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Friday, December 22, 2017

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपने बर्फ बार बार रंगें हैं...!

एशिया के बाद दो भाग में देखें विश्व राजनीति में यूरोप !



चौबीस घंटे की एक क्लॉक से अगर अपनी पृथ्वी की अभी तक की जिंदगानी को दिखाने की कोशिश हो तो हम इंसानों  की औकात महज इतनी है कि 00:00 से शुरू हुई घड़ी में हम तकरीबन 11:58 पर अवतरित हुए। पर लगता यों है कि हिस्ट्री हमीं से है, इस जहान की । उसमें भी पिछले दो-तीन सौ साल से यूरोप का चैप्टर चल रहा और लगता यही है कि जैसे दुनिया का सारा ‘फर्स्ट’ यहीं से बिलोंग करता है। सत्ता जिसकी होती है, उसी का रहन-सहन होता है, उसी का भौकाल होता है, उसी की भाषा होती है और उसी की परिभाषा होती है। सुबूत ये है हुजूर कि, इवेन इस आर्टिकल में भी अगर अंगरेजी के वर्ड्स निकाल प्योर हिंदी के डाल दें, तो इसे बोझिल लगना चाहिए । इतिहास का पिता हेरोडोटस को मानना होता है जो यूरोप के एक देश ग्रीस का निवासी था। हम पढ़ते हैं कि अमेरिका की खोज कन्फ्यूज्ड क्रिस्टोफर कोलम्बस ने की जो इंडिया ढूंढते-ढूंढते कैरिबियाई द्वीपों से जा टकराया। अमेरिका पहले भी वहीं था, पर यूरोप के देश इटली के नाविक को पहली बार मिला तो अमेरिका की खोज हुई। यों ही आखिरकार भारत की भी खोज हुई, क्यूंकि पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा को ये देश पहली बार मिला। इंडिया का भौकाल समझिये, कि 20 मई 1498 को केरल के कप्पडु क्षेत्र में उतरने के करीब 8000 किमी दूर ही अफ्रीका के जिस द्वीप से कोलम्बस इंडिया को पहली बार देख पाया, खुशी में उस द्वीप का नाम ही केप ऑफ़ गुड होप रख दिया। सिक्का यूरोप का होगा तो टकसाल भी यूरोपियन होगी और करेंसी (चलन ) में वही होगा जो यूरोप का होगा।



कनाडा से महज दो प्रतिशत बड़ा है, पर महाद्वीप तगड़ा है यूरोप। दुनिया का दूसरा सबसे छोटा महाद्वीप यूरोप है पर इसमें दुनिया का सबसे बड़ा देश रूस है और दुनिया का सबसे छोटा देश वेटिकन सिटी भी है। आस्ट्रेलिया से थोड़े ही बड़े इस महाद्वीप में पचास देश हैं, बोली जाने वाली ढाई सौ से अधिक भाषाएँ हैं और एक सौ साठ से अधिक कल्चरल आइडेंटिटिज हैं। दुनिया में सबसे धनी है यूरोप और आज के ख्वाबों भरी ज़िंदगी की हकीकत है यूरोप। दुनिया के सर्वाधिक विकसित देश यहीं हैं और मान लीजिये कि यहाँ के गरीबों का कूड़ा अगर दुनिया के कुछ देशों में पहुंचा दिया जाय तो वे अपने देश के अमीरों में होंगे।दुनिया का हर भाग्यशाली बारहवां आदमी यूरोप में रहता है। क्रिस्टोफर मार्लोवी के शब्दों में - कि जैसे, इनफाइनाइट दौलत एक रूम में बंद हो। पेरिस यहीं, लन्दन यहीं, बर्लिन यहीं, रोम यहीं, यश चोपड़ा के शिफॉन साड़ियों वाला स्विट्जरलैंड यहीं, हॉलीवुड यहीं, डिज्नीलैंड यहीं और अपने अनुष्का वाले कैप्टन विराट ने भी यूरोप का वह देश चुना अपने शादी और हनीमून के लिए जहाँ से यूरोप के दूसरे सबसे पुराने एम्पायर, रोमन एम्पायर की शुरुआत हुई, यानी इटली।धरती के महज दो प्रतिशत धरातल वाले यूरोप में दुनिया में देशों के न्याय सुनाने वाला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, हेग भी यही हैं।  

दुनिया को साइंस का मॉडर्न लेसन देने वाले यूरोप के नाम की कहानी तक वेरी कन्फ्यूजिंग है। इसे ग्रीक मिथोलॉजी में यूरोपा नाम की राजकुमारी और ज्यूस की एक रानी के नाम से लिया गया। ग्रीक शब्द से चलें तो इसका मतलब वाइड, ब्रॉड माने विस्तृत होगा, पर सीरियन वार्ड एरेब से इसकी उत्पत्ति मानें तो इसका मतलब सनसेट होगा। शुरू में जब यह शब्द किसी प्लेस के लिए इस्तेमाल में आया तो इस यूरोप से मतलब उत्तरी अफ्रीका से था फिर धीरे धीरे यूरोप का आधुनिक अर्थ बना। अगर दुनिया भगवान ने बनाई तो यकीन करना मुश्किल है कि कभी यूरोप को इतना बुलंद करने की सोची हो उसने । क्योंकि सोचिये न, चारो तरफ से दुनिया के बाकी हिस्सों से कटा हुआ है यूरोप।  बर्फीला आर्कटिक इसे सर्द बनाये रखता है। विशाल अटलांटिक इसे पश्चिम के प्राकृतिक स्रोतों भरपूर अमेरिका महाद्वीप से वंचित रखता है तो मेडीटीरियन सी से यह मिनरल्स वाले अफ्रीका से कट जाता है। यूराल पहाड़ इसे पूरब के एशिया से अलग करके रखता है। जब यह ही न पता हो कि पृथ्वी गोल है या चपटी, और सूरज घूमता है कि पृथ्वी चक्क्र काटती है सूरज के, तो फिर ये सोचना कि एक दिन यूरोप के देश ऐसे शिप बनाएंगे कि वे पृथ्वी के एक-तिहाई लैंड से निकलकर दो-तिहाई वाटर को तैरते हुए  पृथ्वी के चक्कर पे चक्कर लगाएंगे; यह किसी किसी ऊँघती दुपहरी में देखे जाने वाले अटपटे बेतरतीब सपने से कहीं अधिक न था। पर, जनाब ! ये हुआ और इसलिए ही आज यूरोप ड्रीमलैंड है। सब बस अच्छा ही है, यूरोप में, ऐसा नहीं है, पर बाकी दुनिया के महाद्वीपों के मुकाबले यकीनन यूरोप की स्थिति यकीनन बेहतर है।

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपने बर्फ बार बार रंगें हैं। और एक ज़माने में से ही यूरोप में रहने वाली जातियों को बारबेरिक माना जाता रहा और आज भी यूरोप ने वह बारबेरिज्म खोया नहीं है बस मॉडर्न सिविलाईजेशन के अधखुले कपडे से इसे ढँक रखा है। उस कहानी को आइये फिर दुहराते हैं जो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इकोनॉमिक-कल्चरल सिक्का अभी भी यूरोप का ही करेंसी में है। जीसस के करीब 1200 साल पहले फेमस ट्रॉय-स्पार्टा वार हुआ। जीसस के जनम के साढ़े आठ सौ साल पहले होमर हुआ जिसने आधुनिक दुनिया का पहला महाकाव्य इलियड और ओडिसी लिखा। फिर 776 बीसीई में ओलम्पिक खेल शुरू हुए और समझिये कि यूरोप की काशी रोम बसी ईसा से तकरीबन 750 साल पहले। ग्रीक एम्पायर पर पर्सिया ने आक्रमण किया ईसा के धरती पर आने के भी ठीक 500 साल पहले और यह लड़ाई अगले दो सौ और साल चलने वाली थी। बहरहाल, यूरोप महाद्वीप ने महान ग्रीक एम्पायर देखा और फिर महान रोमन एम्पायर देखा।

जीसस के इस दुनिया से विदा होने के बाद उनके कहे शांति संदेशों पर चर्च कुंडली मारकर बैठ गया और पॉलिटिक्स की कमान रिलिजन के सम्हालते ही यूरोप इतिहास के अपने मध्ययुग में आ पहुंचा। आज की पॉलिटिक्स अभी जितना क्रूर होने के लिए सोचेगी, रीलिजन ने वे हदें शताब्दियों पहले से ही तोड़नी शुरू कर दी थीं। ईसा मसीह की मृत्यु के 632 साल बाद एक नए रीलिजन इस्लाम के मसीहा मुहम्मद साहब की मृत्यु हुई और इस्लाम आज यूरोप का ही दूसरा प्रमुख रीलिजन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का दूसरा बड़ा रिलिजन है। मध्य युग के यूरोप की कमान चर्च के पास थी। यूरोप से निकलकर चर्च ने रिलिजन के नाम पर क्रूसेड करने शुरू किये, जिसमें बेरहमी से काफिरों को मिटाया गया। तब तक मध्य एशिया से सिल्क रुट बनाता हुआ मंगोल शासक चंगिज खान बारबेरिज्म की दूसरा स्टैंडर्ड सेट करता हुआ आ पहुंचा और उसके बाद के शासकों ने सर्द यूरोप को और भी सर्द अपने हाथों से छु लिया। मध्य युग का यूरोप अंधयुग माने ब्लाइंड ऐज कहलाता है। ब्लाइंड इसलिए क्यूंकि चर्च का आदमी टिकटें बेचता स्वर्ग की और लोग टूट पड़ते खरीदने को। आज भी लोग चाँद और मंगल पर जमीन खरीद ही रहे इंटरनेट पर। उस ब्लाइंड ऐज में सारी कसौटियां चर्च सेट करता और ‘राइट’ वही माना जाता जो पोप को ‘राइट’ लगता। ठीक ऐसे ही जैसे आज मुस्लिम फ़ण्डामेंटलिस्ट को किसी सिरफिरे मौलवी की बात ‘राइट’ लगती है, किसी क्रिस्चियन फंडामेंटलिस्ट को दहशती प्रीस्ट की बात ‘राइट’ लगती है और किसी भटके हिन्दू नौजवान को किसी ढोंगी गुरु की ही बात ‘राइट’ लगती है। यों तो इस ब्लाइंड ऐज के बाद फिर रेनेसॉ और एनलाइटेन्मेंट एरा भी आया 17वीं शती तक, जिसमें एक बार फिर अंधश्रद्धा के स्थान पर रीजन और लॉजिक को महत्त्व दिया गया पर रीलीजन अभी भी इतना प्रभावशाली था कि उसने समूचे यूरोप को 1618 से 1648 तक के तीस साल के युद्धों में झोंक दिया।




भारत ने क्यों किया वोट खिलाफ अमेरिका के ?



आप इतना समझें कि वर्ल्ड पॉलिटिक्स में अमूमन नैतिकता महज इतनी होती कि वह किया जाय जिससे राष्ट्रहित को फायदा पहुंचे। जिसे हम आप डिप्लोमेसी कहते हैं, कूटनीति कहते हैं, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में इसके मायने बस इतना है कि कैसे अपना राष्ट्रहित बचाते हुए जहाँ कहीं मौका मिले वहाँ इसे बढ़ाया जाय। वर्ल्ड पॉलिटिक्स की एक खास बात और समझ लें तो भारत की हालिया अमेरिका के खिलाफ की गयी वोटिंग समझ आ जाएगी।  वर्ल्ड पॉलिटिक्स anarchic है, माने यहाँ कोई एक नियामक शक्ति नहीं है जैसे कि देशों के भीतर सरकारें होती हैं। इसलिए अपने हितों की सुरक्षा स्वयं करनी होती है। हितों की सुरक्षा सभी अन्य देशों से किसी न किसी रीति से जुड़ने में अधिकतम होती है। दुनिया के सभी देश घोषित तौर पर कुछ भी प्रवचन दें, किन्तु सभी देशों से किसी न किसी रीति से जुड़ने की सम्भावना को टटोलते रहते हैं। इसीलिये कहते हैं कि, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में कोई स्थाई शत्रु नहीं होता और न होता है कोई स्थाई मित्र ही। 

लोकतंत्र में चुनाव जीतना बेहद कठिन होता है। बहुमत के मत संजोने होते हैं। अमेरिकी चुनाव में यहूदी  मत और हथियारों की लॉबी में उनका निर्णायक प्रभाव महत्वपूर्ण है। येरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने का मतलब है, इजरायल की स्थापना को अंतिम रूप से मुहर लगा देना और फलस्तीन को एक दूसरे पक्ष के रूप में लगभग ख़ारिज कर देना। चुनाव में ट्रम्प की जीत हुई और अमेरिकी प्रेसिडेन्ट अब अमूमन दो कार्यकाल लेते हैं, तो अमेरिका को यह स्टंट तो करना था। स्टंट इसलिए क्यूंकि यह एक ऐसा मुद्दा जिसपर बेहद बुरी तरह से बंटा मध्य एशिया एकजुट हो जाता है। विश्व व्यवस्था के लोकतान्त्रिक मॉडल में द्विपक्षीय मुद्दे द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाए जाने चाहिए। इस रीति से भी अमेरिका की निर्णायक उपस्थिति तभी संभव है जब दोनों पक्ष चाहें। तो अमेरिकी प्रसाशन को पहले दिन से यह पता है कि एकतरफा उनकी घोषणा से जमीन पर कुछ बदलने वाला नहीं है। चूँकि वर्ल्ड सिस्टम anarchic है तो UNO उतना ही प्रभावी है जितना सदस्य राष्ट्र इसे होने देते हैं।  और फिर अमेरिका एक वीटो पावर वाला देश है। तो इससे अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ता फ़िलहाल कि UNO में क्या हो रहा और यकीन मानिये सदस्य राष्ट्रों को भी चूँकि पता है कि UNO से कुछ निर्णायक नहीं होने वाला कम से कम अभी।  

दुनिया के सभी देश यह जरूर चाहते हैं कि उनकी विदेश नीति स्वतंत्र दिखे और एक सततता (Continuity ) में दिखे। इजरायल-फलस्तीन मुद्दा चूँकि अभी सुलझा नहीं है, फिर येरुशलम को राजधानी स्वीकार कर लेना एकतरफा निर्णय ले लेना है जो कि किसी भी रीति से उचित नहीं है। ऐसे में यदि अमेरिका के खिलाफ वोटिंग करके जमीन पर पारस्परिक संबंधों पर कोई फर्क न पड़ता हो और अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता भी प्रदर्शित होती है तो एक समझदार स्मार्ट राष्ट्र अवश्य ही अमेरिका के खिलाफ वोटिंग करेगा। और देखिये अमेरिका के किसी भी अधिकारी ने किसी भी स्तर पर कहीं भी इस मुद्दे पर भारत की आलोचना नहीं की है। 


Tuesday, December 19, 2017

Looking Nepal through Chinese Prism



Dawn in New Nepal
Dr. Shreesh Pathak



It's almost clear that the first elected democratic government is going to be formed in the leadership of left coalition parties in Nepal. A country which waited so long for its first full-fledged democratic republic federal constitution on the name of proper representation of three major identities i.e. Himal, Pahad and Terai; its first elected government would be a stable governemnt which would last for next five years and enjoys favorable coordination from its state governments because many of them would be led by again the left coalition parties. It can be better hoped that Nepal would follow its natural course of development which is badly affected for almost last thirty years and the country now deserves to have a peaceful and stable governance experience. As Nepal has adopted a federal structure, this certainly would help to address the several identity concerns of the people. A strong government at the centre would be decisive to take essential steps which eventually would strengthen the integrity of the country.


New government in Nepal would have many challenges waiting to address sooner or later. Elections are contested mainly on the issue of development and undoubtedly, this should be the foremost agenda of the government. Development requires investments, resources and prowesses. In order to have all these things Nepal needs to maintain relations with the actors of world system in general and with India and China in particular. As a landlocked country Nepal is bordered with India from three sides and with China from one side. Nepal also does not have any direct access with sea routes for trade exchanges. India whereas enjoys a traditional relationship with the country, China has tried  more ambitiously and cautiously to build a sturdy connectedness through its vast investment programme under its OBOR policy. Situated in the lap of Himalayas, Nepal would be promising source of hydro-power and it can develop itself as a central point for trade interactions connecting India, China, Bhutan and Bangladesh.


As a most important neighbour, India is keenly watching the progresses of Nepal as democratic country. In the long run of democracy, nobody can refuse the role of India in Nepal and the kind of rapport the both country enjoy and it cannot be compared with anybody. But, India should not come in any complacency and keeping in view the Chinese policy of pearls of strings and BRI, India needs to be more engaged with Nepal than ever before. India must understand the need of a new nation which aspires to adopt ambitious developmental path and has to be ready with generous offers at times which Nepal could not refuse keeping China at its back. India needs to correct its traditional diplomatic approach towards Nepal and does not need to react in haste over any China-Nepal cooperation. Nepal with a new constitution and a new elected government needs India and China both as per economics and geography suggest. Obviously as a sovereign state, Nepal would try to utilise its geopolitical location in order to beat the constraints of its geography. India cannot approach Nepal any longer as mere a buffer state but should see as a credible neighbour which is willing to go forward hand in hand. Definitely; a left government at the centre makes India a little bit uncomfortable dealing Nepal especially when already China is investing huge in the country, but India should go forward on its traditional legacy of interconnections, its outstanding democratic credibility and the mutual reverence arising from people to people connect.

Monday, December 18, 2017

पॉलिटिक्स पढ़ने पढ़ाने का फायदा क्या

Hobbes को यही लगा था तो राजनीति को उसने फिजिक्स के तर्ज पर ढालकर विषय का पुनरोद्धार कर पॉलिटिक्स का गैलिलिओ बनने की ख्वाहिश पाली थी . एकबारगी डेविड ईस्टन को भी यही लगा था. अंततः यह समझा गया कि मानविकी विषय में तथ्य (fact) और मूल्य (Values) का सुन्दर समावेशन (inclusion) हो . Exactness जहाँ विज्ञान का गुणधर्म है वहीँ dynamism मानविकी का. प्रचलित विज्ञान निर्जीव (inanimate) का अध्ययन अधिक करते हैं, जहाँ कहीं सजीव (animate ) का अध्ययन करते भी हैं तो उनके स्थिर सार्वत्रिक गुणधर्मों (universal properties) तक सीमित होते हैं . मानविकी जीवित मन का अध्ययन करती है . इसमें exactness ना होना इसकी खूबसूरती और खासियत है . यह अधिक सूक्ष्म और व्यापक (universal) है . इसमें केवल तथ्यों से काम नहीं चलता .
ध्यान दें, इकोनोमिक्स और ज्योग्रोफ़ी क्रमशः objectification की ओर बढ़ रहे हैं, एक तरफ पृथ्वी ऑब्जेक्ट है और दुसरी तरफ अर्थ (Money). ऐसा नहीं है कि विज्ञान बिना मूल्यों के निर्वहन कर सकता है अथवा उसमें केवल exactness ही है. एक समय उसमें यह कल्पना की गयी कि नाभिक में इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रोन ठीक वैसे होंगे जैसे तरबूज में बीज. भूगोल को ध्यान से देखिये, उसकी शाखाएं देखिये, अधिकांश इतिहास, राजनीति और समाज से उधार ली हुई हैं और अर्थशास्त्र का जन्म ही राजनीति से है, तब उसे पोलिटिकल इकॉनमी कहा जाता था.
जाने कितने उपागमों (disciplines )के पिता अरस्तु ने यों ही नहीं राजनीति को मास्टर साइंस कहा है. प्लेटो की एकेडमी में गणित और विज्ञान की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जी दर्शन और राजनीति की शिक्षा दी जाती थी . आधुनिक अर्थव्यवस्था को ध्यान से देखें, उन्मुक्त बाजार जब जब वैश्विक मंदी लाता है, राजनीति का राज्य उसे अपने बाहों में लेकर बचाता है .
हाँ, रोजगारपरक (Employment Oriented ) होना एक पृथक बात है . यहाँ राजनीतिविज्ञों की ये गलती है कि वे सिलेबस पर काम नहीं कर रहे और शिक्षाविदों और प्रशासन की यह गलती है कि वे विषय का महत्त्व नहीं समझ रहे . पर क्या दोष दें किसी को . विभाजन इतने गहरे हैं कि अभी भी विज्ञान को महज एक विषय माना जाता है जबकि कब का यह एक पद्धति बन चुका है जो सभी उपागमों में प्रयोग में लाई जाती है .
कला विषय कितने उपयोगी हैं यह समझने के लिए बाजार ने अवकाश ही कितना छोड़ा है . बिके मूल्य आदर्श कब समझने लगे . यह मूल्यहीन स्थिति भ्रष्ट सत्ता को सतत बनाने में योग देती है इसलिए वे चाहते हैं कि यह ज्ञानशून्यता बनी रहे . सभी विकसित राष्ट्रों में मानविकी विषयों में प्रवेश अधिक है और सभी विकासशील देशों में विज्ञान विषयों में भीड़ मची है . अकुशल ज्ञानशून्य नागरिक समाज (Unskilled Unaware Civil Society) को कुछ भी नहीं खलता जब वह देखता है कि विकास के नाम पर मनमोहन और मोदी दोनों ही नए IITs, AIIMS' और IIMs खोलने की बात तो करते है पर यह विकास की संकल्पना जिस मानविकी से आयी है उसके लिए DU, JNU, Jamia, या ऐसी ही उच्चस्तरीय संस्थाएं नहीं खोलना चाहते. शायद वो चाहते हैं कि विभाजन बने रहें, कहीं ज्ञान यह विभ्रम (Illusion made out from hegemony) तोड़ देगा फिर तो सच में नागरिकों के लिए कार्य करना पड़ेगा . फिर राजनीति का करियर सेवक का हो जायेगा, जैसा कि प्लेटो की Philosopher King की अवधारणा कहती थी .
राजनीति में आज भी अपने टूल्स और अप्रोच हैं जो इस विज्ञान को प्रामाणिक (authentic) बनाते हैं. टूल्स और कार्यप्रणाली (systematic functions) की उत्तर व्यवहारवाद (Post Behaviouralism) के बाद बहुत अधिक मांग है, दोष देश की शिक्षा व्यवस्था का है कि वे विषयवस्तु (Content) अद्यतन (updated) नहीं कर रहे. इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री शोधित (well researched ) नहीं है. सभी, सब कुछ कभी नहीं सीख सकते सो expertise की जरुरत बनी रहेगी. राजनीति एक प्रक्रिया (function) के तौर पर कितनी समझ आती है और मूल्य एवं पद्धति (System) के तौर पर कितनी समझ आती है यह अलग अलग प्रतीति (realisation) है. एक्टर से भी प्रश्न होते हैं और किसी फिल्म के दर्शक भी बहुत कुछ बताते हैं पर उस फिल्म के निर्देशक, लेखक अथवा समीक्षक के जवाब का स्तर यकीनन अलग होगा , उनकी expertise को कम कर के आंकना बहुत बड़ी भूल होगी . इंटरनेट ने विषय की उपादेयता (utility) और विषयविज्ञानी (subject expert) की उपादेयता ज़रा भी कम नहीं की है. शोध के कई स्रोतों में से एक स्रोत है, यह भी एक्सक्लूसिव नहीं.
मोटर बाइक एक मैकेनिक भी बना लेता है पर इंजीनियर ही जानता है कि वह पूरी प्रक्रिया क्या है। मेरा इतना ही निवेदन है कि किसी खास समय में यदि विद्वान अथवा व्यक्ति सुसंगत (appropriate) न कर रहे हों तो उसमें विषय उपागम का दोष कहां आ जाता है। सन 96 में ही मैं देख पा रहा था कि मेरे जनपद से चुनाव में कौन जीतेगा और क्यों पर आज विश्लेषण करने के मेरे टूल्स और अप्रोच में निश्चित ही गुणात्मक सुधार आया है। कला विषय उतनी गति से अद्यतन नहीं हो रहे जितनी तीव्रता से विज्ञान विषय। हममें से ज्यादा लोगों की प्रारम्भिक ट्रेनिंग भी विज्ञान की है जो स्वभाविक तौर पर तथ्यपरक है। तथ्यों से लगाव स्वाभाविक है। चुनाव एक राजनीतिक परिघटना है जिसमें ढेरों प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। उसे केवल सीटों की संख्या से देखना अल्‍पदृष्टि का (मायोपिक) होना है। तो यदि कोई सामान्य जन सीटों की सटीक भविष्यवाणी कर दे और वह विशेषज्ञ की संख्या से मेल करे तो इसका अर्थ यह नहीं कि विषय विज्ञानी की उपादेयता संकट में है.
किसी चुनाव के परिणाम पर राजनीतिक विश्लेषक की व्याख्या का स्तर यकीनन किसी सामान्य जन से बेहतर होगा। आप पूछेंगे कि उपादेयता का यह स्तर कोई इतना भी आकर्षक नहीं. भाई, उस चुनाव के बाद तुरत चुनाव यदि हो जाएं तो पुनः संभवतः परिणाम बदले या मतप्रतिशत अथवा जीत-हार का अंतर बदले, इस परिघटना की व्याख्या सामान्य व्यक्ति कभी नहीं कर सकेगा किन्तु एक विश्लेषक आसानी से कर लेंगे। पत्रकार जो किसी निश्चित घटना विशेष पर उपलब्ध होते हैं और उनमें से कईयों को लंबा अनुभव भी होता है फिर भी परिचर्चा में कम से कम एक विषय विश्लेषक अवश्य होता है. हाँ, यह अवश्य हो सकता है कि वह विश्लेषक एक्सप्लेन कर पा रहा हो किन्तु interpret ना कर पा रहा हो और वह बोझिल लगे. पर यह उस विश्लेषक की सीमा है, उस विषय की नहीं.
निराशा यह है कि विभिन्न सामाजिक परिवर्तनों में यह विश्लेषक क्या योग करते हैं ? संभवतः कुछ नहीं, क्या ? दरअसल सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन बहुत धीमे धीमे होते हैं। और देखिए ज्ञान का एक सिस्टमेटिक अवदान होता है और एक फंक्शनल अवदान होता है। लॉक ने गौरवपूर्ण क्रांति का नेतृत्व नहीं किया था पर लॉक को उस क्रांति का दार्शनिक कहते हैं. भूमिकाओं को गड्ड मड्ड करके देखने का समय है । रेडियो का आविष्कार मार्कोनी ने किया अब उसका प्रयोग कैसे करना है समय सापेक्ष समाज उपजाता है। समाजविज्ञानी और समाजसुधारक में फर्क होता है। कभीकभार सुसंयोग से समाजसुधारक समाजविज्ञानी भी होता है तो यह एक अनिवार्य स्थिति तो नहीं हो गई, ना। हम भी टीवी पर क्रिकेट देखते हुए बोलते तो हैं कि खिलाड़ी को यह शॉट यों लेना चाहिए पर खिलाड़ी और खेल विशेषज्ञ ही समझते हैं कि अन्य प्रभावी कारक कौन से हैं। यही अन्य प्रभावी कारक जो जनसामान्य के लिए छिपे होते हैं, विशेषज्ञ उन्हें उजागर करते हैं। संभव यह भी है कि हमारा या किसी विद्यार्थी विशेष का अभी बोध उस स्तर का ना हो कि वह जनसामान्य से अधिक विशेष रीति से ना सोच पा रहा हो इसका अर्थ यह नहीं कि विषय विशेषज्ञ की उपयोगिया अथवा विषय विशेष की उपगोगिता खतरे में है।
विषय विज्ञता (Knowledge of Subject) केवल व्याख्याओं तक सीमित भी नहीं. सिद्धांत के तीन उपयोग होते हैं जिसमें व्याख्या केवल एक उपयोग है। Explanation, Interpretation and Restructuring . एक सुसंगत राजनीतिक सिद्धांत किसी राजनीतिक परिघटना (Phenomena) को पहले अपने टर्मिनोलॉजी में समझेगा। जैसे डाक्टर्स आपस में चर्चा करते हैं किसी रोगी की। फिर अगले चरण में उस व्याख्या का सरलीकरण व्यापकीकरण (generalise, universalise) किया जाता है ताकि सभी उसे समझें। इसी चरण पर विशेषज्ञ को वह भाषा मिलती है जिससे वह रोगी को रोग के बारे में समझा पाता है। अंतिम चरण में व्याख्या को नित नवीन बदल रही चुनौतियों के अनुरूप अपने आधारों को फिर फिर नवीन करने में मदद मिलती है ताकि वह सिद्धांत प्रासंगिक (relevant) बना रहे। तो विषय विज्ञता महज व्याख्या तक सीमित नहीं।
समकालीन समस्याएं अपने युग अनुरूप हमेशा ही जटिल होती हैं और किसने कहा कि समाजविज्ञानी असफल हैं । यह भी क्यों सोचें कि वह परिघटना जिसमें यह नैराश्य (disappointment) उपजा है कि विषय विशेषज्ञता किस काम की, उस परिघटना का पटाक्षेप हो गया है, अभी देखते जाएं। यह तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। जब अंग्रेजों ने कहा कि संविधान की तमीज नहीं है तो हमने वह राजनीतिक व्यवस्था दी जिसमें सार्वजनिक मताधिकार (Universal Adult Suffrage) का आत्मविश्वास था। इंदिरा गांधी आपातकाल लाती हैं तो वैकल्पिक राजनीति ने वह शून्य भरा और न्यायपालिका और भी सशक्त हुई। हाँ, इन प्रक्रियाओं के बीचोबीच पड़ा नागरिक जरूर सशंकित हुआ होगा कि स्वतंत्रता के मूल्य तो व्यर्थ गए या अब तो देश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं अवसरों पर विषय विशेषज्ञ आशावान रहेगा क्योंकि उसे वह अन्य प्रभावी कारक दिखेंगे तो जन सामान्य को नहीं दिखेंगे। यहीं पर उपयोगिता अधिक है डॉक्टर की जब मेडिकल स्टोर वाला निराश हो चुकेगा।

Thursday, December 14, 2017

भारत राष्ट्र की विविधता और चुनाव सुधार



भारत राष्ट्र की विविधता और चुनाव सुधार
डॉ. श्रीश पाठक* 






स्वतंत्र व निष्पक्ष और नियमित अंतराल पर होने वाले चुनाव किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक लक्षण हैं। चुनाव यदि स्वच्छ और निष्पक्ष न हों, तो राजनीतिक व्यवस्था के लिए ही घातक सिद्ध हो जाते हैं। राजनीतिक सरंचनाएं निर्बाध चलती तो रहती हैं किन्तु उनका अभिप्राय शेष नहीं रह जाता। दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र भारत में चुनाव वर्षपर्यन्त चलने वाले उत्सव हैं, जो न केवल बेहद खर्चीले हैं बल्कि इससे सामान्य प्रशासन के संचलन में भी बाधा पड़ती है। इसी वर्ष अप्रैल में नीति आयोग ने एक मसविदा तैयार करके सभी मुख्यमंत्रियों एवं दूसरे संबंधित लोगों को प्रेषित किया है जिसमें २०२४ से केंद्र-राज्य चुनाव एक साथ ही कराने की वकालत की गयी है, जिससे सुशासन की राह में आने वाली चुनाव-प्रचार संबंधित ख़लल न्यूनतम किये जा सके।


पड़ोसी देश नेपाल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य और केंद्र के चुनाव एक साथ ही दो चरणों में कराने का निर्णय लिया और सफलतापूर्वक संपन्न भी कर लिया है। इस केंद्र-राज्य समकालिक चुनाव व्यवस्था से संसाधनों का मितव्ययी प्रयोग तो होगा ही, आशा की जानी चाहिए कि इस प्रगतिवादी कदम से नेपाल अपने इस लोकतांत्रिक प्रयोग में सफल होकर एक सुदृढ़ राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ पायेगा। दक्षिण एशिया में श्रीलंका में भी यह विमर्श जारी है कि कम से कम सभी राज्यों के चुनाव एक साथ कराये जाएँ ! प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के समर्थन के बाद इस विमर्श को और बल मिला कि भारत देश में एक जरूरी चुनाव-सुधार के तौर पर केंद्र-राज्य चुनाव साथ-साथ कराये जाएँ। आज़ादी के बाद संविधान लागू होने के बाद से भारत में १९६७ तक केंद्र-राज्य चुनाव साथ-साथ ही होते रहे। किन्तु अविश्वास प्रस्ताव आदि प्रक्रियाओं वाली भारतीय संसदीय व्यवस्था में मध्यावधि चुनाव और राज्यों में राष्ट्रपति शासन की गुंजायश बनती है, इसलिए चुने जाने के बाद सरकारों की एक नियत अवधि स्थिर करनी होगी और कुछ राज्यों की सरकारें समयपूर्व ही स्थगित करनी होंगी। जाहिर है यह एक कठिन कार्य है और इसके लिए आवश्यक संवैधानिक सशोधनों के लिए व्यापक विमर्श के साथ आम सहमति की भी दरकार होगी। जहाँ इस संदर्भ में अमूमन राष्ट्रीय दल समर्थन में हैं, वहीं क्षेत्रीय दल और राज्य सरकारें इसके लिए असमय सरकारों के भंग किये जाने के खिलाफ हैं। यदि एक आम सहमति बन भी जाती है तो भी एक साथ चुनाव करवाने के लिए भारी मानव संसाधन और एकमुश्त धन की भी आवश्यकता होगी। कुछ विश्लेषकों ने इस तरह के चुनाव के दौरान अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती से देश की आंतरिक सुरक्षा स्तर पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को लेकर भी आशंका व्यक्त की है। ऐसे सभी प्रश्नों के जवाब के लिए नीति आयोग ने बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई नेतृत्व में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार  की है जो एक सुचिंतित आलेख है। ऐसे किसी भी योजना का क्रियान्यवन कितना ज़मीनी है और क्या सचमुच इससे चुनाव व्यवस्था मितव्ययी होगी और सुशासन के अवरोध क्या कम हो सकेंगे; इन सभी बिंदुओं पर पड़ताल देबरॉय-देसाई कमेटी ने की है। 


भारत की राजनीतिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों ही रीति से चुनाव होता है। देश का वास्तविक प्रधान, प्रधानमंत्री जहाँ प्रत्यक्ष रीति से चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन से चुना जाता है वहीं औपचारिक प्रधान राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रीति से चयनित किया जाता है। चुनाव की दो विधियां विश्व में सर्वाधिक प्रचलित हैं। पहली विधि फर्स्ट पास्ट दी पोस्ट सिस्टम (एफपीपी) सरल है और इसमें जो अधिक मत पहले पाता है उसे ही विजेता घोषित कर दिया जाता है। इस विधि में यदि मत प्रतिशत पैतालीस ही हो अर्थात सौ में से महज पैंतालीस  नागरिकों ने ही मत का प्रयोग किया हो और उस स्थान से केवल छः प्रत्याशी मैदान में हों तो संभव है कि पाँच प्रत्याशियों को सात या उससे कम मत मिलें और महज आठ या अधिकतम दस मत पाकर ही एक प्रत्याशी विजेता घोषित होकर समूचे सौ का प्रतिनिधित्व करे !  इसके उलट आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (हेयर प्रणाली) जटिल तो है, किन्तु इसमें एक भी मत व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि मतदाता प्रत्येक छः प्रत्याशियों को एक वरीयता में मत देता है। इस उदाहरण में यह वरीयता एक से लेकर छः तक होगी। यह प्रणाली छोटे-छोटे संख्या में रहने वाली अस्मिताओं की भी तदनुरूप उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। उथल-पुथल से भरे नए-नवेले राष्ट्र के लिए एफपीपी चुनाव पद्धति आदर्श थी जिसके तकरीबन बारह प्रतिशत नागरिक ही तब साक्षर थे। परन्तु अब उपयुक्त समय है कि भारत में मतदान रीति में बदलाव की एक बहस चले। इस समय भारत की साक्षरता प्रतिशत उल्लेखनीय है और वैश्वीकरण के प्रभावों के परितः भारत के प्रति एक अस्मिता के नागरिक राजनीतिक सहभागिता को आतुर हैं तो एफपीपी चुनाव पद्धति के स्थान पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है।   

*लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं.

Tuesday, December 12, 2017

पोलिटिकल पाठशाला: आइडियोलॉजी

*यह कोई अकादमिक आलेख नहीं है !
#जेनरेशन नेक्स्ट के लिए


जिससे जान नहीं छुड़ा सकते, उसे जान लेने में ही भलाई है।

अपने देश में पॉलिटिक्स स्टडी की चीज मानी नहीं जाती, बस चतुर करते हैं और बकिया मौज लेते हैं। लाइफ रिपीट नहीं करती खुद को पर इसके चैलेंजेस से निपटने की प्रिपरेशन हो तो इजी हो जाता है और कई बार बेहतरी की गारंटी भी मिल जाती है। इन्हीं तैयारियों को पढ़ाई कहते हैं। ज़िंदगी का एक-एक रेशा वेस्ट न हो, इसलिए होश सम्हालते ही कोशिश होती है कि स्कूल शुरू करवा दिया जाए। पढ़ाई को बैगेज बना दिया गया है और इसे केवल ब्रेड-बटर से जोड़ दिया गया है तो अब यह रियलिटी से दूर होती जा रही और अक्सर लोग इसे बुकिश कह कट लेते हैं। उनका दोष नहीं है। पढ़ाने वाले भी और पढ़ने वाले भी उसी सोशल प्रेशर में हैं, जिसमें बस जल्द से जल्द बंगला, गाड़ी, झुमके, कंगना और शोहरत हासिल कर लेना होता है।

मेरा अपना मानना है कि अगर पढ़ी हुई चीज जीवन में दिखाई न पड़ने लगे, उसे हम रियलिटी से रिलेट न कर पा रहे हों और वह स्टडी रोजमर्रा के प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने में हेल्प न करती हो, तो वह टीचिंग भी बेकार और वह स्टडी भी बेकार है। राजनीति एक प्रैक्टिकल चीज भी है और आर्ट सब्जेक्ट भी। इसकी स्पेसियालिटी यह है कि यह वेट नहीं करती कि इसे आप चूज़ करेंगे या लाइक करेंगे; यह आपके लाइफ में लोचा करने ही लगती है । जिससे जान नहीं छुड़ा सकते, उसे जान लेने में ही भलाई है। इसे जान लेने से इसका लाइफ में कलेक्टिव इस्तेमाल किया जा सकता है वर्ना कोई क्लेवर हमारा यूज़ भी करेगा जब-तब, इधर-उधर और हम करेंगे-क्लैप, लिखेंगे-नाइस और कहेंगे-वाओ ! इसी थिंकिंग से यह सीरीज शुरू की जा रही है कि इसमें अक्सर यूज़ किये जाने वाले पोलिटिकल वर्ड्स के रीयल मीनिंग्स पर बात होगी, क्योंकि राजनीतिक शब्दों के मीनिंग्स का छेड़छाड़ डेंजरस है और फेसबुक-व्हाट्सअप की दुनिया में अकुरेट मीनिंग तक पहुंचना और भी टफ है । कोशिश है कि बात डेली लैंग्वेज में हो और बिना किसी ऐकडेमिक टेंशन के कही जाए !

विचारधारा (Ideology)
केवल शब्द से पकड़ें, माने लिटरली; विचारधारा को आइडियाज का एक स्ट्रीम होना चाहिए पर मामला इतना आसान नहीं है। अब यह वर्ड, टर्म (टर्मिनोलॉजी) बन गया है और एक स्पेशल मीनिंग में यूज़ होता है। विचारधारा; एक खास विचारों का पुलिंदा है जिसके आधार पर किसी भी घटना (फिनॉमिना) को देखा, परखा, समझा और कहा जाता है।उन खास विचारों की बुनावट लॉजिकल होगी ताकि किसी भी रेशनल माइंड को अपील करे। उन खास आइडियाज से एक नजरिया (पर्स्पेक्टिव) बनाने में मदद मिलती है। समझना जरूरी यह है कि किसी आइडियोलॉजी से जब हम किसी फिनॉमिना को देखने-समझने की कोशिश करते हैं तो वह अंडरस्टैंडिंग और वह कन्क्लूजन फाइनल नहीं होता। उसी घटना को किसी दूसरे आइडियोलॉजी से किसी दुसरी तरह देखा-समझा जा सकता है।

अब जब ऐसा है कि एक आइडियोलॉजी से टोटल ट्रुथ तक पहुँचा नहीं जा सकता तो फिर आइडियोलॉजी की इम्पोर्टेंस ही क्या है ? है, हुज़ूर ! बहुत जरूरी है समझना !
हम अगड़म बगड़म माने स्पोरेडिकली या ज़िगज़ैग में सोचते हैं नॉर्मली। और यही प्रॉब्लम की जड़ है। हम फुटबाल से सोचना शुरू करते हैं, फुटबाल से रोनाल्डो तक और फिर पुर्तगाल पहुँच जाते हैं और फिर कब वास्को डी गामा के बारे में सोचते हुए गोवा के वास्को डी गामा पहुँच जाते हैं। ऐसे सोचते हैं हम, हमेशा ! इस थिंकिंग से डेफिनिट और अक्सेप्टबल कन्क्लूजन आने की पॉसिबिलिटी है बंधू बहुत लिटिल। इसलिए डिसिप्लिंड वे में थिंकिंग करना जरूरी हो जाता है। विचारधारा यानी आइडियोलॉजी उन्हीं खास आइडियाज को मिलकर कंस्ट्रक्ट किये जाते हैं जो डिसिप्लिंड थॉट प्रॉसेस से लॉजिकली अर्रेंज किये जाते हैं और इसलिए ही वे एक रेशनल माइंड को अपील भी करते हैं।

चूँकि हर आदमी अलग अलग जगह होता है और अलग अलग जगह से किसी घटना को देखते हुए ज़िगज़ैग ही सही एक कन्क्लूजन पर पहुँचता तो है ही, अक्सर उसी कन्क्लूजन को फाइनल मानने की टेंडेंसी रहती है, अक्सर इसी को लोग कहते हैं-भैया, हम ग्राउंड पे थे, हमसे जानों रियल्टी ! कोई फिनॉमिना होती एक जगह है पर उसे अलग-अलग लोग अलग-अलग जगह से अलग-अलग तरीके से परसीव करते हैं और फिर उस रियल्टी के रीयल वर्जन भी उतने ही हो जाते हैं, जितने लोग उसके बारे में ग्राउंड रिपोर्ट करते हैं। एक बात और भी है, दो आँखें हैं अपने पास, पर मिलकर भी देखती वही है जहाँ माइंड का अटेंशन होता है। जब माइंड डिसाइड करता है कि किसी सीन में ‘क्या’ देखना है तो अक्सर अपनी पुरानी ट्रेनिंग के हिसाब से वह यह भी डिसाइड करता है कि उस ‘क्या’ को ‘कैसे’ देखना है ! फिर क्या- सब अपनी-अपनी ज़िद पे रहते हैं कि-भइया, हमरी सुनो, हम ग्राउंड पे थे ! सच ये है कि जितना पास होकर देखा जाता है, उतना ही खतरा होता है। इसलिए ही रिपोर्टर को एनालिस्ट की जरुरत होती है। जिस घटना के हम विटनेस होते हैं या जिस घटना के हम खुद ही पार्ट होते हैं, वह घटना हम पर ही जाने कितना इम्पैक्ट कर रही होती है। और यह जो इम्पैक्ट होता है वह माइंड को गाइड करता है कि उस फिनॉमिना को एक खास इम्पैक्ट में ही ज़ियादा परसीव किया जाय। फ्रंट के एक सिपाही को इसीलिये डिसीजन मेकिंग के लिए दूर खड़े जनरल या हेडक़्वार्टर का आर्डर लेना होता है।

रियल्टी के इसलिए ही कई एंगेल होते हैं। सच झुकता नहीं है, परेशान हो सकता है, साहब लेकिन सच का सच यह है कि इसे टोटैलिटी में परसीव करना एक टफ चीज है। इसलिए विचारधारा और सिद्धांतों की शुरुआत हुई। आइडियोलॉजी का जो ऑब्जेक्ट है वह एनिमेट डायनामिक रियलिटी है। ह्यूमन बींग पर कोई एक प्रिंसिपल काम कर ही नहीं सकता, इसलिए ही ह्यूमन बिहैवियर से जुड़े सब्जेक्ट्स में प्रिंसिपल से अधिक पर्स्पेक्टिव इम्पोर्टेन्ट होता है और यहीं चूक होती है उनसे, जिन्होंने पिछले कई सालों से महज साइंस के ऐकजैक्टनेस (exactness) की ट्रेनिंग से अपने माइंड को ट्रेन किया हुआ है। इसमें उनकी कोई फॉल्ट भी नहीं। अपने कंट्री में साइंस, मैनेजमेंट, मेडिकल के स्वैग का पूछो मत। जहाँ, पैसा नहीं; वहां नॉलेज नहीं, मान लिया जाता है, इसे कहते हैं सोशल सायकॉलॉजी ! आर्ट्स में जब इस प्रॉब्लम को महसूस किया गया कि रियलिटी के परसीव करने के प्रोसेस में पर्सनल बायसेस (biases) आ सकते हैं तो विचारधाराओं का चलन तेजी से हुआ।

एक आइडियोलॉजी, अपने तरह की खास विचारों से बने डिसिप्लिंड थॉट प्रोसेस को ऑफर करती है। यहाँ बायसनेस की गुंजायश तो पूरी है, पर आइडियोलॉजी यूज़ करने वाला शुरू से ही अवेयर है। इसी अवेयरनेस की गुंजायश ने आइडियोलॉजी का मान बढ़ाया। अब जब हम किसी फिनॉमिना को मार्क्सिज्म की आइडियोलॉजी से देखते हैं तो अवेयर रहते हैं कि थॉट प्रोसेस का बेस क्या है। इसप्रकार फिनॉमिना को समझ भी लेते हैं और थॉट प्रोसेस पर कंट्रोल भी बना रहता है, ज़िगज़ैग नहीं होने पाता। बस एक गलती हो जाती है अक्सर। इसी गलती की वजह से आइडियोलॉजी बदनाम बहुत हैं। लेकिन इसमें गलती आइडियोलॉजी से नहीं, बंदे से होती है। यही कि, उस पार्टिकुलर आइडियोलॉजी के यूज़ से मिले कन्क्लूजन को ही फाइनल समझना। भाई, दुनिया में बहुत विचारधाराएँ हैं, क्यूंकि दुनिया बहुत बड़ी है और लोग वैरायटी में हैं, तो किसी घटना के अनगिनत ऐंगल संभव हैं तो एक आइडियोलॉजी से कुछ ऐंगल्स पकड़ में आते हैं, ज्यादातर रह ही जाते हैं। ये समझना चाहिए। तभी तो किसी एक घटना को समझने के लिए कई आइडियोलॉजीज का इस्तेमाल होता है, ताकि ज्यादातर ऐंगल्स पकड़ में आएं। एनालिसिस इसलिए ही यों की जाती है कि उसमें ग्राउंड रिपोर्ट वाला भी हो और दूर से देख रहा एनालिस्ट भी हो ! ज़िंदा डायनामिक ह्यूमन बींग जिस फिनॉमिना के पार्ट हों, उससे निकलती घटना के रियलिटी का ट्रुथ पकड़ना कभी आसान नहीं था, पर कोशिश की जाती है लगातार ताकि फ्यूचर आज से बेहतर हो। डिबेट, डिस्कशन, एनालिसिस सारे ही इसलिए ही जरूरी हैं ताकि अधिक से अधिक एंगेल पकड़ में आये। जरूरी नहीं कि हर डिस्कशन, डिबेट का कन्क्लूजन आये ही, क्योंकि यह स्टेबल ऑब्जेक्ट वाला साइंस नहीं है, यहाँ अगर डिस्कशन से अधिकांश पॉसिबल एंगेल ही खोज लिए गए तो धीरे धीरे कन्क्लूजन परसीव होते रहेंगे।

एक आइडियोलॉजी एक चश्में से अधिक कुछ नहीं होती। हमें समझना चाहिए कि लाल रंग के चश्में से सब कुछ लाल दिखेगा और हरे रंग का ग्लास होगा तो सबकुछ ग्रीन दिखेगा। मुश्किल तब होती है जब परवरिश या एजुकेशन से कोई एक ही तरह का चश्मा लगा ही रह जाता है और बंदा आँख और चश्में में फर्क ही नहीं कर पाता। कलर लैब में जैसे फोटो डेवलपिंग में हम समझते हैं कि कोई फ्रेम किस कलर में ज़ियादा निखरेगा उसी कलर का यूज़ करके बेहतरीन फोटो बनाने की कोशिश की जाती है, इसलिए ही अलग-अलग विचारधाराओं का चश्मा पहनकर घटनाएं देखने की कोशिश होती है। बस परेशानी यह है कि कइयों को दूसरा चश्मा कभी मिल ही नहीं पाता, जो मिलता भी है तो पिछला चश्मा उतारना नहीं आता। और मान लीजिये कि नंगी आँख से सब दिखेगा तो जरूर पर माइंड का घालमेल बना रहेगा।

सबसे बेहतर तो यही है कि हमारी एडुकेशन हमें पढाई के दिनों में ही ढेरों चश्मों से मिलवा दे ताकि हम किसी एक चश्मे को आँख न मानने लगें और जब चाहें वैसा चश्मा यूज़ कर रियलिटी के अधिकांश ऐंगल पकड़ सकें। मोटीमोटा जान लीजिये कि किसी भी वर्ड के बाद जो इज्म लगा होता है तो ज्यादातर वह आइडियोलॉजी होता है, ज्यादातर ! जैसे मार्क्सिज्म, लिबरलिज्म, कैपिटलिज्म, फेमिनिज्म, एट्सेटरा. यूरोप में नेशनलिज्म की आइडियोलॉजी ने वो कहर बरपाया कि दो-दो वर्ल्ड वार्स हो गए। हुआ यही कि अपने अपने नेशन का चश्मा उन्होंने उतारा ही नहीं। सो, आइडियोलॉजी समझनी पड़ेगी देर-सबेर, नहीं तो डेंजर रहगी कि कोई क्लेवर कुछ बोलकर कोई चश्मा पहनाकर टोपी न पहना दे !



Monday, December 11, 2017

नेपाली लोकतंत्र का प्रभात


डॉ. श्रीश पाठक




नेपाल की सांस्कृतिक-भौगोलिक वैविध्यता में पलने वाले उसके निवासियों को तीन मुख्य विभाजन में समझा जाता है; हिमाल, पहाड़ और तराई। तिब्बत से सटे ऊँचाई पर बसे हिमाल कहलाते है, पहाड़ के लोग मध्य नेपाल के निवासी हैं और भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार से जुड़े सीमाई लोग मधेशी अस्मिता वाले तराई के कहलाते हैं। यह विभाजन इतना सरल नहीं है पर नेपाली राजनीति में इनकी जटिलतायें महत्वपूर्ण हैं और इसलिए ही नेपाल की संविधान निर्माण की यात्रा इतनी दुरूह रही है। यह समय, नेपाल के लिए लोकतान्त्रिक सूर्योदय का है। एक साथ नयी सरकार केंद्र में भी आएगी और राज्यों में भी। एशिया के दो शक्तिशाली पड़ोसी देश भारत और चीन ध्यानपूर्वक नेपाल की राजनीतिक प्रगति को निहार रहे हैं क्योंकि सितम्बर 2015 के नए संविधान के मुताबिक वह सरकार लोकतान्त्रिक सरकार होगी, जो एक स्वतंत्र गणराज्य का नेतृत्व करेगी और सम्भावना अधिक इसी की है कि आगामी सरकार वामपंथी गठबंधन की होगी और अपना पाँच साल का कार्यकाल पूर्ण करेगी। आश्चर्यजनक रूप से इतनी मतभिन्नता एवं संघर्षों के इतिहास के बावजूद छोटे-बड़े कई दलों के देश नेपाल में दो बड़े गठबंधन उभरे और वामपंथी और दक्षिणपंथी गठबंधनों ने यह चुनाव कमोबेश सुप्रतिनिधित्व एवं विकास के मुद्दे पर लड़ा है। एक स्थाई, मजबूत, लोकतान्त्रिक सरकार किसी भी प्रकार के द्विपक्षीय समझौतों एवं संबंधों के लिए माकूल मानी जाती है, नए नेपाल के लिए यह शुभ है।   


राजनीतिक मूल्य परिवर्तित होते रहते हैं किन्तु भौगोलिक और सांस्कृतिक मूल्य अपनी निरंतरता बनाये रखते हैं। भौगोलिक दृष्टि से नेपाल एक स्थलबद्ध देश है, जो तीन तरफ से भारत के राज्यों से घिरा हुआ है और एक तरफ से चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से। भूटान और बांग्लादेश इसकी सीमा में क्रमशः पूर्व और दक्षिण में जुड़ते हैं। हिमालय क्षेत्र में बसे नेपाल में विश्व की सर्वाधिक दस ऊंची पर्वत-चोटियों में से एवरेस्ट सहित आठ चोटियाँ स्थित हैं और तीन बड़ी नदियाँ कोसी, गण्डकी और करनाली भी प्रवाहित होती हैं जिनसे महान गंगा नदी प्रणाली निर्मित होती है। नेपाल का सांस्कृतिक स्वरुप मुख्यतः देश के हिन्दू और बौद्ध धार्मिक परम्पराओं से निर्मित होता है, जिसमें इंडो-आर्यन एवं तिब्बती-मंगोलियन धारा का समावेशन प्रमुखतया से है। राजनीतिक रूप से इस समय नेपाल में दो वैचारिक धाराएँ दक्षिणपंथी और वामपंथी प्रवाह में हैं जो तीस साल के सियासी भूकंप व हालिया प्राकृतिक भूकंप से उबर विकास के पथ पर बढ़ जाने को संकल्पित हैं और आंतरिक राजनीति में तीन समानांतर अस्मिताएँ हिमाल, पहाड़ और तराई अपने अपने सम्यक प्रतिनिधित्व और नए नेपाल के आशावान भविष्य में अपनी अपनी भागेदारी सुनिश्चित करने को आतुर हैं।


हाल के वर्षों में वामपंथ के उभार के साथ ही नेपाल में चीन की प्रभावी उपस्थिति महसूस की जा रही है। चीन ने ओबोर नीति के अंतर्गत ही अपने पड़ोसी देशों से भौतिक-आर्थिक सम्बद्धता पर बेहद महत्वाकांक्षी रीति से कार्य किया है। वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों के मध्य ‘रेलवे कूटनीति’ के नाम से मशहूर चीन की इस नीति को नेपाल के सन्दर्भ में भी परखा जा सकता है। हाल ही में चीन ने नेपाली मुख्यभूमि को तिब्बत से जोड़ दिया है। चीन ने नेपाल में भारी निवेश किया है और जिसमें  अधिकांश  नेपाल की अवसरंचना विकास के लिए प्रयुक्त हो रहा है। भूकंप के बाद का नेपाल यों भी विकास की चाह शिद्दत से लिए है और चीन ने 1968 से अस्तित्व में आयी नेपाल-चीन फ्रेंडशिप हाईवे को और भी सुरक्षित और इसे व्यापार व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए उपयुक्त बनाने में रत है। चीन के सम्बन्ध नेपाल से पारंपरिक रूप से कोई प्रगाढ़ नहीं रहे हैं क्योंकि सीमावर्ती तिब्बती संस्कृति से उनका जुड़ाव भी चीनी संस्कृति से स्पष्टतया नहीं जोड़ता पर अब जबकि तिब्बत एक स्वायत्त क्षेत्र के रूप में चीन का भाग है, चीन के पारम्परिक सम्बन्ध नेपाल से प्रमुखता से उल्लेखित किये जा रहे हैं।  



भारत के नेपाल से अन्यान्य संबंधों की मिसाल इतिहास के प्रत्येक कालखंड में देखी जा सकती है। भारत-नेपाल मुक्त सीमा प्रणाली से इन संबंधों को दैनंदिन संपर्क के रूप में स्थापित किया गया। चूँकि नेपाल की पहुँच किसी समुद्र से नहीं है तो सहज ही नेपाल अपने द्विपक्षीय और वैश्विक व्यापारों के लिए भारत पर निर्भर रहा है। सांस्कृतिक-भौगोलिक संबंधों की परम्परा से राजनैतिक सम्बन्ध भी संचालित होते रहे और दुनिया तेजी से बदलती रही। भारत ने नेपाल की बदलती राजनीतिक जमीन को यथासंभव सहारा भी दिया और उनके लोकतान्त्रिक अनुभव की यात्रा में साथ भी दिया।  हालिया भूकंप में भी भारत ने यथासंभव मदद तो की पर इससे संबंधों में कोई नयी ऊष्मा नहीं आ सकी । हाल ही में रक्सौल-बीरगंज पॉइंट पर स्थानीय मधेशियों द्वारा की गयी पाँच महीने की  नाकाबंदी, जिससे कि  दैनंदिन आवश्यक चीजों की पूर्ति भी बाधित हुई; को नेपाल का आम जनमानस यह मानकर चल रहा है  कि यह भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी है और भारत ने इसकी समाप्ति के लिए कोई ठोस कदम भी नहीं उठाया । भारत ने बार-बार दुहराया कि यह नाकाबंदी नेपाल की आंतरिक तनावों की देन है पर हालिया चुनावों में इस प्रकरण का वामपंथी दलों ने भरपूर लाभ उठाया।  


दरअसल वामपंथ के मुख्यधारा में आने के कारण नेपाल में आम विमर्शों की तर्क आयोजना ही बदल गयी है, किन्तु भारत का कूटनीतिक कुटुंब अभी भी नेपाल को उसी पारम्परिक दृष्टि से देखे जा रहा है, जहाँ नेपाल अपनी सुरक्षा और आर्थिक जीवन के लिए अधिकांशतया भारत पर निर्भर रहता था। आज का नेपाल अपनी भू-राजनीतिक स्थिति की सीमायें और महत्ता समझता है। नया नेपाल जो कि अब स्वतंत्र संप्रभु लोकतंत्रिक गणराज्य है, वह संबंधों की वही परिभाषा स्वीकार करेगा जो उसकी राष्ट्रहित की अधिकतम व्याख्या की ओर उद्यत होगा। अब जबकि नेपाल अपने राजनीतिक जीवन के नए मुहाने पर खड़ा है, भारत को नेपाल के प्रति अपनी विदेश नीति चीन को केंद्र में रखते हुए ही गढ़नी चाहिए। भारत को भी समझना होगा कि नेपाल अपने राष्ट्रहित के अनुरूप ही सौदेबाजी (बार्गेन )के लिए स्वतंत्र है और हमारे प्रयास व व्यवहार ऐसे विन्यास को गढ़ने की दिशा में होने चाहिए जिसमें नेपाल को अपना सर्वाधिक हित सधता प्रतीत हो और वह सहजता में इसका निर्वहन कर सके। नेपाल के पास एक सशक्त विकल्प के तौर पर महत्वाकांक्षी चीन उपलब्ध है, इसका ध्यान रखना होगा।  


नेपाल का चीन से किये गए किसी नए करार अथवा समझ पर भारत को किसी प्रकार की असुरक्षा प्रदर्शित न करते हुए सावधानी से प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है। भारत को दूसरे अन्य विमाओं में सहयोग की सम्भावना खंगालनी होगी और परस्पर विश्वास व सम्मान को बढ़ाना होगा। नेपाल में नई सरकार से दूरगामी संबंधों की नई नींव सततता और पारस्परिकता के आलोक में ही बनेगी और फिर तब ही ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ बनेंगे। मौजूदा भारतीय सरकार ने भारतीय हितों को वैश्विक पटल पर जितनी बेहतरीन ढंग से तराशा है, कहना होगा कि अपने पड़ोसी देशों के साथ हमारे सम्बन्ध ठिठके हुए हैं। यों तो विश्व-राजनीति में संबंधों की आवश्यकता प्रति एक राष्ट्र को है पर चीन की भारत को घेरने की नीति के आलोक में हमें अपने पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का एकतरफा प्रयास भी करते रहना होगा और इसमें नेपाल के साथ सम्बन्ध बढ़ाना अहम ही नहीं अनिवार्य भी है। नेपाल को भी यह ज्ञात है कि एक भरोसेमंद साथी के तौर पर भारत का रिकॉर्ड  चीन के मुकाबले कहीं बेहतर है परन्तु भारत भी सौदेबाजी के उनके संप्रभु अधिकारों की अवहेलना नहीं कर सकता क्योंकि विश्व-राजनीति में किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रहित ही स्थाई होते हैं।


Tuesday, December 5, 2017

अटकी शिक्षा और ब्रितानी अतीत


डॉ. श्रीश पाठक*
यू सी न्यूज

आधुनिक समय में पदार्थ ने विचार/दर्शन पर विजय पा ली है और उपनिवेशवाद के अनुभव ने हमारा आत्मबोध खोखला किया है जिसे भरने की कोशिश विवेकानंद से लेकर गाँधी तक ने की थी. एक भारतीय के तौर पर अब हम स्वयं को विशिष्ट अस्मिता का मानने तो लगे हैं इस विशिष्टता की कसौटी अब भी हम पश्चिम से उधार ले रहे. हम ऐसा कर रहे क्योंकि आधुनिक समय में समानांतर, हमने अपनी कसौटियाँ जिन्हें हमारी थातियों से उभरना चाहिए था,हमने उन्हें विकसित नहीं किया. इस दिशा में प्रगति धीरे-धीरे ही होती है और इस राह में और दूसरी समस्याएं भी आती हैं. परिवर्तन कोई एक दिन का फूल नहीं. पश्चिम का पैमाना लेकर हम अलग थलग हो अपने देसी जमीन पर उपजने वाले एक-दुसरे का अनुभव नकारे जा रहे हैं, जिससे युवाओं में एक हीनताबोध उपजता है और वे लालायित हो पश्चिम की तरफ देखते हैं.


आज का भारत जिसे हम दैट इज इंडिया कहते हैं यह १९४७ में आया, १९५० में संप्रभु हुआ, इसकी जड़ें हड़प्पा के भी पीछे की हैं और इसमें जो संविधान आया उसके बनाने वालों में हिन्दू महासभा, मुस्लिम लींग, कांग्रेस, लेफ्ट, एंग्लो-इंडियन, राजपूत, दलित, मराठी, पंजाबी, मद्रासी, बंगाली, उड़िया, तमिल, मलयाली, कश्मीरी, सभी धर्मों के पंडित और आज के सभी पहचान/अस्मिता वाले लोग थे, इसमें से किसी ने बनने वाले संविधान को यह कहकर नहीं नकार दिया अथवा संविधान सभा से इस्तीफ़ा दे दिया कि यह हमें स्वीकार नहीं है अथवा यह कि यह मेरे देश का संविधान नहीं हो सकता अथवा यह ही कि इस संविधान से जिस नए राष्ट्र का निर्माण होगा उसकी तस्वीर और तासीर उन्हें मंज़ूर नहीं. भारतीय संविधान ने भारतीय संस्कृति का सत्व सुरक्षित रखा है और हम अपने-अपने धर्म, संस्कृति का सत्व सुरक्षित रख सकें इसकी व्यवस्था कर दी है.


भारतीय संस्कृति में सनातन संस्कृति, इस्लामिक संस्कृति, कैथोलिक संस्कृति आदि-आदि सभी संस्कृतियाँ मिलीजुली हैं, गुथीमुथी हैं. अब आप इसे पृथक नहीं कर सकते, हाँ; पृथक पृथक देख अवश्य सकते हैं. इस व्यक्तिगत दृष्टिकोण की संकीर्णता से संभव है कि मन में भेद उपजे और घृणा को घृत दे कोई इसका राजनीतिक-सांप्रदायिक इस्तेमाल कर ले. यहाँ नागरिक समाज को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और शिक्षा को सामाजिक-सामयिक बनाने के प्रयत्न करने होंगे। देश के व्यापक भूगोल में से किसी एक व्यक्ति को सहसा चुन लिया जाए और उसके केवल किसी एक दिन के व्यवहार के समाजशास्त्रीय विवेचन से इतना अवश्य ज्ञात हो जाता है उसकी भाषा में केवल एक भाषा के शब्द नहीं हैं,उसकी आस्था में केवल एक धर्म की व्याख्या नहीं है, उसके आचरण में रीति-रिवाजों की विविधता है.भारतीय संस्कृति एक साझी संस्कृति है और इसमें विभिन्न संस्कृतियों ने समवेत फलना-फूलना सीख लिया है.


बाकी शासनों के मुकाबले औपनिवेशिक शासन इसलिए इतने घातक सिद्ध हुए क्योंकि उन्होंने हमारी शिक्षा पर वार किया. सामाजिक शिक्षा से ही हमने सामंजस्यता का पाठ अपने सभी लोगों तक पहुँचाया था. वे चौंके थे कि १८५७ में मुसलमानों का साथ हिन्दू कैसे दे रहे हैं! क्योंकि उन्होंने जब भारत के शासक की तरफ देखा तो उन्हें एक मुसलमान दिखा. वही मुसलमान जिनसे वे अपने यूरोप में भी भयाक्रांत थे और क्रूसेड (धर्मयुद्ध) कर उनका कमोबेश सफाया कर चुके थे. उनके यूरोप में अब अमूमन हर शासक ईसाई था. भारत के शासक में उन्हें मुसलमान ही दिखाई दिया, उन्हें हिन्दुओं और अन्य धर्मों का सल्तनत में भागीदार होना नहीं दिखाई दिया. कैसे देखते वे क्योंकि यूरोप पूरा ही बदल गया था ईसाईयत में. हमारे देश में लेकिन कभी भी कुछ पूरा नहीं बदला था. उत्तर-मध्य एशिया के शक लोग आये, शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश. हिमालय के उस पार चीन से हूण आये, शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश. कुषाण आये ग्रीस बैक्ट्रिया से शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश. अरब से आये, फारस से आये, अफगानी आये, तुर्क आये, मुग़ल आये शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश. आत्मसात कर लिया और दुनिया को सह-अस्तित्व की सबसे बड़ी नजीर दी. अंग्रेज नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर एक बूढ़े शासक को बहुसंख्यक आबादी ने बागी होकर क्यूँ अपना शासक घोषित कर दिया था १८५७ में. उस बूढ़े शासक की मजार पर म्यांमार में अपनी हालिया यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी ने चादर चढ़ाई है. उसका खानदान जमींदोज कर दिया गया.


लार्ड कर्जन ने बंगाल को चुना सांस्कृतिक-सामाजिक विभाजन पैदा करने के लिए जो उन्हें लगता था कि भौगोलिक विभाजन से संभव हो जायेगा। प्रशासनिक मजबूरी बताई और बंगाल का विभाजन १९०५ में करके हिन्दू और मुस्लिम की एकता को पहला बड़ा झटका दिया. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘ आमार शोनार बांग्ला ’ का नारा देकर बंगाली अस्मिता को सबसे ऊपर रखने की दरख्वास्त की. हर धर्म के बंगाली, बच्चे, औरत, जवान, बूढ़े सड़क पर लेट गए, रातें बीतायीं, उपवास रखा और अंततः भारी दबाव के बीच १९११ तक यह विभाजन वापस लेना पड़ा. १८५७ में हम जीते, फिर हारे और हारकर हम जीत गए क्यूंकि वे हमारे वृहत्तर सामाजिक ताने-बाने का कुछ नहीं बिगाड़ पाए. १९०५ में भी हम अडिग रहे. उन्नीसवीं शती तक दुनिया की हर शक्ति हमारी साझी संस्कृति से हारती रही. इसी में घुलती मिलती रही पर अफ़सोस उसके बाद हम यह विभाजन नहीं रोक पाए.


बीसवीं शती का हमारा इतिहास विभाजन का इतिहास है. यकीनन विश्व के लिए भी यह खासा चुनौतियों वाला रहा और हम इससे अछूते नहीं रहे लेकिन जहाँ विश्व के बाकी हिस्सों ने शिक्षा का सम्यक प्रयोग कर अपने सांस्कृतिक-सामाजिक ताने बाने को आधुनिकता के साथ परम्परा का सुन्दर टीका दिया हम यहीं पिछड़ गए. शिक्षा ही वह तार है जिससे साझी संस्कृति और सामाजिकता का विद्युत प्रवाहित होता किन्तु वह तार तोड़-मरोड़ दिया गया. अंगरेजी शिक्षा ने हमारी नयी पीढ़ी की जड़ों में आत्महीनता की ग्रंथि डाल दी. भारत में रहकर भी भारत को उस तरह से खोजने की कोशिश हुई जैसे कभी कोलंबस ने अमरीका को और वास्कोडिगामा ने भारत को पाया था. इतिहास के हमारे पन्ने जिसे भारत के सभी धर्मों ने अपने अपने घरों में संजोया था, निरक्षर,अशिक्षित होकर हमने उनका मोल गँवा दिया. अब हम एक रेडीमेड इतिहास, एक रेडीमेड समाज और एक रेडीमेड शिक्षा के मोहताज हो गए. इधर तथाकथित संवैधानिक सुधार और जनगणना के नाम पर अंग्रेजों ने भारतीय समाज को कभी जाति, कभी समाज, कभी धरम और कभी भाषा के नाम पर विभाजित कर दिया. मैंकडोनाल्ड अवार्ड, सेपरेट एलेक्टोरेट और जनगणना में दी गयी अलग अलग जातियों का वर्गीकरण एक गाढ़ा जहर साबित हुआ देश के लिए. बंगाल विभाजन तो विफल किया हमारी साझी विरासत ने पर मन में विभाजन रोप दिया था अंग्रेजों ने. आगा खान तृतीय जिन्हें क्वीन विक्टोरिया ने १८९७ में ही इंडियन एम्पायर के नाईट कमांडर की ईज्जत नवाजी थी और जार्ज पंचम ने १९१२ में नाईट ग्रैंड कमांडर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द स्टार ऑफ़ इंडिया बनाया था उन्होंने मुस्लिम हितों के नाम पर १९०६ में मुस्लिम लींग की स्थापना की. ये अभिजात्य लोग थे, अवाम की इन्हें कितनी चिंता रही होगी, पता नहीं पर मुस्लिम लींग पहला बड़ा संगठन था जो धरम के नाम पर गढ़ा गया था. अंग्रेज अपनी विभाजन की जो चाल चल चुके थे वो मौलाना अबुल कलाम आजाद, अब्दुल गफ्फार खान आदि तमाम मुसलसल ईमान वाले मुसलमानों की साझी संस्कृति के लिए की गयी कोशिशों पर पानी फेरने वाली थी. अभिजात्य किसी का नहीं होता. वह महज अपना होता है. कोई धर्म हो, कोई सत्ता में हो, कोई देश हो, अपना मुनाफा आते रहना चाहिए. देखते देखते ही हिन्दू महासभा की भी स्थापना १९१५ में हो गयी, जिसकी जड़ें १९०९ के पंजाब हिन्दू महासभा तक जाती हैं. इतिहास अब कर्जन और मैकाले का अट्टहास चुपचाप सुन रहा था.


आजादी के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद देश के शिक्षा मंत्री रहे. आज की शिक्षा व्यवस्था की नींव उनकी कर्जदार है. किन्तु हम शिक्षा में समयोचित सुधार नहीं कर सके. किसी भी औपनिवेशिक इतिहास वाले देश की आजाद शिक्षा व्यवस्था के दो मूलभूत उद्देश्य होते है; देश को औपनिवेशिक सोच से मुक्ति दिलाना, उसके प्रभावों को न्यून से न्यूनतम करना; और दूसरे शिक्षा को समावेशी बनाते हुए नए विश्व के अनुरूप ढालना ! दोनों ही उद्देश्यों में हमें अभी मीलों-मीलों चलना है.


*लेखक राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक हैं.

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