदा सामरिक पकड़ को देखते हुए भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करेंगी। यदि अमेरिका आदि पश्चिमी शक्तियाँ भारत का साथ देती भी हैं तो हिन्द महासागर क्षेत्र को विश्व-शक्तियों की अगली क्रीड़ास्थली बनने से नहीं रोका जा सकेगा। फिर भारत की मौजूदा सरकार अगले आम चुनाव में उतरने से पहले ऐसा कोई दुस्साहस नहीं करना चाहेगी जिससे उसके राजनीतिक हितों पर आंच आये। चीन से तनातनी मोल लेते हुए भारत के हस्तक्षेप से मालदीव में यदि  एक लोकतांत्रिक सरकार का गठन हो भी जाता है तो भी इस्लामिक आतंकवाद की लपटों में ध्रुवीकृत हुए मालदीवी राजनीतिक समाज में इसका संचालन बेहद कठिन होगा और चीन आदि शक्तियों के पास इसे डांवाडोल करने का अवकाश मिलता रहेगा। 

लेकिन भारत यदि एक कूटनीतिक चुप्पी ओढ़ लेता है और इसे महज एक आंतरिक मामला मान चीनी अपेक्षाओं के अनुरूप मोहम्मद नशीद के अनाधिकारिक अनुरोध को दरकिनार कर देता है तो भी इसके गहरे और दीर्घकालिक कूटनीतिक खतरे हैं। जिसप्रकार गुटनिरपेक्ष आंदोलन से उभरते भारत की साख को चीन ने हिमालय क्षेत्र में 1962 में बट्टा लगाया था और हाल ही में डोकलाम में भी यही कोशिश थी, उसीप्रकार हिन्द महासागर क्षेत्र में यदि चीनी प्रभुत्व में भारत हाथ धरे रह जाता है तो भारत पर अपनी कूटनीतिक और सामरिक निर्भरता कम करने को मित्र व पड़ोसी देश निश्चित ही बाध्य होंगे और इससे चीन के मंसूबों को पंख लगेंगे। भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए उचित यही होगा कि भारत अपनी हिचक छोड़े और हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका, जापान व आस्ट्रेलिया के अपने नवगठित मजबूत सामरिक एवं आर्थिक गठजोड़ “चतुष्क (क्वाड)” के नेतृत्व में मालदीव संकट का निराकरण करे। इस चतुष्क को मिलकर यह तय करना चाहिए कि मालदीव में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप उचित होगा अथवा संयुक्त राष्ट्र एवं विश्व-समुदाय के सम्मिलित दबाव से इसमें अपेक्षित परिणाम मिलेंगे। इससे न केवल चीन को संतुलित किया जा सकेगा बल्कि क्षेत्र में भारतीय उम्मीदों और उसकी लोकतांत्रिक साख को भी बल मिलेगा। 

*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं।  

Sunday, February 11, 2018

मालदीव संकट और भारत



महज सवा चार लाख की आबादी वाले छोटे से देश मालदीव ने अपने राजनीतिक संकट से पूरी दुनिया की नज़र भारत पर केंद्रित कर दी है। मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने मालदीव के पहले लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद सहित हाई प्रोफ़ाइल नौ राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और 12 सांसदों की सदस्यता बहाल करने का निर्देश दिया। संसद सदस्यता के बहाल होने का अर्थ यह है कि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की सरकार अल्पमत में आ जाएगी और उनके विरुद्ध संसद महाभियोग पारित कर सकेगी। यामीन ने खतरा भांपते हुए और संभवतः अपना आखिरी दांव चलते हुए देश में 15 दिवसीय आपातकाल की घोषणा कर संसदीय कामकाज सहित सारे कामकाज ठप कर दिए हैं, आशंका है वे इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं । उनके निर्देश पर सेना ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व यामीन के भाई पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया है तथा संसद को घेर लिया है। निर्वासित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भारत से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाई है और अमेरिका से भी मदद की दरख्वास्त की है। भारत ने कड़े शब्दों में मालदीव से लोकतंत्र बहाली की अपील तो जरूर की है पर किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर एक चुप्पी बनाई हुई है। तीस साल पहले 1988 में भी जब कुछ स्थानीय व्यापारियों की शह पर तमिल आतंकवादियों की सहायता से गयूम की सरकार को अपदस्थ करने की साजिश रची गयी थी तो गयूम की गुहार पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने नौ घंटे के भीतर ही भारतीय सैन्य टुकड़ी भेजकर गयूम की सत्ता बहाल की थी। एकबार फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से लोकतंत्र बचाने की गुहार लगाई गयी है। भारत के पास चुनने के जो विकल्प हैं, यकीनन कोई उनमें से आसान नहीं हैं।

1965 में ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता से मुक्त होने के बाद मालदीव में  सल्तनत राजशाही 1968 के जनमत संग्रह तक चलती रही जब इब्राहिम नासिर के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना हुई। 1978 से मालदीव में मौमून अब्दुल गयूम का काल शुरू हुआ जो लोकतान्त्रिक तो नहीं रहा किन्तु मालदीव को एक राजनीतिक स्थिरता मिली, जिसकी लम्बे समय से दरकार थी। गयूम हिंदमहासागर में विश्व-शक्तियों का हस्तक्षेप नहीं चाहते रहे। मालदीव की इस विदेश नीति के साथ उसकी राजनीतिक स्थिरता भारत के हित में थी, इसलिए 1988 के गयूम शासन के तख्तापलट को भारत ने सैन्य हस्तक्षेप से सफलतापूर्वक रोक लिया था। 2003 में पेशे से पत्रकार मोहम्मद नशीद ने मालदीवियन डेमोक्रैटिक पार्टी का गठन किया और गयूम प्रशासन पर राजनीतिक सुधारों के लिए दबाव बनाया। नागरिक समाज के लोकतान्त्रिक आंदोलनों से आखिरकार 2008 में मालदीव को नया लोकतान्त्रिक संविधान मिला जो बहुदलीय व्यवस्था प्रणाली पर आधारित था। अक्टूबर 2008 में चुनाव हुए और गयूम को हराकर विपक्षी नेता मोहम्मद नशीद नवम्बर, 2008 में देश के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति चुने गए। तीन साल बाद ही नशीद सरकार को राजनीतिक संकट से जूझना पड़ा और आखिरकार 2012 में नशीद को त्यागपत्र देना पड़ा। 2013 के नवम्बर में गयूम के प्रयासों से उनके भाई अब्दुल्ला यामीन ने राष्ट्रपति की कुर्सी अपने नाम की और तबसे यामीन और नशीद में राजनीतिक संघर्ष जारी है। 

1988 से 2013 और 2018 तक मालदीव के राजनीतिक परिदृश्य में कई तब्दीलियां हुई हैं। मोहम्मद नशीद ने राष्ट्रपति रहते देश की पर्यटन नीति में जो बदलाव किये थे उनसे अब्दुल गयूम और अब्दुल्ला यामीन के आर्थिक हितों को ठेस लगी थी। फिर नशीद ने देश के कुछ द्वीपों को सामरिक हितों के लिए ब्रिटेन और अमेरिका को प्रयोग करने की इजाजत दे दी थी जो गयूम की विश्व-शक्तियों को हिन्द महासागर क्षेत्र से बाहर रखने की नीति से भी अलग थी। इस बीच सबसे रुचिकर राजनीतिक विकास यह हुआ कि गयूम और यामीन में आपस में ही ठन गयी है । यामीन ने गयूम के बेटे पर गंभीर आरोप लगाए हैं और अब गयूम विपक्षी पाले में दिखाई दे रहे हैं। गयूम की राजनीति में इस्लामिक राष्ट्रवाद के लिए जगह रही है, उन्होंने इस्लाम को मालदीव का राज्यधर्म भी घोषित किया। मालदीव की नजदीकियाँ पाकिस्तान और अरब राज्यों से भी रही हैं। यह स्थिति मालदीव को देर-सबेर चीन के करीब ले ही जाती, जबकि शी जिनपिंग का चीन अपने आक्रामक ओबोर नीति से तेजी से हिन्द महासागर क्षेत्र में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। 

हिन्द महासागर सामरिक दृष्टि से इस समय सबसे महत्वपूर्ण हो चला है। अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य के बीच की समस्त व्यापारिक गतिविधियाँ हिन्द महासागर से होती हैं। चीन की क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता और रूस व पाकिस्तान की चीन के साथ जुगलबंदी ने ब्रिटेन-अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत को विवश किया है कि वे हिन्द महासागर को अधिक तवज्जो दें। जुलाई 2017 में संपन्न मालाबार नौसेना अभ्यास और बहुप्रसिद्ध चतुष्क (क्वाड) इसी शृंखला का एक सामरिक विकास है। डियागो गार्सिआ, एक सामरिक लघुद्वीप जो ब्रिटेन-अमेरिका-भारत के संयुक्त निगरानी में संचालित है, क्षेत्र पर निर्णायक पकड़ बनाने में मदद करता है और चीन की स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स नीति को संतुलित करता है। यहाँ, मारीशस का चागोस प्रायद्वीप के लिए चीन की तरफ सौदेबाजी के लिए उद्यत होना भी ध्यान में रखा जाना चाहिए जो ब्रिटेन-अमेरिका के सामरिक हितों के विरूद्ध विकास है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद चीन ने मालदीव के साथ मुक्त व्यापार समझौता संपन्न कर लिया है और श्रीलंका, मारीशस के साथ बेहद तेजी के साथ इस दिशा में वार्त्ता जारी है। इससे क्षेत्र में चीन की बढ़ती पकड़ का अंदाजा लगता है।  

भारत के कूटनीतिक कुटुंब के पास मालदीव संकट पर चुप रह जाने का विकल्प ही नहीं है। चुप्पी का अर्थ यामीन सरकार के अलोकतांत्रिक कदम का समर्थन कर देना होगा। मालदीव की तरफ से हस्तक्षेप का जो आग्रह है वह 1988 की तरह आधिकारिक नहीं है, अपितु यह निर्वासित राष्ट्रपति नशीद की तरफ से है। 1988 में हिन्द महासागर में चीन का दखल नहीं था जो आज के मालदीव सरकार का निर्णायक मित्र है। यामीन ने इस संकट पर अपने विशेष दूत अपने मित्र देशों यथा- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को भेज दिए हैं। बाद में भारत से भी संवाद की कोशिश की गयी, जिसे भारत ने यामीन सरकार की प्राथमिकताओं को समझने के बाद ठुकरा दिया। यामीन सरकार ने भी यूरोपीय यूनियन और श्रीलंका के विशेष दूतों से माले में मिलने से इंकार कर दिया है। ज़ाहिर है यामीन सरकार चाहती है कि चीन ही अपनी प्रभावी भूमिका से उनकी सरकार बचा ले । किन्तु चीन ने मालदीव सरकार को इस संकट से निपटने में सक्षम बताते हुए यह संकेत दिए हैं कि उसकी मंसा है कि कोई भी वाह्यशक्ति इस आंतरिक संकट में हस्तक्षेप न करे। चीनी अधिकारियों ने अपने भारतीय समकक्षों को भी आपसी द्विपक्षीय संबंधों में कोई दूसरा विवादित बिंदु न जोड़ने का आग्रह किया है। चीन ने अपने मालदीव पर्यटकों को कुछ सुरक्षा निर्देश भी जारी किये हैं। चीन ने अभी तक किसी मित्र देश के लिए खुलकर सामरिक हस्तक्षेप नहीं किया है इसलिए मालदीव में भी इसकी सम्भावना कम ही है। 

इस संकट पर पश्चिमी जगत एकमत हैं कि लोकतंत्र बहाली के तर्क से भारत को किसी भी प्रकार के आवश्यक हस्तक्षेप के लिए तैयार रहना चाहिए। ट्रम्प के अमेरिका की यह रट रही है कि भारत को अपनी वैश्विक भूमिका निभानी चाहिए। अमेरिका, भारत, पाकिस्तान, चीन, सऊदी अरब और यूरोपीय यूनियन आपस में मालदीव संकट पर अलग-अलग स्तरों पर वार्त्तारत हैं और बारीकी से मामले को देख रहे हैं। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत अपनी भूमिका से बच नहीं सकता, विश्व-शक्ति भूमिका के अपने खतरे तो हैं ही किन्तु अक्रियता अन्ततः मालदीव को भारत से दूर ले जाएगी और भारतीय कूटनीतिक साख को भी मद्धम करेगी। भारत के पास प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का विकल्प तो है, किन्तु निश्चिततः यह अंतिम विकल्प है क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप अविश्वासों और विवादों का नया सिलसिला शुरू करेगा और फिर हिन्द क्षेत्र आँगन में वाह्य विश्व-शक्तियों का हस्तक्षेप और बढ़ जायेगा। भारत के पास कूटनीतिक विकल्प उपलब्ध हैं। संयुक्त राष्ट्र विशेष दल की निगरानी में मालदीव में लोकतंत्र बहाली के प्रयास किये जा सकते हैं। भारत की यह कोशिश रहनी चाहिए कि अपने कूटनीतिक प्रभाव का प्रयोग करके अमेरिका, सऊदी अरब, यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय समाज के संयुक्त दबाव से चीन के प्रभाव को कम किया जाए और मालदीव में लोकतंत्र बहाली की जाय।  

Friday, January 5, 2018

पाकिस्तान पर दबाव बनाने के पीछे कहीं अमेरिका की ये रणनीति तो नहीं


"अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण रीति से पिछले पंद्रह सालों में सहायता के नाम पर तैतीस बिलियन से भी अधिक राशि पाकिस्तान को दी है, और उन्होंने हमें बस झूठ, धोखा दिया है कि जैसे हमारे नेता मूर्ख हों। उन्होंने उन आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह दी, जिन आतंकवादियों को हम अफ़ग़ानिस्तान में उनकी थोड़ी सहायता से खोज रहे थे। … अब नहीं !"

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने नए साल के अपने छठे ट्वीट से दक्षिण एशियाई, खासकर पाकिस्तानी राजनीति में खलबली मचा दी। ट्रम्प के बयानों को लेकर विश्लेषक कुछ पसोपेस में रहते हैं, जो अक्सर अस्पष्ट, विरोधाभासी और सनसनीखेज होते हैं, किन्तु यह ट्वीट बेहद करारा, स्पष्ट और निर्णायक था। भारत-अमेरिकी रिश्तों की तुलना में अमेरिकी-पाकिस्तानी रिश्ते ज्यादा गहरे और शीतकालीन समय के जांचे-परखे रिश्ते रहे हैं, ऐसे में जबकि भारत-अमेरिका रिश्तों की ऊष्मा बढ़ रही तो भारत के लिए भी यह ट्वीट खास मानी गयी। 

ट्रम्प के इस ट्वीट के बाद पाकिस्तान की तिलमिलाहट साफ़ दिखी और पाकिस्तान के विदेश मंत्री जनाब ख्वाजा मोहम्मद आसिफ साहब ने उसी ट्विटर पर कई करारे जवाब दिये और लिखा कि जल्द ही पाकिस्तान ट्रम्प को जवाब देगा और सच और झूठ अलग-अलग हो जायेंगे। पाकिस्तान ने अमेरिकी राजदूत डेविड हेल को इस सन्दर्भ में तलब किया और प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी की अध्यक्षता में राष्टीय सुरक्षा समिति (एन.एस.सी.) की बैठक हुई जिसमें हाल-फिलहाल कई स्तरों से की जा रही देश की अमेरिकी आलोचनाओं पर बात हुई। पाकिस्तान-अमेरिका के रिश्तों में ठंडक की सुगबुगाहट कम-अधिक एक अरसे से दिख रही है पर दिसंबर से यह सर्द सतह पर नजर आने लगी है। दिसंबर में अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने पाकिस्तान की अपनी यात्रा में अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रयासों में उसकी सिकुड़ी भूमिका की कई बार आलोचना की। फिर तो इसी मुद्दे के बहाने अमेरिकी अधिकारियों के बयानों की झड़ी लगती रही, कभी विदेश सचिव रेक्स टिलरसन, कभी निकी हैले तो कभी जेम्स मैटिस और कई मंचों पर कई बार राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पाकिस्तान की खिंचाई की। अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के मसविदे में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की आलोचना की। पाकिस्तान को दी जा रही नॉन नाटो रक्षा सहूलियतों में कटौती की बात की गयी और निकी हैले के हवाले से पाकिस्तान को दी जाने वाली 255 मिलियन डॉलर की सहायता राशि को फ़िलहाल स्थगित करने की सुचना दी गयी। 

अमेरिका और पाकिस्तान के ऐतिहासिक रिश्तों की प्रकृति हमेशा से सामरिक रही है जिसमें ‘आदान-प्रदान’ की मुख्य भूमिका रही है और यह रिश्ता एक विश्व-शक्ति का एक क्षेत्रीय राष्ट्र से था। विश्व-राजनीति में विश्व-शक्ति होने का एक व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि वह ग्लोब के प्रत्येक सामरिक क्षेत्रों में उसका एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि होना चाहिए जो उस क्षेत्र-विशेष में उसके हितों को सुनिश्चित करने में मदद करे। पाकिस्तान ने वह भूमिका अपने लिए स्वीकार कर ली। ब्रिटिश दासता से मुक्ति के पश्चात् जहाँ भारत ने स्वतंत्र विदेश नीति की चाह में निर्गुट आंदोलन की राह पकड़ी, वहीं पाकिस्तान ने अमेरिकी गुट में शामिल होना मुफीद समझा। अमेरिका ने पाकिस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाया और पाकिस्तान को रक्षा और आर्थिक सहायता मिलती रही। जब भी इस लेन-देन में किसी भी पक्ष से कसर रही, आपसी रिश्तों में खींचातानी देखने को मिली। 1971 तक अमेरिका, भारत और पाकिस्तान दोनों से ही सामरिक रिश्तों की जुगत में लगा रहा ताकि अमेरिका के पास सौदेबाजी की शक्ति (बार्गेनिंग) बनी रहे और एशिया क्षेत्र में वह निर्णायक बना रहे। हालाँकि अमेरिका के रिश्ते पाकिस्तान से ही प्रगाढ़ रहे, भारत से रिश्तों में एक हिचक ही बनी रही। फिर 1998 के परमाण्विक परीक्षण के बाद अमेरिकी उप विदेश सचिव स्ट्रोब टालबोट और तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह की अट्ठारह राउंड की भारतीय लिहाज से बेहद सफल वार्ता हुई जिसके के बाद से ही अमेरिका-भारत के रिश्तों की नयी मजबूत बुनियाद पड़ी। 

ट्रम्प के ट्वीट में पिछले पंद्रह सालों का हवाला दिया है। स्पष्ट है कि ओसामा बिन लादेन को पकड़ने की एबोटाबाद ऑपरेशन तक के पाकिस्तानी सहयोग को चिन्हित किया गया है और उसके बाद के पाकिस्तानी सहयोग को ‘बहुत थोड़ा और विरोधाभासी’ कहा गया है। निश्चित ही साल 2012 पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में एक महत्वपूर्ण साल है। अमेरिका के एबोटाबाद ऑपरेशन की पाकिस्तान की भीतरी राजनीति में बेहद आलोचना हुई। एक तो ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तानी मिलिटरी बेस के भीतर सुरक्षित पाया जाना और फिर अमेरिका का एकतरफा ऑपरेशन जिसमें पाकिस्तानी सरकार कुछ यों पेश आयी कि उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था; इसे पाकिस्तानी संप्रभुता का भीषण हनन माना गया और जो था भी। इससे पहले परवेज़ मुशर्रफ ने 2009 में खुलकर स्वीकार कर लिया था कि अमेरिकी सहायता का एक बड़ा हिस्सा भारत के खिलाफ पाकिस्तानी रक्षा बजट में खर्च किया जाता है। फिर इधर अमेरिका के रिश्ते जितने ही भारत से बढ़ते गए, पाकिस्तान के रिश्ते उभरते विश्व शक्ति चीन से बढ़ते गए। भारत से अमेरिकी मेलजोल जहाँ पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा था वहीं चीन से पाकिस्तानी मेलजोल अमेरिका को पसंद नहीं था। बदलते विश्व-राजनीति में पाकिस्तान के हितों के लिए एक मजबूत पड़ोसी के रूप में चीन से संबंध निश्चित ही मुफीद है जो कि भारत-चीन के खट्टे रिश्तों को देखते हुए पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर के भारत-विरोध को भी तुष्ट करता है। फिर चीन न केवल भौतिक रूप से पाकिस्तान से अधिक सम्बद्ध है अपितु आर्थिक और सामरिक परिप्रेक्ष्य में भी यह तब और अनुकूल हो जाता है जब इस समीकरण में महत्वाकांक्षी पुतिन का रूस भी शामिल हो जाता है। अमेरिकी नाराजगी के मूल में महज पाकिस्तान से ‘अफग़ानिस्तान में अपेक्षित सहयोग’ का मिलना ही नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान का धीरे-धीरे चीन, रूस और उत्तर कोरिया के साथ सम्बद्ध हो जाना है। अफगानिस्तान कार्ड तो महज एक दबाव की कार्यनीति है। चीन की ओबोर नीति और बढ़ती सामरिक सक्रियता ने ही अमेरिका को मजबूर किया है कि वह दक्षिण एशिया क्षेत्र को एशिया-प्रशांत क्षेत्र की वृहद् दृष्टि से देखे, जिसमें चीनी सामरिक प्रभाव को भारतीय केंद्रीय भूमिका से संतुलित किया जा सके। 

दरअसल चीन-रूस-पाकिस्तान-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) के जवाब में ही अमेरिका-भारत-जापान-आस्ट्रेलिया का चतुष्क (क्वाड) निर्मित किया गया है और ट्रम्प का यह ट्वीट और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा की जा रही लगातार आलोचना एंटीक्वाड की एक प्रमुख धुरी पाकिस्तान पर दबाव बनाकर इसी एंटीक्वाड को  कमजोर करने की रणनीति है। व्यवसायी ट्रम्प की राजनीतिक शैली वैश्वीकरण के दौर की प्रचलित मल्टीलैटरलिज्म (बहुपक्षीयवाद) के स्थान पर बाईलैटरलिज्म (द्विपक्षीयवाद) की है जो ट्रम्प की संरक्षणवादी ‘अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी’ से भी मेल खाती है और अमेरिकी प्रभुत्व को मिलने वाली बहुपक्षीयवाद की चुनौती से भी सुरक्षा मिलती है। द्विपक्षीयवाद नीति में ट्रम्प अपने प्रत्येक सहयोगी राष्ट्र से  उनकी भूमिका की जवाबदेही स्पष्ट चाहते हैं, जिसके एवज में उन्हें अमेरिकी तवज्जो दी जाती है। इस साल नवम्बर में अमेरिका में कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों की सम्भावना ट्रम्प को अमेरिकी अवाम के नजर में सक्रिय और अमेरिकी डॉलर व अमेरिकी हितों के लिए प्रतिबद्ध दिखते रहने को मजबूर करती है। ट्रम्प के चुनावी वादे ही हैं जो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति के जान-माल के नुकसानों को न्यूनतम करने के उद्देश्य से पाकिस्तान और भारत से अफ़ग़ानिस्तान में और अधिक सक्रियता की बार-बार मांग करते हैं। यकीनन, अमेरिका के रिश्ते भारत से मजबूत हो रहे हैं और पाकिस्तान से उनके रिश्तों में तनाव है पर भू-राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए अमेरिका का पाकिस्तान से रिश्तों में तनाव की दीर्घकालिक सम्भावना तलाशना कठिन ही है।  

Tuesday, January 2, 2018

2017: भारतीय कूटनीति का लेखा-जोखा



पिछला साल महज उपलब्धियों वाला नहीं रहा है, अपितु भारतीय कूटनीति के लिए कई सबक देकर यह वर्ष विदा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के अभिकरण इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में भारतीय जज दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति भारत की जबरदस्त कूटनीतिक विजय मानी गयी पर उसी संयुक्त राष्ट्र का लोकतंत्रीकरण करने के लिए सरंचनात्मक सुधार करते हुए सुरक्षा परिषद् में भारत की वीटोसहित सदस्यता के भारतीय प्रयासों में ठंडक बनी रही। यदा-कदा आते-जाते कई देशों के भारतीय अतिथि इस मुद्दे पर भारतीय पक्ष लेते रहे पर कुछ भी ठोस प्रगति नहीं हुई। भारत से अपने संबंधों में एक उन्नत स्तर की समझ की दुहाई देने वाला अमेरिका भी अपने रवैये में ढुलमुल ही रहा। पड़ोसी चीन ने तो कभी भी इस मुद्दे पर भारत का समर्थन नहीं ही किया अपितु वह कहता रहा कि सुधारों का यह उपयुक्त समय ही नहीं है। भारत समझ सकता है कि भारत के हित उसके विश्व सहयोगियों को भी वहीं तक स्वीकार्य होंगे जहाँ तक उनके हित को कोई असुरक्षा न हो। 

चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भी भारत की सदस्यता का पुरजोर विरोध किया। एनएसजी, परमाणु आपूर्ति राष्ट्रों का एक समूह है जो परमाणु तकनीक के प्रयोग/दुष्प्रयोग पर नियंत्रण रखती है। ध्यातव्य है कि विश्व में शस्त्र व तकनीक -नियंत्रण के लिए चार अनौपचारिक समितियाँ यथा- एनएसजी, एमटीसीआर, आस्ट्रेलिया समूह और डब्ल्यू ए , कार्य करती हैं, जिनकी सहमति से ही कोई राष्ट्र अपने विभिन्न प्रकार के शस्त्रों का निर्माण व प्रयोग कर सकता है, इसमें शस्त्र-नियंत्रण की मंशा मूल है। साधारणतया, इन समितियों में सदस्यता के लिए परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) एवं व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर करना आवश्यक है, किन्तु  अपवाद रूप से दूसरे कई देश भी हैं, जिन्होंने बिना इन संधियों पर हस्ताक्षर किये भी इनमें से कुछ समितियों के सदस्य हैं। फिर, 2008 के अमेरिका के साथ हुए भारत के परमाणु समझौते में स्पष्ट था कि आने वाले दिनों में अमेरिका इन समितियों की सदस्यता के लिए भारत की मदद करेगा। अमेरिका ने जब तब मदद की भी है और भारतीय कूटनीतिक श्रम के साथ देश को एमटीसीआर और डब्ल्यू ए की सदस्यता मिल भी चुकी है। जहाँ आस्ट्रेलिया ग्रुप में सदस्यता के लिए भारत लगभग आश्वस्त है वहीं एनएसजी की सदस्यता में सर्वाधिक अड़ंगा चीन की तरफ से है। एक रुचिकर बात यह भी है कि चीन स्वयं भी अभी डब्ल्यू ए की सदस्यता के लिए प्रयासरत है और भारत का कूटनीतिक कुटुंब डब्ल्यू ए में अपने निर्णायक भूमिका के चलते सौदेबाजी की सुन्दर स्थिति में है। 

आज के वैश्वीकरण की विश्व-राजनीति में उत्तर-दक्षिण विभाजन जैसी शब्दावली अब उतनी प्रासंगिक नहीं मानी जाती किन्तु मुद्दा यदि पर्यावरण का और खाद्य-सुरक्षा का हो तो यह विभाजन पूरी तरह हर वर्ष सतह से ऊपर आ जाता है। भारत जैसे विकासोन्मुख और औपनिवेशिक अतीत वाले देश अभी भी अपनी अर्थव्यवस्था में कृषि पर एक निर्णायक स्तर तक निर्भर हैं। किन्तु विश्व बैंक का प्रभावी गुट, विभिन्न देशों के द्वारा दी जा रही कृषि सहायता पर खासा नियंत्रण लगाना चाहता है। इन देशों की खाद्य सुरक्षा-अधिकारों के प्रति अमेरिका न केवल असंवेदनशील है बल्कि उसने विकसित पश्चिमी शक्तियों के साथ सुर मिलाते हुए इन देशों की मांग को नज़रअंदाज भी कर दिया। फ़िलहाल, 2013 के ‘शांति-अनुच्छेद’ से यथास्थिति बरकरार रही और ब्यूनस आयर्स में हुई इस वर्ष की ग्यारहवीं मंत्रीस्तरीय अभिकरण की बैठक में भारत के पक्ष को चीन सहित सभी विकासशील देशों का पुरजोर समर्थन मिला। इसीप्रकार, जहाँ यूरोपीयन यूनियन सहित लगभग विश्व के सभी देशों ने पर्यावरण मुद्दे पर स्मार्ट कृषि तकनीकों के विकास और पर्यावरण के संरक्षण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की, वहीं ट्रम्प के अमेरिका ने इस प्रतिबद्धता से यह कहकर अपने हाथ खींच लिए कि यह अमेरिकी हितों के अनुरूप नहीं है। 

तीन तरफ से जल से घिरे और उत्तर से स्थलबद्ध भारत के विभिन्न हित तब तक सुरक्षित नहीं हो सकते जबतक हिन्द महासागर को सामरिक दृष्टिकोण से सुरक्षित न कर लिया जाय। हिन्द महासागर की सुरक्षा के लिए भारत का  अफ्रीका महाद्वीप के देशों के साथ अच्छे संबंधों की अनिवार्यता सर्वविदित है। कम से कम जहाँ भारत दशकों से दिखाई ही नहीं देता था, वहॉं भारत की सक्रियता दिखने लगी है और दक्षिण अफ्रीका के साथ रक्षा सहयोग समझौते के बाद यकीनन इसमें तेजी भी आयी है। भारत ने इस महाद्वीप में अपनी गतिविधियाँ बहुपक्षता और आर्थिक प्राथमिकताओं में गढ़ी है। अपने से पूरब में भारत ने ऐक्ट ईस्ट नीति पर अमल किया है और सकारात्मक परिणाम भी आये हैं। म्यांमार और थाईलैंड ने भारत की इस मंशा में रूचि दिखाई है। अमेरिका के साथ सामरिक भागेदारी में भारत को जापान, आस्टेलिया के साथ बहुचर्चित चतुष्क (क्वाड) में शामिल किया गया और अमेरिका द्वारा बारम्बार सम्पूर्ण एशिया-प्रशांत क्षेत्र को इंडो-पैसिफिक कहकर भारत की उभरती वैश्विक संभावनाओं को रेखांकित भी किया गया। भारत ने भारत-एसियान कनेक्टिविटी पर बल दिया और जापान के साथ सफलतापूर्वक अपने सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ करने की कोशिश की। 

इस वर्ष मोदी की विदेश यात्राओं में यूरोप प्रमुखता से छाया रहा, इससे भारत की ईयू से सम्बद्धता में सुधार भी देखने को मिला है। मध्य-पूर्व एशिया में जहाँ भारत के संबंध ईरान से बेहतर हुए हैं वहीं सऊदी अरब से भी संबंधों में ऊष्मा बनी रही। भारत ने मध्य-पूर्व एशिया में एक सुन्दर कूटनीतिक संतुलन साधा है।  इधर मध्य एशिया के साथ भारत ने  कनेक्ट सेन्ट्रल एशिया नीति के तहत अपने कदम बढ़ाये हैं और इससे लाभ यह हुआ है कि  ईरान के चाबहार बंदरगाह के खुल जाने के बाद तुर्कमेनिस्तान-कजाखिस्तान सीमा रेलवे परियोजना का लाभ उठाते हुए भारत मध्य एशिया से तो जुड़ेगा ही अपितु इसकी पहुँच यूरोप तक हो जाएगी। अमेरिका महाद्वीप में भी कनाडा और मेक्सिको से भारत के संबंधों में तरलता आयी है और ब्राजील, क्यूबा से कूटनीतिक संबंध पहले से बेहतर बने हैं। 

भारत ने इस वर्ष दो अवसरों पर अपनी प्रौढ़ होती कूटनीति के भी दर्शन कराये। अपना एक चुनावी वादा पूरा करते दिखने की चाह में ट्रम्प ने असमय ही जेरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने की घोषणा करते हुए अपने दुताबास वहीं स्थानांतरित करने की बात की। ट्रम्प के इस सहसा स्टंट के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में मध्य-पूर्व एशियाई देशों के नेतृत्व में महासभा ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें द्विपक्षीय विवाद में तृतीय पक्ष के अहस्तक्षेप की सामान्य परम्परा दुहराई गयी थी। भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया और अमेरिका, इजरायल सहित कई विश्लेषकों को चौंका दिया। दरअसल, भारत ने न केवल संयुक्त राष्ट्र में हवा का ताप मह्सूस कर लिया बल्कि यह भी परख लिया कि इस प्रस्ताव से कोई भी जमीनी बदलाव नहीं होने जा रहा। इस मत से एकतरफ जहाँ भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता की पुष्टि हुई वहीं भारत फलस्तीन मुद्दे पर अपनी पारम्परिक नीति पर भी कायम रह सका। 

इसीप्रकार जून में भी भारत ने ब्रिटेन के विरुद्ध और अपने हिन्द महासागर में पड़ोसी मॉरीशस के उस प्रस्ताव के पक्ष में मत कर दिया जिसमें विवादित चागोस द्वीपसमूह के स्वामित्व-निर्णयन के लिए इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस जाने की बात कही गयी थी। हालाँकि, हिन्द-एशिया क्षेत्र में चीन की आक्रामक घेरेबंदी की नीति को ब्रिटिश-अमेरिकी और भारत की मिलीजुली सामरिक व्यवस्था से ही संतुलन मिलता है जो कि इसी विवादित चागोस के डियागो गार्सिआ पर स्थति है। गौरतलब है कि मॉरीशस ने ताईवान मुद्दे पर चीन को हमेशा समर्थन दिया है ताकि संयुक्त राष्ट्र में चीन अपने वीटो अधिकार से मॉरीशस के हितों की रक्षा कर सके। यहाँ, भारत ने अपनी भू-राजनैतिक यथार्थ को महत्त्व दिया और कूटनीतिक रूप से प्रौढ़ कदम उठाया।  निश्चित ही, इसी प्रकार भारत को सभी देशों से संतुलन साधते हुए अपने राष्ट्रहितों को लेकर प्रतिबद्ध रहना होगा क्योंकि आगे भी चुनौतियाँ आसान तो नहीं रहने वाली हैं।  


Sunday, December 31, 2017

सुनो बे दो हजार अट्ठारह



सुनो भई दो हजार अट्ठारह,


देखो, आराम से आना! लगे कि कुछ नया आ रहा है. फिर वही अखबार मत लाना जिसे ले जाएगा कबाड़ी वाला. लोग तो हैं ही सट्टेबाज, सत्ता की मलाई के लिए खांचा खीचने के लिए तैयार बैठे हैं. फेस्टिवल वाले देश में फेस्टिवल का धरम बताएंगे, किसी किसी दिन की जाति बतावेंगे और बंसी बजैइया के देश में बेशर्म इज्ज़त के नाम पे उसी पेड़ पे लटकावेंगे जहाँ उ चोर कपड़े लेके बैठे रहा!


सुनो, इस बार मुहल्ले में भी आना चमकदार टीवी से उतरकर. देखों यों आना कि नालियाँ साफ हो जाएं, अस्पताल में दवाई मिले और पाठशाला में मिलें गुरुजी. मौका लगे तो छह लाख गावों में शैम्पू की छोटी छोटी सैशे में समाकर आना, पर आना. पता करना कि किसी गांव में सचमुच बिजली रहती कितनी देर तक है. देखना, कि नहर में पूआल रखी है या पानी भी आता है. किसी से चुपके से पूछना कि पिछले चुनाव में जो मर्डर हुआ, उसमें कुछ हुआ या फिर सब विकास ही है.


अच्छा रुको रे दो हजार अट्ठारह! जरा विकास को पुचकार देना, बेचारा रूखा सूखा हुआ है. सब उसे हर सीजन में नए कपड़े पहनाकर घुमाते हैं सर पे, पर बेचारा दशकों से भूखा है. सड़क की पटरियों पे इधर उधर पोस्टर बैनर के नीचे कहीं कहीं कुछ बोतलों में चमकती अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाटने से भला पेट भरता तो क्या बात थी. उसे बताना कि तुझे रोपेंगे किसी दिन रे विकास, अभी तो नारों से ही सेंसेक्स और रेटिंग में ज्वार आ जाता है.


लड़कियों के कान में चुपके से कह दो कि ये 21 वीं शती अब बालिग हुई. पढ़ें, लड़ें, कमाएँ, प्यार करें और जिएं! कितने ही जगह लड़कियों तुम्हारा अभी इन्तजार है, कितना ही अभी चमकना है! तुम्हारे पास सब कुछ पाने को ही तो है और लड़कों मेहनत करों, लड़कियाँ भी पुरजोर साथ देने को तैयार हैं.


नया भारत, सरकार के बनाने से नहीं बनेगा कभी, कह दो इस देश के गरम खून वाले बहुसंख्यक युवाओं से. नए साल जो तुम सचमुच नए हो तो नई सोच का तड़का लगा देना युवाओं में, ताकि वो सोच सहम जाएं जो विभाजन की फसल पैदा करती है.


यार, देश अपना अभी भी बहुतों से बहुत मायनों में पीछे है, कह दो हे नए साल हम सबसे कि हम सब मिलजुलकर इसे तरक्की के एक नए पैमाने पर ले जाएंगे!


नवल वर्ष की शुभकामनाएँ!




Saturday, December 30, 2017

2017 की विश्व राजनीति और भारत




अब जबकि पृथ्वी 2017 का अपना चक्कर पूरा ही करने वाली है, यह एक मुफीद समय है कि इस साल की विश्व-राजनीति को पीछे मुड़कर टटोला जाय, देखा जाय कि वे कौन सी घटनाएँ थीं, जिन्होंने खासा असर पैदा किया, ऐसी वे कौन सी गतिविधियाँ रहीं, जिनके जिक्र के बिना 2017 का कोई जिक्र अधूरा रहेगा और इन सबके बीच अपना भारत कैसे आगे बढ़ा ! यह एक मुश्किल काम इसलिए तो है ही कि विश्व राजनीति की बिसात बेहद लम्बी-चौड़ी है, पर असल चुनौती इसमें वैश्वीकरण की प्रक्रिया पैदा करती है। विश्व में वैश्वीकरण है, इसके अपने अच्छे-बुरे असर हैं; पर दरअसल विश्व-राजनीति का भी वैश्वीकरण हो चला है। इसका अर्थ यह है कि अब किसी भी महत्वपूर्ण वैश्विक घटना के स्थानीय निहितार्थ व प्रभाव हैं और किसी महत्वपूर्ण स्थानीय घटना के भी वैश्विक निहितार्थ व प्रभाव हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।संचार साधनों ने यह सुलभता तो दी है कि सभी घटनाएँ सभी स्तर पर लगभग तुरत ही उपलब्ध हैं, किन्तु इन्होने विश्व-राजनीति की जटिलताओं का और विस्तार ही किया है। इनकी अनदेखी करना सहसा विश्व-राजनीति के किसी घटना की व्याख्या में चूक जाना है।  विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण का सबसे सीधा असर यों महसूस किया जा सकता है कि अब भले ही देशों के मध्य कूटनीतिक तनातनी हो, देश आपस के व्यापारिक संबंधों पर उसका असर न्यूनतम रखना चाहते हैं। अमेरिका और चीन के व्यापारिक  आंकड़ें इस सन्दर्भ में देखे जा सकते हैं। यहीं से इस आशा को भी बल मिलता है कि दुनिया में तनाव तो कई जगह बेहद गहरे हैं पर विश्वयुद्ध जैसी विभीषिका अथवा शीतयुद्ध जैसे तनाव की सम्भावना मद्धिम ही है। 

दुनिया के सबसे चमकदार महाद्वीप यूरोप का यूरोपीय यूनियन लगभग साल भर चर्चा में रहा। आर्थिक वजहों को अगर परे रखें तो ब्रिटेन का ईयू से छिटकना, जिसे विश्व मीडिया में ब्रेक्जिट कहा गया; लगातार चर्चा में रहा। 2016 में ही ब्रिटेन ने अपनी मंशा जतला दी थी पर इसे औपचारिक जामा मिला 2017 में । अभी भी ब्रेक्जिट की जटिल औपचारिक प्रक्रियाएँ चल रही हैं और इसी के सामानांतर यह विमर्श भी चलता रहा कि आज की वैश्वीकरण वाली विश्व-राजनीति में ईयू का एकीकृत मॉडल कितना सटीक है ! प्रसिद्द बार्सीलोना शहर वाले स्पेन का सबसे समृद्ध राज्य कैटेलोनिया, जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान स्पेनी राष्टीय पहचान से भी पुरानी है, इस साल एक नए राष्ट्र बनने के संघर्ष में जुटा रहा। कैटेलोनियन राष्ट्रीयता के साथ एक अलग संप्रभु राष्ट्र-राज्य बन जाने की राह बेहद कठिन है क्योंकि ईयू, अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस समेत सभी विकसित देशों ने इसका विरोध किया है। कैटेलोनिया विवाद दरअसल यूरोप में चल रहे दर्जन भर से अधिक नए राष्ट्र-राज्य आन्दोलनों की सबसे सशक्त बानगी है, जिसके मूल में पश्चिमी देशों की दोतरफा नीति की झलक तो है ही अपितु और गहरे में यह पश्चिमी राष्ट्रवाद की सीमा को भी उजागर कर देती है। पश्चिमी जगत लोकतान्त्रिक आत्म-निर्णयन के सिद्धांत का हवाला देता हुआ विकासशील देशों खासकर जिनका एक औपनिवेशिक अतीत भी है, के ऐसे ही आन्दोलनों के पक्ष में खड़ा हो जाता है। किंतु जब बात स्वयं पर आती है तो एक स्वर से सभी विकसित पश्चिमी राष्ट्र ऐसे आन्दोलनों को ‘खतरनाक चलन’ कह ख़ारिज करना चाहते हैं। सिद्धांततः पश्चिमी राष्ट्रवाद एकरूपता/समरूपता (homogeneity) की नींव पर निर्मित है जिसमें विविध पहचानों को किसी एक पहचान में विलीन होना होता है अथवा अलग राष्ट्र बन जाना होता है। इसके विपरीत भारतीय राष्ट्रवाद की संकल्पना जो पश्चिमी राष्ट्रवाद के जवाब में आयी उसने विविधता को अंगीकार किया और अनेकता में एकता के दर्शन करते हुए विभिन्नता (heterogeneity) को अपना आधार बनाया। कैटेलोनिया विवाद जैसे वैश्विक घटना से भारत स्थानीय स्तर पर यह पाठ ले सकता है कि हमें अपनी राष्ट्रीयता को संजोना चाहिए जो हमारे देश की विशाल विविधता को आत्मसात करते हुए सततता में विश्वास रखती है। 

जुलाई में इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल को आखिरकार आई एस के चंगुल से छुड़ा लिया गया जिसे ठीक दो साल पहले अबू बक्र अल बगदादी के नेतृत्व में कब्ज़ा कर लिया गया था। इसके साथ ही पिछले तीन साल का क्रूरतम आतंकवादी खौफ व क्रूरता अंततः थमी, जिसने लोगों के मन में अल क़ायदा का नाम भुला ही दिया था।  अमेरिका और रूस दोनों ने ही आईएस के खिलाफ हुंकार भरी, पर यकीनन दोनों का उद्देश्य अपना अपना राष्ट्रहित रहा। रूस के लिए सीरियाई सरकार प्राथमिकता में है तो अमेरिका इराकी प्रतिबद्धता के अनुरूप कार्यरत रहा। मध्य-एशिया का सबसे गरीब देश यमन जो अदन की खाड़ी के किनारे-किनारे बसा है हूती (शिया) और सुन्नी की क्षेत्रीय लड़ाई में मोहरा बन गया। यमन में हालात तो पहले ही कुछ ठीक नहीं थे पर शियापरस्त ईरान और सुन्नीपरस्त सऊदी अरब ने यमन की घरेलू राजनीति की खींचातानी को अंततः एक बेहद अमानवीय गृहयुद्ध में तब्दील कर दिया। दिसंबर के इस हफ्ते में यमन को यों सुलगते लगभग हजार दिन हो जायेंगे और लगभग नौ हजार की नरबलि ले चूका यह संघर्ष विश्वशक्तियों के निर्णायक हस्तक्षेप की अभी भी बाँट जोह रहा है। मध्य-एशिया का सबसे पुराना और जटिल मुद्दा फ़िलहाल ठंडे बस्ते में था कि इसी दिसंबर माह के पहले हफ्ते में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपना एक चुनावी वादा पूरा करते हुए ऐलान किया कि अब वक्त आ गया है कि जेरुसलम को इजरायल की राजधानी घोषित किया जाय  और अमेरिकी दूतावास को जेरुसलम में प्रतिस्थापित किया जाय। ट्रम्प के इस बेवक्त के स्टंट ने मध्य एशियाई राजनीति के इस पुराने जिन्न को फिर से जगा दिया और मध्य एशियाई शक्तियाँ इस मुद्दे पर एकजुट हो इजरायल और अमेरिका का विरोध करने लगी हैं। इसमें सऊदी अरब की भूमिका सबसे अधिक उल्लेखनीय है। पहले से ही यह मुल्क अमेरिका सहयोग की नीति अपनाता रहा है और नए अतिमहत्वाकांक्षी राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व वाला सऊदी अरब एक सोची समझी अस्पष्टता बरत रहा है। ज़ाहिर है नए साल में भी मध्य एशिया सुर्ख़ियों में बना रहेगा भले ही सुलगता हुआ ही रहे। भारत ने बेहद सुन्दर संतुलन के साथ मध्य एशिया की अपनी विदेश नीति कुछ यों साधी है कि तेल की जरूरतें पूरी होती रहें और लपटें भी न लगें। 

वैश्विक स्तर पर जिन मामलों ने 2017 को परिभाषित किया उनमें इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस के जजों का चुनाव, पनामा पेपर्स और जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रोबर्ट मुगाबे की विदाई खासा सनसनीखेज रही। यूएनओ ने सभी पारम्परिक शक्तियों ने ब्रिटेन को समर्थन दिया पर अंततः भारत के दलवीर भंडारी ने जीत दर्ज की। यह हेग विजय भारतीय कूटनीति के अथक प्रयासों का परिणाम थी। दलवीर भंडारी का जजों के पैनल में होना एक निर्णायक बिंदु था जहाँ भारत को कुलदीप जाधव मामले में सहायता मिली थी। जिम्बाब्वे में एक समय नायक की तरह राज करने वाले रोबर्ट मुगाबे ने सत्ता मोह में अपनी छवि के साथ ही समझौता कर लिया और अंततः जनविरोध के समक्ष घुटने टेककर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक होना पड़ा। दुनिया के चौथे सबसे बड़े लॉ फर्म मोजैक फोंसेका के डेटाबेस से तकरीबन साढ़े ग्यारह मिलियन दस्तावेजों के लीक हो जाने से दुनिया भर के कच्चे-चिट्ठों की पोल खुली। लगभग हर देश में इसपर बवाल मचा पर सर्वाधिक असर पाकिस्तान की सिविल सोसायटी पर देखा गया जब अदालत ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मामले में उन्हें दोषी करार दिया। नवाज़ को गद्दी छोड़नी भी पड़ी. अपने देश भारत में भी पनामा पर चर्चा बहुत हुई और कई लोगों के नाम भी उछले पर अंततः यह सुर्खियां सूख गयीं। 

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चीन इस वर्ष भी पश्चिमी मीडिया के लिए ड्रैगन बना रहा और चीन लगभग वर्ष भर इसके कई वाजिब कारण भी मुहैया करवाता रहा। दुनिया अभी चीन के ओबोर नीति को समझ ही रही थी तब तक चीन के सर्वेसर्वा शी जिनपिंग ने अपनी पार्टी के अक्टूबर अधिवेशन में अपने तीन घंटे तेईस मिनट के लम्बे भाषण में चीन की वैश्विक और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को नए सिरे से रेखांकित कर दिया। यकीनन चीन आने वाले वर्षों में भी एक प्रमुख निर्णायक विश्व शक्ति बना रहेगा। अपनी आर्थिक व्यवस्था एक हद तक सुदृढ़ और स्थिर कर लेने के पश्चात् अब चीन विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनने की होड़ में है। विवाद की दृष्टि से दक्षिण चीन सागर में  इस वर्ष हिलोर कम रही पर यह शांत कभी नहीं रहा। चीन ने विश्व के लगभग सभी सामरिक क्षेत्रों में भारी निवेश किया है और एशिया-हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपनी भौतिक सम्बद्धता काफी मजबूत कर ली है। इधर रूस में पुतिन पिछले सत्रह सालों से एक निर्णायक पद पर बने हुए हैं और पुतिन का रूस अब अपनी ऐतिहासिक महत्वाकांक्षा के आगोश में है, जिसमें उसने चीन, सीरिया पाकिस्तान और उत्तर कोरिया का सामरिक समर्थन भी जुटा लिया है। उत्तर कोरिया लगातार प्रतिबंधों के बीच में भी धमकियाँ देता रहा और अपने हथियारों का परीक्षण करते हुए तनाव का माहौल बनाता रहा। यही कारण है कि ट्रम्प का अमेरिका सम्पूर्ण एशिया-हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को इंडो-पैसिफिक कह भारत की वैश्विक भागेदारी बढ़ाने की वकालत कर रहा है। नवम्बर के ईस्ट एशिया समिट में बाकायदा क्वाड (चतुष्क) देशों की चर्चा हुई जिसमें अमेरिका के साथ जापान, आस्ट्रेलिया और भारत शामिल है। हाल की अमेरिका द्वारा जारी की गयी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा कार्ययोजना में भी भारत को एक प्रमुख विश्व शक्ति मानते हुए चतुष्क (क्वाड) की चर्चा की गयी। शिंजो अबे की पकड़ जापान में मजबूत हुई है और वे जापान को एक बार फिर सामरिक और सैन्य दृष्टिकोण से सक्रीय एवं मजबूत बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं। चीन में शी जिनपिंग घरेलू राजनीति में और मजबूत हुए हैं और वे भी चीन को विश्व शक्ति बनाने को आतुर हैं। ठीक यही रूस के पुतिन की स्थिति है। 2017 का एशिया एक शांत किन्तु गहरे तनाव में है। 

भारत के लिहाज से यह वर्ष उत्साहजनक रहा। वैश्विक हलकों में इसकी चर्चा लगातार होती रही। खाद्य सुरक्षा, कृषि, पर्यावरण के मुद्दों पर जहाँ इसे सभी विकासशील देशों का समर्थन मिला वहीं एनएसजी सदस्यता, सुरक्षा परिषद् सदस्यता के मोर्चे पर गतिरोध बना रहा। बाकी अन्य सभी विषयों पर अमेरिका लगातार और काफी खुलकर भारत के समर्थन में बयान जारी करता रहा।यों तो हर वर्ष ही भारत-चीन के सैनिकों में छिटपुट गतिरोध होते हैं, किन्तु इस वर्ष तिब्बत-भूटान के एक कोने से लगा डोकलम विवादों में रहा। तनातनी एक समय इतनी बढ़ी कि कुछ युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए किन्तु भारत इस बार रक्षात्मक नहीं रहा और अंततः चीन ने पैतरा बदल लिया। चीन के द्वारा जबरन उत्पन्न की गयी इस गतिरोध में आखिरकार उसे भी पता लगा कि भूटान के साथ-साथ दुनिया की बड़ी शक्तियाँ और खासकर अमेरिका भारत के साथ खड़े हैं। जैसे ट्रम्प भारत की वैश्विक भूमिका को निभाते हुए देखना चाहते हैं ठीक वैसे ही भारत ने अपने उत्तर-पूर्व के पड़ोसियों के साथ मेलजोल बढ़ाया है और भारत की एक्ट ईस्ट नीति में म्यांमार एक प्रमुख सहयोगी राष्ट्र के तौर पर उभरा है। किन्तु पड़ोस में वह म्यांमार ही है जहाँ से इस वर्ष विश्व की सर्वाधिक चर्चित त्रासदी रोहिंग्या शरणार्थी समस्या के तौर पर सामने आया । भारत ने इस पर एक सोची समझी कूटनीतिक अकर्मण्यता दिखाई, पड़ोसी देश बांग्लादेश थोड़ा नाराज भी रहा और अंततः यह विवाद थमा। भारत के सम्बन्ध अपने पड़ोसियों से इस वर्ष खिंचे ही रहे बस इसमें अफ़ग़ानिस्तान और भूटान अपवाद रहे। यों तो पाकिस्तान को छोड़कर कमोबेश सभी पड़ोसी देशों के छोटे-बड़े प्रतिनिधियों की भारत यात्रा समय-समय पर हुई किन्तु पारस्परिक संबंधों में वह अपेक्षित ऊष्मा नदारद रही। 

भारत को निश्चित ही श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और पाकिस्तान से अपने सम्बन्ध सुधारने की कोशिश करनी होगी क्यूंकि बड़ी तेजी से चीन इन पड़ोसियों में अपने भारी निवेश से एक गुडविल बनाता जा रहा है। नेपाल ने ऐतिहासिक रूप से नए संविधान के अनुरूप शांतिपूर्ण ढंग से एक साथ केंद्र और राज्य के चुनाव संपन्न करवा लिया और अंततः तीन दशकों के बाद उसे एक स्थिर सरकार मिली है। मालदीव ने हाल ही में चीन से मुक्त व्यापार समझौता संपन्न किया और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर आख़िरकार चीन का निर्णायक स्वामित्व हो गया। चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ग्वादर बंदरगाह भी विकसित किया और पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन-अधिकृत अक्साई चिन पर पाकिस्तान-चीन के द्वारा पारस्परिक व्यापारिक गलियारा विकसित किया जिससे भारत का पारम्परिक ऊर्जा के भंडार मध्य एशिया के देशों के साथ भौतिक संपर्क ही अवरुद्ध हो गया। हालाँकि भारत ने अपनी तैयारियों में तेजी लाते हुए आखिरकार ईरान के साथ सहयोग करते हुए ग्वादर के निकट ही सिस्तान-बलूचिस्तान प्रान्त में उन्नत चाबहार बंदरगाह विकसित कर लिया और अब यह संचलन में भी आ गया है। चाबहार एक कूटनीतिक उपलब्धि भी है क्योंकि इससे भारत का न केवल मध्य एशिया के देशों के साथ पुनः भौतिक संपर्क स्थापित हो सकेगा अपितु भारत की सामरिक पहुँच ईरान-अफ़ग़ानिस्तान-रूस होते हुए यूरोप तक हो जाएगी। हिन्द महासागर में भारत अमेरिका के साथ डियागो गार्सिआ पर अपनी सामरिक पकड़ बनाये हुए है, हालाँकि इस वर्ष ब्रिटेन के अस्थाई स्वामित्व वाले इस मारीशस के द्वीप पर ब्रिटेन और मारीशस के बीच तनातनी भी रही। मामला यूएनओ में पहुंचा और भारत ने भू-राजनीतिक स्थिति को देखते हुए मारीशस के पक्ष में मतदान किया। यहाँ कूटनीतिक चुनौतियाँ सचमुच आसान नहीं हैं। पीएम मोदी की विदेश यात्राओं में यूरोप के देश प्रमुखता से रहे, यथा-जर्मनी, स्पेन, रूस, फ़्रांस, पुर्तगाल और नीदरलैंड ! इसके अलावा 2017 में मोदी फिलीपींस, चीन, श्रीलंका, कजाखस्तान, अमेरिका और म्यांमार की यात्रा पर रहे। सर्वाधिक चर्चित यात्रा मोदी की इजरायल यात्रा रही क्यूंकि यह यात्रा एक कूटनीतिक बदलाव का द्योतक यात्रा रही। संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया, नेपाल, श्रीलंका, फलस्तीन, मारीशस, यमन, अफ़ग़ानिस्तान, भूटान के राष्टध्यक्षों ने भारत की इस वर्ष यात्रा की और जापान की शिंजो अबे की यात्रा इस वर्ष विशेष सुर्ख़ियों में रही। भारत ने इस वर्ष कई सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया किन्तु सार्क और नैम के बैठक ठिठके ही रहे और यकीनन इसके कूटनीतिक निहितार्थ निकाले गए। 

नए वर्ष का विश्व जहाँ जेरुसलम और उत्तर कोरिया में उलझा रहेगा वहीं एक आशा ही है कि संभवतः अगले वर्ष दुनिया के शक्तिशाली देश ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों से लड़ने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठा सकें। 2017 की एक खास बात यह भी रही कि अंततः वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में मांग और पूर्ति के प्रक्रियाओं में तेजी आयी और विश्व-व्यापार को पटरी पर आने में मदद मिली। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का सुधार विश्व में एक आर्थिक आशावादिता जगाता है। नया वर्ष मोदी सरकार के इस कार्यकाल आख़िरी वर्ष होगा और सरकार अपने सभी वैश्विक और क्षेत्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का प्रयास करेगी। पिछले सालों की सक्रियता से दुनिया को यह सन्देश तो अवश्य ही पहुंचा है कि भारत अपनी वैश्विक भूमिकाओं के लिए तैयार है।  भारत ने यकीनन वे क्षेत्र भी स्पर्श किये हैं जो एक अरसे अछूते रहे और खासकर अमेरिका के साथ संबंध यकीनन और बेहतर हुए हैं। विदेश नीति के सर्वाधिक विश्वसनीय सिद्धांत सततता व परिवर्तन के हिसाब से और राष्ट्र के दूरगामी हितों को देखते हुए भारत को ईरान, इजरायल, रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को भी सम्हालते रहना होगा। कहना होगा कि भारत को अपनी वैश्विक भूमिका के साथ अपनी क्षेत्रीय भूमिका नज़रअंदाज नहीं करनी चाहिए। खासकर अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को सुधारने की दिशा में एकतरफा ही सही पहल शुरू कर देनी चाहिए। नैम और सार्क को पुनर्जीवित करने का प्रयास भारत की बार्गेनिंग शक्ति को उभारेगा और इसे अपनी वैश्विक पहचान बनाने में मदद देगा। 


Friday, December 29, 2017

आपके सपने हैं, विश्वास सबसे पहले आपको करना है



ये उधेड़बुन बनी रहती है कि सपने संजोये जाएँ भी कि नहीं। कुछ कहते हैं कि अपनी सीमा समझते हुए जमीन पर पाँव जमाये रखना चाहिए। लक्ष्य रीयलिस्टिक होने चाहियें। जिंदगी के खूबसूरत एहसास से परे डरे सहमे लोगों की सख्त नसीहतें अधिक मिल जाएंगी। ये जिंदगी को बस एक रेस बना छोड़ देते हैं जिसके अंत में चाहे जीत हो या हार हो, इंसान हांफने ही लगता है।

इस दुनिया का सबसे उम्रदराज शख्स भी नहीं जानता कि अगले पल क्या होना है। इसलिए सपने संजोने का प्यारा जोखिम लिया जाना चाहिए। अगर आप चाहते हैं कि आपकी ज़िंदगी महज जेरोक्स बनकर न रह जाए, तो सपने संजोने चाहिए अपने। इसके फायदे अधिक हैं, नुकसान गिनती के हैं। सपनों वाला आदमी एक तरह के उत्साह में रहता है। पॉजिटिव मन के आदमी को ये दुनिया और भी प्यारी लगती है।

अपने सपनों का पीछा करते हुए धीरे धीरे हमारा व्यक्तित्व निखर जाता है और यह निखार कई बार उन सपनों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए सपनों की यात्रा में गिरना-उठना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि चलते रहना।

घबराने की जरुरत नहीं है, हिम्मत से सपने संजोते हुए धीरे-धीरे लगातार सीखते हुए मुस्कुराते हुए यारियां निभाते हुए चलने की जरुरत है। आप लोगों में उत्साह भर सकते हैं। लोग घबराये हुए हैं, डरे हुए हैं; ऐसे में आपकी मुस्कान राहत तो देगी ही उन्हें, आपको एक बेहतर सामजिक सम्बल भी मिलेगा। सभी दौड़ में हैं तो इंतज़ार मत करिये कि कोई आपको पुचकरेगा, हौसला बढ़ाएगा या आपके सपनों की ईज्जत करेगा। सपने आपने देखे हैं, सबसे अधिक भरोसा आपको ही उनपर करना होगा।

Wednesday, December 27, 2017

कुलभूषण जाधव, अजमल कसाब नहीं हैं...


कभी भारतीय नेवी में काम कर चुका एक शख्स जो अपनी अधेड़ उम्र में ईरान जाकर कारोबार कर रहा था कि सहसा उसका अपहरण हो जाता है। पाकिस्तानी मीडिया हल्ला मचाती है कि उसने भारत के जासूस को पकड़ा है वह भी अपने प्रान्त बलूचिस्तान से। कहा जाता है कि वह रॉ का एक जासूस है, जो बलूचिस्तान में हुए कई बम विस्फोटों का जिम्मेदार है। पाकिस्तानी मार्शल कोर्ट उसे गुनहगार मानती है और फांसी की सजा सुनाती है। भारत सरकार हरकत में आती है और सजा के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, हेग में अपील करती है। पंद्रह सदस्यीय जजों का पैनल (जिसमें भारत के जस्टिस दलवीर भंडारी भी हैं ) उस शख्स की सजा पर रोक लगा देता है। भारत सरकर राहत की साँस लेती है और उनके परिवारजनों को उस शख्स से मिलवाने की कूटनीतिक जुगत लगाती है। यह मेहनत रंग लाती है और भारी इंटरनेशनल दबाव में पाकिस्तान, उस शख्स को उसकी माँ और पत्नी से मिलवाने के लिए राजी हो जाता है। पत्नी और माँ की सघन जांच होती है, महज सादे कपड़ों में उस शख्स से मीटिंग करवाई जाती है, बात आमने-सामने पर फोन से होती है, जिसे अधिकारी सुन रहे होते हैं और उनके बीच में एक मोटी पर पारदर्शी दीवार होती है। अगले दिन पाकिस्तान के सारे अख़बार देश की दरियादिली पर लहालोट होते हैं और उस शख्स की पत्नी के जूतों में सदिग्ध वस्तु होने की बात कहते हैं।
जी हाँ, उस शख्स का नाम है, कुलभूषण जाधव !
राजनीति में खासकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सच वह माना जाता है जो आपको और आपके देश को सूट करता है। तो सच क्या है, यह इस लेख का विषय नहीं है। कुछ बातें और कहीं जा सकती हैं, जिससे सीन और समझ में आ सकता है। देशों में सरकारें होती हैं, उन्हें फिर फिर चुनाव जीतकर सत्ता में आना होता है। चुनाव एक खर्चीली और कठिन प्रक्रिया है। राजनीतिक जनभागेदारी और राजनीतिबोध से शून्य समाज में सरकारें अमूमन भ्रष्ट होती हैं और वे ऐसे मुद्दे खोजती और बनाती हैं, जिसमें जनता का ध्यान जाए, जनता खुश हो और मूल समस्याएँ किनारे पडी रहें। भारत-पाकिस्तान की सरकारों में यह आम है, इसलिए जबतब ही किसी घटना पर भारत में ‘विदेशी हाथ’ और पाकिस्तान में ‘खुफ़िआ हाथ’ होने की बात की जाती है।
हमने अजमल कसाब को जब रंगे हाथों पकड़ा तो पाकिस्तान के लिए वह अंतरराष्ट्रीय शर्म से गुजरने जैसा था। हमने अजमल कसाब का गुनाह कुबूलता विडिओ चलाया और कसाब कहता सुना गया कि उसके साथ भारतीय अधिकारी बहुत अच्छे से पेश आये और भारतीय अख़बारों में उसके लिए बिरयानी के खर्चों की चर्चा हुई। कसाब ने उसी वीडियो में कुबूला कि गरीबी में उसने आतंक का रास्ता चुना और आईएसआई ने उसे ट्रेनिंग दी है। बाद में भारतीय कोर्ट ने उसी दोषी पाया और फांसी की सजा दे दी। चूँकि कसाब के लिए भारत के पास ढेरों सुबूत थे और कसाब भारतीय जमीन पर पकड़ा गया, इसलिए पाकिस्तान चाहकर भी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस नहीं जा सकता था बल्कि पाकिस्तान ने तो आधिकारिक रूप से माना ही नहीं कि कसाब पाकिस्तानी नागरिक है. हालाँकि कसाब का पंजाबी पाकिस्तानी उच्चारण चीख चीखकर बयान कर रहा था कि यकीनन वह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के फरीदकोट का है। कुलभूषण जाधव का भी एक विडिओ जारी किया गया है, जिसमें उसने कमोबेश इसी पैटर्न पर कुबूलनामा पेश किया है। पाकिस्तान में सियासत गरम है कि कुलभूषण को फांसी देके रहेंगे और भारत में राजनीति गरम है कि कुलभूषण के परिवार वालों के साथ बदसुलुकी हुई है और भारत चुप नहीं बैठेगा।
मुझे सच नहीं पता, निष्कर्ष आप निकालें !!!

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