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Friday, September 21, 2018

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश: एकीकरण बनाम महासंघ के तर्क


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

लाहौर में जन्में प्रसिद्द भारतीय फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा की 2004 में आयी फिल्म वीर-ज़ारा में मशहूर गीतकार जावेद अख्तर का लिखा एक गीत है जो सुर-साम्राज्ञी लताजी और उदित नारायण की आवाज में बेहद मकबूल हुआ था। 'धरती सुनहरी अम्बर नीला, हर मौसम रंगीला, ऐसा देश है मेरा हो...ऐसा देश है मेरा !' आख़िरी बंद में यह गीत कुछ यों हो जाता है- 'तेरे देश को मैंने देखा, तेरे देश को मैंने जाना...,....ऐसा ही देश है मेरा, जैसा देश है तेरा...!' यह फिल्म, इसके निर्देशक, इसकी कहानी, इसके लेखक और गीतकार यह निश्छल संदेश देते हैं कि भारत और पाकिस्तान में एक-दूसरे के लिए नफरत की कोई गुंजायश नहीं होनी चाहिए और कायनात की अनगिन खूबसूरत नेमतों को दोनों देश की धरती साझा करती है। कहना होगा कि लोकप्रिय कला माध्यम में यह एक अद्भुत प्रयास था जो एक 'मानवीय पाकिस्तान' की छवि गढ़ता था। लेकिन संस्कृति, समाज, इतिहास और राजनीति ये अलग-अलग शब्द हैं और अपनी पूरी अर्थवत्ता में इनके गंभीर निहितार्थों की अवहेलना कत्तई नहीं की जा सकती। राष्ट्र, राज्य व राष्ट्र-राज्य, 'राजनीति' के पारिभाषिक शब्द हैं और इनके अपने विशिष्ट मायने हैं। एम. फिल. की कक्षा में मेरे पाकिस्तानी सहपाठी को इस सुंदर गाने के आख़िरी बंद से क्यों आपत्ति थी, यह मै धीरे-धीरे समझ पाया था क्योंकि वे पंक्तियाँ अनजाने में ही उसके राष्ट्र-राज्य 'पाकिस्तान' के 'रेजन डेटा (राज्य स्थापना का आधारभूत तर्क)' को चोट पहुँचा रही थी। 

राष्ट्र जहाँ राजनीतिक व सामाजिक अस्तित्व का परिचायक है वहीं राज्य मूर्त अस्तित्व का जिसमें जरूरी तत्वों के रूप में निश्चित भू-भाग, जनता, सरकार और संप्रभुता पाए जाते हैं। आधुनिक 'राष्ट्र-राज्य' होने के लिए राष्ट्र और राज्य दोनों की विषेशताओं का होना आवश्यक है। यह समझ लेना बेहद आवश्यक है कि एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान का प्रादुर्भाव 1940 से ही माना जाता है जो 1947 में राज्य की जरूरी विशेषताएँ पाकर एक 'राष्ट्र-राज्य' बनने की अपनी कोशिशों में लग गया। औपनिवेशिक अतीत से मुक्त हुए देशों के बारे में इसलिए ही कहा जाता है कि यहाँ राष्ट्र-निर्माण एवं राज्य-निर्माण की समांनातर प्रक्रियाएँ सतत चलती रहती हैं। यहीं उद्धृत करना समीचीन होगा कि जिन्ना जहाँ भारत-पाकिस्तान को साझे मातृभूमि के दो राष्ट्र के रूप में देखने के हिमायती थे वहीं गाँधी इन्हें 'एक राष्ट्र' के 'दो राज्यों' के रूप में स्वीकार करना चाह रहे थे। आगे चलकर पाकिस्तान का एक और विभाजन हुआ और बांग्लादेश अस्तित्व में आया। यह ठीक है कि दो या दो से अधिक राष्ट्र-राज्य अपने इतिहास, समाज, संस्कृति के कुछ या अधिकांश पन्ने साझा करते हैं पर इस आधार पर उनके 'एकीकरण' का एकतरफा तर्क गढ़ना व उसका एकपक्षीय आरोपण द्विपक्षीय संबंधों में और अधिक तनाव ही भरेगा। कोई भी दो या दो से अधिक राष्ट्र-राज्य अपने-अपने राष्ट्रवाद को सुरक्षित रखते हुए एक 'महासंघ' बनकर काम करने को राजी हो सकते हैं जिससे विश्व-राजनीति में साझे राष्ट्र-हित साथ मिलकर सँवारे जा सकें। राष्ट्र और राज्य की पृथक-पृथक महत्ता समझते हुए ही पीछे कई बार गंभीर रूप से 'महासंघ' की योजना पर तो अवश्य ही विचार-विनिमय हुआ किन्तु किसी भी गंभीर विचारक अथवा राजनेता ने 'एकीकरण' की बात कभी नहीं चलायी। ‘महासंघ’ बनाकर विभाजन का सच नहीं बदला जा सकता लेकिन उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित किया जा सकता है। 'महासंघ' के तर्क को जिन्ना सहित, राम मनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, हामिद अंसारी आदि अनेक हस्तियाँ स्वीकार करती हैं और समय-समय पर इसकी आवश्यकता पर भी बात करती हैं, किन्तु 'एकीकरण' का एकतरफा तर्क सामान्यतया नहीं ही दिया गया।  

अक्टूबर 1990 में हुए पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी एकीकरण राष्ट्र-राज्यों का यकीनन एक सुंदर उदाहरण है, जिससे इतना अवश्य यकीन उपजता है कि एकीकरण की प्रक्रिया असम्भव नहीं है। पर यह उदाहरण भारत, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश पर आरोपित करने से पहले उनकी अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करना बेहद जरूरी है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीपीय सन्दर्भ में यह उदाहरण उपयुक्त नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते दुनिया उदारवादी एवं साम्यवादी विचारधारा के स्तर पर संयुक्त राज्य अमेरिका व सोवियत रूस के नेतृत्व में बंटकर फिर शीत युद्ध के आगोश में चली गयी थी। जर्मनी का पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी के रूप में विभाजन इसी रस्साकस्सी का परिणाम था। पृथक राष्ट्र-अस्तित्व के मूल में तर्क ‘विचारधारा व राजनीतिक व्यवस्था’ का था। 1986 में सोवियत रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने ‘ग्लासनोस्त’ व ‘पेरेस्त्रोइका’ की घोषणा कर दी थी, जिससे अंततः नब्बे के दशक में आते-आते सोवियत विखंडन की प्रक्रिया की शुरुआत हुई। इन नयी परिस्थितियों का लाभ लेते हुए पश्चिमी जर्मनी के चांसलर हेल्मुट कोल ने अमेरिकी तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज हर्बर्ट वाकर बुश के कूटनीतिक प्रयासों से जर्मन-एकीकरण संभव कर दिया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों ओर की जर्मन जनता इस एकीकरण को चाहती थी और बर्लिन की दीवार बिना किसी राजनीतिक रणनीतिक योजना के पूर्णतः स्वतः स्फूर्त जनता द्वारा ढहायी गयी। वह ‘विचारधारा व राजनीतिक व्यवस्था’ जो जर्मन-विभाजन को आधार देती थी, वही कमजोर पड़ती गयी थी।  इसके इतर पाकिस्तान के राष्ट्रगत अस्तित्व का मूल तर्क  ‘धार्मिक’ है और बांग्लादेशी राष्ट्रगत अस्तित्व का मूल तर्क ‘सांस्कृतिक (बंगाली)’ है, जो अभी भी पूरी मजबूती से बना हुआ है। इसलिए ‘भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश महासंघ’ के तर्कों में जहाँ सहयोग की ऐसी मंशा शामिल है जो किसी भी राष्ट्र-राज्य की राष्ट्र्रीय संकल्पना को बिना हानि पहुंचाए परस्पर सहयोग की अधिकतम सम्भवना को टटोलता है, वहीं ‘एकतरफा एकीकरण’ के तर्क की मंशा ‘राष्ट्रगत असुरक्षा’ पनपाती है। 

विश्व-राजनीति, दक्षिण एशियाई राजनीति एवं भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के वर्तमान संबंध एवं इनकी मौजूदा घरेलू राजनीति भी इस बात की ताकीद करती है कि यह समय ‘एकीकरण के तर्क’ का कत्तई नहीं है, बल्कि ऐसे समय में यदि ‘महासंघ’ बनाने का तर्क भी यदि इन तीनों देशों में से किसी एक देश का कोई एक नेता देने की कोशिश करे तो यह एक बेहद सकारात्मक बात मानी जाएगी। पाकिस्तान की राजनीति में अभी जो इमरान युग शुरू हुआ है उसका आधार वही सेना है जो भारत से अपने संबंधों को सुधारने की दिशा में उदासीन है। भारत-पाकिस्तान संबंध ठिठके पड़े हैं, सामान्य बातचीत का दौर भी स्थगित है। भारत का पारंपरिक मित्र रूस, पाकिस्तान को हथियार दे रहा और उनके सैनिकों को प्रशिक्षण भी दे रहा। तेजी से उभरते चीन से भारत के संबंधों में जहाँ डोकलम, तिब्बत, नेपाल और मालदीव का तनाव है तो उसी चीन से पाकिस्तान के गहराते संबंधों को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं!  बांग्लादेश एक सघन आंतरिक राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है और वहाँ भी बांग्लादेशी शरणार्थियों व धार्मिक चरमपंथी मुद्दों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक ऐंठन पैदा की है। यथार्थ में भारत-पाकिस्तान के सतत तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए 'महासंघ' का लक्ष्य जितना विशिष्ट व कठिन है, 'एकतरफा एकीकरण' का तर्कारोपण, ऐसे माहौल में 'एकीकरण' तो छोड़िये, 'महासंघ' के प्रयत्नों को भी जटिल बनाएगा और यह  चिढ़ाने जैसा बेतुका भी है। 

एक गहरे विजन और प्रतिबद्ध पारस्परिक सहयोगों की रूपरेखा के साथ भारत सरकार, पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ ‘महासंघ’ निर्मित करने की योजना पर तब ही काम कर सकती है जब पृष्ठभूमि में तीनों देशों में परस्पर सहयोग की बानगी हो, भले ही वह हालिया हो लेकिन एक पारस्परिक विश्वास बनने लगा हो। फिर और भी सकारात्मक होकर सोचें तो महासंघ की स्थिति साकार होने के बाद यदि इन देशों के नागरिक धीरे-धीरे यह महसूस करने लगें कि हमें ‘एकीकरण’ की ओर बढ़ना चाहिए तो उचित वैश्विक परिस्थिति में यकीनन यह एकीकरण संभाव्य हो सकता है। इसमें भी दशकों लगेंगे और यह प्रक्रिया निरंतर सहयोग व विश्वास की मांग करती है। हाल-फ़िलहाल तीनों देशों की सरकारें ऐसे किसी निरंतर सहयोग व विश्वास की प्रक्रिया में तो नहीं ही दिख रहीं।   

Friday, September 7, 2018

एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन

#एनेमीऑफ़नन

साभार: गंभीर समाचार 

जिस दिन भारत अपनी आजादी की इकहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने में मशगूल था उसीदिन अमेरिका के छोटे-बड़े तकरीबन साढ़े तीन सौ मीडिया-प्रतिष्ठानों ने  अमेरिकी प्रेस की आजादी के पक्ष में सम्पादकीय प्रकाशित किया । यह एक अभूतपूर्व घटना थी। पर कहना होगा कि यह उस अभूतपूर्व रवैये के विरुद्ध एकजुट प्रदर्शन था जो किसी भी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति में यों नहीं रही । पिछले एक अरसे से मीडिया द्वारा हो रही अपनी हर आलोचना को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ‘फेकन्यूज’ कह रहे हैं और जोर देकर दुहराते हैं कि मीडिया द्वारा कहा गया, दिखाया गया कुछ भी तथ्य नहीं है। ट्रम्प के अनुसार मीडिया, विपक्षी दल की तरह व्यवहार कर रहा है और यह देशहित में नहीं है। ट्रम्प यहाँ तक कहने लगे कि मीडिया उनकी दुश्मन नहीं बल्कि देश की दुश्मन है। ट्रम्प अपने ट्विटर अकाउंट से बमबारी करते हैं तो उसी ट्विटर पर एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन चलाया गया। बोस्टन ग्लोब की अपील पर अमेरिकी मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रम्प के इस मीडिया विरोधी रवैये का एकजुट विरोध किया। 

कमोबेश पूरी दुनिया में सत्ता के साथ मीडिया के जो संबंध हैं वे बहुरंगी हैं। एक लंबे समय तक यह संबंध श्वेत-श्याम था। या तो मीडिया, सरकार की निर्भीक आलोचना करती थी अथवा स्वयं ही सरकारी बन उसका भोंपू बन जाती थी। बाजार की दखलंदाजी ने इस भूमिका में एक अवसरवादी संतुलन भर दिया था। सत्ता और शक्ति के खेल को परोसते-परोसते मीडिया खुद एक बड़ी किरदार हो गयी। इंटरव्यू लेने वालों के इंटरव्यू लिए जाने लगे। प्रश्नकर्ता, द्रष्टा व विचारक बनते गए, प्रश्न छूटते गए, दृश्य धुंधले होते गए और आयातित विचारों की बमबारी ही एजेंडे में शामिल हो गए। चुनाव जो कि एक लोकतांत्रिक उत्सव है अब मीडिया के लिए महज अवसर में तब्दील हो गया। समकालीन मीडिया एक रंगारंग मेला है। हर दुकान पर एक लाउडस्पीकर बंधा है। सारे लाउडस्पीकर चालू हैं चौबीस घंटे और चीख रहे हैं। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाउडस्पीकर चुन लिए हैं। उद्योगपतियों ने इन लाउडस्पीकरों की खरीददारी में मदद की है। अब अधिकांश लाउडस्पीकर वही रिकॉर्ड बजाने को मजबूर हैं, जो उन्हें पहुँचाया जाता है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का चुनाव, सांगठनिक रूप से पहला बड़ा सफल कैम्पेन माना जाता है जब मीडिया का इस्तेमाल खुलकर किया गया। पश्चिमी देशों में यह पहले हुआ, अपने देश में यह अब देखा जा सकता है। नरेंद्र मोदी के चुनाव कैम्पेन में मीडिया की भूमिका से इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। प्रवृत्तियाँ काफी पहले से कार्यरत हैं, परन्तु यह दशक जैसे पर्दादारी जानता ही नहीं। बाजार का साथ पाकर मीडिया एक समय बाद स्वयं में ही एक औद्योगिक घराना बन जाता है। इस बिंदु पर आकर लाउडस्पीकर अपने रेकॉर्ड बजाने की भी हैसियत रखता है। ट्रम्प से वह संतुलन टूट गया है। भारत में यह संतुलन अगले दशक में टूट सकता है। राजनीतिक दल जो मीडिया का इस्तेमाल कर कैम्पेन करते हैं अब अपनी आलोचना के जवाब में मीडिया पर ही तंज कसते हैं। ट्रोलर्स की खेती करने वाले दूसरों के ट्रोलर्स को खर-पतवार बताते हैं। फेकन्यूज फिनोमेना अब एक आत्मघाती बम है।  

विश्व राजनीति में मीडिया


 “जो मीडिया को नियंत्रित करता है वह मन को नियंत्रित करता है।  (जिम मॉरिसन )”


साभार: गंभीर समाचार 

अभिव्यक्ति के लिए भाषा और उसके संकेत चिन्हों को दर्ज करने की तकनीक के सहारे मानव ने अभूतपूर्व प्रगति की है। साझी सामाजिक स्मृति सहेजी जा सकती है और भविष्य के लिए प्रयोग में भी लाई जा सकती है। मानव-अभिव्यक्ति के अनगिन माध्यम विकसित हुए। उन सभी मीडियम्स का बहुवचन ही मीडिया कहलाता है । जैसे-जैसे राजनीतिक संरचनाएँ विकसित होती गयीं, मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती गयी। यों तो इतिहास के पन्नों में मीडिया के कितने ही रंग हैं लेकिन अब जबकि संपूर्ण विश्व में एक राजनीतिक मूल्य के रूप में लोकतंत्र स्वीकार्य हो चला है, मीडिया की भूमिका कमोबेश अब यह स्थापित है कि वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जवाबदेही व पारदर्शिता सुनिश्चित करता है और नागरिक-समाज एवं सरकार के मध्य सेतु बनकर राजनीतिक संक्रियाओं के निर्वहन में योग देता है। 

वैश्वीकरण और मीडिया का वैश्विक स्वरूप 

संचार क्रांति ने समूचे दुनिया से एक क्लिक पर संपर्क-सम्बद्धता उपलब्ध करा दिया है। इंटरनेट ने पूरी दुनिया को चौबीसों घंटे जोड़ रखा है। सूचनाएँ अभूतपूर्व ढंग से इतिहास में पहली बार साझा हो रही हैं और इसलिए ही मार्शल मैकलुहान ने विश्व को ‘वैश्विक-ग्राम’ की संज्ञा दी। मीडिया शब्द में अब अख़बार, टेब्लॉयड, पत्रिका, रेडिओ, टीवी, सोशल साइट्स, ब्लॉग्स, वेबसाइट्स, ऐप आदि सभी माध्यम आते हैं। औद्योगिक क्रांति से उपजे पूँजीवाद के उत्कर्ष ने, उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद और दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका के पश्चात जो वैश्विक व्यवस्था दी है उसमें अब वैश्वीकरण की बयार चल रही है। वैश्वीकरण एक ऐसी विशद सतत प्रक्रिया है जो विश्व-व्यवस्था के देशों को राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक संस्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ने को बाध्य करती है। राष्ट्रीय सीमाएँ वैश्वीकरण के लिए उतनी मायने नहीं रखतीं और सम्प्रभुताएँ यदि तैयार न हों तो भी वैश्वीकरण का दबाव महसूस करती हैं। तकनीक के उत्कट विकास ने वैश्वीकरण को और भी शक्तिमान बनाया है जो कुशल राष्ट्र को जहाँ और भी अवसर प्रदान करती है वहीं अकुशल राष्ट्र स्वयं को इसमें नव-उपनिवेशवाद जैसी स्थिति में स्वयं को बिधा पाते हैं।

विश्व इतिहास और समकालीन वैश्वीकरण ने मीडिया का एक ‘वैश्विक स्वरूप’ गढ़ा है। अब राष्ट्रगत मीडिया, वैश्विक मीडिया से अप्रभावित नहीं रह सकती। वैश्विक मीडिया, वैश्वीकरण की शक्तियों के साथ मिलकर इस स्थिति में है कि वह किसी भी देश की मीडिया को मुद्दे पकड़ाने लगे और उसको   नियोजित विषयवस्तु भी थोपने लगे। इस स्थिति में राष्ट्रहित कब दाँव पर लग जाता है, पता ही नहीं चलता। संपूर्ण विश्व में सरकारें उदारवादी राजनीतिक व्यवस्था में पनप रही हैं। उदारवादी व्यवस्था पूँजी के मुक्त प्रवाह में यकीन करती है और उसी व्यक्ति और व्यवस्था को लाभ पहुँचाती है जो पूंजीसंपन्न होती है। इसके विपरीत मीडिया अपने विकासक्रम में इस आदर्श में आगे बढ़ी है कि उसे जनपक्षधर रहना है और राज्य-उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए उस सीमान्त व्यक्ति के प्रश्न भी सत्ता से करने हैं जिसके पास कोई कुशलता, कोई पूँजी शेष नहीं है। उदारवादी व्यवस्था और मीडिया के सत्व के मध्य यह संघर्ष फिर स्वाभाविक है। चूँकि राष्ट्र-राज्य शून्य में स्थित नहीं होते, वे एक वैश्विक व्यवस्था में होते हैं तो विश्व व्यवस्था की प्रकृति के बदलाव का प्रभाव यकीनन राष्ट्र-राज्य पर भी पड़ेगा। गहराते वैश्वीकरण ने राष्ट-राज्यों की मीडिया के लिए दरअसल और भी कम श्वाँस-स्थान रख छोड़ा है खासकर तब जब सरकारें पूंजीसमर्थक हों। मुनाफा ही मूल्य है बाजार का। बाजार की शक्तियाँ कुछ इस तरह से कार्य करती हैं कि मीडिया को भी पत्रकारिता के मूल्य के ऊपर बाजार के मूल्य को तवज्जो देना पड़ता है। नागरिक, मनोरंजन की चाशनी में परोसे जाने वाले समाचार की निष्पक्षता के लिए कोई मूल्य नहीं चुकाना चाहते और महज मूक दर्शक बनते चले जाते हैं।   

भारतीय मीडिया कवरेज में वैश्वीकरण व वैश्विक मामलों का नकार 

अपने देश भारत की सामान्य मीडिया कवरेज देखें तो ऐसा लगता ही नहीं कि विश्व में वैश्वीकरण घट रहा है जिससे कि हर लोकल खबर का एक वैश्विक मायने बनता है और हर वैश्विक खबर के लोकल मायने बनते हैं। अभी भी वैश्विक राजनीति के लिए अख़बारों में एक-आध पन्ना, पत्रिकाओं में एक नियमित-अनियमित स्तम्भ, टीवी चैनलों पर एक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम को समेटता कोई साप्ताहिक कार्यक्रम ही दिखाई पड़ता है, जो महत्ता के अनुपात में नगण्य है । कुछ अंग्रेजी अख़बारों को छोड़ दें तो अधिकांश हिंदी के अख़बारों में वैश्विक मामलों पर प्रस्तुतीकरण अत्यल्प है। हिंदी अख़बारों के लिए अभी भी विदेश सात समंदर पार है। उनमें छपने वाले संपादकीय आलेखों में बेहद कम आलेख वैश्विक राजनीति पर होते हैं और वह भी अधिकांश कुछ यों होते है जिसमें भारतीय विदेश नीति की उपलब्धियाँ बता दी जाती हैं। यह दौर विश्व- राजनीति के वैश्वीकरण का है और राष्ट्रीय घटनाक्रम, वैश्विक घटनाक्रमों के परिप्रेक्ष्य में यदि नहीं देखे और विश्लेषित किये जा रहे तो देश समानांतर बड़े मीडिया कोलाहलों के बीच भी लगातार अधूरे सच में जी रहा है। होना यह चाहिए कि मीडिया में यह शऊर आना चाहिए कि वह हर खबर को वैश्विक परिदृश्य में परोसे और विश्लेषण की गुंजायश बनाये। बिना इसके कोई भी मीडिया कवरेज सामान्यतः वैश्वीकरण के प्रभावों का नकार है, जो सही नहीं है। इस दोषपूर्ण कवरेज का असर भारतीय जनमत पर यों हुआ है कि जहाँ दुनिया के ज्यादातर देशों के आम चुनावों में विदेश नीति और वैश्विक मामले प्रमुख चुनावी मुद्दे होते हैं वहीं भारतीय आमचुनावों में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो वैश्विक मुद्दे, चुनावी मुद्दे बनते ही नहीं। एक ऐसा देश जिसे जवाहर लाल नेहरू के रूप में ऐसा प्रधानमंत्री मिला था जो एक वैश्विक नेता रहे, एक ऐसा देश जो आजादी के शुरुआती दशकों में ही निर्गुट आंदोलन के माध्यम से तीसरी दुनिया के देशों का अगुआ बन गया, एक ऐसा देश जिसकी भू-राजनीतिक स्थिति लार्ड कर्जन की नजर में भी विशिष्ट थी और आज भी जो देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वैश्विक राजनीति के केंद्र में है, वहाँ वैश्विक मामलों की मुख्यधारा मीडिया द्वारा की जा रही अनदेखी कितनी शोचनीय व दुखद है। यह सच है कि ‘वैश्वीकरण का प्रभाव’ मीडिया में खासा चर्चा घेरता है पर ज्यादातर वह आर्थिक व सामाजिक स्तर पर ही विश्लेषित होता है। उसीप्रकार जबकि मीडिया सूचनाओं के लिए अब इंटरनेट पर खासा निर्भर है तो भी वैश्विक मामलों का महत्त्व यदि नहीं समझा जायेगा तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। समकालीन तथ्य के रूप में मीडिया द्वारा वैश्वीकरण और वैश्विक मामलों की अनदेखी राष्ट्रहित के लिए घातक है। 

मीडिया साम्राज्यवाद व विश्व राजनीति 

उदारवादी बाहुल्य ने विश्व के प्रत्येक देश के अभिजन को व्यक्तिवादी होकर पूँजी बटोरने और सहेजने में मदद दी है। वैश्वीकरण मीडिया मॉडल इतने खर्चीले हैं कि वे परम्परागत आर्थिक मॉडल पर चल ही नहीं सकते। बाजारवाद और उपभोक्तावाद की अतिशयता ने आधुनिक जीवन मूल्यों में जो घुसपैठ की है उससे मीडिया को नागरिक आधारित मॉडल चलाने में बड़ी ही परेशानियाँ हैं। यह आर्थिक विकलांगता मीडिया घरानों को विज्ञापन के लिए या तो सरकार या फिर बाजार के समक्ष घुटने टेकने को मजबूर करती है। पूरी दुनिया में यह सामान्य प्रवृत्ति बनी है कि मीडिया घराने अब किसी न किसी औद्योगिक घरानों की इकाइयाँ बन गयी हैं। यह स्थिति अभिजन को निर्भीक हो पूँजी बटोरने और सहेजने में मदद देती है। उपयुक्त चुनाव-सुधार न होने की वजह से चुनाव इतने खर्चीले होते गए हैं कि यहाँ भी चंदों के माध्यम से औद्योगिक घरानों को राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका मिल जाती है। वैश्वीकरण ने दुनिया भर के औद्योगिक घरानों को हाथ मिलाने का जो मौका दिया है उससे मीडिया घरानों का भी क्रमशः वैश्वीकरण हुआ है। यह स्थिति वैश्विक जनमत निर्माण में  मीडिया को बेहद ताकतवर बना देती है। सीएनएन, बीबीसी, नेटवर्क-18 आदि के अनगिन मीडिया प्रकोष्ठ अमेरिकी इशारे पर चीन को शांतिपूर्ण पांडा नहीं खतरनाक ड्रैगन से प्रदर्शित करते हैं। इजरायल का महिमा-मंडन स्वाभाविक रीति से होगा तो ईरान एक विलेन की तरह नज़र आएगा। आतंकवाद और इस्लाम का फर्क मिटेगा और उत्तर कोरिया का तानाशाह शैतान लगने लगेगा। 

आशय यह नहीं है कि अमेरिका अथवा पश्चिमी शक्तियाँ अनिवार्य रूप से गलत ही हैं अथवा अन्य शक्तियाँ अनिवार्य रूप से सही ही हैं, लेकिन यह सुस्पष्ट है कि उदारवादी बाहुल्य के वैश्वीकरण में पश्चिमी शक्तियाँ अवश्य ही विश्व-जनमत को प्रभावित कर पाने की स्थिति में हैं।  यह एकदम अकारण और सहसा नहीं है कि आजकल अधिकांश वैकल्पिक मीडिया माध्यम इंटरनेट पर जो प्रचलित हैं उनका मूलस्थान देश अमेरिका है, जैसे- फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सप्प, गूगल, जीमेल आदि। इंटरनेट पर एकदम खुले आम अमेरिकी साम्राज्यवाद नज़र आएगा। एक व्यक्ति जब एप्पल, एंड्राइड या विंडो के सेलफोन से क्रोम ब्राउजर में गूगल सर्च से फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, विकिपीडिया पर पहुँचता है, सामग्री डाउनलोड कर माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस से संपादन करता है फिर जीमेल का प्रयोग कर उसे एक मित्र के पास प्रेषित करता है, तो उसे भान भी नहीं रहता कि वह उन्हीं माध्यमों का प्रयोग कर रहा है जिनसे मीडिया साम्राज्यवाद की पृष्ठभूमि बनती है, क्योंकि उनका स्रोत एक ही देश अमेरिका है। 

इस संदर्भ में एक भारतीय उदाहरण बेहद समीचीन है जहाँ वैश्विक मीडिया कवरेज और बहुधा उनकी सूचनाओं पर आधारित भारतीय मीडिया के प्रभावित होकर कार्य करने से घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति पर खासा प्रभाव पड़ा। मनमोहन सिंह सरकार में कुशल कूटनीतिज्ञ नटवर सिंह, देश के विदेश मंत्री थे। नटवर सिंह ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान गैस पाइपलाईन पर काम कर रहे थे जो भारत होते हुए चीन तक पहुँचती और इन देशों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती। इस राह में चुनौतियाँ कई थीं पर इसके सफल होने पर भारत की केवल ऊर्जा जरुरत ही नहीं पूरी होती बल्कि इसके दूसरे महत्वपूर्ण कूटनीतिक परिणाम भी होते। ऊर्जा जरूरतों के माध्यम से पाकिस्तान, भारत व चीन की पारस्परिक कटुता यकीनन कम होती, मध्य-पूर्व एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक एक सहयोगी क्षेत्र उभरता, जिससे अमेरिकी अथवा रूसी जैसी किसी सुपरपॉवर शक्ति के क्षेत्र में दखलंदाजी भी कम होती। एक नया ऊर्जा गलियारा विकसित होता जो कूटनीतिक रूप से भी शक्तिशाली होता और क्षेत्र में शांति और विकास की गारंटी होती। ज़ाहिर है यह क्षेत्र में अमेरिकी हितों को एक चुनौती होती। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र संघ के संचलन में बेहद प्रमुख आर्थिक योगदानकर्ता है। मध्य-पूर्व एशिया में ‘तेल के बदले अनाज योजना’ में हुए भ्रष्टाचार की संयुक्त राष्ट्र समर्थित स्वतंत्र एजेंसी (वोल्कर कमिटी) से जाँच कराई गयी, जिसमें विभिन्न देशों के राजनयिकों के नाम आये। एक नाम उसमें नटवर सिंह का भी था। वैश्विक मीडिया में इस वोल्कर कमिटी रिपोर्ट की खूब चर्चा हुई पर फिर भी किसी और देश में किसी का इस्तीफ़ा नहीं लिया गया। लेकिन भारत में स्थानीय मीडिया ने वैश्विक मीडिया के इनपुट्स पर वो हंगामा किया जिसकी आड़ में मनमोहन सरकार ने आखिर नटवर सिंह से इस्तीफा ले लिया। ऐसा नहीं है कि इस्तीफे के बाद नटवर सिंह पर कोई अभियोजन या जांच चलायी गयी, वह मामला वहीं ठप रहा। इसके कुछ ही समय बाद भारत-अमेरिका परमाणू समझौते को अमली जामा पहनाया गया और गैस पाइपलाइन योजना का आज कोई जिक्र भी नहीं करता।     

वैश्विक मीडिया का एक सकारात्मक उभार 

इन सभी चिंताओं के बीच फिर भी काफी कुछ सकारात्मक भी है। वैश्विक मीडिया ने वह संतुलन साधने की कोशिश की है जिसमें सरोकारिता और मुनाफा दोनों में संतुलन बिठाया जा सके। इंटरनेट पर सीधे पाठकों से मूल्य वसूलकर समाचार व विश्लेषण देने का आत्मनिर्भर मॉडल विकसित हो रहा है। दुनिया भर के अभिजनों ने अपने-अपने देश में टैक्सचोरी करते हुए जो दूसरे मुल्कों में धन संचित किया है, उसका डेटा लीक होकर वैश्विक मीडिया के तहत राष्ट्रगत मीडिया में भी रिसकर आ रहा। विकीलीक्स, एडवर्ड स्नोडेन के लीक्स ने पूरी दुनिया के सामने कुछ शक्तिशाली सरकारों के दूसरे देशों में की जा रही जासूसी का भंडाफोड़ कर दिया, इसमें अमेरिका सर्वप्रमुख था। यह भी इससे पता चला कि विश्व की शक्तिशाली सरकारें, बाकी सरकारों पर गोपनीय सूचनाओं के जरिये नियंत्रण रखती हैं और कई बार मुख्यधारा की मीडिया का वें इस्तेमाल भी करती हैं। पैराडाइज पेपर्स व पनामा पेपर्स जैसे कई लीक्स ने पूरी दुनिया को झिंझोड़ दिया और इस खतरे की तरफ ध्यान दिलाया कि वैश्विक मीडिया व शक्तिशाली सरकारों का गठजोड़ बेहद घातक साबित हो सकता है। अब दुनिया में कई समूह काम कर रहे हैं जिनका नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय है और वे इसतरह के लीक्स के लिए जरूरी अवसंरचना और उनके सटीक वितरण पर जिनका ध्यान है। उदाहरण के लिए एक नाम इंटरनेशनल कंसोरिटियम ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स का लिया जा सकता है जिसमें भारतीय इंडियन एक्सप्रेस मीडिया समूह भी प्रतिभाग करता है। यह सकारात्मक विकास है जो इस वैश्वीकरण युग की वैश्विक मीडिया के प्रति आशाएँ जगाता है। मीडिया पर जनजागरूकता बेहद जरूरी है अथवा कब जनमन नियंत्रित होने लग जाये, यह पता ही नहीं चलता और भाग्यविधाता फिर वही शक्तियाँ बन जाती हैं जो अपनी प्रकृति में अधिनायक हैं। 

Tuesday, August 28, 2018

What is Ideology?

व्हाट इज आइडिओलॉजी: आंसर जेनरेशन नेक्स्ट के लिए 

साभार: दिल्ली की सेल्फी 


केवल शब्द से पकड़ें, माने लिटरली; विचारधारा को आइडियाज का एक स्ट्रीम होना चाहिए पर मामला इतना आसान नहीं है। अब यह वर्ड, टर्म (टर्मिनोलॉजी) बन गया है और एक स्पेशल मीनिंग में यूज़ होता है। विचारधारा; एक खास विचारों का पुलिंदा है जिसके आधार पर किसी भी घटना (फिनॉमिना) को देखा, परखा, समझा और कहा जाता है।उन खास विचारों की बुनावट लॉजिकल होगी ताकि किसी भी रेशनल माइंड को अपील करे। उन खास आइडियाज से एक नजरिया (पर्स्पेक्टिव) बनाने में मदद मिलती है। समझना जरूरी यह है कि किसी आइडियोलॉजी से जब हम किसी फिनॉमिना को देखने-समझने की कोशिश करते हैं तो वह अंडरस्टैंडिंग और वह कन्क्लूजन फाइनल नहीं होता। उसी घटना को किसी दूसरे आइडियोलॉजी से किसी दुसरी तरह देखा-समझा जा सकता है।

अब जब ऐसा है कि एक आइडियोलॉजी से टोटल ट्रुथ तक पहुँचा नहीं जा सकता तो फिर आइडियोलॉजी की इम्पोर्टेंस ही क्या है ? है, हुज़ूर ! बहुत जरूरी है समझना ! हम अगड़म बगड़म माने स्पोरेडिकली या ज़िगज़ैग में सोचते हैं नॉर्मली। और यही प्रॉब्लम की जड़ है। हम फुटबाल से सोचना शुरू करते हैं, फुटबाल से रोनाल्डो तक और फिर पुर्तगाल पहुँच जाते हैं और फिर कब वास्को डी गामा के बारे में सोचते हुए गोवा के वास्को डी गामा पहुँच जाते हैं। ऐसे सोचते हैं हम, हमेशा ! इस थिंकिंग से डेफिनिट और अक्सेप्टबल कन्क्लूजन आने की पॉसिबिलिटी है बंधू बहुत लिटिल। इसलिए डिसिप्लिंड वे में थिंकिंग करना जरूरी हो जाता है। विचारधारा यानी आइडियोलॉजी उन्हीं खास आइडियाज को मिलकर कंस्ट्रक्ट किये जाते हैं जो डिसिप्लिंड थॉट प्रॉसेस से लॉजिकली अर्रेंज किये जाते हैं और इसलिए ही वे एक रेशनल माइंड को अपील भी करते हैं।

चूँकि हर आदमी अलग अलग जगह होता है और अलग अलग जगह से किसी घटना को देखते हुए ज़िगज़ैग ही सही एक कन्क्लूजन पर पहुँचता तो है ही, अक्सर उसी कन्क्लूजन को फाइनल मानने की टेंडेंसी रहती है, अक्सर इसी को लोग कहते हैं-भैया, हम ग्राउंड पे थे, हमसे जानों रियल्टी ! कोई फिनॉमिना होती एक जगह है पर उसे अलग-अलग लोग अलग-अलग जगह से अलग-अलग तरीके से परसीव करते हैं और फिर उस रियल्टी के रीयल वर्जन भी उतने ही हो जाते हैं, जितने लोग उसके बारे में ग्राउंड रिपोर्ट करते हैं। एक बात और भी है, दो आँखें हैं अपने पास, पर मिलकर भी देखती वही है जहाँ माइंड का अटेंशन होता है। जब माइंड डिसाइड करता है कि किसी सीन में ‘क्या’ देखना है तो अक्सर अपनी पुरानी ट्रेनिंग के हिसाब से वह यह भी डिसाइड करता है कि उस ‘क्या’ को ‘कैसे’ देखना है ! फिर क्या- सब अपनी-अपनी ज़िद पे रहते हैं कि-भइया, हमरी सुनो, हम ग्राउंड पे थे ! सच ये है कि जितना पास होकर देखा जाता है, उतना ही खतरा होता है। इसलिए ही रिपोर्टर को एनालिस्ट की जरुरत होती है। जिस घटना के हम विटनेस होते हैं या जिस घटना के हम खुद ही पार्ट होते हैं, वह घटना हम पर ही जाने कितना इम्पैक्ट कर रही होती है। और यह जो इम्पैक्ट होता है वह माइंड को गाइड करता है कि उस फिनॉमिना को एक खास इम्पैक्ट में ही ज़ियादा परसीव किया जाय। फ्रंट के एक सिपाही को इसीलिये डिसीजन मेकिंग के लिए दूर खड़े जनरल या हेडक़्वार्टर का आर्डर लेना होता है।

रियल्टी के इसलिए ही कई एंगेल होते हैं। सच झुकता नहीं है, परेशान हो सकता है, साहब लेकिन सच का सच यह है कि इसे टोटैलिटी में परसीव करना एक टफ चीज है। इसलिए विचारधारा और सिद्धांतों की शुरुआत हुई। आइडियोलॉजी का जो ऑब्जेक्ट है वह एनिमेट डायनामिक रियलिटी है। ह्यूमन बींग पर कोई एक प्रिंसिपल काम कर ही नहीं सकता, इसलिए ही ह्यूमन बिहैवियर से जुड़े सब्जेक्ट्स में प्रिंसिपल से अधिक पर्स्पेक्टिव इम्पोर्टेन्ट होता है और यहीं चूक होती है उनसे, जिन्होंने पिछले कई सालों से महज साइंस के ऐकजैक्टनेस (exactness) की ट्रेनिंग से अपने माइंड को ट्रेन किया हुआ है। इसमें उनकी कोई फॉल्ट भी नहीं। अपने कंट्री में साइंस, मैनेजमेंट, मेडिकल के स्वैग का पूछो मत। जहाँ, पैसा नहीं; वहां नॉलेज नहीं, मान लिया जाता है, इसे कहते हैं सोशल सायकॉलॉजी ! आर्ट्स में जब इस प्रॉब्लम को महसूस किया गया कि रियलिटी के परसीव करने के प्रोसेस में पर्सनल बायसेस (biases) आ सकते हैं तो विचारधाराओं का चलन तेजी से हुआ।

एक आइडियोलॉजी, अपने तरह की खास विचारों से बने डिसिप्लिंड थॉट प्रोसेस को ऑफर करती है। यहाँ बायसनेस की गुंजायश तो पूरी है, पर आइडियोलॉजी यूज़ करने वाला शुरू से ही अवेयर है। इसी अवेयरनेस की गुंजायश ने आइडियोलॉजी का मान बढ़ाया। अब जब हम किसी फिनॉमिना को मार्क्सिज्म की आइडियोलॉजी से देखते हैं तो अवेयर रहते हैं कि थॉट प्रोसेस का बेस क्या है। इसप्रकार फिनॉमिना को समझ भी लेते हैं और थॉट प्रोसेस पर कंट्रोल भी बना रहता है, ज़िगज़ैग नहीं होने पाता। बस एक गलती हो जाती है अक्सर। इसी गलती की वजह से आइडियोलॉजी बदनाम बहुत हैं। लेकिन इसमें गलती आइडियोलॉजी से नहीं, बंदे से होती है। यही कि, उस पार्टिकुलर आइडियोलॉजी के यूज़ से मिले कन्क्लूजन को ही फाइनल समझना। भाई, दुनिया में बहुत विचारधाराएँ हैं, क्यूंकि दुनिया बहुत बड़ी है और लोग वैरायटी में हैं, तो किसी घटना के अनगिनत ऐंगल संभव हैं तो एक आइडियोलॉजी से कुछ ऐंगल्स पकड़ में आते हैं, ज्यादातर रह ही जाते हैं। ये समझना चाहिए। तभी तो किसी एक घटना को समझने के लिए कई आइडियोलॉजीज का इस्तेमाल होता है, ताकि ज्यादातर ऐंगल्स पकड़ में आएं। एनालिसिस इसलिए ही यों की जाती है कि उसमें ग्राउंड रिपोर्ट वाला भी हो और दूर से देख रहा एनालिस्ट भी हो ! ज़िंदा डायनामिक ह्यूमन बींग जिस फिनॉमिना के पार्ट हों, उससे निकलती घटना के रियलिटी का ट्रुथ पकड़ना कभी आसान नहीं था, पर कोशिश की जाती है लगातार ताकि फ्यूचर आज से बेहतर हो। डिबेट, डिस्कशन, एनालिसिस सारे ही इसलिए ही जरूरी हैं ताकि अधिक से अधिक एंगेल पकड़ में आये। जरूरी नहीं कि हर डिस्कशन, डिबेट का कन्क्लूजन आये ही, क्योंकि यह स्टेबल ऑब्जेक्ट वाला साइंस नहीं है, यहाँ अगर डिस्कशन से अधिकांश पॉसिबल एंगेल ही खोज लिए गए तो धीरे धीरे कन्क्लूजन परसीव होते रहेंगे।

एक आइडियोलॉजी एक चश्में से अधिक कुछ नहीं होती। हमें समझना चाहिए कि लाल रंग के चश्में से सब कुछ लाल दिखेगा और हरे रंग का ग्लास होगा तो सबकुछ ग्रीन दिखेगा। मुश्किल तब होती है जब परवरिश या एजुकेशन से कोई एक ही तरह का चश्मा लगा ही रह जाता है और बंदा आँख और चश्में में फर्क ही नहीं कर पाता। कलर लैब में जैसे फोटो डेवलपिंग में हम समझते हैं कि कोई फ्रेम किस कलर में ज़ियादा निखरेगा उसी कलर का यूज़ करके बेहतरीन फोटो बनाने की कोशिश की जाती है, इसलिए ही अलग-अलग विचारधाराओं का चश्मा पहनकर घटनाएं देखने की कोशिश होती है। बस परेशानी यह है कि कइयों को दूसरा चश्मा कभी मिल ही नहीं पाता, जो मिलता भी है तो पिछला चश्मा उतारना नहीं आता। और मान लीजिये कि नंगी आँख से सब दिखेगा तो जरूर पर माइंड का घालमेल बना रहेगा।

सबसे बेहतर तो यही है कि हमारी एडुकेशन हमें पढाई के दिनों में ही ढेरों चश्मों से मिलवा दे ताकि हम किसी एक चश्मे को आँख न मानने लगें और जब चाहें वैसा चश्मा यूज़ कर रियलिटी के अधिकांश ऐंगल पकड़ सकें। मोटीमोटा जान लीजिये कि किसी भी वर्ड के बाद जो इज्म लगा होता है तो ज्यादातर वह आइडियोलॉजी होता है, ज्यादातर ! जैसे मार्क्सिज्म, लिबरलिज्म, कैपिटलिज्म, फेमिनिज्म, एट्सेटरा. यूरोप में नेशनलिज्म की आइडियोलॉजी ने वो कहर बरपाया कि दो-दो वर्ल्ड वार्स हो गए। हुआ यही कि अपने अपने नेशन का चश्मा उन्होंने उतारा ही नहीं। सो, आइडियोलॉजी समझनी पड़ेगी देर-सबेर, नहीं तो डेंजर रहगी कि कोई क्लेवर कुछ बोलकर कोई चश्मा पहनाकर टोपी न पहना दे !


Monday, August 20, 2018

जीवंत अस्मिताओं को महज प्रतीक बनाने का उन्माद बेहद निष्ठुर

साभार: दिल्ली की सेल्फी 

अगर संजीदा लोग समावेशी बात नहीं करेंगे तो अंततः कितनी घृणा भर जाएगी अपने प्यारे देश में। लोग गलतियाँ करते हैं, अगर यों ही हम प्रतिक्रियावादी हो जाएंगे तो फिर हमारा यह देश कमजोर होगा उधर दूर स्वर्ग से चर्चिल ठठाकर हँसेगा कि मैंने तो पहले ही कहा था कि भारत की वह राष्ट्र संकल्पना जिसमें सभी पहचानों के लोग रह सकते हैं वह कपोल है। विनम्रतापूर्वक कह रहा हूँ कि विश्व इतिहास हमें सिखाता है कि जब जब राष्ट्र भावना आरोपित की जाती है वह विनाशक होती है किन्तु जब तक यह स्वयमेव व स्वतः स्फूर्त होती है, कल्याणकारी होती है। क्या यह ठीक है कि कोई कानून के डर से अथवा समूह/व्यक्ति दबाव में राष्ट्र प्रतीकों का सम्मान करे? क्या यह स्थिति हमारे राष्ट्रप्रेम की असुरक्षा को नहीं जतलाती ? अमेरिकन फ्लैग की चड्ढियां पहने एक अमेरिकी का राष्ट्रवाद नहीं आहत होता पर हेल्मेट पर तिरंगा लगाए सचिन को जवाब देना पड़ता है। और यह भी सोचिए न कि प्रतीक, राष्ट्र होते हैं या राष्ट्र से प्रतीक होते हैं? फिर राष्ट्र बनते हैं किनसे नागरिकों से ही न!

आधुनिक राष्ट्रराज्य की संकल्पना तो यही बताती है न कि व्यक्ति के लिए राज्य है और लोकतंत्र कहता है कि संप्रभुता जनता में निवास करती है!

मेरा इतना ही आग्रह है कि किसी ओर से भी जोर जबर्दस्ती नहीं होनी चाहिए! राष्ट्रगान गाने को उद्यत छात्र समूह को यदि कोई मौलाना राष्ट्रगान गाने से रोक देता है या व्यवधान डालता है तो मामला कोर्ट में जाए जहाँ उसे अपना पक्ष रखने का मौका मिले फिर कानून अपना काम करे! एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य कानून का पालन करना है न कि पालन करवाना, इसके लिए राज्य के दूसरे प्रकल्प हैं। इतिहास गवाह है कि मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी फेहरिश्त है और मुझे आज भी कितने ही मुसलमान भाई मिलते हैं जो पूरे शान से राष्ट्रगान गाते हैं, वन्दे मातरम बोलते हैं! जोर जबर्दस्ती किसी ओर से नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है। यह अंततः जोड़ने में है, तभी तो राष्ट्रगान गाना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। राष्ट्रगान न गाने के जुर्म में गिरफ्तारी नहीं की जा सकती, दंड निश्चित नहीं किया जा सकता। हाँ गाने को तैयार अथवा गाते हुए व्यवधान पहुँचाने वाले के लिए दंड का प्रावधान है। कोई राष्ट्रगान गाना चाहता है और कोई उन्हें गाने नहीं देता उसके लिए सजा का प्रावधान है पर कोई कानून यह नहीं कहता कि राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है।यह स्वतः स्फूर्त होना चाहिए, यही अभीष्ट था, है। राष्ट्र जिन घटकों से मिलकर बनता है उसमें नागरिक शामिल हैं, उनका एकीकृत प्रतीक है ध्वज व राष्ट्रगान! जोर जबर्दस्ती राष्ट्र के उत्स को खतरे में डालती है।

फिर कहूंगा अंततः राष्ट्र लोगों को जोड़ने में है! अजीब विडंबना है आजकल बहुत गहराई में देखिए तो जो लोग राष्ट्र को महज एक प्रतीक न मान जीवंत मान रहे उन्हें सहसा देशद्रोही करार दिया जा रहा। इस देश ने ऐसे ही गाँधी को महज प्रतीक बना दिया, नारी को त्याग, पवित्रता का प्रतीक बना दिया, स्त्री को इज्जत का प्रतीक, धर्म को वस्त्र बना दिया गया, कितना गिनाऊँ...ये जिंदा अस्मिताओं को महज प्रतीक बनाने का उन्माद बेहद निष्ठुर है, कम से कम मेरा देश जो सहज सनातन शाश्वत है और जिसमें विभिन्नताओं के संश्लेषण की अद्भुत विराट क्षमता है, जिसकी निर्झर परंपराएँ कालातीत हैं वह प्रतीकों की सुरक्षा का मोहताज नहीं है।

मै राष्ट्र प्रतीकों का आदर करता हूँ और दिल से चाहता हूँ कि देश का प्रत्येक व्यक्ति इनका आदर करे। पर अगर इन प्रतीकों का आदर करवाना पड़े तो बताइए न क्या यह इसे इंगित नहीं करता कि स्वतंत्रता पश्चात जो राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया हमने समवेत चलाई है उसमें और भी सुधार की आवश्यकता है? या कि जबरन आदर करवाएंगे। हमें हराना नहीं है देश विरोधी मानसिकता को, उन्हें जीतना है और पुष्यमित्र, अशोक, गाँधी, मौलाना आजाद, अबुल कलाम, टाटा का य‍ह देश जानता है कि जीता कैसे जाता है!

एक रोष में यदि प्रतीक पालन करवाया जाएगा तो राष्ट्र के नाम पर एक रोष पनपेगा और इस रोष को ध्रुवीकरण के लिए प्रयोग कर राजनीतिक दल लाभ लेंगे! क्या यही अंग्रेजों ने नहीं किया? क्या यही विभाजन के समय नहीं दिखा? क्या यही आजाद भारत के दल जब तब नहीं करते हैं?

Tuesday, August 14, 2018

क्या हम निष्पक्ष मीडिया के लिए तैयार हैं?


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

निष्पक्ष न्यूज-व्यूज पढ़ने-देखने के लिए हमें अपनी जेब से पैसे खर्च करने को धीरे-धीरे मन बनाना होगा। प्रायोजित न्यूज संस्कृति में सबसे बड़ा प्रायोजक सरकारी विज्ञापन के बहाने सरकार ही बन जाती है। प्रायोजित न्यूज संस्कृति में हम मीडिया और सरकार से इस सकारात्मक उम्मीद में होते हैं कि ये दोनों खुद राजनीतिक नैतिकता का अनुपालन करेंगे। यह अजीब स्थिति है। घर में बैठे-बैठे हम ये उम्मीद करते हैं कि मीडिया अपना काम करे और आपको न्यूज पहुँचाए और उसी भोलेपन से हम सोचते हैं कि सरकार चुन ली गई है और अब वह अपना काम करे! मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा इसलिए है क्यूँकि वह सार्वजानिक पक्ष पर प्रश्न कर सकता है।

प्रश्न करने के पीछे एक तैयारी करनी होती है। इस तैयारी में जीते-जागते, पढ़े-लिखे लोग होते हैं, जिनके दिन का 18-20 घंटा लगता है, उन्हें भी उसी रेट पर बाजार सामान देता है, उन्हें भी अपना परिवार चलाना है, यह तैयारी ही उनका रोजगार है। ग्लोबलाईजेशन और तगड़े बाजारवाद के दौर में एक पत्रिका, एक अखबार और एक चैनल चलाना बेहद ही चुनौती भरा काम है। एकबार पैसा लगाने के बाद अपना संस्थान बचाना ही इतना कठिन हो जाता है कि निष्पक्षता और पारदर्शिता का आदर्श बेहद निष्ठुर लगने लगता है। इन आदर्शों से उबकाई आने लगती है जब विज्ञापनों के लिए उन्हीं लालाओं और सरकार के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है जिनके अनियमितताओं के विरुद्ध न्यूज बनानी और चलानी होती है। यह संभव ही नहीं है तो इसलिए ऐसा होता भी नहीं। होता यही है कि न्यूज संस्थान धीरे-धीरे दलाल और धमकाऊ होते जाते हैं। न्यूज के नाम पर वे बेचते हैं जिनको वो एडिटर रूम में नहीं बेच पाते हैं।

इस क्षेत्र की बाजारू प्रतिस्पर्धा मीडिया मालिकों को एक बीच का रास्ता खोजने पर मजबूर करती है। मीडिया मालिक फिर सरकार, बाजार और समाज को छोटी-बड़ी मछलियों से बने झुंड की तरह देखने लगते हैं। मीडिया मालिक बड़े ही ध्यान से फिर मछली मारने के काम में खुद को लगा लेता है। जो मछलियाँ नई होती हैं उनकी एक छोटी गलती भी अखबार और चैनल पर पहाड़ बनकर दिखती है। यह स्थापित मछलियों के लिए चेतावनी भी होती है। सरकार सबसे बड़ी शार्क होती है, ऐसे में! उसके पास तो नुकीले दातों का भी बढ़िया इंतजाम होता है। फिर मीडिया एक ऐसा धंधा बन जाता है जिसमें ग्राहक को लगभग कुछ चुकाना ही नहीं पड़ता। जैसे ही हम नागरिक मीडिया के ग्राहक बन पाने की योग्यता खोते हैं, मीडिया हमारे उम्मीदों के आदर्श का कागज हवाई जहाज बनाकर उड़ाने लग जाता है। ऐसा करते हुए वे अपनी आत्मा का सौदा कर चुके होते हैं, लेकिन उन्हें भ्रष्ट कह आगे बढ़ जाना एक खतरनाक भूल होगी।

उन्हें भ्रष्ट बनने को मजबूर करते हैं हम और आप, क्योंकि हम और आप न्यूज मुफ्त में पढ़ना-देखना चाहते हैं। यहाँ हम अपनी जेबें ढीली करने को तैयार हों तो मीडिया इतनी सशक्त होगी कि सरकार के बहुतेरे पक्षों से भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और नतीजा ये होगा कि चीजें जो बेवज़ह महंगी हैं वे सस्ती होंगी और क्रय शक्ति भी बढ़ेगी। मीडिया पर खर्च करना राष्ट्रहित में एक देशभक्ति का काम भी होगा और यह नागरिक कर्तव्यों की भी पूर्ति करेगा। प्रायोजित न्यूज सामग्री पढ़कर और देखकर सार्वजानिक मामलों पर निष्पक्ष राय बनायी ही नहीं जा सकती। ऐसा सोचना कोरा भोलापन है कि सरकार जिसे अपना भारी-भरकम विज्ञापन देगी, वह सरकार की कोई भी और कैसी भी आलोचना कर सकेगा! मीडिया प्रतिष्ठान का वह मॉडल जिसमें विज्ञापन दिखाने-छापने के लिए व्यवसायी पैसे खर्च करते थे, बेहद पुराना और सरल मॉडल है। अब जबकि सत्ता और उद्योग का गठजोड़ जगजाहिर है ऐसे में इस मॉडल से निकलने वाले किसी भी न्यूज की विश्वसनीयता पर गहरे संकट हैं। बड़े-छोटे पत्रकार निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि सरकारें उनपर दबाव रखती हैं और यह कम-अधिक हर दौर में होता रहता है। परिचित कई मीडियाकर्मी स्वीकार करते हैं कि निष्पक्ष न्यूज कोई कैसे दे जबकि एक रुपया भी ग्राहक कोई एक लेख पढ़ने अथवा देखने में खर्चना नहीं चाहता। यदि दर्शक और पाठक एक रुपए भी प्रति लेख खर्चने को तैयार हो जाए तो मीडिया मछलियों को ठेंगा दिखाने लगें, फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो जाये।

मीडिया पर एकतरफा आदर्श निभाने का दबाव इसे और खोखला करेगा। एक अच्छा नेता हमारी तरफ दशकों से देख रहा कि हम उसे वोट देंगे और जिताएंगे। एक पत्रकार दशकों से हमारी तरफ देख रहा कि जब जान जोखिम में डाल वो न्यूज निकालेगा तो हम जनता उसकी सुरक्षा का, उसकी रोजी-रोटी का ख्याल रखेंगे। एक हम हैं कि लगभग मुफ्त में न्यूज चैनल देख रहे और लगभग 25 से 30 रुपये प्रति लागत के अखबार को 4 से 8 रुपए में पढ़ रहे हैं। हम भ्रष्ट हैं दरअसल। कभी लाइन में लगना नहीं चाहते। हमें यह इल्म ही नहीं कि एक एक बेहतर समाज और शासन के लिए नागरिकों को क्या-क्या करना पड़ता है? हमें लगता है कि सबकुछ अपने-आप हो जाएगा। अजी, अगर हम चाहते हैं कि मीडिया अपना काम जिम्मेदारी से करे, कि सरकार अपना काम जिम्मेदारी से करे, कि अधिकारी अपना काम जिम्मेदारी से करें तो सबसे पहले हम जनता को अपना कर्तव्य पहचान उसे जिम्मेदारी से निभाना होगा! और यह बात कोई किताबी आदर्श नहीं है, यह एकदम यथार्थ है, दूसरी कोई जुगत ही नहीं है, सूरत ही नहीं है।

मीडिया के प्रतिबद्ध लोगों को चाहिए कि सबसे पहले संस्थान का ऐसा टिकाऊ मॉडल विकसित करें जिसमें निर्भरता केवल और केवल जनता पर हो। यह कठिन लगता है पर जनता पर विश्वास रखिए, ईमानदारी से इसे शुरू तो करिए। मीडिया के कुछ लोगों ने इसे शुरू भी किया है। कुछ पोर्टल पर आपको यह संदेश दिखता भी होगा जहाँ वे निष्पक्ष पत्रकारिता के नाम पर आपसे कुछ अर्थदान की विनती कर रहे हैं! एक सशक्त नागरिक-समाज के लिहाज से यह शर्मनाक है कि निष्पक्ष पत्रकारिता की कोशिश करने वाला विनती कर रहा है। दोस्तों! आइए आगे बढ़कर ऐसे पत्रकारों, ऐसे प्लेटफॉर्म्स को सपोर्ट करें जो अपनी निर्भरता केवल जनता पर रखना चाहते हैं। आइए न्यूज के लिए अपनी जेबें ढीली करें! क्या आप तैयार हैं? क्या हम तैयार हैं?

Monday, August 13, 2018

आर्मी अरमानों के कप्तान इमरान


साभार: गंभीर समाचार 

पहचान की औपनिवेशिक जिद की बुनियाद पर बने पाकिस्तान का इतिहास इतना उलटफेर वाला है कि एक राष्ट्र के तौर पर इसकी इमारत को कभी मुकम्मल छत नसीब ही नहीं हुई। भारत को जहाँ 1950 में ही एक दुरुस्त संविधान मिला, वहीं पाकिस्तानी अवाम को उनका आईन आजादी के 26 साल बाद नसीब हुआ। इन बीते छब्बीस सालों में एक सशक्त राजनीतिक व्यवस्था और कुशल नेतृत्व के दारुण अभाव ने पाकिस्तान के ‘राजनीतिक विकास’ को गहरी चोट पहुंचाई और यहाँ लोकतंत्र आकाशकुसुम सा बन गया। जैसा कि औपनिवेशिक अतीत के नवस्वतंत्र राष्ट्रों में होता है कि बहुधा वहाँ ईमानदार, कुशल, लोकतांत्रिक नेतृत्व के अभाव में ‘सहज राजनीतिक विकास की प्रक्रिया’ अवरुद्ध हो जाती है और लोकतंत्र के पनपने की जमीन पर अनायास अनचाही तानाशाही की घास उग आती है, दक्षिण एशियाई परिदृश्य में पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । 

अदृश्य हाथ वाला इस्टैब्लिशमेंट और उसका डीप स्टेट 
पाकिस्तान में इस अनचाही तानाशाही घास की खेती कभी प्रकट तो कभी अप्रकट रहकर सेना करती है। लोकतंत्र के सामान्य लक्षणों में से एक महत्वपूर्ण लक्षण है, नियमित अंतराल पर स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव करवाया जाना। पाकिस्तान के सबसे सफल तानाशाहों में से एक रहे, जनरल परवेज मुशर्रफ की तानाशाही के बाद पाकिस्तान में क्रिकेटर इमरान खान के नेतृत्व में बनने वाली यह तीसरी लोकतांत्रिक सरकार होगी जब देश के इतिहास में इन इकहत्तर सालों में पहली बार लगातार दो शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण संभव हुआ। पाकिस्तान के व्यतिक्रमित इतिहास और ठिठके राजनीतिक विकास ने औपनिवेशिक परंपरा से संगठित सेना में सत्ता और शक्ति के लिए एक अलोकतांत्रिक हवस पैदा कर दी। औपनिवेशिक अतीत शिक्षा का पारम्परिक ढाँचा तोड़ देता है और आधुनिकता का ऐसा अनिच्छुक अधपका शैक्षिक ढांचा थोपता है। इस कारण ही पाकिस्तान में कठमुल्लों को भी सियासती सौदागर बनने का मौका मिलता है। 

भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था जब जर्जर लोकतंत्र की छननी में से जनता की आकाँक्षाओं को छानकर उन्हें पूरा करने में अक्षम होती है तो वह देशभक्ति के नारों के बीच अपनी असफलता छिपाती है और सेना के संगीनों के साये में राष्ट्रवादी द्वेष का तंबू तानती है। भारत से संघर्षों और युद्धों के लिए जरूरी खाद-पानी पाकिस्तानी हुकूमतों की नाकामयाबी से मिलता है और उनके नापाक इरादों का खामियाजा मुल्कों की अवाम को भुगतना पड़ता है। हुक्मरानों के भ्रष्टाचारों से बेहाल मुल्क, जो कि एक असफल राज्य में तेजी से तब्दील हो सकता है; वह आसानी से विश्व-शक्तियों का मुहरा बन जाता है। इससे द्विपक्षीय संबंधों में जटिलता तो बढ़ती ही है, क्षेत्र की राजनीति को भी यह प्रवृत्ति कठिन बना देती है। इसलिए ही यह स्पष्ट है कि अमेरिका के बाद पाकिस्तान ने अब चीन और रूस का कंधा कसकर पकड़ रखा है। सेना, नौकरशाही, कठमुल्ले आदि मिलकर पाकिस्तानी सत्ता का प्रतिष्ठान (इस्टैब्लिशमेंट) रचते हैं। इस्टैब्लिशमेंट का अदृश्य हाथ, पाकिस्तानी स्टेट के भीतर का ‘डीप स्टेट’ गढ़ता है जो असल में सत्तासुख भोगता है। अपनी सत्तालोलुपता और भ्रष्टता छिपाने के लिए यह इस्टैब्लिशमेंट सन 2008 से दो बार लोकतंत्र का लबादा सिलकर ओढ़ चुका है और अब तीसरी बार तैयारी पूरी हो गयी है। एक संगठित सेना कितनी ही बार क्यों न राष्ट्र को टूटने से बचाये फिर भी उसे लोकतंत्र निर्णायक शक्ति नहीं देता। लोकतंत्र में निर्णायक शक्ति सर्वदा ही लोक में निहित होती है जो उसके चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। उथलपुथल इतिहास वाले पाकिस्तान में सेना की साख एक उद्धारक की तरह है और जब-तब चुने गए नागरिक सरकार के भ्रष्टाचार के उदाहरणों ने सेना के भ्रष्टाचार को सहनीय बना दिया है। 

नवाज़ से मुशर्रफ फिर मुशर्रफ से नवाज़ 
1999 में जब जनरल मुशर्रफ ने चुनी हुई नवाज़ शरीफ सरकार को अचानक पदच्युत किया था तो अनुशासित शक्तिशाली सेना के शासन में भ्रष्टाचारमुक्त राष्ट्र बनाने का स्वप्न गढ़ा था। एक अध्यादेश से पाकिस्तान में तब नेशनल एकाउंटिबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) का गठन किया गया था जो स्वायत्त एवं सांविधानिक निकाय था। यकीनन एनएबी ने भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किये और सजा भी दिलवाई, पर सेना और न्यायपालिका के मसलों पर यह औपचारिक तर्कों से काम चला लेती है। दुनिया के हर तानाशाह की ख्वाहिश होती है कि दुनिया उसे लोकतांत्रिक कहे और उसके शासन को तानाशाही कहकर उसके कतिपय योगदानों को कमतर न आँका जाय। 9/11 की घटना के बाद मुशर्रफ एक चालाक व सफल कूटनीतिक सिद्ध हुए थे, जिन्होंने पाकिस्तान को एक राष्ट्र के तौर पर जीवनदान दिया था। इस्टैब्लिशमेंट पर अपनी पकड़ रखते हुए तानाशाह मुशर्रफ अपनी लोकप्रियता को लोकप्रिय लोकतांत्रिक नेता की लोकप्रियता से बदलने को आतुर थे। 2002 में मुशर्रफ ने संविधान में अपने अनुरूप बदलाव करते हुए लीगल फ्रेमवर्क आर्डर जारी किया और उसी साल के आम चुनाव में पीएमएल-क्यू पार्टी के साथ जीत हासिल कर अपने शासन को वैधता देने की कोशिश की। कुछ समय बाद ही कार्यपालिका शक्ति मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री को दे दी। भ्रष्टाचार के आरोपों से स्वयंनिष्काषित लोकप्रिय नेता बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ 2007 में पाकिस्तान लौटे। बेनज़ीर भुट्टो का जहाँ क़त्ल हो गया वहीं सऊदी अरब के हस्तक्षेप से नवाज़ शरीफ दस साल राजनीति से दूर रहने की शर्त को मानने को बाध्य हुए। पांच साल और राष्ट्रपति पद चाहने वाले मुशर्रफ को 2007 में पाकिस्तान में फिर से आपातकाल लागू करना पड़ा और सक्रिय न्यायपालिका व अमरीकी हस्तक्षेप से फरवरी-मार्च 2008 में आम चुनाव करवाने पड़े। यह चुनाव पाकिस्तान के इतिहास के सबसे लोकतांत्रिक, स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव माने जाते हैं जिसमें सहानुभूति की लहर पर सवार बेनज़ीर भुट्टो की पार्टी ने में जीत दर्ज की। नवाज़ शरीफ और सत्तारूढ़ पीपीपी  एकमत होकर मुशर्रफ पर पद छोड़ने का दबाव बनाया और महाभियोग की औपचारिक प्रक्रिया शुरू की। अंततः अगस्त, 2008 में मुशर्रफ ने त्यागपत्र दे दिया और नवम्बर 2008 में देश छोड़ दिया। यह मौका पाकिस्तानी राजनीति के कुछ विरले लोकतांत्रिक अध्यायों में से एक है जब नागरिक सरकार के पास लोकप्रिय जनसमर्थन रहा हो और सेना अपनी निश्चित भूमिका में हो। लेकिन कालांतर में पीपीपी सरकार अपने लोकप्रिय जनसमर्थन को इतनी मजबूत नहीं बना पायी कि इस्टैब्लिशमेंट को मजबूत होने से पुनः रोक पाती। पीपीपी सरकार के भ्रष्टाचार के हवालों ने इसे और कमजोर बनाया। सक्रिय नागरिक समाज, न्यायपालिका और वैश्विक दबाव में पाकिस्तान ने सफलतापूर्वक एक और आम चुनाव संपन्न किया और 2013 में पीएमएल (एन) के नवाज़ शरीफ ने बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई।  

पनामा पेपर्स का प्रकोप: नवाज़ और एनएबी 
देश से बाहर के व्यक्तिगत निवेशों के कानूनी मामलों को देखने वाली दुनिया की चौथी सबसे बड़ी फर्म मोजैक फोंसेका जो कि पनामा देश में स्थित है उसके ऑफिस से अभूतपूर्व रूप से तकरीबन सवा करोड़ दस्तावेज लीक हुए और जर्मन समाचारपत्र सुईदाईचे जाइटुंग द्वारा एक गुमनाम स्रोत से अर्जित किये वे रिकॉर्ड्स इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स को साझा किये गए। यह सूचनाएँ फिर सहभागी द गार्जियन, बीबीसी आदि से साझी की गयीं और इसतरह इन्होने दुनिया भर के राजनयिकों, धनिकों आदि के उन संपत्तियों का हवाला दिया जिनपर उनका देश कोई कर नहीं लगा सकता था क्योंकि इसकी जानकारी ही नहीं थी। यह सीधा-सीधा करचोरी का मामला है। इन खोजी जानकारियों को ही दुनिया भर में पनामा पेपर्स के नाम से जाना गया। यों तो इतिहास के इस सबसे बड़े लीक में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या रॉय, केपी सिंह, विनोद अडानी जैसे कई नाम हैं और कई मुल्कों के कई दिग्गज इसके घेरे में हैं, पर पाकिस्तान की पॉलिटिक्स में पनामा पेपर्स ने भूचाल ही ला दिया। 1999 में स्थापित नेशनल अकाउंटिबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) जो कि भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल करती है उसने पनामा पेपर्स में आये नवाज़ शरीफ परिवार के लोगों पर इस आधार पर ही शिकंजा कसना शुरू किया। नवाज़ शरीफ पाकिस्तान के उन नेताओं में से हैं जो सेना की भूमिका को एक स्तर से अधिक बर्दाश्त नहीं करना चाहते। सेना और नवाज़ शरीफ की तनातनी पाकिस्तानी राजनीति का एक ज़ाहिराना तथ्य है। नवाज़ एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे पर पनामा पेपर्स के सहसा खुलासे के लिए वे तैयार नहीं थे। एनएबी अपनी स्थापना से ही सेना के प्रभाव में रही है और इसका स्वायत्त व सांविधानिक होना इसे और भी शक्तिशाली बनाता है। एनएबी के अधिकारियों ने आख़िरकार नवाज़ शरीफ, उनकी बेटी मरयम, आदि को न्यायालय तक घसीट ही दिया। शरीफ़ को अंततः उनके पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया और नवाज़ शरीफ़ ने जब 29 जुलाई 2017 को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो उनके सरकार में ही सेना के करीबी माने जाने वाले कम विवादित पेट्रोलियम प्रभार सम्हालने वाले शाहिद खाकान अब्बासी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी। 

इमरान का उभार और आम चुनाव 2018 
आम चुनाव 2018 के परिणाम यह निश्चित करते हैं कि पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री तहरीके इंसाफ (पीटीआई) के इमरान खान होंगे। यह परिणाम चुनाव पंडितों के कयासों से थोड़ा विपरीत है। ज्यादातर का मानना था कि क़ौमी मजलिस (नेशनल असेंबली-निम्न सभा) इसबार त्रिशंकु रहेगी। नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल (एन) पनामा पेपर्स से त्रस्त थी तो बिलावल भुट्टो की पीपीपी इसबार बिलकुल भी आक्रामक नहीं थी। इसके अलावा पाकिस्तानी राजनीति में उसके राज्य मुख्यधारा के दलों के पारम्परिक वोटबैंक भी माने जाते हैं, जो यह चुनाव परिणाम भी सिद्ध करते हैं। जैसे- पंजाब को पीएमएल (एन) का तो सिंध को पीपीपी का और खैबर पख्तूनख्वा को पीटीआई का पारम्परिक गढ़ समझा जाता है। बाकी राज्यों में इन बड़ी पार्टियों के बाद ज्यादातर धार्मिक पहचान वाले दल हावी रहते हैं। धार्मिक पहचान वाले दलों में ब्लेस्फेमी (ईशनिंदा) मुद्दे के साथ खादिम हुसैन रिजवी के आक्रामक नेतृत्व में सहसा मजबूत हुई पार्टी तहरीके लब्बाइक से कयास लगाया जा रहा था कि यह पार्टी छितराए धार्मिक कट्टर मतों को ध्रुवीकृत कर लेगी। ऐसी बाकी पार्टियों के मुकाबले इस पार्टी का प्रदर्शन कम से कम निराशाजनक नहीं कहा जायेगा क्योंकि अधिकांश जगहों पर यह नंबर दो की पार्टी रही। इससे यह भी पता चलता है कि अगले आम चुनावों तक यह पार्टी अपने पूरे दमखम के साथ चुनौती पेश करेगी। इन वजहों से ही ऐसा लगने लगा था कि संभवतः नेशनल असेंबली में किसी एक दल को भी सरकार बनाने लायक सीट न मिले। सभी का मानना था कि इमरान खान की पार्टी पीटीआई को अच्छी खासी बढ़त मिलेगी पर जिसतरह से न्यायपालिका, एनएबी और चुनाव आयोग ने एक के बाद एक ऐसे फैसले किये और ऐसे-ऐसे समय में किये जिनसे नवाज़ शरीफ और बिलावल की पार्टी को अपरोक्ष-परोक्ष नुकसान उठाना पड़ा और इमरान की पार्टी को जिससे सीधा फायदा पहुँचा, उससे कई चुनावी पंडित खुलकर कहने लगे थे- कि इमरान कप्तान बनेंगे। नवाज शरीफ़ और उनकी बेटी मरयम का आख़िरी समय में देश आकर गिरफ्तारी देने के फैसले से उम्मीद की गयी थी कि एक प्रकार की सहानुभूति उपजेगी पर वह भी कहीं दिखी नहीं। 

क्रिकेटर इमरान अपने रिवर्स स्विंग के लिए जाने जाते रहे हैं। उनका प्रदर्शन यों ही चौंकाऊ रहता है, वह वापस आकर बढ़िया कर जाते हैं । व्यक्तिगत जीवन में भी उतार-चढाव रहा, उनके क्रिकेट जीवन में भी उतार-चढ़ाव रहा और ठीक इसी तरह उनके राजनीतिक जीवन को भी उतार-चढ़ावों से ही भरा कहेंगे। एक बात तो तय है कि इमरान जीतने में यकीन रखते हैं चाहे कितने ही रंग बदलने पड़ें। लाहौर में जन्मे पश्तून इमरान खान ने दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र विषय के साथ ऑक्सफ़ोर्ड से स्नातक किया है। यह पृष्ठभूमि उन्हें खासा आधुनिक सोच का बनाती है। क्रिकेटर इमरान खान की पारी काफी ग्लैमरस रही। सन्यास के बाद लौटे और पाकिस्तान को अपनी कप्तानी में वर्ल्ड कप दिलाया। फिर 1996 में अपनी नयी पार्टी के साथ राजनीतिक पारी खेलने के लिए आ जुटे। यकीनन, उन्हें किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया और वे खुद भी 2011 तक कुछ गंभीर नहीं लगे। इनकी तीनों बीबियों की पृष्ठभूमि ध्यान से देखें तो उससे भी अंदाजा लगता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्रमशः बदली हैं। राजनीति में भी उनके कई रंग देखने को मिले। 1996 के इमरान, खासा आदर्शवादी रहे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 2008 के आम चुनावों का उन्होंने बहिष्कार किया था, फिर 2010-11 आते-आते उनमें एक चालाक आक्रामक राजनीतिज्ञ दिखने लगा। आज के इमरान जानते हैं कि बिना इस्टैब्लिशमेंट में पैठ बनाये पाकिस्तान की सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन है। इमरान खान की आज की राजनीति के फॉर्मूले में दुनिया की दूसरी युवा आबादी को अपील करने वाली उनकी खिलंदड़ छवि है, पाकिस्तान के डीएनए में रचा धर्म है, इस्टैब्लिशमेंट की रीढ़ सेना को समर्थन करते हुए उसकी अनुशासित छवि भुनाने का शऊर है और उम्मीद रखने वालों के लिए ‘नया पाकिस्तान’ का जुमला है। इसका असर चुनाव परिणामों पर कुछ इस कदर हुआ कि पाकिस्तान के चुनाव-परिणाम मैप को देखने से लगता है कि एकमात्र पीटीआई पार्टीं ही सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी है।   

इमरान खान की जीत में कुछ और दूसरे महत्वपूर्ण अपरोक्ष कारकों का उल्लेख करना जरूरी है। चुनाव आयोग आख़िरी समय तक प्रत्याशियों की उम्मीदवारी ख़ारिज करता रहा। मतदान के तुरत बाद में पाकिस्तान में मतगणना की परम्परा है और फिर परिणामों की घोषणा कर दी जाती है, पर इसबार अचानक रात के दो बजे मतगणना रोक दी गयी और परिणाम तयशुदा समय से लगभग छप्पन घंटे की देरी से आया। पीएमएल (एन) के आवाज उठाने पर चुनाव आयोग ने प्रेस कांफ्रेंस किया और कारण तकनीकी बताकर पल्ला झाड़ लिया। बिलावल भुट्टो ने ट्विटर पर जगह-जगह फॉर्म-45 न देने की बात कही। फॉर्म-45 चुनाव मतगणना के बाद पार्टी एजेंटों को दिया गया आधिकारिक एवं हस्ताक्षरित वह प्रपत्र है जिसमें उस बूथ के मतदान और परिणाम की प्रत्येक जानकारी होती है। कई जगह इसे सादे कागज पर ही दे दिया गया। लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए ईयू ने पाकिस्तान के पिछले तीन आम चुनावों की भाँति इसबार भी अपना पर्यवेक्षक दल भेजा पर उनका वीजा क्लियरेंस में पाकिस्तान ने इसबार देरी की। इसबार दबे स्वर से लगभग सभी विश्लेषकों ने माना कि मीडिया सेंसरशिप अघोषित रूप से लागू रही। पर्यवेक्षक टीम के मुखिया माइकल गाहलर के हवाले से पाकिस्तान का डॉन जहाँ यह छापता है कि चुनाव संतोषजनक रहे और 2013 के आम चुनाव से भी स्वच्छ व निष्पक्ष रहे वहीं ब्रिटिश अख़बार द गार्जियन के अनुसार माइकल गाहलर ने इन चुनावों के मुकाबले 2013 के चुनावों को अधिक स्वच्छ व निष्पक्ष कहा। पहली बार ऐसा हुआ कि पांच प्रमुख दलों ने पुनर्मतदान एवं धांधलियों की कराने की माँग की। आतंकी घटनायें इस चुनाव में भी होती रहीं, बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में चुनाव के दिन ही आत्मघाती हमला हुआ और तकरीबन पैतीस लोग मारे गए और पैतालीस से अधिक घायल हुए। सेना की भारी तैनाती जमी रही और चुनाव में फिर भी मत प्रतिशतता पहले के मुकाबले अधिक बताई जा रही। इस्टैब्लिशमेंट की पकड़ इस चुनाव में कुछ इस कदर है कि चुनाव परिणामों के बाद विपक्षी दलों ने मिलकर धांधलियों की जांच की मांग उठाने का फैसला किया लेकिन पीपीपी के बिलावल और पीएमएल के नवाज़ अंततः उस साझे विरोध से पीछे हट गए। 

लोकतंत्र की प्रक्रिया में ‘राजनीतिक क्षय’
प्रसिद्द राजनीति विज्ञानी सैमुअल पी हटिंगटन ने नवस्वतंत्र देशों के राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए एक बेहतरीन सिद्धांत दिया है। उनका कहना है कि किसी देश में राजनीतिक विकास तब होता है जब राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना एवं उनका विकास उसी अनुपात में हो जितनी उस देश की जनता की राजनीतिक मुद्दों के प्रति जुटान (पॉलिटिकल मोबिलाईजेशन) हो। यदि किसी देश में राजनीतिक संस्थीकरण की प्रक्रिया किसी कारण से तीव्र हो और उस अनुपात में पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन न हो, अथवा जितनी मात्रा में पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन हो उस अनुपात में किसी कारण से राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना न हो पा रही हो तो समय के सापेक्ष राजनीतिक विकास न होकर ‘राजनीतिक क्षय’ होता है जो उस देश की राजनीतिक संस्कृति को अंततः नुकसान पहुँचाता है। 

पाकिस्तान के उथल-पुथल राजनीतिक इतिहास में मुशर्रफ के बाद बड़े प्रयासों से 2008 में एक लोकतांत्रिक सरकार यथासंभव स्वच्छ व निष्पक्ष रीति से चुनी गयी थी, जो यदि प्रतिबद्धता से कार्य करती तो लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी-अपनी मर्यादा में रहती और सेना अपने बैरकों में ही रहती। पीपीपी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और 2013 के चुनाव में पाकिस्तान के इतिहास का पहला शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण सम्भव हुआ और नवाज़ शरीफ़ को सत्ता मिली। दुर्भाग्य से पीएमएल सरकार भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे और शरीफ सरकार, सेना और कटटरपंथियों के समक्ष घुटने टेकती रही। दो चुनी हुई सरकारों का लचर प्रदर्शन पाकिस्तान के संभावित ‘राजनीतिक विकास’ को अब ‘राजनीतिक क्षय’ में बदलेगा क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया दुहराई तो गयी है पर निभायी नहीं गयी है। इन सरकारों के भ्रष्टाचारों व लचर प्रदर्शनों ने एकबार फिर आम अवाम का सेना के अनुशासन के प्रति दृष्टिकोण सकरात्मक किया है, इस्टैब्लिशमेंट फिर से शक्तिशाली हुई है और उस इमरान खान की पार्टी इसबार सत्ता में आयी है जो सेना को पाकिस्तान का एकमात्र हीरो मानता है और नवाज़ शरीफ को महज इसलिए देश का गद्दार मानता है कि उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकातें कीं। यों तो इमरान खान अपने जीवन में अचानक रिवर्स स्विंग कराने लगते हैं और विरोधी उन्हें मास्टर ऑफ़ युटर्न्स भी कहते हैं, तो सम्भव है कि इमरान कुछ रिस्क लें और सचमुच एक ‘नया पाकिस्तान’ बनाने की कोशिश नज़र आये, वरना अभी तो वह बस इस्टैब्लिशमेंट का लोकतांत्रिक लिहाफ लग रहे जिसके भीतर रहकर वह सत्तासुख सेना भोगने को आतुर है। 

इमरान खान के लिए चुनौतियाँ 
पाकिस्तान भीषण जलसंकट और नकदी के संकट से गुजर रहा है। अर्थव्यवस्था जर्जर है और बेरोजगारी चरम पर है। अर्थव्यवस्था के लिए आईएमएफ से दूसरे आर्थिक पैकेज की माँग और पूर्ति कठिन होने वाली है। जल संरक्षण तकनीक व नहरों के निर्माण में समय व धन की दरकार है। उग्र आतंकवादी संगठनों से निपटना अगली बड़ी चुनौती है और इससे निपटना इसलिए भी आसान नहीं होगा क्योंकि इमरान के सुर धार्मिक कट्टरपंथियों के लिए खासा अच्छे रहे हैं और वे उसी इस्टैब्लिशमेंट के हिस्से हैं, जिन्होंने इमरान खान की पार्टी को मदद पहुंचाई है। विदेश नीति में अमेरिका से होते खट्टे रिश्तों को पटरी पर लाना असली चुनौती होगी तो इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, सऊदी अरब, रूस और चीन से संगति बिठाना आसान नहीं होगा। पिछले दो-तीन सालों से भारत के साथ रिश्ते भी बिलकुल जमे से हैं, जिद्दी इस्टैब्लिशमेंट के साथ उन जमी रिश्तों को आंच देना काफी मुश्किल होगा। यह रिस्की भी होगा क्योंकि पाकिस्तान में कहते हैं कि कोई चुनी हुई नागरिक सरकार तभी खतरे में आती है जब सुरक्षा और विदेश नीति के मामले में सेना से इतर फैसले लेती है, जो कि उसका पारम्परिक क्षेत्र माना जाता है और इसमें ‘लाडले इमरान’ की दखलंदाजी भी सेना बर्दाश्त तो नहीं करेगी।   


Sunday, July 29, 2018

जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जेआरडी)

साभार: दैनिक भास्कर 

वो जमाना था जब समझा जाता था कि रूस को कभी पराजित नहीं किया जा सकता था, क्योंकि कोई भी शक्तिशाली सेना यदि इसके भीतर प्रवेश कर भी ले तो भी रूस के भीमकाय भूगोल में उसे उलझना ही था। लेकिन पिद्दी सा जापान रूस के लिए मुसीबत बन अगले साल तक उसे हराने वाला था। जर्मन राजा अपने इरादों से यूरोप के बड़े खिलाड़ी फ़्रांस और ब्रिटेन के साम्राज्यवादी बुनियादों को हिलाने की फ़िराक में था। ऐसे में फ़्रांस, ब्रिटेन के साथ आपसी साम्राज्यवादी सघर्षों को तनिक विराम दे, ‘ऐंतांत कोर्डीएल’ के समझौतों को संपन्न कर राहत की साँस ले रहा था। कला और फैशन के लिए मशहूर फ़्रांस, चित्रकला की फ़ॉविज्म धारा को अपना रहा था जिसका यकीन था कि कैनवस पर मानव मनोभावों को उकेरना आवश्यक है भले ही असंगत रंगों का चटख प्रयोग करना पड़े । बेहद लोकप्रिय बाईसिकिल रेस प्रतियोगिता ‘टूर डी फ्रांस’ के दूसरे संस्करण का कम उम्र का विजेता हेनरी कोर्नेट अपनी बुलंदियों पर था। अमेरिका के ओरविल व विलबर राइट जब अपने हवा से भारी एयरक्राफ्ट फ्लायर-दो को सफलतापूर्वक उड़ा चुके थे तो उसके सात महीने के बाद २९ जुलाई १९०४ के पेरिस में भारत के सबसे महत्वपूर्ण पारसी उद्योगपति जमशेतजी टाटा के ममेरे भाई रतनजी दादाजी टाटा और भारत की सबसे पहली कार चलाने वाली फ्रेंच महिला सुज़ैन सूनी ब्रिय्ररे के घर जिस भारतरत्न का जन्म हुआ उसे भविष्य के स्वतंत्र भारत में भारतीय विमानन का पिता कहा जाने वाला था। जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा की ज़िंदगी भी बिलकुल उलटफेरों से भरी बींसवी शती की तरह रही और अंततः यह जहाँगीर, जहाँ को जीतने वाला ही साबित हुआ। जेआरडी टाटा का सुखद बचपन पेरिस की गलियों में बीता और उनकी पहली भाषा बनी फ्रेंच। वहाँ स्कूल में हालाँकि अध्यापक उन्हें इजिप्टियन बुलाते रहे। वहीं गर्मी की एक छुट्टी में छोटे जेआरडी टाटा की मुलाकात फ्रेंच विमानन के पिता लुइस ब्लेरिओट से हुई और फिर जेआरडी उस आकाशीय रोमांच के जीवन भर के दीवाने हो गए। फ़्रांस, जापान, इंग्लैंड की अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के बाद जेआरडी का इरादा आगे इंजीनियरिंग पढ़ने का था कि विश्वयुद्ध के सायों ने फ़्रांस को अपने युवा नागरिकों के लिए कानून बनाकर एकवर्षीय सेनासर्विस करना अनिवार्य कर दिया। चूँकि जेआरडी को फ्रेंच आती भी थी और वे इसका टंकण भी जानते थे तो उन्हें कर्नल का सचिव बनाकर भेजा गया। इसके तुरत बाद १९२५ में पिता ने व्यवसाय सम्हालने के लिए जेआरडी को भारत बुला लिया और बताते हैं कि जिस फ्रेंच टुकड़ी में जेआरडी थे, वह अपने मोरक्को अभियान से कभी वापस नहीं आ सकी। 

भारत आने के चौथे साल जेआरडी ने भारतीय नागरिकता ली और भारत के पहले कामर्शियल पायलट बन गए। जेआरडी ने १९३२ में ‘टाटा एंड संस’ में विमानन विभाग की नींव रखी जो आगे चलकर ‘टाटा एयरलाइंस’ और फिर ‘एयर इंडिया’ बनकर भारत की पहली एयरलाइंस कम्पनी बनी। ३४ साल की उम्र में उन्हें टाटा एंड संस का चेयरमैन बनाया गया और अगले पचास साल में जेआरडी ने टाटा की ६२ करोड़ की इस कम्पनी को अपने रिटायर होने तक १०,००० करोड़ की कम्पनी बना दिया। जेआरडी ने जब टाटा एंड संस की कमान सम्हाली तो इसका व्यवसाय कुल १४ एंटरप्राइजेज में सिमटा था और जब कम्पनी के चेयरमैन पद को छोड़ा तो तकरीबन ९५ एंटरप्राइजेज पर काम फ़ैल चुका था। जेआरडी टाटा ने टाइटन, वोल्टास, टाटा टी, टीसीएस, टाटा एयरलाइंस (एयर इंडिया), टाटा मोटर्स, टाटा कम्प्यूटर सेंटर, फार्मा, केमिकल्स, आदि कई सेक्टर्स में टाटा का काम फैला दिया।  

जेह (जेआरडी का प्यार का नाम) को महज एक सफल कारोबारी की तरह याद करना ज्यादती है। उनका व्यक्तित्व कहीं इससे बहुत आगे जाकर ठहरता है। जेह को ईश्वर ने एक सुखद बचपन दिया था और जेह जीवन भर अपनी कम्पनी और देश को एक परिवार की तरह देखते रहे। कम्पनी में उन्होंने जो श्रम-सुधार किये वे अपने समय से इतने आगे थे कि पूरे भारत में अभी वे सुधार पूरी तरह लागू नहीं हो सके हैं। सवेतन अवकाश (पेड लीव), कर्मचारी कल्याण योजना, एच. आर. विभाग, निश्चित काम के आठ घंटे, निःशुल्क कर्मचारी चिकित्सा, कर्मचारी प्रोविडेंट फंड, दुर्घटना भत्ता आदि सारे कदम तो ऐसे थे कि जब वे कम्पनी में लागू किये गए तो वे अमेरिका जैसे देशों के भी विधान में नहीं थे। उनकी कारपोरेट एथिक्स ऐसी थी कि करछूट की कोई योजना को अपनाना उन्हें पसंद नहीं था और देशसेवा के तर्क से वे अपने वकील तक को चुप करा देते थे। उनका हर वक्त ये कहना था कि कारपोरेट जगत को अपनी समृद्धि के हिसाब से देशसेवा व समाजसेवा में अपनी भूमिका बढ़ानी चाहिए। जेह के नेतृत्व में टाटा ने कई वैज्ञानिक, सामाजिक, कला आदि प्रक्रमों को बढ़ावा दिया। टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ़ सोशल साइंस, नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ एडवांस्ड साइंसेज, नेशनल सेंटर फॉर परफार्मिंग आर्ट्स, फैमिली प्लानिंग फाउंडेशन आदि जैसे कई राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों की स्थापना, उनका सफल संचालन और उनका आधुनिक भारत के विकास में निर्विवादित योग,  जेआरडी की अपने देश के प्रति उत्कट सामाजिक प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है।      

जेआरडी द्वारा स्थापित इंस्टीच्यूट ऑफ़ साइंस, बैंगलोर से १९७४ में कंप्यूटर साइंस से शोध पूरा करने के बाद एक मेधावी छात्रा सुधा कुलकर्णी जब अमेरिका में नौकरी करने की सोच रही थीं, तभी उन्होंने इंजीनियर्स जॉब के लिए अपने हॉस्टल की दीवार पर चिपका टेल्को (टाटा मोटर्स) का एक विज्ञापन देखा जिसमें स्पष्ट यह लिखा था कि महिला इंजीनियर आवेदन न करें। जेआरडी के नाम एक पोस्टकार्ड पर उन्होंने इस विज्ञापन का विरोध किया। दस दिन के भीतर टेलीग्राम आया और सुधा कुलकर्णी को साक्षात्कार के लिए बुला लिया गया। कम्पनी में काम करते हुए एक शाम जब वे घर जाने के लिए अपने पति का इंतजार कर रही थीं तो वहाँ से गुजरते हुए जेआरडी ने सुधा कुलकर्णी के साथ उनके पति की तबतक प्रतीक्षा की जबतक उनके पति आ नहीं गए। एक समय बाद जेआरडी ने सुधा के कम्पनी छोड़ने के निर्णय पर आशीर्वाद दिया और सुधा व उनके पति नारायणमूर्त्ति ने फिर इंफोसिस की नींव रखी। एक बेहद मशहूर किस्सा दिलीप कुमार का भी है जिसका जिक्र उनके जीवनीकार ने भी किया है । दिलीप कुमार अपने कैरियर के चरम पर थे और हवाई जहाज से सफर कर रहे थे। जहाँ सभी सहयात्री उनसे उनका हस्ताक्षर लेने को बेताब थे वहीं उनके साथ बैठा सहयात्री अप्रभावित हो अख़बार पढ़ रहा था तो कभी खिड़कियों से बादलों को निहार रहा था। दिलीप कुमार ने बात करने की कोशिश की और उस सहयात्री से सामान्य बातचीत हुई। उतरते वक्त दिलीप कुमार ने हाथ मिलाते हुए कहा कि- मेरा नाम दिलीप कुमार है। उस सहयात्री ने मुस्कुराते हुए कहा-मेरा नाम जेआरडी टाटा है। दिलीप कुमार कहते हैं कि अपने पूरे जीवन भर मुझे नम्र रहने की सीख मिली क्योंकि इस दुनिया में आपसे बड़ा कोई न कोई होता ही है। फ़्रांस ने जेह की उपलब्धियों पर जहाँ अपना सर्वोच्च सम्मान लीजियन ऑफ़ ऑनर प्रदान किया वहीं भारत में भी उन्हें ‘पद्म विभूषण’ के बाद ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। १९९३ में अंतिम सांस लेने वाले जेआरडी टाटा कहते थे कि- भारत आर्थिक शक्ति बने इससे कहीं अधिक जरूरी है कि देश अपना खुशहाल बने। 

Monday, July 23, 2018

भारत में समान नागरिक संहिता की स्थिति तब तक नहीं बन सकती


साभार: दिल्ली की सेल्फी 

जटिल परतदार समस्याओं के समाधान भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्वों में रखे गए हैं। नीति निदेशक तत्व सरकार व समाज के लिए बाध्यकारी नहीं होते किन्तु उन तत्वों का नीति निदेशक तत्वों में होना यह बताता है कि वे तत्व संविधाननिर्माताओं के भविष्य के भारत में एक अनिवार्य तत्व के रूप में हैं, इसका सीधा मतलब यह है कि वे सभी तत्व जो नीति निदेशक तत्वों की श्रेणी में हैं, उन्हें भविष्य में कभी न कभी भारत की जमीनी हकीकत में उतारना ही है। उनमें से एक तत्व ‘समान नागरिक संहिता’ भी है।

आइये पहले समझते हैं कि क्या है यह ‘समान नागरिक संहिता’ ?
एक व्यक्ति के जीवन के कई आयाम होते हैं और वे सभी आयाम दूसरे व्यक्तियों को भी प्रभावित करते हैं। राजनीतिक जीवन के साथ ही साथ सामाजिक जीवन में भी दायित्व और उत्तरदायित्व का तत्व राजनीतिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है जिससे अंततः किसी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव होता है। बहुधा दायित्व और कर्तव्य के मार्गदर्शन के लिए एक-दूसरे पर बनती निर्भरता अपनी भूमिका निभाती है, किन्तु दायित्व-निर्वहन के न होने की स्थति में अथवा न्यून होने की स्थिति में उत्तरदायित्व का प्रश्न खड़ा होता है। कानून द्वारा निर्धारित उत्तरदायित्व की जाँच-परख तो कानूनी रूप से संभव है किन्तु मानव जीवन के वे व्यवहार जो समाज और धर्म द्वारा सामान्यतः निर्धारित होते हैं, वहाँ कानून-व्यवस्था असहाय हो जाती है। यदि किसी उचित रीति से मानव-जीवन के मूलभूत व्यवहारों में ‘दायित्व और उत्तरदायित्व’ की एकरूप नीति बनाई जा सके, जिसके आधार पर कानून व्यवस्था भी उन व्यवहारों का मूलाधिकार व मानवीय आधार पर नियमन व निर्वहन करा सके, तो उस व्यवस्था को ‘समान नागरिक संहिता पर आधारित व्यवस्था’ कहेंगे।

समान नागरिक संहिता और धर्म का पेंच 
राजनीति की संस्थाओं का जन्म मानव-विकास की हालिया उपलब्धि है। इन संस्थाओं के जन्म के बहुत पहले यदि मानव विकास के रुपहले सोपान चढ़ सका तो उसमें ‘धर्म’ की भूमिका सबसे अहम् है। सभी प्रकार की आधुनिक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक-आर्थिक आदि संस्थाओं के विकास के पहले का स्पेस ‘धर्म’ की विभिन्न संरचनाओं के द्वारा भरा गया। इसलिए ही मानव सभ्यताओं के विकास के प्रत्येक स्थलों पर धर्म की प्रभावी उपस्थिति मिलती है। धर्म के महत्त्व से किसी भी आधुनिक विचारक को इंकार नहीं हो सकता, क्योंकि धर्म ने वह सभी शून्य भरे जहाँ विज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र अब आधुनिक समय में कुशलतापूर्वक कार्यरत हैं। इसप्रकार से देखें तो आधुनिक समस्त उपलब्धियाँ विश्व के प्रत्येक धर्मों की ऋणी हैं, क्योंकि धर्मों के द्वारा बनाये गए प्रावधानों के क्रमशः सुधार का नाम ही आधुनिक ज्ञान-विज्ञान है। किसी एक भूगोल में रहने वाली मानव जाति अपने-अपने परिवेश की उत्तरजीविता (Survival) के अनुरूप जीवन के कतिपय अभ्यासों (Practices) को दोहराती है, जो कालांतर में परम्पराएँ, मूल्यों, रूढ़ियाँ, उत्सव, सभ्यताओं में बदलती हैं। एक अदृश्य आस्था धर्म बनकर इन सभी survival facts को जोड़े चलती है। विज्ञान के विकास ने विश्व के प्रत्येक भूगोल को परस्पर जोड़ दिया है। अब किसी राष्ट्र के भीतर इसलिए ही विभिन्न प्रकार के समाज मिलते हैं जो विभिन्न धर्मों को मानने वाले हो सकते हैं। विभिन्न धर्मों मानने सामाजिक-व्यवहार निश्चित ही भिन्न होगा। यहाँ किसी एक धर्म के व्यवहार को श्रेष्ठ अथवा निम्न नहीं कहा जा सकता क्योंकि सभी धर्म अपने-अपने भूगोल और उत्तरजीविता के तथ्यों से निर्मित हुए हैं। इसी के साथ ही आधुनिक राजनीति जब राज्य के भीतर रहने वाले समुदायों के सामाजिक-व्यवहारों के लिए ‘दायित्व व उत्तरदायित्व’ को तय करने की कोशिश करती है तो धर्म और राजनीति के मध्य एक द्वंद प्रारम्भ हो जाता है।

यहाँ यह सवाल भी मौजू है कि आखिर क्यों राज्य, धर्म के पारंपरिक स्कोप में दखल देना चाहता है? दरअसल, राज्य के चार मूलभूत अंग संप्रभुता (Sovereignty), जनता, सरकार और भू-भाग हैं। इन चारों अंगों को केवल ‘राष्ट्रीयता’ ही जोड़कर एक साथ रख सकती है। राष्ट्रीयता वह सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता है जिससे किसी एक निश्चित भू-भाग के व्यक्ति अपना जुड़ाव महसूस करते हैं। लेकिन व्यक्ति की सामाजिक-धार्मिक विभिन्नता अक्सर ‘संघर्ष’ की स्थिति पैदा करती है तथा यह विभिन्नता व्यक्ति के उस मौलिक अधिकारों के संरक्षण में भी आड़े आती है जिसकी बुनियाद पर राज्य व संविधान टिके होते हैं। यहीं राज्य, धर्म के परम्परागत क्षेत्र में प्रवेश करने को बाध्य हो जाता है। ‘आधुनिक विज्ञान व जीवन-शैली’ चूँकि एक आधुनिक राज्य के निश्चित तथ्य है तो राज्य की यह दखलंदाजी तर्कसंगत भी हो जाती है। संवैधानिक युग में ‘मौलिक अधिकार’ सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च मूल्य हैं, जिनका संरक्षण देश का सर्वोच्च न्यायालय स्वयं करता है।

पेंच कहाँ ?
कानून शून्य में नहीं बनते। उनके स्रोतों में मूल्य, अभिसमय, परम्पराएँ, धर्म भी हैं। इसलिए ही भारत का संविधान अपने नागरिकों को ‘धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (Art. 25)’ भी देता है और यह भारत की राजनीति को ‘पंथनिरपेक्षता (Secularism)’ का स्वरुप भी देता है। इसलिए ‘समान नागरिक संहिता’ की स्थिति तबतक नहीं बन सकती जबतक भारत में रहने वाले सभी धार्मिक समुदायों में इसके लिए एक सर्वमान्य स्वीकृति न हो। सर्वमान्य स्वीकृति के लिए लगभग भारत में रहने वाले सभी धार्मिक समुदायों की ‘आधुनिक विज्ञान व जीवन-शैली’ के प्रति बराबर जागरूकता (जो कि उचित शिक्षा से सम्भव है ) और उनका एक सामान्य मानकीय जीवन स्तर (यह, आर्थिक विकास से सम्भव है) आवश्यक है। जिस देश ने शताब्दियों की टूट-फुट और गुलामी देखी हो, वहाँ इस प्रकार की प्रगति के लिए कुछ वक्त की दरकार होती है, इसलिए हमारे देश के संविधाननिर्माताओं ने ‘समान नागरिक संहिता’ को 1950 से ही लागू न कर उसे भविष्य के लिए ‘नीति-निदेशक तत्वों’ में डालकर छोड़ दिया। 

क्या हमारे देश में भी "समान नागरिक संहिता" लागू होनी चाहिए?
ऊपर के विश्लेषण के पश्चात् अब इस प्रश्न का एक वाक्य में उत्तर होगा कि यदि भारत में रहने वाले सभी धार्मिक समुदायों की ‘आधुनिक विज्ञान व जीवन-शैली’ के प्रति बराबर जागरूकता और उनका एक सामान्य मानकीय जीवन स्तर वर्तमान समय तक हो चुका हो तो यकीनन समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। सरकारी आंकड़ें ही बताते हैं कि ऐसी स्थिति से काफी दूर हैं, अभी हम। इस स्थिति के पहले यदि समान नागरिक संहिता को मुद्दा बनाया जाता है तो यह केवल ‘अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वोटबैंक’ के लोभ में राजनीतिक दलों द्वारा फैलाया गया कोलाहल ही है।  


Monday, July 16, 2018

‘दौर-ए-दिखाऊ देशभक्ति’, देशप्रेमी या भ्रष्ट


साभार: दिल्ली की सेल्फी 
आजकल कुछ को देशद्रोही बताने के लिए स्वतः ही स्वयं को परम देशभक्त घोषित करने की परम्परा चली है। लोग उस छोटे भाई की तरह तात्कालिक लोभ में मझले भाई के विरोध पर उतर आये हैं जिसने अपने बड़े भाई के किसी गलत फैसले का महज विरोध कर दिया है। ‘देशभक्ति’ को ‘राष्ट्रवादी’ होना बताया जा रहा और इस साबुन से सारे कुकृत्य धुलकर लंबा गाढ़ा चन्दन लगाकर लोग भारत माता का जयकारा लगाकर सीना ताने ‘भारतीयता’ को ताक पर रख रहे। नारों, जुमलों, पोस्टरों, प्रोफाइल पिक्स और डीपी आदि की ‘दिखाऊ देशभक्ति’ को छोड़ दें तो किसकी रोजमर्रा की ज़िंदगी में ‘देश’ होता है? दिनभर के अपने फैसलों में कब ‘देश’ कसौटी बनता है कि कौन सोचता है कि मेरे किसी कदम से ‘देश’ को क्या नुकसान होगा या फायदा होगा! भ्रष्ट व्यक्तियों का तंत्र भ्रष्ट होता है। राज्य, कर वसूलती है और अपने नागरिकों की जरूरतों का पालन करती है। लेकिन नौकरीपेशा टैक्स बचाने के लिए सीए और वकील को जुगाड़ लगाने को कहता है। उद्योगपति, राजनीतिक दलों को चंदा दे उनसे अपने लिए छिपे-छिपे सहूलियतें बटोरते हैं और टैक्स से छूट जाते हैं, सो अलग। कितने तो कर देते ही नहीं। 

जब एक अध्यापक अपनी कक्षा में पढ़ाता नहीं तो यह एक प्रकार का भ्रष्टाचार है जो कत्तई एक देशभक्त नहीं कर सकता क्योंकि देश से प्रेम करने वाला अध्यापक देश की अगली पीढ़ी को अपाहिज नहीं बना सकता। देश, जिन छात्रों को आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण मानव-संसाधन के रूप में तैयार होने की बाट जोहता है, उनका अपनी कक्षा में अनुपस्थित रहना देशभक्ति नहीं है। एक वकील, दूसरे पक्ष के वकील से मिलकर मामले को लम्बा खींचकर हर लगने वाली तारीख पर उस नागरिक से पैसा नहीं ऐठ सकता और अगर ऐठता है तो इस भ्रष्टता के साथ वह ‘देशभक्त’ नहीं हो सकता, क्योंकि जिस संविधान को पढ़कर वह आया है कचहरी में उसकी मूल भावना ‘समाज के आखिरी आदमी’ तक को छूती है। एक अधिकारी जरूर सबसे पहले उस दीन-हीन की बात को तवज्जो देगा जो उसके द्वार तक महीनों की कशमकश के बाद पहुँचा है, उनकी नहीं जिन्होंने उसकी शान में नमकीन काजू के प्लेट रखे हैं और अधिकारी के एक इशारे पर  करारे नोटों को न्यौछावर करने को तैयार बैठा है। काजू और करारे नोटों को सुनते हुए वह ‘देशभक्त’ नहीं बल्कि ‘दीमक’ बनकर देश को चाटने की फ़िराक में होता है। बंद कमरे में अपने वकील के साथ किसी धनपशु की टेर सुनते जज को भी हम देशभक्त नहीं कह सकते जो कल के अपने फैसले में किसी गरीब को उसकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर देगा।   

देशभक्ति वो भी नहीं ही जब कोई अपनी बालिग बिटिया को महज इसलिए मारकर पेड़ पर लटका देता है क्योंकि उसने अपनी जाति, धर्म से बाहर शादी कर ली थी क्योंकि यह उस बच्ची के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। एक्सपायरी और महँगी दवा बेचते मेडिकल स्टोर, महँगा ईलाज बेचते डॉक्टर, अपना जमीर अपना कलम बेचते पत्रकार, टीवी एंकर, संपादक, चुप रहते या अन्याय के पक्ष में बोलते प्रोफ़ेसर, टैक्स चोरी करते, नकली सामान बेचते, मिलावट और जमाखोरी करते व्यवसायी, सब्जियाँ रंगते सब्जीवाले, चोरी करते दूकानदार, दलाली मांगते दफ्तरों के बाबू कोई भी देशभक्त नहीं हो सकता। भ्रष्ट कोई भी देशभक्त नहीं हो सकता, हाँ आजकल वह देशभक्ति पोत सकता है शकल पर और उसे ओढ़-बिछा सकता है। यह समझना होगा कि जैसे ही किसी क्षण विशेष में हमने किसी न्यायगत व्यवस्था से समझौता किया, कहीं न कहीं, किसी न किसी को देश में नुकसान पहुँचेगा और देश लोगों से ही बनता है। इंसान को, जानवर को, प्रकृति के किसी भी हिस्से को नुकसान पहुँचाते हुए आप ईश्वर की आरती नहीं कर सकते, यह निरा दोहरापन है, भ्रष्टता है। 

देशभक्ति के लिए पहले देश को समझना होगा। देश की प्रत्येक विभिन्नता और उसकी विशेषताओं को महसूस करना होगा। भारत की ‘अनेकता में एकता’ को समझे बिना हम देशप्रेमी नहीं हो सकते। मन के अनगिन विभाजन पाले हुए हम देशप्रेमी नहीं हो सकते। सारी रूढ़ियों को ढोते हुए हम देशप्रेमी नहीं हो सकते। अपनी परंपराओं पर उठने वाले वाजिब प्रश्न दबाते हुए हम देशप्रेमी नहीं हो सकते, उन्हें सुलझाते हुए और आधुनिकता से उचित का चयन करते हुए ही हम हो सकते हैं, देशप्रेमी। किसी एक दल, किसी एक महंथ, किसी एक मौलवी, किसी एक विचारधारा, किसी एक व्यक्ति का अंधसमर्थक होते हुए हम अपने देश की नींव में मट्ठा डाल रहे होते हैं और हमें पता भी नहीं होता। देश का व्यक्तित्व किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता, वह नागरिकों के समूचे व्यक्तित्व का योग होता है। इसलिए देशप्रेमी होने के लिए हमें देश की उस ‘समूचे व्यक्तित्व’ को समझना होगा और उसके अनुरूप ही अपनी मानसिकता दुरुस्त रखनी होगी।  

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